गुरुवार, 30 अक्तूबर 2014

अनेक समुदायों का बैंड "बस्तर बैंड"




बस्तर बैंड की खासियत ये है कि इसमें कई समुदाय के लोग जुड़े हैं। वैसे तो बस्तर में मुख्यतः गोंड जनजाति के लोग निवास करते हैं। लेकिन गोंड जनजाति भी कई उप-जातियों में विभाजित है। इनमें घोटुल मुरिया, राजा मुरिया, दंडामी माडिया (बायसन हार्न माडिया (भैंस के सींग सर पर लगाने वाले)), धुरवा, परजा, दोरला, मुंडा, मिरगान, कोईतूर शामिल हैं। बस्तर में महरा और लोहरा भी रहते हैं, जिन्हें आदिवासी नहीं माना गया है, लेकिन इनकी संस्कृति ठीक वैसी है, जैसी आदिवासियों की। एक चीज है, जो इन सभी को जोड़े रखती है और सभी में समानता का भाव पैदा करती है, वो है इनका नृत्य और संगीत। वाद्य परंपरा के कारण सभी समुदाय आपस में जुडे हुए दिखाई देते हैं। बस्तर में लिंगादेव की गाथा सुनाई जाती है, जिनमें बस्तर के 18 वाद्य यंत्रों का उल्लेख किया गया है। दरअसल लिंगादेव को नृत्य और संगीत का देवता माना गया है। हालांकि पूरे बस्तर में करीब 45 वाद्य यंत्रों का प्रयोग किया जाता है। बस्तर के आदिवासियों के बीच हजारों देवी-देवता पूजे जाते हैं। इन सभी देवताओं के लिए संगीत की अलग-अलग धुन का प्रयोग किया जाता है। नगाड़ा, देवमोहिरी (विशेष प्रकार की शहनाई), तुड़मुड़ी, मुंडा बाजा, पराए, तिरदुड़ी, बिरिया ढोल, किरकिचा, जलाजल, वेरोटी (विशेष प्रकार की बांसुरी) ऐसे अनेक वाद्य यंत्र हैं, जिनका संगीत आपको रोमांचित कर देता है। इन जनजातिय वाद्य यंत्रों की स्वर लहरियो में ठेठ लोक संस्कृति की खुशबू महसूस की जा सकती है। बस्तर बैंड की खासयित है कि एक ही मंच पर कई समुदाय और उनके वाद्य यंत्रों के संगीत का लुत्फ उठाया जा सकता है। जबकि ये बस्तर में भी संभव नहीं है, क्योंकि एक वक्त और एक जगह पर आप केवल किसी एक ही समुदाय के वाद्य यंत्र को सुन सकते हैं। जबकि बस्तर बैंड इस संगीत परंपरा को सहेजने से भी एक आगे बढ़कर बस्तरिया संगीत का फ्यूजन तैयार कर दर्शकों के सामने परोसने का काम भी कर रहा है।

ऐसे ही बस्तर के गोंडी जनजाति के सबसे अहम मुंडा समुदाय के बाबूलाल बघेल और साहदुर नाग बस्तर बैंड से जुड़े हुए हैं। कमर में पटकू लपेटे हुए (घुटने के ऊपर लुंगीनुमा परिधान पहने हुए), सिर पर पागा बांधे हुए बाबूलाल बघेल बताते हैं कि कभी किसी जमाने में हमारे पूर्वज कढू और बेताल राजा अन्नम देव के साथ बस्तर पहुंचे थे। कढ़ू और बेताल के परिवार ही पीढ़ी दर पीढ़ी बढ़ते हुए आज मुंडा समुदाय के रूप में बस्तर में मौजूद हैं। बघेल और नाग मुंडा बाजा बजाते हैं। बगैर इनके वाद्य यंत्र के बस्तर के मशहूर दशहरे की शुरुआत नहीं हो सकती है। इसका कारण है कि जगदलपुर के राजा अन्नमदेव के जमाने से ही मुंडा समुदाय को बस्तर दशहरे का स्वागत अपने वाद्य यंत्र को बजाकर करने का दायित्व सौंपा गया था। जो परंपरा आज भी अनवरत जारी है। मुंडा बाजा की खासियत ये है कि इस पर बकरे की खाल को बाल सहित चढ़ाया जाता है। जगदलपुर के पोटानार गांव में रहने वाले बाबूलाल बघेल बताते हैं कि हमारी कई पीढ़ी पहले हमारे वाद्य यंत्र को मेढंक की चमड़ी लगाकर तैयार किया गया था, लेकिन उसका आकार बेहद छोटा था। समय के साथ वाद्य यंत्र का आकार बढ़ा तो इसे बकरे की चमड़ी लगाकर तैयार किया जाने लगा। चार एकड़ जमीन पर धान बोकर जीवन यापन करने वाले बघेल बस्तर बैंड के साथ 2008 में जुड़े थे। बैंड के संयोजक अनूप पांडे जब वाद्य यंत्रों को खोजते हुए उनके गांव पहुंचे तो उन्हें अपने दल में शामिल होने का न्यौता दिया। तब से आज तक वे बस्तर बैंड से जुड़कर दर्जनों प्रस्तुतियां दे चुके हैं।
