गुरुवार, 30 अक्टूबर 2014

अब पत्थर पर उगेगा धान


केवल पानी में उगने वाला धान अब पथरीली जमीन पर भी उगाया जा सकेगा। छत्तीसगढ़ के इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय ने धान की ऐसी ही कई नई किस्मों को खोज निकाला है। इनमें पथरीली जमीन पर उगने वाला दगड़ धान, दुर्गेश्वरी, इंदिरा राजेश्वरी, बमलेश्वरी, दंतेश्वरी, डोकरा-डोकरी, तुलसी मंजरी, दो दाना, अम्मा रूठी और श्याम जीरा जैसी कई किस्में शामिल हैं।
धान केवल अनाज का एक रूप ही नहीं वरन छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक धरोहर है। वैसे भी सूबे को धान का कटोरा ऐसे ही नहीं कहा जाता है। यहां धान की 23 हजार 250 धान की प्रजातियां खोजी जा चुकी हैं। इसके अलावा धान की नई किस्मों की खोज जारी है। छत्तीसगढ़ के इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय ने अपने 600 एकड़ में फैले खेतों में इन प्रजातियों को संरक्षित और संवर्धन करने का काम कर रही है। विश्वविद्यालय का सेंटर फॉर बॉयोडायवर्सिटी रिसर्च एंड डेवलपमेंट धान की प्रजातियों के जर्म प्लाज्मा को सुरक्षित रखने का जिम्मा उठाए हुए है। कृषि वैज्ञानिकों का दावा है कि विश्व में फिलीपींस के बाद भारत में सबसे ज्यादा धान की किस्मों को खोजा और संरक्षित किया जा रहा है और इसमें छत्तीसगढ़ का योगदान सबसे ज्यादा है।
विश्वविद्यालय ने खुद भी धान की 15 ऐसी किस्मों को विकसित किया है, जिनकी अलग-अलग विशेषता है। इनमें से कई प्रजातियां ऐसी हैं, जो किसी भी परिस्थिति में पैदा की जा सकती है। मसलन दुर्गेश्वरीऔर इंदिरा राजेश्वरीकी फसल सूखा झेलने पर भी खराब नहीं होती। वहीं गर्मी के वक्त बोने के लिए दंतेश्वरीको विकसित किया गया है। दगड़ धान को पथरीली जमीन पर न्यूमतम पानी की उपलब्धता के साथ उगाया जा सकता है।
इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ एस के पाटिल कहते हैं कि छत्तीसगढ़ में विपुल संपदा उपलब्ध है। हमारे विश्वविद्यालय ने प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों से धान की कई किस्में खोजी है। कुछ खुद विकसित की हैं। लेकिन अभी बहुत काम किया जाना बाकी है। किसानों के पास अभी कई प्रजातियां उपलब्ध हैं, जो दुनिया से छिपी हुई हैं। उन्हें खोजकर सबके सामने लाने के लिए शोध जारी है। हम भारत सरकार से ज्यादा फंड की मांग भी कर रहे हैं। अभी तक राज्य सरकार के सहयोग से सालाना 25 लाख रुपए खर्च कर शोध, विश्लेषण और संरक्षण का काम किया जा रहा है। लेकिन इतना काफी नहीं है। लगातार नई किस्में खोजी जा रही हैं। पुरानी साढ़े तेईस हजार किस्मों को भी सुरक्षित रखना बड़ी जिम्मेदारी है। इसके लिए ज्यादा धन की आवश्यकता होगी
पौधा किस्म और कृषक सरंक्षण अधिकार प्राधिकरण नई दिल्ली के अध्यक्ष आर आर हंचिनाल कहते हैं, मैं बहुत सारे राज्यों और उनके विश्वविद्यालों में गया हूं। लेकिन जैव विविधता को संरक्षित करने के काम में छत्तीसगढ़ और यहां का कृषि विश्वविद्यालय हमारे प्राधिकरण से भी आगे है। खासतौर पर कांकेर और जगदलपुर में अच्छा काम हो रहा है। यह सुनकर ही आश्चर्य हो रहा है कि छत्तीसगढ़ में धान की साढ़े तेईस हजार किस्में हैं। इनके जर्म प्लाज्मा को संरक्षित किया जा चुका है। अब आगे की खोज जारी है। हम भी किसानों को प्रोत्साहित कर रहे हैं कि उनके भी पास यदि कोई अछूती-अलग किस्म हो, तो वे भारत सरकार के इस प्राधिकरण को बताए।
हंचिलान आगे बताते हैं कि जैव विविधता में भारत का विश्व में पहला स्थान है। विश्व में जैव विविधता के 34 हॉट स्पाट खोजे गए हैं। जिमें चार अकेले भारत में है। इसमें से एक स्थान छत्तीसगढ़ में पाया गया है। यहां के धान की किस्में खनिज, विटामिन, प्रोटीन से भरपूर है। छत्तीसगढ़ में खोजी जा रही धान की नई किस्मों को देखकर लगता है कि प्रदेश खाद्य सुरक्षा के साथ साथ पौष्टिकता की सुरक्षा भी प्रदान कर रहा है। छत्तीसगढ़ के धान में चिकित्सीय गुण भी पाए जा रहे हैं। कई प्रकार की किस्में ऐसी हैं, जिन्हें खाने से मधुमेह जैसी बीमारियों में फायदा पहुंच रहा है।
प्रदेश के कृषि संचालक प्रतापराव कृदत्त कहते हैं कि, धान की इतनी किस्मों की खोज निश्चित ही अच्छा प्रयास है। फिलीपींस में जर्म प्लाज्म के संकलन में भारत का ही अहम योगदान है। इसमें छत्तीसगढ़ एक अलग नाम के साथ उभर रहा है। यहां धान की कई ऐसी किस्में खोजी गई हैं, जो इलायची के दाने से भी छोटी हैं। वहीं पक्षीराज किस्म के दाने उड़ते हुए पक्षियों की तरह नजर आते हैं, जो कि अद्भुत खोज है। वहीं खेराघुल किस्म का दाना सबसे छोटा होता है। ये अत्यधिक सुगंधित चावल है। लेकिन चावल जैसा दिखता नहीं है
भारत सरकार द्वारा 2011-12 में पादम जीनोम संरक्षण समुदाय पुरस्कार हासिल कर चुके महासमुंद जिले के किसान तुलसीदास साव कहते हैं, छत्तीसगढ़ में ना केवल धान बल्कि आम, नीबू और केले की भी कई ऐसी प्रजातियां मौजूद हैं, जिससे देश के दूसरे इलाके के किसान परिचित नहीं है। इन किस्मों के आम के पेड़ हर साल और नीबूं के पेड़ साल में दो से तीन बार फल दे रहे हैं। धान में तो प्रदेश काफी समृद्ध है ही। इसके अलावा विश्वविद्यालय ना केवल नई किस्मों की खोज कर रहा है, बल्कि किसानों को उससे परिचित भी करवा रहा है
वहीं कृषि वैज्ञानिक के के साहू कहते हैं कि धान की किस्मों के सरंक्षण का काम सराहनीय है। प्रदेश में हर किसान के पास अपनी अलग किस्म है। लेकिन केवल कुछ किस्में ही अपनी पहचान बना पाई हैं। जिसमें विष्णुभोग, दुबराज, बादशाह भोग जैसी सुगंधित प्रजातियां शामिल हैं। लेकिन अभी भी धान की कई अनजानी किस्में मौजूद हैं। जिनपर काम किया जाना बाकी है।
धान में 62 गुण होते हैं। जो हरेक किस्म को दूसरी से अलग करते हैं। किसी की पत्ती बड़ी होती है तो किसी का दाना। कोई धान की सुगंधित किस्म होती है, तो किसी में कोई सुगंध नहीं होती। इसी तरह धान की फसल पकने में अलग-अलग समय निर्धारित होता है। किसी प्रजाति की फसल 105 दिन में पक कर तैयार हो जाती है तो किसी को पकने में 135 दिन का वक्त लगता है। विश्वविद्यालय ने जिन खास किस्मों को खोजा है। उनमें सबकी अलग-अलग खासियत है। मसलन दो दाना और राम लक्ष्मण में एक ही खोल में दो दाने पाए जाते हैं। कभी-कभी तीन दाने भी मिल जाते हैं। इसी तरह महासमुंद से खोजा गया हनुमान लंगूर में सबसे लंबा दाना पाया जाता है। सराई फूल कमजोरी दूर करने के लिए लाभकारी है। वहीं महाराजी नई माताओं के लिए लाभकारी है। खासतौर से उनके लिए जिन्हें प्रसूति के वक्त ज्यादा रक्त बहने से कमजोरी आई हो। गाथुवन से जोड़ों के दर्द की शिकायत दूर की जा सकती है। नारियल चुडी विशेष रूप से दलदली जमीन और गहरे पानी में उगाया जाने वाला धान है। रोटी चपाती और ब्रेड बनाने के लिए उपयुक्त धान है। वहीं हाथीपंजारा नाम के ही अनुरूप मोटा धान है। तुलसी की मंजरी के जैसा दिखने वाली किस्म है तुलसी मंजरी। वहीं जीरे के अनुरूप दिखने वाली प्रजाती है जीरा धान। इन धान की प्रजातियों के जर्म प्लाज्मा को रायपुर में संरक्षित किया गया है ताकि आने वाली पीढ़ियां भी इनका फायदा उठा सकें।
बहरहाल धान के कटोरे को समृद्ध बनाने के लिए किसान, वैज्ञानिक और विशेषज्ञ दिन-रात मेहनत कर रहे हैं। सूबे के कृषि वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि वो समय भी जल्द आएगा, जब प्रदेश की धान की नई किस्में देश और दुनिया के हिस्सों में भी उगाई जाएंगी। फिलवक्त तो छत्तीसगढ़ में परंपरागत किस्मों के अलावा नई किस्मों की पैदावार लेने का प्रयोग शुरु किया जा चुका है। जो विश्व के सामने एक नजीर पेश करेगा।
पूर्वजों द्वारा संरक्षित किस्मों की खोज
धान की नई किस्मों की खोज जारी है। इसमें अब केंद्र सरकार भी बढ़चढ़ कर भाग ले रही है। केंद्र द्वारा किसानों को भी प्रोत्साहित किया जा रहा है कि वे भारत सरकार के 2001 में बनाए गए कानून पौध किस्म और कृषक अधिकार संरक्षण के तहत अपनी किस्मों को खुद के नाम से पंजीकृत करवाएं। इसके लिए केंद्र सरकार द्वारा गठित प्राधिकरण के रजिस्ट्रार डॉ रवि प्रकाश कहते हैं कि हमारे पूर्वजों ने ना केवल धान बल्कि दूसरी फसलों के बीजों का सरंक्षण कर नई पीढ़ियों को हस्तांतरित किया। अब हमारा दायित्व है कि हम ना केवल उन्हें खोजें बल्कि बोयें भी। अब केंद्र सरकार ने किसानों को मालिक के रूप में किस्मों का पंजीकरण कराने का अधिकार दे दिया है। ऐसा करके हम नई किस्में खोज रहे हैं, वहीं किसानों को अपने पूर्वजों द्वारा संरक्षित प्रजातियों का मालिकाना हक मिल रहा है। भविष्य में जिससे उन्हें कई फायदे होंगे।
इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय द्वारा विकसित किस्में

