बुधवार, 4 नवंबर 2015

सोनी सोरी से चार सवाल


सोनी सोरी को तो आप सब जानते ही होंगे। नक्सलियों को एस्सार कंपनी की रकम पहुंचाने के आरोप में पुलिस ने सोनी को दिल्ली से गिरफ्तार किया था। यह छत्तीसगढ़ का हाईप्रोफाइल मामला बना और सोनी को देशभर में पहचाने जाने लगा। फिर जेल से छूटने के बाद सोनी आप के टिकट पर लोकसभा चुनाव लड़ तथाकथित तौर पर बस्तर की नेता बन चुकी है। मैं सोनी सोरी से चार सवाल पूछना चाहती हूं। लेकिन उसके पहले उस घटना का उल्लेख हो जाए, जिसके बहाने सोनी सोरी और उन जैसे तमाम लोग एक बार फिर लाइम लाइट में आने के लिए बेकरार हैं। साथ ही बस्तर में शांति की स्थापना के विरोधियों को भी एक बार फिर हो-हल्ला मचाने का मौका मिल गया है।
छत्तीसगढ़ के माओवाद प्रभावित बीजापुर ज़िले की कुछ आदिवासी महिलाओं ने पिछले दिनों आरोप लगाया था कि बड़ागुड़ा थाना क्षेत्र के चिन्नागेलूर, पेदागेलूर, गोदेम और भूर्गीचेरु समेत कई गांवों में सीआरपीएफ और पुलिस के कुछ जवानों ने माओवादियों की तलाशी के नाम पर उनके घरों में घुसकर लूटपाट की है। यह भी आरोप लगाया कि जवानों ने उनके घरों से पुरुष सदस्यों को जबरदस्ती निकाला और महिलाओं के साथ बलात्कार किया। तथाकथित मानवाधिकार संगठनों के हस्तक्षेप के बाद रविवार को इनमें से चार पीड़ित महिलाओं ने ज़िले के कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक के समक्ष अपना बयान दर्ज़ कराया। बीजापुर ज़िले के पुलिस अधीक्षक केएल ध्रुव का कहना है, “हमें इन चार महिलाओं से शिकायत मिल गई है। अब हम मामले की जांच कर रहे हैं। फ़िलहाल ये स्पष्ट नहीं है कि 19 से 22 अक्टेबर की बताई जा रही इन घटनाओं में कितने सुरक्षाकर्मी शामिल थे आरोपों की जांच के लिए एएसपी इंदिरा कल्याण ऐलेसेला के नेतृत्व में चार सदस्यीय टीम का गठन किया गया है। आरोप कितने सच्चे या झूठे हैं, यह तो जांच में सामने आ ही जाएगा। लेकिन इस घटना के बहाने ज़रा बस्तर में सक्रिय सफेद मुखौटा लगाए काले दिल वाले उत्पातियों पर भी बात होनी चाहिए।
अब उन सवालों पर आते हैं, जिन्हें मैं सोनी सोरी से करना चाहती हूं-

1.-पहला यह कि बीजापुर में अर्ध्यसैनिक बलों और पुलिस के कुछ जवानों पर आदिवासी महिलाओं से बलात्कार के आरोप लगने के बाद आप कुछ ज्यादा ही मुखर नज़र आ रही हैं। बस्तर से लेकर रायपुर तक पहुंचकर आप प्रेस कॉफ्रेंस ले रही हैं। इसे देखकर लगता है कि आप को राजनीति की अच्छी ट्रेनिंग दी जा रही है। यह अच्छी बात है, इसमें कुछ भी गलत नहीं है। फिलवक्त आपसे मेरा सवाल यह है कि आज से करीब एक साल पूर्व मैं तहलका के लिए एक स्टोरी करना चाहती थी। मैं यह जानना चाहती थी कि क्या सचमुच सुरक्षा बलों के जवान आदिवासी महिलाओं का बलात्कार करते हैं? मैं खुद प्रत्यक्ष रूप से उन इलाकों में जाना चाहती थीं, उन महिलाओं से मिलना चाहती थी, उनके दर्द को सुनना-समझना और दुनिया के सामने लाना चाहती थी। इसके लिए मैंने आपसे फोन पर कई-कई बार संपर्क किया। लेकिन आपमें उसमें बिलकुल भी रूचि नहीं ली। मैं समझ ही नहीं पाई कि एक तरफ तो आप बस्तर में आदिवासियों पर हो रहे अत्याचार की बात करती हैं, लेकिन जब कोई पत्रकार उसे अपनी आंखों से देखना या सुनना चाहता है तो आप चुप्पी साध लेती हैं। इतना ही नहीं, मौका आने पर आप स्थानीय पत्रकारों पर आरोप भी लगाती हैं कि पुलिस के डर से वे चुप हैं। जब मैं आपसे संपर्क कर रही थी तो मुझे पता था कि बस्तर में जाकर इस तरह की स्टोरी करने में रिस्क था, लेकिन वह रिस्क मेरी अपनी थी। फिर क्यों आप मुझे टालती रहीं और मुझे किसी भी तरह से मदद करने की रुचि नहीं दर्शाई?