इन अपने उन्मुक्त जीवन को अब ये समुदाय पहले की तरह नहीं जी पा रहे हैं। इसका कारण है बस्तर में व्याप्त नक्सल समस्या। बाबूलाल बघेल बताते हैं कि अब हम खुलकर अपनी संस्कृति को नहीं सहेज पा रहे हैं। कुछ दशक पहले तक हम खुलकर नाचते, गाते और अपने उत्सव मनाते थे। लेकिन अब बंदूकों के साए में जीना बेहद मुश्किल हो गया है। हम पर दोनों तरफ से बंदूकें तनी हुई हैं। इकट्ठा होना भी संदेह की नजरों से देखा जाता है। यही कारण कि हमारे बच्चे वो परिवेश नहीं पा रहे हैं, जो हमें मिला था। अब तो बस डर के साए में जीवन कट रहा है। लेकिन एक परिवर्तन हमें खलता है, वो ये कि हमारे बच्चे अब पांरपरिक परिधान नहीं पहनना चाहते हैं, उन्हें शर्ट पेंट चाहिए।
मुंडा समुदाय के ही साहदुर नाग बताते हैं कि पहले हमारे समुदाय का जीवन यापन घर घर जाकर धान मांगकर होता था। राजा ने हमें खेती का काम नहीं सौंपकर घर घर जाकर बाजा बजाने का काम सौंपा था। वही हमारी पंरपरा थी। लेकिन अब समय के साथ हम कमाने और खेती करने लगे हैं। मैं मनिहारी (सौंदर्य प्रसाधन बेचने) का काम करता हूं। जगदलपुर के बाजार से सामान लाकर गांव में लगने वाले साप्ताहिक हाट में सामान बेचता हूं। बचे हुए समय में बस्तर बैंड के साथ प्रस्तुति देता हूं। हम जगदलपुर के आसपास रहने वाले लोग हल्बी बोली बोलते हैं, जबकि बैंड के अधिकांश सदस्य गोंडी बोली बोलते हैं। लेकिन साथ काम करते करते ना केवल एक दूसरे के नृत्य संगीत को सीख रहे हैं, बल्कि एक दूसरे की बोली भी समझने लगे हैं। किसी भी कार्यक्रम के पहले एक हफ्ता जमकर रिहर्सल करते हैं। कई बार रिहर्सल का मौका नहीं भी मिल पाता है। जब मिलता है तो मिलजुल कर कोई नई धुन या संगीत बनाने का मौका मिल जाता है।
घोटुल मुरिया समुदाय के नवेल कोर्राम और दशरूराम कोर्राम भी बस्तर बैंड से जुड़े हुए हैं। जिला नारायणपुर के गांव रेमावंड के रहने वाले नवेल ओर दशरूराम  पराए बजाते हैं। पराए एक प्रकार का ढोल होता है, जिसके दोनों तरफ बैल के चमड़ा लगाया जाता है। पराए ना केवल एक वाद्य यंत्र है, बल्कि घोटुल मारिया समुदाय की पूज्य और अनिवार्य वस्तु भी है। पराए का महत्व इसी बात से पता चलता है कि यदि शादी करने वाले युवक के घर पराए ना हो तो, उसे दंड स्वरूप 120 रुपए भरने होते हैं। रिश्ता तय होने के पहले वर पक्ष से पूछा जाता है कि उनके घर में पराए है कि नहीं। ये बाजार में नहीं बिकता, बल्कि हर परिवार अपने लिए पराए को खुद बनाता है। शिवना नामक पेड़ की बकायदा पूजा करके पराए के लिए लकड़ी काटी जाती है। बदलते जमाने का असर दशरूराम की पोशाक में देखा जा सकता है। शर्ट पेंट पहने हुए दशरूराम बताते हैं कि उनके पास 15 एकड़ जमीन है। जिसपर वे धान की खेती करते हैं। दशरूराम के पास सिरहा की जिम्मेदारी भी है। सिरहा मतलब जिसके सिर देवी आती हो। दशरूराम बताते हैं कि उनके पिता भी सिरहा थे। उनकी मृत्यु के बाद अचानक मुझ पर भी देवी आने लगी। अब हर रोज शाम चार बजे दशरूराम के घर बैठक होती है। जिसमें वो लोगों की समस्याओं का समाधान भी करता है और बीमारियों का आर्युवैदिक उपचार भी।
