शनिवार, 17 मई 2014

हक की लड़ाई


देश के सबसे बड़े एल्युमिनियम प्लांट कहे जाने वाले कोरबा स्थित भारत एल्युमिनियम कंपनी (बालको) में श्रम कानूनों का धड़ल्ले से उल्लघंन हो रहा है। अपने हक से वंचित होने पर 6000 ठेका श्रमिक बालको से नाराज़ होकर हड़ताल पर चल रहे हैं। श्रमिकों का आरोप है कि कंपनी प्रबंधन कारखाना अधिनियम के तहत उनका रिकॉर्ड नहीं रख रहा है।
छत्तीसगढ़ के कोरबा जिले में भारत एल्युमिनियम कंपनी लिमिटेड यानि बालको ने 2003 से 2008 के बीच नए संयंत्रों की स्थापना और पुराने के विस्तार की अनुमति ली थी। नए संयंत्रों में 540 मेगावॉट का संयंत्र भी शामिल था। संयंत्र तो तय सीमा में पूरा हो गया, लेकिन इसमें काम करने वाले श्रमिकों के हितों का नियमानुसार ध्यान नहीं रखा जा रहा है। यही कारण है श्रमिक काम छोड़कर आंदोलन की राह पर उतर आए हैं। दरअसल भारत सरकार ने कारखाना अधिनियम 1970 में संशोधन कर श्रमिकों के हितों के लिए प्रावधान किया था। जिसके मुताबिक कंपनी प्रबंधन को ठेका श्रमिकों का भी रिकॉर्ड रखना अनिवार्य है। जिस प्रारूप में श्रमिकों का रिकार्ड रखा जाता है, उस प्रारूप को फार्म 14 कहा जाता है। लेकिन बालको के श्रमिकों का आरोप है कि उनका फॉर्म 14 नहीं भरा जा रहा है। जबकि नियमानुसार बगैर फॉर्म 14 भरे कंपनी प्रबंधन श्रमिकों को परिसर में प्रवेश नहीं दे सकती। श्रमिकों का आरोप है कि ऐसा उन्हें उनके हक से वंचित करने के लिए किया जा रहा है। बालको के मजदूर इसलिए भी डरे हुए हैं क्योंकि आज से ठीक साढ़े चार साल पहले 23 सिंतबर 2009 की शाम बालको संयंत्र परिसर में चिमनी हादसा हुआ था। 12 सौ मेगावॉट पॉवर प्लांट की निर्माणाधीन दो ऊंची चिमनियों में से एक 240 मीटर ऊंची चिमनी भरभरा कर गिर गई थी। इस घटना में 40 मजदूरों की मौत हुई थी। उस वक्त भी बालको प्रबंधन पर आरोप लगे थे कि मजदूरों की मौत का आंकड़ा 40 से कहीं ज्यादा है। सरकार ने न्यायाधीश संदीप बख्शी की अध्यक्षता में एकल जांच आयोग गठित किया था। जिसकी रिपोर्ट में माना गया था कि दुर्घटना में बालको प्रबंधन की लापरवाही की वजह से हुई है।
छत्तीसगढ़ संविदा एवं ग्रामीण मजदूर संघ (इंटक) के महासचिव संतोष सिंह का आरोप है कि हम हड़ताल पर नहीं है, बल्कि बालको प्रबंधन ही हमें काम नहीं करने दे रहा है। हमारी मांग केवल इतनी है कि हमें हमारा फॉर्म 14 दिखाया जाए। लेकिन जब प्रबंधन ने उसे भरा ही नहीं है तो हमें दिखाएगा कहां से। यही कारण है कि जब सहायक श्रमायुक्त ने बालको प्रबंधन को बुलाया तो वहां कोई अफसर नहीं पहुंचा
अपने अधिकारों को लेकर 19 अप्रैल को छत्तीसगढ़ ग्रामीण संविदा एवं मजदूर संघ (इंटक) ने प्रबंधन को पत्र लिखा और चेतावनी दी कि 7 दिनों के भीतर उनकी मांगे पूरी नहीं होने पर काम बंद आंदोलन किया जाएगा। इसके बाद भी प्रबंधन के कान में जूं तक नहीं रेंगी। अंततः श्रमिकों ने हड़ताल का रास्ता अपना लिया। प्रतिदिन पहली पाली में लगभग 5 हजार श्रमिक कार्य पर पहुंचते थे, वे नहीं पहुंचे। इसके साथ ही अन्य पालियों में आने वाले मजदूर भी काम पर नहीं आए। बालको संयंत्र में लगभग 6 हजार श्रमिकों के काम पर नहीं पहुंचने से संयंत्र के भीतर स्थिति असामान्य हो गई। श्रमिकों की अनुपस्थिति से कामकाज प्रभावित न हो, इसे लेकर इंजीनियरों को सामने आना पड़ा। उन्होंने प्लांट 1, 2 के साथ-साथ 540 मेगावाट का कमान अपने हाथों में लेना पड़ा है। जब तहलका ने बालको प्रबंधन से इसका कारण जानना चाहा तो कोई जबाव नहीं मिल पाया। बालको के सीईओ रमेश नायर का कहना था कि मुझे तो इस बारे में कोई जानकारी नहीं है। कारखाना प्रबंधक आर के धनचोलिया ने सवाल सुनते ही फोन काट दिया और फिर ना तो फोन उठाया ना ही एसएमएस का जबाव दिया। जबकि बालको के जनसंपर्क अधिकारी विनोद श्रीवास्तव का कहना था कि बालको अपने श्रमिकों को सबसे बेहतर सुविधाएं और मेहनताना दे रहा है। श्रीवास्तव बेहद गैरजिम्मेदाराना रवैया अपनाते हुए कहते हैं कि छत्तीसगढ़ के किसी भी संस्थान में फॉर्म 14 नहीं भरवाया जा रहा है। इसलिए हमने भी नहीं भरवाया
छत्तीसगढ़ संविदा एवं ग्रामीण मजदूर संघ (इंटक) के संजीव शर्मा तहलका को बताते हैं कि ये कोई नई बात नहीं है। पिछले कई सालों से बालको प्रबंधन ने ऐसा ही रवैया अपना रखा है। 1976 में कारखाना अधिनियम में एक संशोधन के जरिए श्रमिकों को ये सहूलियत दी गई थी कि प्रबंधन प्रत्येक मजदूर का रिकार्ड रखे ताकि हादसा होने की स्थिति में मजदूरों को मुआवजा मिलने में कोई परेशानी ना हो। वैसे भी कारखाने में कौन काम कर रहा है, इसकी जानकारी तो प्रबंधन को रखनी ही चाहिए। कानून में भी इसका प्रावधान है। लेकिन बालको प्रबंधन जानबूझकर श्रम कानूनों की अनदेखी कर रहा है। शर्मा आरोप लगाते हैं कि बालको का 540 मेगावॉट का पूरा प्लांट ही ठेका श्रमिकों के कारण चल रहा है। इसमें एक भी स्थाई कर्मचारी कार्यरत नहीं है
इस बारे में कोरबा के सहायक श्रम आयुक्त सत्यप्रकाश वर्मा तहलका से कहते हैं, मैने बालको प्रबंधन को बैठक के लिए बुलाया था। लेकिन बालको के अधिकारी बैठक में उपस्थित नहीं हुए। श्रमिकों का आरोप है कि कारखाना अधिनियम की धारा 62 के तहत उनका रिकॉर्ड नहीं रखा जा रहा है। यही जानने के लिए बालको प्रबंधन को बुलाया गया था। इस धारा के तहत नियम है कि कारखाना प्रबंधन को फॉर्म 14 भरना होता है, जिसमें कर्मचारी या श्रमिकों के नाम को रिकार्ड में रखना होता है। बगैर फॉर्म 14 में बगैर नाम भरे श्रमिकों कारखाने के भीतर नहीं जा सकता। यदि कंपनी प्रबंधन ऐसा नहीं करता है तो कारखाना अधिनियम की धारा 92 के तहत ये दंडनीय अपराध है
बालको और विवाद का लंबा नाता रहा है। कभी सरकारी जमीन पर अतिक्रमण को लेकर तो कभी हादसों के कारण बालको चर्चा में बना रहता है। अब एक बार फिर मजदूरों के हितों से खिलवाड़ करने के कारण भारत एल्युमिनियम कंपनी ने सबका ध्यान खींचा है। वो भी उस वक्त, जब बालको सैंकड़ों एकड़ वनभूमि पर अवैध कब्जे का आरोप झेल रहा है और कांग्रेस लगातार हर विधानसभा सत्र में कंपनी पर कार्रवाई की मांग कर रही है।
बॉक्स
क्या है फार्म 14

