गुरुवार, 16 अक्तूबर 2014

छग भी देगा स्मार्ट सिटी

भले ही छत्तीसगढ़ सरकार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सपने को साकार करने की दिशा में उत्साह से काम में जुट गई है। लेकिन यहां कुछ जायज से सवाल उठना लाजिमी है। विश्व के अन्य कई देशों में भी स्मार्ट सिटी की अवधारणा पर काम हो रहा है। ऐसे में भारत के लिहाज से स्मार्ट शहर की अवधारणा कैसी होनी चाहिए? खासकर मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, ओडिसा और झारखंड जैसे राज्यों में प्रस्तावित स्मार्ट शहर कहीं मध्यपवर्ग और निम्न आय वर्ग को और पीछे ना धकेंल दे, इस बात का भी ध्यान रखना हो। सवाल यही खड़ा होता है कि क्या विदेशी सपनों को उधार लेने से ही हमारे शहरों का उद्धार हो जाएगा या फिर हमें अपनी हकीकत को ध्यान में रखते हुए ऐसे विकास की रणनीति तय करनी होगी, जिसका उद्देश्य समावेशी हो। शहरों के बसने और उनके बढ़ने का अपना मॉडल रहा है, लेकिन पुराने शहरों से दूर नए शहर बसाने की योजना कितनी कारगर साबित होगी, इसका जवाब तो भविष्य के गर्भ में ही छुपा है।
इसी चिंता को जताते हुए छत्तीसगढ़ में काम कर रहे ऑक्सफेम के कार्यक्रम अधिकारी विजेंयद्र अजनबी कहते हैं कि स्मार्ट सिटी की कोई सर्वसम्मत परिभाषा नहीं है। मोटे तौर पर बढ़ते शहरीकरण की चुनौती से निपटने के लिए ऐसे शहर बसाने की योजना अस्तित्व में आई, जहां नवीनतम तकनीक का इस्तेमाल करते हुए पर्यावरण सम्मत मॉडल का विकास हो। इन शहरों में प्राकृतिक संसाधनों पर न्यूनतम बोझ होगा, नागरिक सेवाएं उपलब्ध कराने की सुचारू व्यवस्था होगी, प्रशासन कसा हुआ होगा और जीवन स्तर बेहतर होगा। नए शहर विकसित करने से आबादी के बोझ तले दबे जा रहे शहरों का बोझ भी कम होगा। लेकिन शहरों को बसाने की होड़ में हम कहीं स्लम्स को बढ़ावा तो नहीं दे रहे हैं। नए शहर बसाने की होड़ में गांवों को गंदी बस्तियों में तब्दील किया जा रहा है। इसका सबसे अच्छा उदाहरण भी नए रायपुर में देखने को मिल सकता है। शहर के विकास के बीच गांव इस तरह फंस गए हैं कि उनकी जल निकासी, खुली आबोहवा और जीवनयापन को तथाकथिक विकास ने अवरूद्ध कर दिया है। अब वे गांव से गंदी बस्तियों में तब्दील हो गए हैं। लोगों के पारंपरिक जीवनयापन के तरीके भी छीन लिए गए हैं, कभी खेतों में काम करने वाले लोग अब नए विकसित होते शहरों के घरों में झाडू बर्तन का काम करने को मजबूर हैं
देश को संभवतः पहली स्मार्ट सिटी देने जा रहे छत्तीसगढ़ के मामले में ध्यान रखने वाली बात ये भी है कि यहां की राज्य सरकार के पास एक शहर बसाने का अपना अनुभव भी है। राज्य सरकार अपने बलबूते पर कमल विहार जैसी टाउनशिप भी बना रही है। अकेले रायपुर विकास प्राधिकरण ने 8 टाउन डेवलपमेंट स्कीम बनाई है। 