महामाया (1995), श्यामला(1997), पूर्णिमा(1997), दंतेश्वरी(1997), बमलेश्वरी(2001), इंदिरा सुंगधित धान(2004), जलडूबी(2006), समलेश्वरी(2006), इंदिरा सोना(2006), कर्मा महसूरी(2007), महेश्वरी(2009), इंदिरा बरानी धान(2010), इंदिरा राजेश्वरी और दुर्गेश्वरी(2011)। 

संकट में अन्नदाता

छत्तीसगढ़ सरकार यह बात गर्व से कहती आई है कि उनके यहां किसान कभी कर्जे में नहीं डूबता। यही कारण है कि महाराष्ट्र के विदर्भ और मराठवाड़ा में आत्महत्या कर ईहलीला समाप्त करने वाले किसानों के आंकडे छ्त्तीसगढ़ में शून्य हैं। लेकिन क्या सरकार के यह दावे आने वाले दिनों में भी बरकरार रह पाएंगे, क्योंकि सरकार के एक फैसले ने अन्नदाता किसानों को संकट में डाल दिया है।

छत्तीसगढ़ और धान का रिश्ता सदियों पुराना है। सूबे की 80 फीसदी आबादी की जीविका खेती-किसानी पर निर्भर है, उसमें भी 70 फीसदी किसान केवल धान उपजाते हैं। समर्थन मूल्य पर धान की खरीदी और उस पर मिलने वाला बोनस अब तक किसानों को खेती से जुड़े रहने के लिए प्रोत्साहित भी करता रहा है, लेकिन अब तक पूरा का पूरा धान समर्थन मूल्य पर खरीदने वाली सरकार के नए फैसले से अन्नदाता की कमर टूटती नजर आ रही है। किसानों पर आया यह संकट कहीं छत्तीसगढ़ को भी महाराष्ट्र बनने पर मजबूर ना कर दे। दरअसल छत्तीसगढ़ सरकार अब किसानों से प्रति एकड़ केवल दस क्विंटल धान ही खरीदेगी। सहकारी समितियों के माध्यम से समर्थन मूल्य पर धान खरीदी एक दिसंबर से शुरू की जाएगी। मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह की अध्यक्षता में हुई छत्तीसगढ़ मंत्रिपरिषद की बैठातक में लिए गए इस फैसले का ऐलान राज्य के खाद्य मंत्री पून्नूलाल मोहिले ने इसी पखवाड़े किया है। सरकार के इस फैसले का चारो तरफ विरोध हो रहा है।
अपने फैसले के पीछे सरकार का एक तर्क यह है कि छत्तीसगढ़ में 2001 से 2010-11 तक धान खरीद में 34 सौ करोड़ रूपयों का घाटा हो चुका है। इसके बाद 2011-12 और 12-13 तक करीब 1400 करोड़ की औसत हानि दर्ज की जा चुकी है। 2013-14 में अब तक की सबसे बड़ी खरीद 80 लाख मीट्रिक टन धान खरीद से हुए नुकसान का आंकलन किया जाना अभी बाकी है। एमएसपी पर धान खरीद घाटे का सौदा बनने की कई वजहें हैं। जब धान की खरीद होती है तो उसमें 17 फीसदी नमी होती है, यही धान जब सूखता है तो उसके वजन में कमी आ जाती है। खरीद केंद्रों और संग्रहण केंद्रों में रखरखाव की कमी से धान गीला होता है, सड़ता है, यही नहीं धान की अफरा-तफरी और परिवहन के दौरान चोरी से भी नुकसान होता है।
प्रदेश में प्रति एकड़ धान के औसत उत्पादन के आधार पर प्रति एकड़ दस क्विंटल धान खरीदने के निर्णय के पीछे सरकार का दूसरा तर्क यह है कि सभी इलाकों में धान का उत्पादन एक बराबर नहीं है। कहीं अधिक तो कहीं कम उत्पादन होता है। राज्य सरकार द्वारा उत्पादन के आधार पर अलग-अलग जिलों के लिए प्रति एकड़ धान खरीदी की मात्रा तय करने पर विचार किया गया, लेकिन इसमें एकरूपता न होने के कारण विवाद की स्थिति बन सकती थी, इसलिए पूरे प्रदेश में प्रति एकड़ दस क्विंटल धान खरीदने पर सहमति बनी। जबकि किसान नेताओं का कहना है कि छत्तीसगढ़ में प्रति एकड़ 25 से 30 क्विंटल धान पैदा होता है। इसमें केवल दस क्विंटल को समर्थन मूल्य पर खरीदे जाने का फैसले से किसानों की कमर ही टूट जाएगी।
सरकार के फैसले के पीछे की असल कहानी यह है कि छत्तीसगढ़ में हर साल न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर होने वाली धान की खरीद साल दर साल घाटे का सौदा बनती जा रही है। 2001 से शुरू हुई इस प्रक्रिया से अब तक साढ़े तीन हजार करोड़ से अधिक नुकसान हो चुका है। इस घाटे की वजह यह है कि खरीदे गए धान के रखरखाव में आपराधिक लापरवाही, गुणवत्ता विहीन धान की खरीदी, परिवहन के दौरान चोरी तो है ही, इसके अलावा जानकारों का मानना है कि धान खरीद पर दिया जा रहा बोनस भी एक बड़ी वजह है।
सरकार इस साल भी 300 प्रति क्विंटल के हिसाब से 2400 करोड़ का बोनस बांटने जा रही है, लेकिन इस राशि का सबसे बड़ा हिस्सा वे बड़े किसान उठा रहे हैं, जो सबसे अधिक धान बेचते हैं। ऐसे किसानों की संख्या करीब 20 फीसदी है। इसी तरह 10 प्रतिशत मध्यम किसानों को बोनस का लाभ मिल रहा है, लेकिन करीब 70 फीसदी ऐसे किसान हैं, जो केवल अपनी जरूरत का ही धान उपजाते हैं और एमएसपी (मिनिमम सपोर्ट प्राइज़) पर नहीं बेचते हैं। इसलिए इन किसानों को बोनस का लाभ मिलने का सवाल ही नहीं है।
राज्य सरकार ने अब धान पर बोनस योजना से भी पीछा छुड़ाने की कवायद शुरू कर दी है। पिछले दिनों केंद्रीय खाद्य मंत्री रामविलास पासवान जब खाद्य मंत्री के रूप में पहली बार छत्तीसगढ़ आए तो मुख्यमंत्री डॉ.रमनसिंह ने उनके समक्ष मांग रखी कि केंद्र सरकार सौ फीसदी धान का उपार्जन खुद करे।
केंद्र सरकार यह मांग कब मंजूर करेगी और कब से एमएसपी पर केंद्र द्वारा धान खरीद की व्यवस्था होगी, यह सवाल बेहद पेचीदा है, लेकिन इससे पहले छत्तीसगढ़ में धान खरीद का सौदा एक बड़े घाटे का सौदा बना हुआ है। छत्तीसगढ़ राज्य गठन के बाद राज्य सरकार ने 2001 से न्यूनतम समर्थन मूल्य पर धान खरीद शुरू की थी। उस समय मात्र 4 लाख 63 हजार मीट्रिक टन धान खरीदा गया था। इस समय घाटा बहुत कम था, लेकिन साल-दर साल खरीद का यह आंकड़ा बढ़कर पिछले साल 2013-14 तक करीब 80 लाख मीट्रिक टन जा पहुंचा है। इसके साथ ही खरीद पर नुकसान के आंकड़े बढ़कर विशालकाय हो गए हैं।
कांग्रेस अध्यक्ष भूपेश बघेल ने फैसले को किसानों के साथ धोखा बताया है। बघेल का कहना है कि भाजपा ने घोषणा पत्र में किसानों के एक-एक दाने धान की खरीदी का वादा किया था। लेकिन सरकार बनते ही एक एकड़ में सिर्फ दस क्विंटल खरीदी का फैसला किया है। सरकार ने किसानों को कम बोनस देने के लिए कम धान की खरीदी का फैसला किया है।
पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी ने किसानों को अपने निवास पर बुलाकर सरकार के फैसले का कड़ा विरोध करने की नसीहत दी है। साथ ही कांग्रेस से इतर आंदोलन चलाने की सलाह भी दी है।

