गुरुवार, 30 अक्तूबर 2014

बाजार के हवाले किसान

छत्तीसगढ़ सरकार ने अपने एक फैसले को बदलते हुए किसान को बाजार के हवाले कर दिया है। अब तब सरकार को धान बेचता आ रहा किसान अब व्यापारियों के दरवाजे पर दस्तक देने को मजबूर हो जाएगा। धान ने एक बार फिर छत्तीसगढ़ की सियासत को गरमा दिया है।

छत्तीसगढ़ सरकार अब किसानों से प्रति एकड़ केवल दस क्विंटल धान ही खरीदेगी। सहकारी समितियों के माध्यम से समर्थन मूल्य पर धान खरीदी एक दिसंबर से शुरू की जाएगी। मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह की अध्यक्षता में हुई छत्तीसगढ़ मंत्रिपरिषद की बैठातक में लिए गए इस फैसले का ऐलान राज्य के खाद्य मंत्री पून्नूलाल मोहिले ने इसी पखवाड़े किया है। सरकार के इस फैसले का कांग्रेस सहित किसान संगठनों ने जोरदार विरोध किया है।
प्रदेश में प्रति एकड़ धान के औसत उत्पादन के आधार पर प्रति एकड़ दस क्विंटल धान खरीदने के निर्णय के पीछे सरकार का तर्क है कि सभी इलाकों में धान का उत्पादन एक बराबर नहीं है। कहीं अधिक तो कहीं कम उत्पादन होता है। राज्य सरकार द्वारा उत्पादन के आधार पर अलग-अलग जिलों के लिए प्रति एकड़ धान खरीदी की मात्रा तय करने पर विचार किया गया, लेकिन इसमें एकरूपता न होने के कारण विवाद की स्थिति बन सकती थी, इसलिए पूरे प्रदेश में प्रति एकड़ दस क्विंटल धान खरीदने पर सहमति बनी। जबकि किसान नेताओं का कहना है कि छत्तीसगढ़ में प्रति एकड़ 25 से 30 क्विंटल धान पैदा होता है। इसमें केवल दस क्विंटल को समर्थन मूल्य पर खरीदे जाने का फैसले से किसानों की कमर ही टूट जाएगी। किसान नेता वैगेंद्र कहते हैं कि दस क्विंटल की खरीदी में जो पैसा मिलेगा, वो तो किसानों के उस कर्जे को भी नहीं उतार पाएगा, जो उन्होंने खेती करने के लिए लिया है। बाकी धान बिचौलियों के मार्फेत औने-पोने दाम में व्यापारी खरीदेंगे। किसान नेता अनिल दुबे कहते हैं कि सरकार का ये फैसला व्यापारियों को मालामाल कर देगा, वहीं किसान कंगाल हो जाएंगे।
खाद्य मंत्री पुन्नूलाल मोहले सरकार के फैसले पर अपना तर्क कुछ यूं रखते हैं कि, छत्तीसगढ़ सरकार के पास धान व चावल का पर्याप्त स्टॉक है। इन परिस्थितियों को देखते हुए सरकार को यह निर्णय लेना पड़ा है। किसानों को धान बोनस दिए जाने के सवाल पर खाद्य मंत्री ने कहा कि अभी तो खरीदी शुरू नहीं हुई है। इस पर बाद में विचार करेंगे और केंद्र सरकार से चर्चा की जाएगी।
दरअसल सरकार के फैसले के पीछे की असल कहानी यह है कि छत्तीसगढ़ में हर साल न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर होने वाली धान की खरीद साल दर साल घाटे का सौदा बनती जा रही है। 2001 से शुरू हुई इस प्रक्रिया से अब तक साढ़े तीन हजार करोड़ से अधिक नुकसान हो चुका है। इस घाटे की वजह यह है कि खरीदे गए धान के रखरखाव में आपराधिक लापरवाही, गुणवत्ता विहीन धान की खरीदी, परिवहन के दौरान चोरी तो है ही, इसके अलावा जानकारों का मानना है कि धान खरीद पर दिया जा रहा बोनस भी एक बड़ी वजह है।
सरकार इस साल भी 300 प्रति क्विंटल के हिसाब से 2400 करोड़ का बोनस बांटने जा रही है, लेकिन इस राशि का सबसे बड़ा हिस्सा वे बड़े किसान उठा रहे हैं, जो सबसे अधिक धान बेचते हैं। ऐसे किसानों की संख्या करीब 20 फीसदी है। इसी तरह 10 प्रतिशत मध्यम किसानों को बोनस का लाभ मिल रहा है, लेकिन करीब 70 फीसदी ऐसे किसान हैं, जो केवल अपनी जरूरत का ही धान उपजाते हैं और एमएसपी (मिनिमम सपोर्ट प्राइज़) पर नहीं बेचते हैं। इसलिए इन किसानों को बोनस का लाभ मिलने का सवाल ही नहीं है।