नवेल कोर्राम विशुद्ध रूप से आदिवासी संस्कृति को अपनाए हुए हैं। उघारे बदन, पटकू और पागा पहनने वाले नवेल भी दशरूराम के साथ 2007 में ही बस्तर बैंड से जुड़ गया था। मुख्यतः खेती किसानी करके अपना परिवार पालने वाले नवेल के पास छह गाय भी हैं। लेकिन बस्तर में दूध नहीं बेचा जाता। इसलिए नवेल गाय के दूध का उपयोग घरवालों के लिए ही करता है। नवेल भी पराए बजाता है। नवेल के मुताबिक जब घोटुल मुरिया समुदाय में कोई शादी होती है तो सभी गांववाले मिलकर घोटुल में पराए की थाप पर नाचते हैं। ये शादी के लिए अनिवार्य रसम है। घोटुल इस समुदाय की परंपरा का अभिन्न अंग है। घोटुल मतलब गांव के बीचों बीच बनी एक झोपड़ी, जिसपर पूरे गांव का अधिकार होता है। गांव की हर बैठक, सभा, नाच-गाना, समारोह इसी घोटुल में आयोजित किए जाते हैं। अपने गांव से पहली बार निकलकर दूसरे लोगों के सामने प्रस्तुति देने का अनुभव कैसा रहा, ये पूछने पर नवेल की आंखों में चमक आ जाती है। वह कहता है कि शब्दों में उन अनुभव को बता पाना मुश्किल है क्योंकि कभी सोचा नहीं था कि कहीं बाहर भी हम अपनी संस्कृति का प्रदर्शन कर पाएंगे। नवेल दुखी हैं कि अब घोटुल परंपरा खत्म होने लगी है। माओवादी भी घोटुल को पसंद नहीं करते। इसलिए अब युवक युवती घोटुल में रात नहीं बिताते। लगता है धीरे धीरे हमारी संस्कृति खत्म होती जा रही है।
महरा समुदाय, जिनके वाद्य यंत्र देवमोहिरी (विशेष प्रकार की शहनाई) के बगैर बस्तर में किसी भी प्रकार के शुभ कार्य की कल्पना भी नहीं की जा सकती। चाहे शादी हो या देवी देवताओं की पूजा। जैसा कि नाम से जाहिर है देवमोहिरी यानि देवताओं को मोहित करने वाली। ऐसे ही महरा समुदाय के श्रीनाथ नाग और अनंत राम चाल्की भी बस्तर बैंड के सदस्य हैं। नए जमाने का प्रभाव श्रीनाथ और अनंतराम पर भी पड़ा है। श्रीनाथ जहां नानगुर जिला जगदलपुर के निवासी हैं. वहीं अनंतराम कैकागढ़, जिला जगदलपुर में रहते हैं। श्रीनाथ मजदूरी करके जीवनयापन करते हैं। साल के चार महीने उनका काम केवल देवमोहिरी बजाने का है। दरअसल चार महीने शादियों का सीजन होने से उनके पास भरपूर काम होता है, बाकी दिनों वे खेतों में मजदूरी करके अपना घर चलाते हैं। 2007 में बैंड की शुरुआत के वक्त से ही श्रीनाथ समूह से जुड़े हुए हैं। अब तक वे 50 से भी ज्यादा प्रस्तुति दे चुके हैं। वे बताते हैं कि गांव से निकलकर दूसरे शहरों और राज्यों में प्रदर्शन करने से उन्हें जो मिला, उसे बयान नहीं किया जा सकता। दर्शक और श्रोता तो सम्मान देते ही हैं, गांव में भी हमारा सम्मान बढ़ गया है। अनूप पांडे ने इन्हें भी इनके गांव से खोज निकाला, पहले तो ग्रुप से जुड़ने में श्रीनाथ ने आनाकानी की। लेकिन जब एक बार जुड़े तो अभी तक