खाद्य मंत्री पुन्नूलाल मोहले कहते हैं कि, छत्तीसगढ़ सरकार के पास धान व चावल का पर्याप्त स्टॉक है। इन परिस्थितियों को देखते हुए सरकार को यह निर्णय लेना पड़ा है। किसानों को धान बोनस दिए जाने के सवाल पर खाद्य मंत्री ने कहा कि अभी तो खरीदी शुरू नहीं हुई है। इस पर बाद में विचार करेंगे और केंद्र सरकार से चर्चा की जाएगी।

बाजार के हवाले किसान

छत्तीसगढ़ सरकार ने अपने एक फैसले को बदलते हुए किसान को बाजार के हवाले कर दिया है। अब तब सरकार को धान बेचता आ रहा किसान अब व्यापारियों के दरवाजे पर दस्तक देने को मजबूर हो जाएगा। धान ने एक बार फिर छत्तीसगढ़ की सियासत को गरमा दिया है।

छत्तीसगढ़ सरकार अब किसानों से प्रति एकड़ केवल दस क्विंटल धान ही खरीदेगी। सहकारी समितियों के माध्यम से समर्थन मूल्य पर धान खरीदी एक दिसंबर से शुरू की जाएगी। मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह की अध्यक्षता में हुई छत्तीसगढ़ मंत्रिपरिषद की बैठातक में लिए गए इस फैसले का ऐलान राज्य के खाद्य मंत्री पून्नूलाल मोहिले ने इसी पखवाड़े किया है। सरकार के इस फैसले का कांग्रेस सहित किसान संगठनों ने जोरदार विरोध किया है।
प्रदेश में प्रति एकड़ धान के औसत उत्पादन के आधार पर प्रति एकड़ दस क्विंटल धान खरीदने के निर्णय के पीछे सरकार का तर्क है कि सभी इलाकों में धान का उत्पादन एक बराबर नहीं है। कहीं अधिक तो कहीं कम उत्पादन होता है। राज्य सरकार द्वारा उत्पादन के आधार पर अलग-अलग जिलों के लिए प्रति एकड़ धान खरीदी की मात्रा तय करने पर विचार किया गया, लेकिन इसमें एकरूपता न होने के कारण विवाद की स्थिति बन सकती थी, इसलिए पूरे प्रदेश में प्रति एकड़ दस क्विंटल धान खरीदने पर सहमति बनी। जबकि किसान नेताओं का कहना है कि छत्तीसगढ़ में प्रति एकड़ 25 से 30 क्विंटल धान पैदा होता है। इसमें केवल दस क्विंटल को समर्थन मूल्य पर खरीदे जाने का फैसले से किसानों की कमर ही टूट जाएगी। किसान नेता वैगेंद्र कहते हैं कि दस क्विंटल की खरीदी में जो पैसा मिलेगा, वो तो किसानों के उस कर्जे को भी नहीं उतार पाएगा, जो उन्होंने खेती करने के लिए लिया है। बाकी धान बिचौलियों के मार्फेत औने-पोने दाम में व्यापारी खरीदेंगे। किसान नेता अनिल दुबे कहते हैं कि सरकार का ये फैसला व्यापारियों को मालामाल कर देगा, वहीं किसान कंगाल हो जाएंगे।
खाद्य मंत्री पुन्नूलाल मोहले सरकार के फैसले पर अपना तर्क कुछ यूं रखते हैं कि, छत्तीसगढ़ सरकार के पास धान व चावल का पर्याप्त स्टॉक है। इन परिस्थितियों को देखते हुए सरकार को यह निर्णय लेना पड़ा है। किसानों को धान बोनस दिए जाने के सवाल पर खाद्य मंत्री ने कहा कि अभी तो खरीदी शुरू नहीं हुई है। इस पर बाद में विचार करेंगे और केंद्र सरकार से चर्चा की जाएगी।
दरअसल सरकार के फैसले के पीछे की असल कहानी यह है कि छत्तीसगढ़ में हर साल न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर होने वाली धान की खरीद साल दर साल घाटे का सौदा बनती जा रही है। 2001 से शुरू हुई इस प्रक्रिया से अब तक साढ़े तीन हजार करोड़ से अधिक नुकसान हो चुका है। इस घाटे की वजह यह है कि खरीदे गए धान के रखरखाव में आपराधिक लापरवाही, गुणवत्ता विहीन धान की खरीदी, परिवहन के दौरान चोरी तो है ही, इसके अलावा जानकारों का मानना है कि धान खरीद पर दिया जा रहा बोनस भी एक बड़ी वजह है।
सरकार इस साल भी 300 प्रति क्विंटल के हिसाब से 2400 करोड़ का बोनस बांटने जा रही है, लेकिन इस राशि का सबसे बड़ा हिस्सा वे बड़े किसान उठा रहे हैं, जो सबसे अधिक धान बेचते हैं। ऐसे किसानों की संख्या करीब 20 फीसदी है। इसी तरह 10 प्रतिशत मध्यम किसानों को बोनस का लाभ मिल रहा है, लेकिन करीब 70 फीसदी ऐसे किसान हैं, जो केवल अपनी जरूरत का ही धान उपजाते हैं और एमएसपी (मिनिमम सपोर्ट प्राइज़) पर नहीं बेचते हैं। इसलिए इन किसानों को बोनस का लाभ मिलने का सवाल ही नहीं है।
कारण चाहे जो भी हो, लेकिन प्रदेश सरकार के नए फैसले का कांग्रेस ने कड़ा विरोध किया है। कांग्रेस अध्यक्ष भूपेश बघेल ने फैसले को किसानों के साथ धोखा बताया है। बघेल का कहना है कि भाजपा ने घोषणा पत्र में किसानों के एक-एक दाने धान की खरीदी का वादा किया था। लेकिन सरकार बनते ही एक एकड़ में सिर्फ दस क्विंटल खरीदी का फैसला किया है। सरकार ने किसानों को कम बोनस देने के लिए कम धान की खरीदी का फैसला किया है।
पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी ने भी सभी किसानों को दलगत राजनीति से ऊपर उठकर सरकार के फैसले का विरोध करने की अपील की है। जोगी ने अपने बंगले पर किसान नेताओं की बैठक भी ले ड़ाली।
दूसरी तरफ किसान-मजदूर संघ ने छत्तीसगढ़ के किसानों से समर्थन मूल्य पर राज्य सरकार द्वारा धान खरीदी में प्रति एकड़ दस क्विंटल धान खरीदने और बोनस अब तक घोषित नहीं किए जाने पर नाराजगी जताते हुए कहा है कि  प्रदेश के किसानों से प्रति एकड़ कम से कम बीस क्विंटल धान समर्थन मूल्य पर खरीदने की तत्काल व्यवस्था करे। संघ ने मांग की है कि भाजपा सरकार 2013 के चुनावी घोषणापत्र में 300 रुपए प्रति क्विंटल बोनस भुगतान सुनिश्चित करे, अन्यथा प्रदेशभर के किसान-मजदूर आंदोलन करने बाध्य होंगे। संघ के संयोजक ललित चंद्रनाहू का कहना है कि यदि राज्य सरकार समय रहते किसानों के हित में निर्णय नहीं लेगी, तो किसान-मजदूर संघ प्रदेश के अन्य किसान संगठनों को साथ लेकर इस मुददे पर कोर्ट जा सकते हैं। उन्होंने आरोप लगाया, सरकारी अव्यवस्था से समितियों को नुकसान पहुंचा है। पहले राज्य सरकार समर्थन मूल्य पर धान खरीदी व्यवस्था सुनिश्चित करे। सहकारी चावल मिलों को शुरू कराने का सुझाव भी उन्होंने दिया ।
इधर राज्य सरकार ने अब धान पर बोनस योजना से भी पीछा छुड़ाने की कवायद शुरू कर दी है। पिछले दिनों केंद्रीय खाद्य मंत्री रामविलास पासवान जब खाद्य मंत्री के रूप में पहली बार छत्तीसगढ़ आए तो मुख्यमंत्री डॉ.रमनसिंह ने उनके समक्ष मांग रखी कि केंद्र सरकार सौ फीसदी धान का उपार्जन खुद करे।
