बुधवार, 29 अक्तूबर 2014

मानव-हाथी संघर्षः राज्य सरकार बनी मूक दर्शक

बहुत साल पहले बॉलीवुड के एक फिल्म आई थी, हाथी मेरे साथी। इस मूवी में नायक और हाथी की दोस्ती ने सिनेमाहाल में बैठे दर्शक को खूब रुलाया, गुदगुदाया और प्रेरित किया था कि कैसे एक वन्य प्राणी भी इंसान का अच्छा दोस्त हो सकता है। लेकिन छत्तीसगढ़ में इन दिनों बिलकुल इसके उलट स्थिति बन रही है।

छत्तीसगढ़ में 250 से अधिक हाथी जंगलों में विचरण कर रहे हैं। इनमें से ज्यादातर हाथी भोजन की तलाश में गावों की तरफ रुख करते हैं और परिणामस्वरूप हाथियों और मानव के बीच द्वंद्व की स्थिति निर्मित होती है। प्रदेश में एक साल के भीतर करीब 23 लोगों की जान हाथियों ने ली है। ऐसा नहीं है कि केवल मानव ही मर रहे हैं, इस संघर्ष में हाथियों की जान भी जा रही है। लेकिन राज्य सरकार के कानों में जूं तक नहीं रेंग रही है।
पर्यावरण के क्षेत्र में काम कर रही अंतर्राष्ट्रीय संस्था ग्रीनपीस इंडिया ने हाल ही में एक रिपोर्ट जारी की है। इस रिपोर्ट में दावा किया गया है कि छत्तीसगढ़ में मानव-हाथी संघर्ष कई गुना बढ़ गया है। इतना ही नहीं, ग्रीनपीस का आरोप भी है कि हाथियों के विचरण वाले इलाकों में फैले कोल ब्लॉकों की लालच में जानबूझकर मानव-हाथी संघर्ष को बढ़ावा दिया जा रहा है, ताकि उस इलाके से हाथी और रहने वाले लोग, दोनों एक-दूसरे के डर से भाग जाएं
ग्रीनपीस की हालिया रिपोर्ट एलिफेंट इन द रूम में छत्तीसगढ़ के चार वन प्रभागों दक्षिण सरगुजा, कटघोरा, कोरबा और धर्मजयगढ़ में मानव हाथी संघर्ष का अध्ययन किया गया है। इन चारों इलाकों में दो कोल ब्लॉक हसदेव अरण्य और मंडरायगढ़ मौजूद है। कोल ब्लॉक की लालच में स्थानीय लोगों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के विरोध और चेतावनी के बावजूद राज्य सरकार ने लेमरू हाथी रिजर्व को अधिसूचित करने के बजाए ठंडे बस्ते में डाल दिया। लेमरू हाथी रिजर्व राज्य सरकार की एक महती योजना थी, जिसके द्वारा हाथियों के सरंक्षण और संवर्धन की योजना बनाई गई थी। राज्य सरकार के इस कदम के बाद यह कहा जाने लगा कि अफसर हाथियों को बचाने के बजाए जंगलों में पड़ने वाले कोल ब्लाक के खनन के लिए अधिक उत्सुक हैं।