2022 तक रायपुर में होने वाली आबादी को ध्यान में रखकर बनाई गई इन योजनाओं को कमल विहार नाम दिया गया है। इसका कुल एरिया 14 हजार एकड़ है, यानि 8 कमल विहार 14 हजार एकड़ जमीन को अधिग्रहित करने के बाद बन पाएंगे। पहला कमल विहार रायपुर के बोरियाखुर्द, मठपुरैना और डूंडा इलाके की 1600 एकड़ जमीन पर बनाया जा रहा है। प्रदेश में पुराने रायपुर से 25 किलोमीटर की दूरी पर राज्य सरकार ने कई दर्जन गांवों की करीब 20 हजार एकड़ जमीन लेकर को मिलाकर नई राजधानी यानि नया रायपुर का निर्माण कर चुकी है। छत्तीसगढ़ के नए रायपुर की तारीफ खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ट्विटर के जरिए कर चुके हैं। इतना ही नहीं तालिबानी आतंकियों की वजह से पूरी तरह से बर्बाद हो चुकी अफगानिस्तान की राजधानी काबुल को नया रायपुर की तर्ज पर तैयार करने का प्लान बन रहा है। काबुल मेट्रोपोलिटन एरिया डेवलपमेंट ने नया रायपुर विकास प्राधिकरण से इसमें मदद मांगी है। काबुल में नया शहर बसाने का जिम्मा लेने वाली कंपनी जापान इंटरनेशनल को-ऑपरेशन एजेंसी ने पूरी दुनिया में बसाए गए नए शहरों के अध्ययन के बाद नया रायपुर के प्लान को सबसे सटीक पाया।
नया रायपुर विकास प्राधिकरण के सीईओ अमित कटारिया कहते हैं कि रायपुर में बनने वाली स्मार्ट सिटी को केंद्र सरकार ने बजट में शामिल कर लिया है। नया रायपुर पहले ही इसी तर्ज पर डिवेलप हो रहा है, अब पूरा रायपुर इसमें शामिल होगा।
हालांकि देश के पर्यावरणविद् 100 स्मार्ट सिटी को लेकर ज्यादा खुश नजर नहीं आ रहे हैं। मशहूर पर्यावरणविद् सुनीता नारायण अपने एक लेख के जरिए कहती हैं कि हम दूसरा शंघाई या दूसरा न्यूयार्क नहीं बसा सकते। मगर हम दूसरा इंदौर, मुबंई या गाजियाबाद बसा सकते हैं। जहां आवास, साफ पेयजल, सार्वजनिक परिवहन, कचरा निपटान की कारगर व्यवस्था हो। दूसरे शब्दों में कहें तो हम सबके लिए कल्याण और कुछ के लिए संपन्नता की व्यवस्ता कर सकते हैं। भारतीय शहर आज गंभीर संकट में है। यह संकट वित्तीय भी और योजनागत भी। इससे बढ़कर यह ऐसी मानसिकता का संकट है, जो शहरों की सडांध की असलियत और भयावहता को स्वीकारने को तैयार नहीं है
लेकिन इन सबके परे मैकिंसे ग्लोबल इंस्टीट्यूट (एमजीआई) की एक रिपोर्ट पर कर गौर करें तो तो लगता है कि देश ये स्मार्ट शहर बसाने का निर्णय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की दूरदर्शिता भी साबित हो सकता है। रिपोर्ट के मुताबिक अगले पंद्रह बरसों में आर्थिक गतिविधियों के केंद्र पश्चिम के विकसित देशों के शहर नहीं रह जाएंगे, बल्कि विकासशील देशों के नगरों का दबदबा होगा। मैकिंसे ग्लोबल इंस्टीट्यूट (एमजीआई) ने अरबन व‌र्ल्ड-मैपिंग इकोनॉमिक पावर ऑफ सिटीज रिपोर्ट में यह दावा किया है। एमजीआई ग्लोबल प्रबंधन परामर्श कंपनी मैकिंसे एंड कंपनी की व्यापार व आर्थिक शोध इकाई है। इस रिपोर्ट के मुताबिक, वर्ष 2025 में वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के मामले में विकासशील देशों के शहर आगे रहेंगे। फिलहाल, विश्व के कुल आर्थिक