केंद्र सरकार यह मांग कब मंजूर करेगी और कब से एमएसपी पर केंद्र द्वारा धान खरीद की व्यवस्था होगी, यह सवाल बेहद पेचीदा है, लेकिन इससे पहले छत्तीसगढ़ में धान खरीद का सौदा एक बड़े घाटे का सौदा बना हुआ है। छत्तीसगढ़ राज्य गठन के बाद राज्य सरकार ने 2001 से न्यूनतम समर्थन मूल्य पर धान खरीद शुरू की थी। उस समय मात्र 4 लाख 63 हजार मीट्रिक टन धान खरीदा गया था। इस समय घाटा बहुत कम था, लेकिन साल-दर साल खरीद का यह आंकड़ा बढ़कर पिछले साल 2013-14 तक करीब 80 लाख मीट्रिक टन जा पहुंचा है। इसके साथ ही खरीद पर नुकसान के आंकड़े बढ़कर विशालकाय हो गए हैं।
34 सौ करोड़ का घाटा
छत्तीसगढ़ में 2001 से 2010-11 तक धान खरीद में 34 सौ करोड़ रूपयों का घाटा हो चुका है। इसके बाद 2011-12 और 12-13 तक करीब 1400 करोड़ की औसत हानि दर्ज की जा चुकी है। 2013-14 में अब तक की सबसे बड़ी खरीद 80 लाख मीट्रिक टन धान खरीद से हुए नुकसान का आंकलन किया जाना अभी बाकी है।
धान पर सियासत
राज्य की करीब 80 फीसदी आबादी कृषि पर आधारित है, यही कारण है कि प्रदेश की राजनीति के केंद्र में किसान और उससे जुड़े मुद्दे शामिल हैं। किसानों का धान खरीदने, बोनस देने जैसे मामले सड़क से लेकर सदन में हमेशा उठते रहते हैं, लेकिन अब जबकि राज्य सरकार ने सौ फीसदी की खरीद केंद्र से करने का आग्रह किया है, माना जा रहा है कि अब यह मामला राज्य से निकलकर केंद्र की राजनीति को भी प्रभावित कर सकता है।
क्यों हो रहा घाटा?
एमएसपी पर धान खरीद घाटे का सौदा बनने की कई वजहें हैं। जब धान की खरीद होती है तो उसमें 17 फीसदी नमी होती है, यही धान जब सूखता है तो उसके वजन में कमी आ जाती है। खरीद केंद्रों और संग्रहण केंद्रों में रखरखाव की कमी से धान गीला होता है, सड़ता है, यही नहीं धान की अफरा-तफरी और परिवहन के दौरान चोरी से भी नुकसान होता है।
केवल बड़े किसानों को ही मिलता है बोनस का लाभ
सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त फूड सिक्योरिटी कमिश्नर समीर गर्ग का मानना है कि यह बिलकुल सहीं है कि धान खरीद में घाटे की सबसे बड़ी वजह धान पर दिया जाने वाला बोनस है। बोनस का लाभ केवल बड़े किसानों को ही मिल रहा है, जो बड़ी मात्रा में धान बेचते हैं। छत्तीसगढ़ में समर्थन मूल्य पर 11 लाख किसान धान बेचते हैं, इनमें 4 लाख किसान ऐसे हैं जो बड़ी मात्रा में धान बेचते हैं। इन्हें ही सबसे अधिक लाभ मिल रहा है। इनके अतिरिक्त धान बेचने वाले अन्य किसानों को लाभ मिलता है, लेकिन बहुत कम। गर्ग का कहना है कि धान पर बोनस दिए जाने पर कोई सामाजिक लाभ नहीं है। उनका यह भी कहना है कि सरकार को बोनस बांटने के बजाय बोनस में खर्च होने वाली राशि का उपयोग छोटे और गरीब किसानों की फसल की उत्पादकता बढ़ाने के लिए किया जाना चाहिए। धान खरीद से हर साल होने वाला घाटा जिस रफ्तार से बढ़ रहा है, आने वाले समय में यह और अधिक बढ़ेगा।
उनके मुताबिक न्यूनतम समर्थन मूल्य पर धान खरीदी के एवज में जितनी राशि दी जा रही है, वह पर्याप्त है। इसके अलावा अतिरिक्त बोनस दिए जाने के पीछे राजनीतिक कारण भी हैं। उल्लेखनीय है कि 2013 को विधानसभा चुनाव में भाजपा ने किसानों को 300 रुपए प्रति क्विंटल बोनस देने की घोषणा की थी। इस घोषणा के पालन में ही सरकार को 2400 करोड़ रुपए खर्च करने पड़ रहे हैं।
कागज पर रहता है स्टॉक
राज्य विधानसभा में धान खरीद में नुकसान और धान की बर्बादी का मुद्दा उठा चुके कांग्रेस विधायक मोतीलाल देवांगन का कहना है कि राज्य सरकार की लापरवाही से घाटा हो रहा है। धान सड़ रहा है या खराब हो रहा है। अरबों रुपए धान के रखरखाव के लिए मिलते हैं पर उसकी व्यवस्था ढंग से नहीं की जाती है। कई जगह गड़बड़ी पाई गई है। स्टॉक कागज पर रहता है। अब भौतिक सत्यापन होने से गड़बडियां सामने आ रही हैं।
धानखरीद (लाख मीट्रिक टन)
2000-01 में - 4.63
2001-02 में 13.34
2002-03 मे -14.74
2003-04 में 27.05
2004-05 में 28.82
2005-06 में 35.86
2006-07 में 37.07
2007-08 में 31.51
2008-09 में 37.47
2009-10 में 44.28
2010-11 में 51.00
2011-12 में 59.68
2012-13में 71.36

2013-14 में 79.72

बुधवार, 29 अक्टूबर 2014

मानव-हाथी संघर्षः राज्य सरकार बनी मूक दर्शक

बहुत साल पहले बॉलीवुड के एक फिल्म आई थी, हाथी मेरे साथी। इस मूवी में नायक और हाथी की दोस्ती ने सिनेमाहाल में बैठे दर्शक को खूब रुलाया, गुदगुदाया और प्रेरित किया था कि कैसे एक वन्य प्राणी भी इंसान का अच्छा दोस्त हो सकता है। लेकिन छत्तीसगढ़ में इन दिनों बिलकुल इसके उलट स्थिति बन रही है।

छत्तीसगढ़ में 250 से अधिक हाथी जंगलों में विचरण कर रहे हैं। इनमें से ज्यादातर हाथी भोजन की तलाश में गावों की तरफ रुख करते हैं और परिणामस्वरूप हाथियों और मानव के बीच द्वंद्व की स्थिति निर्मित होती है। प्रदेश में एक साल के भीतर करीब 23 लोगों की जान हाथियों ने ली है। ऐसा नहीं है कि केवल मानव ही मर रहे हैं, इस संघर्ष में हाथियों की जान भी जा रही है। लेकिन राज्य सरकार के कानों में जूं तक नहीं रेंग रही है।
पर्यावरण के क्षेत्र में काम कर रही अंतर्राष्ट्रीय संस्था ग्रीनपीस इंडिया ने हाल ही में एक रिपोर्ट जारी की है। इस रिपोर्ट में दावा किया गया है कि छत्तीसगढ़ में मानव-हाथी संघर्ष कई गुना बढ़ गया है। इतना ही नहीं, ग्रीनपीस का आरोप भी है कि हाथियों के विचरण वाले इलाकों में फैले कोल ब्लॉकों की लालच में जानबूझकर मानव-हाथी संघर्ष को बढ़ावा दिया जा रहा है, ताकि उस इलाके से हाथी और रहने वाले लोग, दोनों एक-दूसरे के डर से भाग जाएं
ग्रीनपीस की हालिया रिपोर्ट एलिफेंट इन द रूम में छत्तीसगढ़ के चार वन प्रभागों दक्षिण सरगुजा, कटघोरा, कोरबा और धर्मजयगढ़ में मानव हाथी संघर्ष का अध्ययन किया गया है। इन चारों इलाकों में दो कोल ब्लॉक हसदेव अरण्य और मंडरायगढ़ मौजूद है। कोल ब्लॉक की लालच में स्थानीय लोगों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के विरोध और चेतावनी के बावजूद राज्य सरकार ने लेमरू हाथी रिजर्व को अधिसूचित करने के बजाए ठंडे बस्ते में डाल दिया। लेमरू हाथी रिजर्व राज्य सरकार की एक महती योजना थी, जिसके द्वारा हाथियों के सरंक्षण और संवर्धन की योजना बनाई गई थी। राज्य सरकार के इस कदम के बाद यह कहा जाने लगा कि अफसर हाथियों को बचाने के बजाए जंगलों में पड़ने वाले कोल ब्लाक के खनन के लिए अधिक उत्सुक हैं।