हर प्रस्तुति के लिए पहुंच ही जाते हैं। वे बताते हैं कि ये बैंड एक ऐसी कंपनी की तरह है, जिसका मुनाफा सबमें बांट दिया जाता है। बैंड के साथ रहते हुए रोज का खाना तो मिलता ही है। हर शो का भी भुगतान होता है। श्रीनाथ बताते हैं कि एक कार्यक्रम में उन्होंने पंथी और करमा नृत्य देखा था, जो मध्यप्रदेश के मंडला जिले में किया जाता है। छत्तीसगढ़ के भी कुछ हिस्सों में ये नृत्य किए जाते हैं। उन्हें पंथी और कर्मा बेहद पंसद आया था। वे कहते हैं कि जैसे हमें दूसरे के पारंपरिक नृत्य पसंद आए, वैसे ही हमारे भी कई कद्रदान अब देशभर में मौजूद हैं।
अनंतराम चाल्की ऑटो चलाते हैं। बैंड में जुड़ने के पहले वे शादी ब्याह में देवमोहिरी बजाया करते थे। लेकिन अब बस्तर बैंड के साथ परफार्म करते हैं। अनंतराम कहते हैं कि बैंड से जुड़कर मैने सही ढंग से बजाना भी सीखा। मैने कभी नहीं सोचा था कि देशभर में घूमूंगा। ये मेरे लिए अनमोल अनुभव है। घर चलाने लायक तो हम कमा ही लेते हैं, लेकिन अपनी संस्कृति का संरक्षण और उसका विस्तार ऐसे भी हो सकता है। ये जानकर खुशी होती है। हम तो पीढ़ी दर पीढ़ी अपनी विरासत को आगे बढ़ा ही रहे थे। ये मौखिक और वाचिक परंपरा है, जिसे कहीं लिखा नहीं गया, लेकिन वो हर पीढ़ी में हस्तातंरित होती रही है। लेकिन दुनिया भर के सामने अपनी पंरपरा को रखना सुखद अनुभव है।
दन्नामी माडिया समुदाय के होंगी (माया) सोरी और बुधराम सोरी भी बस्तर बैंड का अभिन्न हिस्सा है। बुधराम बिरिया ढोल बजाते हैं। इस बिरिया ढोल के बगैर भी दन्नामी माडिया समुदाय में ना तो शादी ब्याह संपन्न होता है ना ही अंतिम संस्कार। इसे समुदाय के लोग खुद ही बनाते हैं। इसकी खासियत ये है कि इस ढोल के एक तरफ बैल का चमड़ा होता है तो दूसरी तरफ बकरे का। जब इस ढोल को बनाने के लिए शिवना पेड़ की लड़की काटी जाती है, तब बकायदा पूजा करके पेड़ को नारियल चढ़ाया जाता है। बिरिया ढोल जब शादी के मौके पर बजता है तो अलग धुन होती है, लेकिन जब किसी के अंतिम संस्कार के वक्त बजता तो है तो अलग धुन निकाली जाती है। इसकी आवाज इतनी तेज होती है कि आसपास के 30-35 गांव तक सुनाई देती है। धुन सुनकर दूसरे गांव के लोग अंदाजा लगा लेते हैं कि किसी की शादी हो रही है या किसी का अंतिम संस्कार संपन्न किया जा रहा है। बुधराम को वर्ष 2010 में उस्ताद बिस्मिल्ला खान संगीत पुरस्कार से नवाजा जा चुका है। बुधराम भी किसान है।
होंगी (माया) सोरी दंतेवाड़ा के जरीपारा गांव में रहती है। होंगी तिरदुड़ी बजाती है। तिरदुड़ी लोहे से बना हुआ एक वाद्य यंत्र है। होंगी की एक ओर जिम्मेवाही है गीत गाने की। होंगी बताती हैं कि उनके माता पिता जोगी और देवालान सोरी ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के सामने गौर नृत्य (आदिवासियों द्वारा किया जाने वाला एक नृत्य) प्रस्तुत किया था। इसके लिए वे विशेष रूप से दिल्ली बुलाए गए थे। होंगी महुआ बीनकर अपना घर चलाती हैं। अभी महुआ बीनने का ही मौसम चल रहा है, लेकिन बैंड से लगाव के कारण वे प्रस्तुति देने निकली हुई हैं।