दूसरी तरफ हालिया वर्षों में छत्तीसगढ़ में हाथियों की संख्या लगातार बढ़ है। ओडिशा और झारखंड में जंगलों की अंधाधुंध कटाई की वजह से 80 के दशक में हाथियों ने राज्य के जगंलों की तरफ पलायन शुरु किया था। यही कारण रहा कि मानव-हाथी संघर्ष बढ़ने से मानव मौत, जानवरों और संपत्ति को नुकसान पंहुचने लगा। पिछले पांच वर्षों में हाथियों के हमले में मरने वालों की संख्या 8 गुनी बढ़ गई। ग्रीनपीस की रिपोर्ट में भी दावा किया गया है कि साल 2005 के बाद प्रति साल कम से कम 25 लोगों की औसत मृत्यु सरकारी दस्तावेजों में दर्ज की गई है। 
ऐसा नहीं है कि नुकसान केवल मानव का हो रहा है। साल 2005 से 2013 के बीच छत्तीसगढ़ में 14 हाथियों की भी बिजली के झटके खाने से मौत हो गई है। इस पूरी अवधि में मानव-हाथी संघर्ष की वजह से 198 लोगों की मौत हुई। राज्य में 2004 से 2014 के बीच संपत्ति नुकसान की भी 8,657 और फसल नुकसान की 99,152 घटनाएं दर्ज की गईं। इस पूरी अवधि में मानव-हाथी संघर्ष की वजह से 2,140.20 लाख की राशि भी मुआवजे के तौर पर बांटी गई।
यह भी एक संयोग ही है कि जिन इलाकों में उक्त घटनाएं दर्ज की गई हैं, सरकार उन्हीं इलाकों के कोल ब्लाकों में खनन करने की इच्छुक है। इससे जान-माल का नुकसान बढ़ने की आशंका गहरा गई है।
ग्रीन पीस के कैंपेनर और रिपोर्ट के लेखक नंदीकेश शिवलिंगम ने  बताया कि कोल ब्लाक के एरिया में हाथियों की मौजूदगी और कोरबा व धर्मजयगढ़ में काम कर रहे पर्यावरण कार्यकर्ताओं की चेतावनी और सलाह के बावजूद राज्य सरकार संभवतः खनन के कारण ही प्रस्तावित लेमरू हाथी रिजर्व के प्रस्ताव से पीछे हट गई है। शिवलिंगम कहते हैं कि यह जंगल ना सिर्फ हाथियों के लिए बल्कि भालू, तेंदुओं और संभवतः बाघों का भी घर है। लेकिन विडंबना यह है कि केंद्र से लेमरू हाथी रिजर्व के लिए 2007 में हरी झंडी मिलने के बावजूद राज्य सरकार ने इसे रद्द कर दिया।
छत्तीसगढ़ में चल रहे मानव-हाथी संघर्ष पर अतंर्राष्ट्रीय गोल्डमैन पर्यावरण पुरस्कार प्राप्त सामाजिक कार्यकर्ता रमेश अग्रवाल कहते हैं कि राज्य सरकार द्वारा इन जंगलों से दूर हाथियों के लिए सुरक्षित क्षेत्र बनाने के लिए प्रस्ताव इस समस्या का हल नहीं है। हाथियों ने छत्तीसगढ़ के जंगलों में रहना और प्रजनन करना शुरु कर दिया है। राज्य के लोगों और वन जीवन की सुरक्षा के लिए एक सक्षम रणनीति की जरूरत है।
छत्तीसगढ़ में यह बहस तब शुरु हुई है, जब सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला देते हुए 214 कोल ब्लाक के आवंटन को अवैध घोषित कर दिया है। इसमें छत्तीसगढ़ के कोल ब्लाक भी शामिल हैं। हालिया फैसले से भारतीय जंगलों को बचाने की कोशिश कर रह कार्यकर्ताओं में खुशी है। शिवलिंगम भी कहते हैं कि सरकार को गलत को सही करने का एक मौका मिला है। अब हम केंद्र से मांग कर रह हैं कि वो जंगल क्षेत्र के भीतर स्थित कोल ब्लाकों की नीलामी से बचे और एक स्वंतत्र समिति का गठन करे, जो राज्य में हाथियों की गतिविधियों का अध्ययन करके उनके प्रवासी मार्ग और मानव-वन्यजीव संघर्ष के प्रबंधन के लिए उचित व आवश्यक सुझाव दे
दूसरी तरफ वन विभाग के अफसर मुआवजा बांटकर अपने कर्त्तव्यों की इतिश्री मान लेते हैं। राज्य सरकार ने अलग-अलग मुआवजा तय कर रखा है। इसमें हिंसक वन्यजीवों से जनहानि होने पर 3 लाख, स्थाई अपंगता होने पर 1.5 लाख, साधारण घायल होने पर 40 हजार, पशु हानि होने पर 20 हजार की राशि के मुआवजे का प्रावधान किया है। 
हाथियों की मौत का क्या?
मनुष्यों को तो राज्य सरकार मुआवजा बांटकर चुप करवा रही है। लेकिन मरने वाले हाथियों की क्षतिपूर्ति के बारे में राज्य सरकार के पास कोई एक्शन प्लान नहीं है। उलटे हाथियों को मारने के लिए (तथाकथित रूप से गांव में आने से रोकने के लिए) वन विभाग ने सोलर पॉवर फेंसिंग की है। ग्रामीण भी हाथियों को मारने के लिए करंट का इस्तेमाल कर रहे हैं। 2014-15 में अब तक चार हाथियों की मौत हो चुकी है। इसमें दो नर और दो मादा शामिल हैं। 




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