दूसरी तरफ हालिया वर्षों में छत्तीसगढ़ में हाथियों की संख्या लगातार बढ़ है। ओडिशा और झारखंड में जंगलों की अंधाधुंध कटाई की वजह से 80 के दशक में हाथियों ने राज्य के जगंलों की तरफ पलायन शुरु किया था। यही कारण रहा कि मानव-हाथी संघर्ष बढ़ने से मानव मौत, जानवरों और संपत्ति को नुकसान पंहुचने लगा। पिछले पांच वर्षों में हाथियों के हमले में मरने वालों की संख्या 8 गुनी बढ़ गई। ग्रीनपीस की रिपोर्ट में भी दावा किया गया है कि साल 2005 के बाद प्रति साल कम से कम 25 लोगों की औसत मृत्यु सरकारी दस्तावेजों में दर्ज की गई है। 
ऐसा नहीं है कि नुकसान केवल मानव का हो रहा है। साल 2005 से 2013 के बीच छत्तीसगढ़ में 14 हाथियों की भी बिजली के झटके खाने से मौत हो गई है। इस पूरी अवधि में मानव-हाथी संघर्ष की वजह से 198 लोगों की मौत हुई। राज्य में 2004 से 2014 के बीच संपत्ति नुकसान की भी 8,657 और फसल नुकसान की 99,152 घटनाएं दर्ज की गईं। इस पूरी अवधि में मानव-हाथी संघर्ष की वजह से 2,140.20 लाख की राशि भी मुआवजे के तौर पर बांटी गई।
यह भी एक संयोग ही है कि जिन इलाकों में उक्त घटनाएं दर्ज की गई हैं, सरकार उन्हीं इलाकों के कोल ब्लाकों में खनन करने की इच्छुक है। इससे जान-माल का नुकसान बढ़ने की आशंका गहरा गई है।
ग्रीन पीस के कैंपेनर और रिपोर्ट के लेखक नंदीकेश शिवलिंगम ने  बताया कि कोल ब्लाक के एरिया में हाथियों की मौजूदगी और कोरबा व धर्मजयगढ़ में काम कर रहे पर्यावरण कार्यकर्ताओं की चेतावनी और सलाह के बावजूद राज्य सरकार संभवतः खनन के कारण ही प्रस्तावित लेमरू हाथी रिजर्व के प्रस्ताव से पीछे हट गई है। शिवलिंगम कहते हैं कि यह जंगल ना सिर्फ हाथियों के लिए बल्कि भालू, तेंदुओं और संभवतः बाघों का भी घर है। लेकिन विडंबना यह है कि केंद्र से लेमरू हाथी रिजर्व के लिए 2007 में हरी झंडी मिलने के बावजूद राज्य सरकार ने इसे रद्द कर दिया।
छत्तीसगढ़ में चल रहे मानव-हाथी संघर्ष पर अतंर्राष्ट्रीय गोल्डमैन पर्यावरण पुरस्कार प्राप्त सामाजिक कार्यकर्ता रमेश अग्रवाल कहते हैं कि राज्य सरकार द्वारा इन जंगलों से दूर हाथियों के लिए सुरक्षित क्षेत्र बनाने के लिए प्रस्ताव इस समस्या का हल नहीं है। हाथियों ने छत्तीसगढ़ के जंगलों में रहना और प्रजनन करना शुरु कर दिया है। राज्य के लोगों और वन जीवन की सुरक्षा के लिए एक सक्षम रणनीति की जरूरत है।
छत्तीसगढ़ में यह बहस तब शुरु हुई है, जब सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला देते हुए 214 कोल ब्लाक के आवंटन को अवैध घोषित कर दिया है। इसमें छत्तीसगढ़ के कोल ब्लाक भी शामिल हैं। हालिया फैसले से भारतीय जंगलों को बचाने की कोशिश कर रह कार्यकर्ताओं में खुशी है। शिवलिंगम भी कहते हैं कि सरकार को गलत को सही करने का एक मौका मिला है। अब हम केंद्र से मांग कर रह हैं कि वो जंगल क्षेत्र के भीतर स्थित कोल ब्लाकों की नीलामी से बचे और एक स्वंतत्र समिति का गठन करे, जो राज्य में हाथियों की गतिविधियों का अध्ययन करके उनके प्रवासी मार्ग और मानव-वन्यजीव संघर्ष के प्रबंधन के लिए उचित व आवश्यक सुझाव दे
दूसरी तरफ वन विभाग के अफसर मुआवजा बांटकर अपने कर्त्तव्यों की इतिश्री मान लेते हैं। राज्य सरकार ने अलग-अलग मुआवजा तय कर रखा है। इसमें हिंसक वन्यजीवों से जनहानि होने पर 3 लाख, स्थाई अपंगता होने पर 1.5 लाख, साधारण घायल होने पर 40 हजार, पशु हानि होने पर 20 हजार की राशि के मुआवजे का प्रावधान किया है। 
हाथियों की मौत का क्या?
मनुष्यों को तो राज्य सरकार मुआवजा बांटकर चुप करवा रही है। लेकिन मरने वाले हाथियों की क्षतिपूर्ति के बारे में राज्य सरकार के पास कोई एक्शन प्लान नहीं है। उलटे हाथियों को मारने के लिए (तथाकथित रूप से गांव में आने से रोकने के लिए) वन विभाग ने सोलर पॉवर फेंसिंग की है। ग्रामीण भी हाथियों को मारने के लिए करंट का इस्तेमाल कर रहे हैं। 2014-15 में अब तक चार हाथियों की मौत हो चुकी है। इसमें दो नर और दो मादा शामिल हैं। 