कारण चाहे जो भी हो, लेकिन प्रदेश सरकार के नए फैसले का कांग्रेस ने कड़ा विरोध किया है। कांग्रेस अध्यक्ष भूपेश बघेल ने फैसले को किसानों के साथ धोखा बताया है। बघेल का कहना है कि भाजपा ने घोषणा पत्र में किसानों के एक-एक दाने धान की खरीदी का वादा किया था। लेकिन सरकार बनते ही एक एकड़ में सिर्फ दस क्विंटल खरीदी का फैसला किया है। सरकार ने किसानों को कम बोनस देने के लिए कम धान की खरीदी का फैसला किया है।
पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी ने भी सभी किसानों को दलगत राजनीति से ऊपर उठकर सरकार के फैसले का विरोध करने की अपील की है। जोगी ने अपने बंगले पर किसान नेताओं की बैठक भी ले ड़ाली।
दूसरी तरफ किसान-मजदूर संघ ने छत्तीसगढ़ के किसानों से समर्थन मूल्य पर राज्य सरकार द्वारा धान खरीदी में प्रति एकड़ दस क्विंटल धान खरीदने और बोनस अब तक घोषित नहीं किए जाने पर नाराजगी जताते हुए कहा है कि  प्रदेश के किसानों से प्रति एकड़ कम से कम बीस क्विंटल धान समर्थन मूल्य पर खरीदने की तत्काल व्यवस्था करे। संघ ने मांग की है कि भाजपा सरकार 2013 के चुनावी घोषणापत्र में 300 रुपए प्रति क्विंटल बोनस भुगतान सुनिश्चित करे, अन्यथा प्रदेशभर के किसान-मजदूर आंदोलन करने बाध्य होंगे। संघ के संयोजक ललित चंद्रनाहू का कहना है कि यदि राज्य सरकार समय रहते किसानों के हित में निर्णय नहीं लेगी, तो किसान-मजदूर संघ प्रदेश के अन्य किसान संगठनों को साथ लेकर इस मुददे पर कोर्ट जा सकते हैं। उन्होंने आरोप लगाया, सरकारी अव्यवस्था से समितियों को नुकसान पहुंचा है। पहले राज्य सरकार समर्थन मूल्य पर धान खरीदी व्यवस्था सुनिश्चित करे। सहकारी चावल मिलों को शुरू कराने का सुझाव भी उन्होंने दिया ।
इधर राज्य सरकार ने अब धान पर बोनस योजना से भी पीछा छुड़ाने की कवायद शुरू कर दी है। पिछले दिनों केंद्रीय खाद्य मंत्री रामविलास पासवान जब खाद्य मंत्री के रूप में पहली बार छत्तीसगढ़ आए तो मुख्यमंत्री डॉ.रमनसिंह ने उनके समक्ष मांग रखी कि केंद्र सरकार सौ फीसदी धान का उपार्जन खुद करे।
केंद्र सरकार यह मांग कब मंजूर करेगी और कब से एमएसपी पर केंद्र द्वारा धान खरीद की व्यवस्था होगी, यह सवाल बेहद पेचीदा है, लेकिन इससे पहले छत्तीसगढ़ में धान खरीद का सौदा एक बड़े घाटे का सौदा बना हुआ है। छत्तीसगढ़ राज्य गठन के बाद राज्य सरकार ने 2001 से न्यूनतम समर्थन मूल्य पर धान खरीद शुरू की थी। उस समय मात्र 4 लाख 63 हजार मीट्रिक टन धान खरीदा गया था। इस समय घाटा बहुत कम था, लेकिन साल-दर साल खरीद का यह आंकड़ा बढ़कर पिछले साल 2013-14 तक करीब 80 लाख मीट्रिक टन जा पहुंचा है। इसके साथ ही खरीद पर नुकसान के आंकड़े बढ़कर विशालकाय हो गए हैं।
34 सौ करोड़ का घाटा
छत्तीसगढ़ में 2001 से 2010-11 तक धान खरीद में 34 सौ करोड़ रूपयों का घाटा हो चुका है। इसके बाद 2011-12 और 12-13 तक करीब 1400 करोड़ की औसत हानि दर्ज की जा चुकी है। 2013-14 में अब तक की सबसे बड़ी खरीद 80 लाख मीट्रिक टन धान खरीद से हुए नुकसान का आंकलन किया जाना अभी बाकी है।
धान पर सियासत
राज्य की करीब 80 फीसदी आबादी कृषि पर आधारित है, यही कारण है कि प्रदेश की राजनीति के केंद्र में किसान और उससे जुड़े मुद्दे शामिल हैं। किसानों का धान खरीदने, बोनस देने जैसे मामले सड़क से लेकर सदन में हमेशा उठते रहते हैं, लेकिन अब जबकि राज्य सरकार ने सौ फीसदी की खरीद केंद्र से करने का आग्रह किया है, माना जा रहा है कि अब यह मामला राज्य से निकलकर केंद्र की राजनीति को भी प्रभावित कर सकता है।
क्यों हो रहा घाटा?