धुर्वा समुदाय के भगतसिंह नाग नेतीनार जिला बस्तर के रहने वाले हैं। वे वेरोटी (बांसुरी) बजाते हैं। अभी 12वीं की पढ़ाई कर रहे भगतसिंह को राजस्थानी नृत्य संगीत से भी बेहद लगाव है। वे एक पढ़े लिखे आदिवासी परिवार से हैं। भगतसिंह के बड़े भाई सहायक शिक्षक हैं और भाभी आंगनवाड़ी कार्यकर्ता हैं। भगतसिंह बस्तर के उन युवाओं में से हैं, जिन्हें बाहरी दुनिया आकर्षित भी करती है और वे दुनिया के गुणा भाग को समझते भी हैं। भगत सिंह बतात हैं कि कई बार अपने ग्रुप की प्रस्तुति के वक्त आयोजिक कार्यक्रमों में उन्होंने राजस्थानी लोकसंगीत भी देखा और सुना है। जो उन्हें बेहद पंसद आया। भगतसिंह कहते हैं कि दूसरे राज्यों की लोक संस्कृति देखकर अच्छा लगता है। वेरोटी यानि बांसुरी के बारे में भगत बताते हैं कि इसे मढ़ई मेलों के वक्त बजाया जाता है। शादी ब्याह में भी इसे बजाया जाना शुभ माना जाता है। 2011 में वे बैंड से जुड़े हैं। नए लोगों से मिलना, मान सम्मान पाना उन्हें रोमांचित करता है। इसलिए वे बैंड से जुड़े रहना चाहते हैं। वे किरकिचा (लोहे से बना वाद्य यंत्र) और जलाजल (घुंघरूओं से बना बाजा) भी बजाते हैं। हम सब मिलकर 150 स 200 धुने तैयार कर चुके हैं। इसे आप जनजातिय संगीत का फ्यूजन मान सकते हैं। जब हम मिलकर प्रैक्टिस करते हैं तो कई बार नई धुने तैयार हो जाती हैं। ये मिलकर रिहर्सल करने का वक्त निकाल ही लेते हैं। जबकि सब अलग अलग गांवों, जिलों में रहते हैं। अलग अलग समुदायों से हैं। लेकिन जब इकट्ठे होते हैं तो लगता है कि बस्तर के सारे गुलाब एक ही गुलदस्ते में महक रहे हैं।
जब 45 वाद्य यंत्र एक साथ स्वर लहरी छोड़ते हैं तो माहौल नशीला सा लगने लगता है। वैसे भी बस्तर के वाद्य यंत्रों की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि वे श्रोता को झूमने पर मजबूर कर देते हैं। नगाड़ा, देवमोहिरी और तुड़मुड़ी को एक साथ बजाने की पंरपरा हैं। जब ये तीनों वाद्य यंत्र बजते हैं, तो ये शौर्य रस का आभास पैदा करते हैं। इन्हें सुनते वक्त ऐसा लगता है जैसे वीर रणभूमि की तरफ प्रस्थान कर रहे हैं। लेकिन जब यही तीनों वाद्य यंत्र पराए, तिरदुड़ी, बिरिया ढोल, किरकिचा और जलाजल के साथ बजते हैं तो समा सुरमयी हो जाता है। ताड़ी और सल्फी (दोनों देशी शराब का प्रकार हैं) की मादकता इन वाद्य यंत्रों में उतर आती है। आदिवासी इलाकों में घर में बनाई जाने वाली शराब का अलग महत्व है। मदिरा आदिवासी संस्कृति का अभिन्न अंग है....इसका सुरुर जनजातीय वाद्य यंत्रों की स्वर लहरियों में महसूस किया जा सकता है। बस्तर बैंड के सदस्यों की तैयार धुनें केवल नृत्य, मौज मस्ती भर के लिए नहीं, बल्कि देवी और देवताओं की अराधना के लिए भी होती हैं। ये धुनें अपनी कथा वाचक परंपरा को भी आगे बढ़ाती हैं। पराए और बिरिया ढोल की थाप पर थिरकते हुए आदिवासी युवक युवती आपको भी थिरकने को मजबूर कर देते हैं। माओपारा (वनभैंसे को मारने की नृत्य नाटिका) हो या लोरी चंदा की प्रेम कहानी, आल्हा उदल की शौर्य गाथा हो या लिंगादेव की गाथा हो, हर गाथा और गीत के साथ बजते वाद्य यंत्र करिश्माई माहौल पैदा करने का माद्दा रखते हैं। यही बस्तर के वाद्य यंत्रों की विशेषता है।


एक टिप्पणी भेजें