गुरुवार, 16 अक्टूबर 2014

छग भी देगा स्मार्ट सिटी

भले ही छत्तीसगढ़ सरकार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सपने को साकार करने की दिशा में उत्साह से काम में जुट गई है। लेकिन यहां कुछ जायज से सवाल उठना लाजिमी है। विश्व के अन्य कई देशों में भी स्मार्ट सिटी की अवधारणा पर काम हो रहा है। ऐसे में भारत के लिहाज से स्मार्ट शहर की अवधारणा कैसी होनी चाहिए? खासकर मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, ओडिसा और झारखंड जैसे राज्यों में प्रस्तावित स्मार्ट शहर कहीं मध्यपवर्ग और निम्न आय वर्ग को और पीछे ना धकेंल दे, इस बात का भी ध्यान रखना हो। सवाल यही खड़ा होता है कि क्या विदेशी सपनों को उधार लेने से ही हमारे शहरों का उद्धार हो जाएगा या फिर हमें अपनी हकीकत को ध्यान में रखते हुए ऐसे विकास की रणनीति तय करनी होगी, जिसका उद्देश्य समावेशी हो। शहरों के बसने और उनके बढ़ने का अपना मॉडल रहा है, लेकिन पुराने शहरों से दूर नए शहर बसाने की योजना कितनी कारगर साबित होगी, इसका जवाब तो भविष्य के गर्भ में ही छुपा है।
इसी चिंता को जताते हुए छत्तीसगढ़ में काम कर रहे ऑक्सफेम के कार्यक्रम अधिकारी विजेंयद्र अजनबी कहते हैं कि स्मार्ट सिटी की कोई सर्वसम्मत परिभाषा नहीं है। मोटे तौर पर बढ़ते शहरीकरण की चुनौती से निपटने के लिए ऐसे शहर बसाने की योजना अस्तित्व में आई, जहां नवीनतम तकनीक का इस्तेमाल करते हुए पर्यावरण सम्मत मॉडल का विकास हो। इन शहरों में प्राकृतिक संसाधनों पर न्यूनतम बोझ होगा, नागरिक सेवाएं उपलब्ध कराने की सुचारू व्यवस्था होगी, प्रशासन कसा हुआ होगा और जीवन स्तर बेहतर होगा। नए शहर विकसित करने से आबादी के बोझ तले दबे जा रहे शहरों का बोझ भी कम होगा। लेकिन शहरों को बसाने की होड़ में हम कहीं स्लम्स को बढ़ावा तो नहीं दे रहे हैं। नए शहर बसाने की होड़ में गांवों को गंदी बस्तियों में तब्दील किया जा रहा है। इसका सबसे अच्छा उदाहरण भी नए रायपुर में देखने को मिल सकता है। शहर के विकास के बीच गांव इस तरह फंस गए हैं कि उनकी जल निकासी, खुली आबोहवा और जीवनयापन को तथाकथिक विकास ने अवरूद्ध कर दिया है। अब वे गांव से गंदी बस्तियों में तब्दील हो गए हैं। लोगों के पारंपरिक जीवनयापन के तरीके भी छीन लिए गए हैं, कभी खेतों में काम करने वाले लोग अब नए विकसित होते शहरों के घरों में झाडू बर्तन का काम करने को मजबूर हैं
देश को संभवतः पहली स्मार्ट सिटी देने जा रहे छत्तीसगढ़ के मामले में ध्यान रखने वाली बात ये भी है कि यहां की राज्य सरकार के पास एक शहर बसाने का अपना अनुभव भी है। राज्य सरकार अपने बलबूते पर कमल विहार जैसी टाउनशिप भी बना रही है। अकेले रायपुर विकास प्राधिकरण ने 8 टाउन डेवलपमेंट स्कीम बनाई है। 2022 तक रायपुर में होने वाली आबादी को ध्यान में रखकर बनाई गई इन योजनाओं को कमल विहार नाम दिया गया है। इसका कुल एरिया 14 हजार एकड़ है, यानि 8 कमल विहार 14 हजार एकड़ जमीन को अधिग्रहित करने के बाद बन पाएंगे। पहला कमल विहार रायपुर के बोरियाखुर्द, मठपुरैना और डूंडा इलाके की 1600 एकड़ जमीन पर बनाया जा रहा है। प्रदेश में पुराने रायपुर से 25 किलोमीटर की दूरी पर राज्य सरकार ने कई दर्जन गांवों की करीब 20 हजार एकड़ जमीन लेकर को मिलाकर नई राजधानी यानि नया रायपुर का निर्माण कर चुकी है। छत्तीसगढ़ के नए रायपुर की तारीफ खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ट्विटर के जरिए कर चुके हैं। इतना ही नहीं तालिबानी आतंकियों की वजह से पूरी तरह से बर्बाद हो चुकी अफगानिस्तान की राजधानी काबुल को नया रायपुर की तर्ज पर तैयार करने का प्लान बन रहा है। काबुल मेट्रोपोलिटन एरिया डेवलपमेंट ने नया रायपुर विकास प्राधिकरण से इसमें मदद मांगी है। काबुल में नया शहर बसाने का जिम्मा लेने वाली कंपनी जापान इंटरनेशनल को-ऑपरेशन एजेंसी ने पूरी दुनिया में बसाए गए नए शहरों के अध्ययन के बाद नया रायपुर के प्लान को सबसे सटीक पाया।
नया रायपुर विकास प्राधिकरण के सीईओ अमित कटारिया कहते हैं कि रायपुर में बनने वाली स्मार्ट सिटी को केंद्र सरकार ने बजट में शामिल कर लिया है। नया रायपुर पहले ही इसी तर्ज पर डिवेलप हो रहा है, अब पूरा रायपुर इसमें शामिल होगा।
हालांकि देश के पर्यावरणविद् 100 स्मार्ट सिटी को लेकर ज्यादा खुश नजर नहीं आ रहे हैं। मशहूर पर्यावरणविद् सुनीता नारायण अपने एक लेख के जरिए कहती हैं कि हम दूसरा शंघाई या दूसरा न्यूयार्क नहीं बसा सकते। मगर हम दूसरा इंदौर, मुबंई या गाजियाबाद बसा सकते हैं। जहां आवास, साफ पेयजल, सार्वजनिक परिवहन, कचरा निपटान की कारगर व्यवस्था हो। दूसरे शब्दों में कहें तो हम सबके लिए कल्याण और कुछ के लिए संपन्नता की व्यवस्ता कर सकते हैं। भारतीय शहर आज गंभीर संकट में है। यह संकट वित्तीय भी और योजनागत भी। इससे बढ़कर यह ऐसी मानसिकता का संकट है, जो शहरों की सडांध की असलियत और भयावहता को स्वीकारने को तैयार नहीं है
लेकिन इन सबके परे मैकिंसे ग्लोबल इंस्टीट्यूट (एमजीआई) की एक रिपोर्ट पर कर गौर करें तो तो लगता है कि देश ये स्मार्ट शहर बसाने का निर्णय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की दूरदर्शिता भी साबित हो सकता है। रिपोर्ट के मुताबिक अगले पंद्रह बरसों में आर्थिक गतिविधियों के केंद्र पश्चिम के विकसित देशों के शहर नहीं रह जाएंगे, बल्कि विकासशील देशों के नगरों का दबदबा होगा। मैकिंसे ग्लोबल इंस्टीट्यूट (एमजीआई) ने अरबन व‌र्ल्ड-मैपिंग इकोनॉमिक पावर ऑफ सिटीज रिपोर्ट में यह दावा किया है। एमजीआई ग्लोबल प्रबंधन परामर्श कंपनी मैकिंसे एंड कंपनी की व्यापार व आर्थिक शोध इकाई है। इस रिपोर्ट के मुताबिक, वर्ष 2025 में वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के मामले में विकासशील देशों के शहर आगे रहेंगे। फिलहाल, विश्व के कुल आर्थिक उत्पादन या जीडीपी में 600 शहरों का योगदान लगभग 60 फीसदी है। ये शहर मुख्य रूप से उत्तरी अमेरिका और यूरोप के विकसित देशों के हैं. रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्ष 2025 में नगरों की संख्या और ग्लोबल जीडीपी में उनके योगदान का अनुपात यही रहेगा, पर इसमें विकासशील देशों के 136 नए शहर शामिल हो जाएंगे। इनमें चीन के 100 और भारत के सूरत, हैदराबाद जैसे 13 शहर होंगे। दिल्ली, चेन्नई व मुंबई इस सूची में और ऊपरी पायदान पर चढ़ जाएंगे। वहीं, अगले 15 वर्षों में विकसित देशों के एक तिहाई शहर इस सूची से बाहर हो जाएंगे। इन 600 शहरों में वर्ष 2025 तक करीब 31 करोड़ और लोग जुड़ जाएंगे।
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शहर, जो पहले से स्मार्ट हैं
भारत में कई शहरों ने सुचारू रूप में नागरिक सेवाएं प्रधान करने के लिए स्मार्ट टेक्नोलॉजी का उपयोग करना शुरु कर दिया है। इनमें हैदराबाद, बैंगलुरू, सूरत, मंगलौर, दिल्ली, मुंबई, चैन्नई, पूणे, गुडगांव, चंडीगढ़, नोएडा, कानपुर, कोयंबतूर, जमशेदपुर शामिल हैं। यहां मेट्रो रैल उन्नत संचार व्यवस्था, उच्च तकनीक वाले ट्रैफिक सिस्टम, कचरा व साफ सफाई मैनेजमेंट के लिए जीपीआरएस की मदद, स्मार्ट मीटर, पानी की गुणवत्ता पर नजर रखने के लिए ऑन लाइन व्यवस्था जैसी सुविधाएं अपनाई जा रही हैं।
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विश्व के स्मार्ट शहर
दुनिया भर में कई छोटे-बड़े शहरों को स्मार्ट बनाने की दिशा में अपने-अपने स्तर पर काम किए जा रहे हैं। इनमे प्रमुखता से स्कॉटहोम, कैलिफोर्निया, रियो डि जेनेरो, सिंगापुर, पेरिस, साओ पाउलो (ब्राजील), वेंकूवर (कनाडा), मसदर सिटी (संयुक्त अरब अमीरात) के नाम लिए जाते हैं। इन्हीं शहरों के मॉडल को दुनिया के दूसरे देशों ने भी अपनाने की कोशिश की है। ये ऐसे स्मार्ट शहर हैं, जिन्होंने नई तकनीक को अपनाने के साथ ही पर्यावरण का भी विशेष ख्याल रखा है।
सिंगापुर-यह केवल अत्याधुनिक शॉपिंग डेस्टिनेशन ही नहीं है, बल्कि पर्यावरण और ऊर्जा सरंक्षण के क्षेत्र में भी इसने अलग मूल्य स्थापित किए हैं। 54 लाख आबादी वाले इस विशाल शहर में हरियाली के दर्शन भी सरल सुलभ हैं।
मसदर सिटी-संयुक्त अरब अमीरात में अबू धाबी के पास विकसित किया गया ये शहर विश्व भर के नगर नियोजकों का ध्यान खींच रहा है। यह शहर पूरी तरह सौर ऊर्जा व अन्य नवीकरण ऊर्जा स्त्रोतों द्वारा संचालित होगा। इसका निर्माण 2008 में शुरु हुआ था। इसका पहला चरण 2015 में पूरा होने की उम्मीद है।