उत्पादन या जीडीपी में 600 शहरों का योगदान लगभग 60 फीसदी है। ये शहर मुख्य रूप से उत्तरी अमेरिका और यूरोप के विकसित देशों के हैं. रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्ष 2025 में नगरों की संख्या और ग्लोबल जीडीपी में उनके योगदान का अनुपात यही रहेगा, पर इसमें विकासशील देशों के 136 नए शहर शामिल हो जाएंगे। इनमें चीन के 100 और भारत के सूरत, हैदराबाद जैसे 13 शहर होंगे। दिल्ली, चेन्नई व मुंबई इस सूची में और ऊपरी पायदान पर चढ़ जाएंगे। वहीं, अगले 15 वर्षों में विकसित देशों के एक तिहाई शहर इस सूची से बाहर हो जाएंगे। इन 600 शहरों में वर्ष 2025 तक करीब 31 करोड़ और लोग जुड़ जाएंगे।
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शहर, जो पहले से स्मार्ट हैं
भारत में कई शहरों ने सुचारू रूप में नागरिक सेवाएं प्रधान करने के लिए स्मार्ट टेक्नोलॉजी का उपयोग करना शुरु कर दिया है। इनमें हैदराबाद, बैंगलुरू, सूरत, मंगलौर, दिल्ली, मुंबई, चैन्नई, पूणे, गुडगांव, चंडीगढ़, नोएडा, कानपुर, कोयंबतूर, जमशेदपुर शामिल हैं। यहां मेट्रो रैल उन्नत संचार व्यवस्था, उच्च तकनीक वाले ट्रैफिक सिस्टम, कचरा व साफ सफाई मैनेजमेंट के लिए जीपीआरएस की मदद, स्मार्ट मीटर, पानी की गुणवत्ता पर नजर रखने के लिए ऑन लाइन व्यवस्था जैसी सुविधाएं अपनाई जा रही हैं।
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विश्व के स्मार्ट शहर
दुनिया भर में कई छोटे-बड़े शहरों को स्मार्ट बनाने की दिशा में अपने-अपने स्तर पर काम किए जा रहे हैं। इनमे प्रमुखता से स्कॉटहोम, कैलिफोर्निया, रियो डि जेनेरो, सिंगापुर, पेरिस, साओ पाउलो (ब्राजील), वेंकूवर (कनाडा), मसदर सिटी (संयुक्त अरब अमीरात) के नाम लिए जाते हैं। इन्हीं शहरों के मॉडल को दुनिया के दूसरे देशों ने भी अपनाने की कोशिश की है। ये ऐसे स्मार्ट शहर हैं, जिन्होंने नई तकनीक को अपनाने के साथ ही पर्यावरण का भी विशेष ख्याल रखा है।
सिंगापुर-यह केवल अत्याधुनिक शॉपिंग डेस्टिनेशन ही नहीं है, बल्कि पर्यावरण और ऊर्जा सरंक्षण के क्षेत्र में भी इसने अलग मूल्य स्थापित किए हैं। 54 लाख आबादी वाले इस विशाल शहर में हरियाली के दर्शन भी सरल सुलभ हैं।
मसदर सिटी-संयुक्त अरब अमीरात में अबू धाबी के पास विकसित किया गया ये शहर विश्व भर के नगर नियोजकों का ध्यान खींच रहा है। यह शहर पूरी तरह सौर ऊर्जा व अन्य नवीकरण ऊर्जा स्त्रोतों द्वारा संचालित होगा। इसका निर्माण 2008 में शुरु हुआ था। इसका पहला चरण 2015 में पूरा होने की उम्मीद है।

वैंकूवर-कनाडा का यह महानगर डिजीटल गवर्नेंस की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। साथ ही इसने 2020 तक विश्व का सबसे हरा भरा शहर बनने का संकल्प रखा है। यहां बिजली से चलने वाले वाहनों को बड़े पैमाने पर प्रोत्साहित किया जा रहा है। 
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