2.-मेरा दूसरा सवाल यह कि आपने रायपुर में प्रेस कॉफ्रेंस करके बोला कि बस्तर में शांति बहाल नहीं हुई है, बल्कि आदिवासियों की समस्या और बढ़ गई  है। आप कहती हैं कि बस्तर में शांति वार्ता से ही हो सकती है, जनप्रतिनिधि इस दिशा में पहल करें। तो क्या आपने इस दिशा में कोई पहल की, अब तो आपज्वाइन करने और लोकसभा चुनाव लड़ लेने के बाद आप भी जनप्रतिनिधि हैं। आरोप लगाना सबसे आसान काम है, लेकिन समाधान की दिशा में आगे बढ़ना सबसे चुनौतीपूर्ण। नक्सलवाद ऐसा मसला है, जो सिर्फ सरकारें नहीं सुलझा सकती, इसके लिए समग्र राजनीतिक-सामाजिक चेतना का जागृत होना जरूरी है। क्या आपने सरकार और पुलिस-प्रशासन को कोसने के अलावा इस दिशा में कोई काम किया है?
3.- तीसरा सवाल यह कि आप बस्तर में रहती हैं, लेकिन क्या आप नहीं जानती कि नक्सली जब सुरक्षाबलों पर हमला करते हैं या उन्हें एंबुश में फंसाकर मार डालते हैं तो कई बार वे उनके हथियारों के साथ-साथ उनकी वर्दी और जूते भी लूट ले जाते हैं। क्या ऐसा नहीं हो सकता (ऐसा हो भी सकता है, इस पर क्यों न विचार किया जाए) कि नक्सलियों ने जवानों की वर्दी पहनकर आदिवासी महिलाओं को जानबूझकर निशाना बनाया ताकि जवानों का मनोबल गिरे, उनकी बदनामी हो ( या तथाकथित मानवाधिकार संगठनों को उनकी बदनामी करने का मौका मिल सके)। क्या आप मेरी इस बात से सहमत हैं कि नक्सली हथियार और वर्दी लूटते हैं?
4.- चौथा और सबसे अहम सवाल यह कि केंद्र में भाजपा की सरकार बनने के बाद से ही बस्तर में नक्सलवाद को कुचलने के लिए व्यापक अभियान चलाया गया। कई नक्सलियों को या तो आत्मसमर्पण करना पड़ा या कई गिरफ्तार कर लिए गए। केंद्रीय गृहमंत्रालय ने नक्सलवाद को वामपंथ उग्रवाद का नया नाम देकर अभूतपूर्व आक्रमकता दिखाई और माओवादियों की जड़ों को हिला दिया। हाल ही में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल ने छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित सुकमा का दौरा करके नक्सलियों के खिलाफ बड़े ऑपरेशन का खाका तैयार किया है। सुकमा दौरे के दौरान डोभाल के साथ सीआरपीएफ, आईटीबी और बीएसएफ के डीजी भी थे। केंद्रीय गृह मंत्रालय बारिश के बाद नक्सलियों के खिलाफ बड़े ऑपरेशन की तैयारी में है। इसका बेस कैंप सुकमा को बनाया गया है। बारिश खत्म होने के बाद अब अभियान को गति देने से पहले श्री डोभाल ने एक-एक बिंदु पर रणनीति तैयार की है। यहां यह भी ध्यान देने योग्य है कि माओवादी और उनके पैरोकार बस्तर से जवानों को हटाने की मांग करते रहे हैं। क्या यह कहीं ऐसा तो नहीं कि एंटी नक्सल ऑपरेशन शुरु न हो पाए, इसलिए षड़यंत्रपूर्वक केंद्र और राज्य सरकार का ध्यान भटकाने की कोशिश की जा रही है?