वैंकूवर-कनाडा का यह महानगर डिजीटल गवर्नेंस की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। साथ ही इसने 2020 तक विश्व का सबसे हरा भरा शहर बनने का संकल्प रखा है। यहां बिजली से चलने वाले वाहनों को बड़े पैमाने पर प्रोत्साहित किया जा रहा है। 

जवानों का टूटता मनोबल

जगदलपुर से निकलकर सड़कविहीन रास्तों से होते हुए जब आप 56 किलोमीटर का रास्ता तय करते हुए तोंगपाल पुलिस थाने पहुंचते हैं तो इस बात का अंदाजा सहज ही हो जाता है कि हम यहां अपनी खुद की रिस्क पर हैं। यहां मिलने वाले सीआरपीएफ के जवान हों या छत्तीसगढ़ पुलिस के सिपाही, सबके चेहरों पर एक सा तनाव आपको अहसास दिलाता है कि महसूस की जा रही शांति केवल छलावा भर है। कभी भी-कुछ भी हो सकता है। खैर बस्तर को कवर करने वाले पत्रकारों के लिए इसमें नया कुछ भी नहीं है, वे ऐसी परिस्थितियों का हमेशा सामना करते रहते हैं। फिलहाल बात सुकमा जिले के तहत आने वाले तोंगपाल की, जो केंद्रीय सुरक्षा बल (सीआरपीएफ) के 16 जवानों और एक पुलिस कांस्टेबल के निलंबन के कारण चर्चा में है।
सीआरपीएफ ने कड़ी अनुशासनात्मक कार्रवाई करते हुए अपने 16 जवानों को निलंबित कर दिया है। वहीं एक पुलिस के सिपाही को भी सीआरपीएफ की रिपोर्ट के आधार पर निलंबित किया गया है। निलंबित जवानों में से 13 कांस्टेबल रैंक के, जबकि चार अन्य इंस्पेक्टर व सहायक सब-इंस्पेक्टर रैंक के अधिकारी हैं। इन 17 जवानों पर आरोप है कि ये इस साल के शुरूआत में नक्सलियों के साथ हुई मुठभेड़ में अपने साथियों को मदद देने के बजाए मैदान छोड़कर भाग खड़े हुए थे। इस मुठभेड़ में एक नागरिक समेत कुल 16 लोगों की मौत हुई थी। जिनमें सीआरपीएफ के 11, पुलिस के चार जवान मारे गए थे। सीआरपीएफ के आरोप के मुताबिक छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले में इस साल 11 मार्च को दरभा थाना क्षेत्र में तैनात सीआरपीएफ की 80वीं बटालियन के जवान ग्राम टहकवाड़ा के लिए रोड़ ओपनिंग पार्टी के लिए रवाना किए गए थे। इस 46 सदस्यीय टुकड़ी के 20 जवान घात लगाए नक्सलियों के एंबुश में फंस गए थे। इस हमले में विक्रम निषाद नामक एक ग्रामीण भी मारा गया था, जो घटना के वक्त अपनी मोटरसाइकिल से गुजर रहा था। इस खूनी मुठभेड़ के तुरंत बाद कोर्ट ऑफ इन्क्वायरी बैठा दी गई थी। इसकी जांच में सामने आया है कि नक्सलियों द्वारा घात लगाकर किए गए इस हमले में सीआरपीएफ जवानों की आगे चल रही टुकड़ी फंस गई थी। जबकि पीछे आ रहे 17 जवान ऐसी विषम परिस्थिति में अपने साथियों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर लोहा लेने के बजाय वहां से जान बचाकर भाग खड़े हुए।
सीआरपीएफ निदेशक जनरल दिलीप त्रिवेदी का कहना है कि शुरुआती जांच में दोषी मिले इन जवानों को छत्तीसगढ़ के आइजी ने निलंबित कर दिया है। पूरी जांच तीन महीने के भीतर पूरी कर ली जाएगी। एक दशक से ज्यादा समय से नक्सल प्रभावित इलाकों में नक्सलियों से मोर्चा संभाल रही सीआरपीएफ की ओर से अपने जवानों के खिलाफ यह दुर्लभ अनुशासनात्मक कार्रवाई है
सीआरपीएफ के अधिकारियों का कहना है कि जांच में पता चला है कि अगर इन जवानों ने मुंहतोड़ जवाब दिया होता तो कई जानें बचाई जा सकती थीं और करीब 200 नक्सलियों में से कई ढेर भी किए जा सकते थे। करीब तीन घंटे तक चली इस मुठभेड़ में नक्सली शहीद जवानों से बड़ी संख्या में हथियार लूट ले गए थे।
ये तो हुए सीआरपीएफ के आरोप और अब तक की कार्यवाही, लेकिन इस एक प्रकरण का दूसरा पहलू भी है, जिसे नज़रअंदाज किया जा रहा है। दरअसल छत्तीसगढ़ में CRPF जवानों के निलंबन का यह प्रकरण कई गंभीर सवाल भी खड़े कर रहा है, जिस पर गौर किया जाना बेहद जरूरी है। पहला सवाल तो यह ही कि क्या सर पर कफन बांधकर नक्सल इलाकों में काम कर रहे जवानों का मनोबल टूट रहा है, दूसरा सवाल यह कि आखिर इन जवानों की मानसिक व भौतिक परिस्थितियों पर क्या पुनर्विचार नहीं किया जाना चाहिए। इस घटना ने छत्तीसगढ़ में एक नई बहस छेड़ दी है।
हालांकि तोंगपाल पुलिस थाने के एसआई शिशुपाल सिन्हा ने तहलका को बताया कि जिस दिन घटना हुई, वह उस दिन शासकीय कार्य से कहीं बाहर गए हुए थे, लेकिन मौके पर मौजूद लोग बताते हैं कि जवान भागे नहीं थे, बल्कि वे भी फायरिंग में फंस गए थे। यही कारण था कि वे अपने साथी जवानों की मदद नहीं कर पाए थे
पुलिस मुख्यालय ने इस पूरे विवाद से दूरी बना ही है। अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक मुकेश गुप्ता कहते हैं कि सीआरपीएफ के मामले में वे क्या बोल सकते हैं। यदि उन्होंने कार्रवाई की है, तो सही ही की होगी।
पुलिस मुख्यालय में पदस्थ एक अन्य उच्च पदस्थ अफसर भी मानते हैं कि जब जवानों को विशेष साहस दिखाने पर कई तरह से उपकृत किया जाता है, उन्हें आउट ऑफ टर्म प्रमोशन दिया जाता है तो गलती होने पर सजा क्यों नहीं दी जा सकती। वे कहते हैं कि हमारी फोर्स बेहद विपरीत परिस्थितियों में काम करती है, वहां जवानों की संख्या से ज्यादा उनका साहस मायने रखता है। सबको साथ मिलकर काम करना होता है, तभी सकारात्मक परीणामों तक पहुंचा जा सकता है। अब अगर ऐसे में टीमवर्क ही ना रहे, टीम भावना ही ना रहे तो कैसे काम चलेगा। कोई भी जवान कैसे अपने साथियों पर भरोसा कर पाएगा। जहां तक मनःस्थिति का सवाल है तो मौत से किसे डर नहीं लगता, लेकिन हमारे जवान अपनी जिम्मेदारी को समझते हुए मौत से भी दो-दो हाथ करते हैं। अधिकारी कहते हैं, देखिए लीडरशिप की अवधारणा केवल पुलिस या सुरक्षा बलों में होती है, किसी और सरकारी महकमे में नहीं। ये लीडरशिप यही है कि यदि आपके अफसर ने हुकुम दिया कि कूदो मतलब कूदो, अब यदि जवान अपना दिमाग लगाने लग जाए तो वो कूदेगा ही नहीं, ऑर्डर ही नहीं मानेगा
लेकिन उनके ही विभाग का तोंगपाल थाने में ही पदस्थ एक पुलिसकर्मी ने नाम ना छापने की शर्त पर कहता है कि जवानों की स्थिति को समझे बगैर उनपर गलत कार्रवाई की गई है। अगर जवानों को कायरता ही दिखानी होती तो वे पहले ही ड्यूटी से मना कर देते। बिलकुल विपरीत परिस्थिति में हर संघर्ष करने वाले जवान कायर नहीं है। वे बरसात में भी हर एंटी नक्सल ऑपरेशन में भाग लेते रहे हैं। आप देखिए ना जवानों को, वे कैसे रह रहे हैं। कई कैम्प तो दुनिया से कटे हुए हैं, उन्हें हैलीकॉप्टर के जरिए भोजन और दवाईयां भेजी जाती हैं। ना उनके फोन में नेटवर्क है, ना ही कोई दूसरी सुविधा। कई बात तो छुट्टी मिलने के बाद जवानों को जगदलपुर आने में ही दो से तीन दिन लग जाते हैं, रायपुर पहुंचते-पहुंचते पूरा हफ्ता खराब हो जाता है, बताइए कितने दबाव में काम कर रहे हैं लोग, लेकिन यह किसी को नहीं दिखाई दे रहा है। चाहे पुलिसवाला हो या सीआरपीएफवाला, दोनों ही जटिल परिस्थितियों में अपनी सेवाएं दे रहे हैं
पुलिसकर्मी की बात का समर्थन करते हुए तोंगपाल (सुकमा जिला) में ही काम करने वाले स्थानीय पत्रकार संतोष तिवारी तहलका से कहते हैं कि यहां की परिस्थितियां तो आम आदमी के जीने के लायक भी नहीं है। ना सड़कें हैं, ना मोबाइल फोन में नेटवर्क है। हम जगदलपुर से केवल 56 किलोमीटर दूर बैठे हैं, लेकिन सड़कविहीन रास्ते के कारण जगदलपुर पहुंचने में ही दो से ढ़ाई घंटे लग जाते हैं। बस्तर के अंदरूनी इलाकों में कैम्प कर रहे सीआरपीएफ जवानों की हालत तो और भी बदतर है। उन्हें कभी कीटों (छोटे कीड़े) के प्रकोप का सामना करना पड़ रहा है तो कभी मलेरिया उनकी जान ले रहा है। जान जोखिम में डालकर तो वे काम कर ही रहे हैं, लेकिन ना तो उनके पास बातचीत की सुविधा है, ना ही बेहतर चिकित्सा व्यवस्था। रोज-रोज एक ही ऊबाऊ काम करके उनका मनोबल भी टूटता है।
इस वक्त पूरे छत्तीसगढ़ में सीआरपीएफ, आईटीबीपी जैसे सुरक्षा बलों की 36 बटालियन तैनात हैं। इनमें से 29 बटालियन अकेले बस्तर में लगाई गई हैं। एक बटालियन में 780 जवान होते हैं, लेकिन मोर्चे पर लड़ने के लिए 400 से 450 जवान ही मौजूद होते हैं। बस्तर में तैनात जवानों को नक्सलियों के इतर भी कई मुसीबतों का सामना करना पड़ता है। नक्सलियों से पहले मच्छरों से उनका मुकाबला होता है। छत्तीसगढ़ में मई से लेकर नंबवर तक मच्छरों का प्रकोप रहता है। खासकर बस्तर में अनगिनत लोग मलेरिया के कारण काल के गाल में समा जाते हैं। इस साल की जुलाई तक ही राज्य मलेरिया कार्यालय द्वारा इकट्ठे किए गए आंकड़ों पर गौर करें तो अकेले बस्तर मेंमलेरिया के 23 हजार 774 मलेरिया पीड़ित मरीज मिल चुके हैं। हर साल कई जवान भी मलेरिया के कारण मर जाते हैं, हालांकि मलेरिया से मरने वाले जवानों का अधिकृत आंकड़ा कहीं भी उपलब्ध नहीं है। मच्छरों के प्रकोप का अंदाजा आप इस बात से लगा सकते हैं कि इस साल अमेरिका की ब्यूरो ऑफ डिप्लोमेटिक सिक्योरिटी द्वारा अमेरिकी नागरिकों के लिए जारी यात्रा एडवायजरी में छत्तीसगढ़ ना जाने की सलाह दी है, इसका कारण नक्सली व मच्छर बताए गए हैं। एडवायरी में कहा गया है कि छत्तीसगढ़ में मलेरिया होना जानलेवा साबित हो सकता है। छत्तीसगढ़ में बस्तर एक ऐसा इलाका है, जहां फेल्सीफेरम मलेरिया ज्यादा फैलता है। इस मलेरिया में यदि सात दिनों के भीतर पीड़ित को सही दवा ना मिले, तो उसकी मौत निश्चित हो जाती है।
उसमान खान भी सुकमा जिले में आने वाले छिंदगढ़ जैसे घोर नक्सल प्रभावित इलाके के पत्रकार हैं। छिंदगढ़ तोंगपाल से भी 36 किलोमीटर अंदर है। खान कहते हैं कि मलेरिया भी जवानों का मनोबल तोड़ रहा है। इस वक्त तो यानि अगस्त-सितंबर को हमारे इलाके में मलेरिया का सबसे ज्यादा असर होता है। हर साल दर्जनों लोग दवाई के अभाव में मर जाते हैं। अभी भी कई जवान मलेरिया से जूझ रहे हैं। पिछले साल करीब डेढ़ दर्जन जवान केवल मलेरिया के कारण मौत के मुंह में चले गए थे
बस्तर में नक्सल मोर्चों पर तैनात जवानों के सामने कई परेशानियां हैं। जिन्हें उनके आला अधिकारी कितना समझते हैं, ये तो वे ही जानें, लेकिन कभी परिस्थितिवश उत्पन्न समस्याओं पर चर्चा होती नज़र नहीं आती। एंटी नक्सल ऑपरेशन की रणनीति बनाते वक्त भी राज्य सरकार के प्रतिनिधि और अफसर मलेरिया, मोबाइल नेटवर्क, जवानों को मनोवैज्ञानिक उपचार देने जैसे मुद्दों पर खास बात करते हुए नहीं दिखाई देते हैं। बहरहाल, तोंगपाल-दरभा प्रकरण को केंद्र में रखकर सीआरपीएफ और पुलिस के आला अफसरों को एक बार इन बिंदुओं पर भी जरूर गौर करना चाहिए।  