एमएसपी पर धान खरीद घाटे का सौदा बनने की कई वजहें हैं। जब धान की खरीद होती है तो उसमें 17 फीसदी नमी होती है, यही धान जब सूखता है तो उसके वजन में कमी आ जाती है। खरीद केंद्रों और संग्रहण केंद्रों में रखरखाव की कमी से धान गीला होता है, सड़ता है, यही नहीं धान की अफरा-तफरी और परिवहन के दौरान चोरी से भी नुकसान होता है।
केवल बड़े किसानों को ही मिलता है बोनस का लाभ
सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त फूड सिक्योरिटी कमिश्नर समीर गर्ग का मानना है कि यह बिलकुल सहीं है कि धान खरीद में घाटे की सबसे बड़ी वजह धान पर दिया जाने वाला बोनस है। बोनस का लाभ केवल बड़े किसानों को ही मिल रहा है, जो बड़ी मात्रा में धान बेचते हैं। छत्तीसगढ़ में समर्थन मूल्य पर 11 लाख किसान धान बेचते हैं, इनमें 4 लाख किसान ऐसे हैं जो बड़ी मात्रा में धान बेचते हैं। इन्हें ही सबसे अधिक लाभ मिल रहा है। इनके अतिरिक्त धान बेचने वाले अन्य किसानों को लाभ मिलता है, लेकिन बहुत कम। गर्ग का कहना है कि धान पर बोनस दिए जाने पर कोई सामाजिक लाभ नहीं है। उनका यह भी कहना है कि सरकार को बोनस बांटने के बजाय बोनस में खर्च होने वाली राशि का उपयोग छोटे और गरीब किसानों की फसल की उत्पादकता बढ़ाने के लिए किया जाना चाहिए। धान खरीद से हर साल होने वाला घाटा जिस रफ्तार से बढ़ रहा है, आने वाले समय में यह और अधिक बढ़ेगा।
उनके मुताबिक न्यूनतम समर्थन मूल्य पर धान खरीदी के एवज में जितनी राशि दी जा रही है, वह पर्याप्त है। इसके अलावा अतिरिक्त बोनस दिए जाने के पीछे राजनीतिक कारण भी हैं। उल्लेखनीय है कि 2013 को विधानसभा चुनाव में भाजपा ने किसानों को 300 रुपए प्रति क्विंटल बोनस देने की घोषणा की थी। इस घोषणा के पालन में ही सरकार को 2400 करोड़ रुपए खर्च करने पड़ रहे हैं।
कागज पर रहता है स्टॉक
राज्य विधानसभा में धान खरीद में नुकसान और धान की बर्बादी का मुद्दा उठा चुके कांग्रेस विधायक मोतीलाल देवांगन का कहना है कि राज्य सरकार की लापरवाही से घाटा हो रहा है। धान सड़ रहा है या खराब हो रहा है। अरबों रुपए धान के रखरखाव के लिए मिलते हैं पर उसकी व्यवस्था ढंग से नहीं की जाती है। कई जगह गड़बड़ी पाई गई है। स्टॉक कागज पर रहता है। अब भौतिक सत्यापन होने से गड़बडियां सामने आ रही हैं।
धानखरीद (लाख मीट्रिक टन)
2000-01 में - 4.63
2001-02 में 13.34
2002-03 मे -14.74
2003-04 में 27.05
2004-05 में 28.82
2005-06 में 35.86
2006-07 में 37.07
2007-08 में 31.51
2008-09 में 37.47
2009-10 में 44.28
2010-11 में 51.00
2011-12 में 59.68
2012-13में 71.36

2013-14 में 79.72
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