इस वर्ष में बस्तर समेत सुकमा,बीजापुर व दंतेवाड़ा में नक्सलियों के विरुद्ध लंबा आपरेशन जारी है। हजारों जवान जंगल में उतारे गए हैं। काफी संख्या में जवान सुकमा, दंतेवाड़ा, बीजापुर जिलों के किस्तावरम, गोलापल्ली, उसूर, आवापल्ली, भद्रकाली, मद्देड़, कुआकोंडा, तुमनार, पिनकोंडा, मसेनार, गुमडा आदि इलाकों में सर्चिंग कर रहे थे। इस दौरान एक दर्जन से अधिक छिटपुट मुठभेड़ होने की खबरें आ रही थीं।। जुलाई में सुकमा जिले के जगरगुंडा क्षेत्र में हुई मुठभेड़ में तीन से चार नक्सलियों के मारे जाने की सूचना मिली थी। हालांकि उनके शव साथी ले जाने में सफल हो गए थे। जिला बल,एसटीएफ तथा सीआरपीएफ के जवान सीमावर्ती क्षेत्रों की लगातार घेरेबंदी से नक्सली सुरक्षित ठिकानों की ओर दुबक रहे थे। कही यह उसी का बदला तो नहीं। दरअसल जिस तरह से यह पूरा घटनाक्रम सामने आया है, उससे कई तरह के संदेह जन्म लेते हैं। मैं कतई नहीं कहना चाहती कि यह आरोप पूरी तरह से झूठे हैं या हो सकते हैं। लेकिन बावजूद इसके पूरा घटनाक्रम देखते हुए यह आशंका जरूर हो रही है कि कहीं यह कोई साजिश तो नहीं? क्योंकि आप की नेता सोनी सोरी, जो नक्सलवादियों को एस्सार की रकम पहुंचाने के मामले में गिरफ्तार हुईं और पूरे देश में कुप्रसिद्ध भीं, उन्होंने पूरे मामले को यूं लपका है, जैसे वे बस इसी बात का इंतजार कर रहीं थीं।
सोनी सोरी ने रायपुर प्रेस क्लब में आयोजित प्रेस कांफ्रेंस में बीजापुर जिले में सीआरपीएफ और पुलिस के कुछ जवानों द्वारा आदिवासी महिलाओं के साथ कथित बलात्कार, यौन प्रताड़ना और घरों में लूटपाट की घटना को सच बताया और कहा कि बस्तर में नक्सली बताकर किसी को गिरफ्तार करना, महिलाओं के साथ दुष्कर्म करना आम बात हो गई है।

सच क्या है यह जांच में सामने आना ही है, महिलाओं से दुष्कर्म करने वाले किसी भी कीमत पर नहीं बख्शा जा सकता है। उन्हें इसकी सख्त से सख्त सजा मिलनी ही चाहिए। फिर चाहे वे कोई भी क्यों न हों। लेकिन इतना जरूर है कि बस्तर को इस वक्त उस नजर से देखने वालों की ज्यादा जरूरत है, जो निष्पक्ष हों। एक तरफ सरकार है तो दूसरी तरफ माओवादी। यहां एक तीसरा पक्ष भी है, जो प्रथम दोनों ही पक्षों से ज्यादा मुखर, तेज और चालाक है, वह है माओवादियों के पैरोकार। इनसे और इनकी दिग्भ्रमित करती दलीलों से बचते हुए सच तक पहुंचना जरूरी है, फिर सच चाहे जो भी हो। हो सकता है कि यह घिनौना कृत्य जवानों का ही हो, या फिर नक्सलियों का। लेकिन सिक्के के दोनों पहलुओं को जांच में शामिल कर सच्चाई तक पहुंचा जा सकता है। 
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