मोदी का नहीं हम सबका अभियान


प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वच्छ भारत अभियान का ऐलान कर उस हरेक वर्ग को राहत देने का काम किया है, जिसे रोजाना कहीं ना कहीं गंदगी से दो चार होना पड़ता है। स्वच्छ भारत अभियान का सबसे ज्यादा फायदा उस तबके को मिलेगा, जिसके पास साफ-सफाई की सुविधा भोगने के लिए जेब में मोटी रकम नहीं होती। यह अभियान गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करने वालों के साथ ही मध्यमवर्गीय और उच्च मध्यमवर्गीय लोगों के लिए संजीवनी का काम करेगा। हम सब जानते हैं कि भारतीयों की आम मानसिकता केवल अपने घर को चमकाने की रही है, घर में झाडू लगाकर कचरा हम सड़कों पर फेंक देते हैं। हम तब भी नहीं सुधरते, जब हम घरों से बाहर निकलते हैं तो हमारा ही फैलाया कचरा हमारा जीवन मुहाल सा कर देता है। सबसे ज्यादा कष्ट रेल में सफर करने के दौरान होता है, हिंदुस्तान में तकरीबन सात हजार स्टेशन हैं। रेलवे स्टेशन से लेकर डब्बों तक पसरी गंदगी से किसी नारकीय जीवन की भासना होने लगती है। यात्रा लंबी हो तो किसी सजा से कम नहीं लगती। लेकिन अब चूंकि खुद प्रधानमंत्री इस समस्या को समझ रहे हैं, संभवतः उन्होंने भी कई बार इस कष्ट का सामना किया होगा। मोदी आम भारतीय की मानसिकता को भी भलीभांति समझते हैं। इसलिए इस अभियान में हरेक आमों खास को शरीक होने को कहा गया है। एक जागरूक नागरिक के नाते इस अभियान में शामिल होते वक्त हमें भी यह याद रखना होगा कि देश में गंदगी से हुए संक्रमण के कारण बड़ी संख्या में बच्चे जन्म लेने के साथ ही मौत के मुंह में समा जाते हैं। प्रति वर्ष 20 लाख से अधिक बच्चे अपना पांचवां जन्म दिन नहीं मना पाते। अंतर्राष्ट्रीय चिकित्सा पत्रिका लांसेट में छपे लेख में दावा किया गया है कि हर साल भारत में दो लाख से ज्यादा मौतें मलेरिया की वजह से हो जाती हैं। स्वाभाविक हैं कि मलेरिया मच्छरों के काटने से होता है और मच्छर गंदगी के कारण ही पनपते हैं। ये तो केवल बानगी भर है, बीमारीजनित रोगों से मरने वालों की सालाना संख्या कई लाखों में होगी। आशा ही नहीं विश्वास भी है कि लोग इस अभियान के जरिए अपनी जिम्मेदारी समझेंगे और केवल एक दिन नहीं, बल्कि हमेशा अपने आसपास, अपने कार्यस्थल, सार्वजनिक स्थलों की साफ-सफाई का ख्याल रखकर एक उज्जवल, स्वच्छ, बीमारी रहित भारत का स्वप्न साकार करेंगे।