संयंत्रों में काम करने वाले श्रमिकों के लिए कारखाना अधिनियम 1970 की धारा 62 में विशेष प्रावधान हैं। इसके तहत कारखाना प्रबंधन श्रमिकों का पूर्ण विवरण रजिस्टर में दर्ज करेगा। कारखाना के भीतर काम करने वाले श्रमिक अपनी पूरी जानकारी इस रजिस्टर से प्राप्त की जा सकेगी। इसे फार्म 14 के नाम से जाना जाता है। इसके तहत श्रमिकों के लिए औद्योगिक एवं स्वास्थ्य सुरक्षा दिए जाने का प्रावधान है । इसके लागू होने पर ठेका श्रमिकों को स्वास्थ्य संबंधी लाभ तो मिलेगा ही साथ ही किसी अनहोनी की स्थिति में उनके परिजनों को भी नियम का लाभ मिल सकता है।

अब बंदूक नहीं “हल”

यदि भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी वाकई गद्दीनशीन हो जाते हैं तो देश की नक्सल नीति में व्यापक बदलाव आएंगे। छत्तीसगढ़ सरकार के क्रियाकलाप और मोदी के भाषणों से इस बात के संकेत मिलना शुरु हो गए हैं।

छत्तीसगढ़ के सर्वाधिक नक्सल प्रभावित जिले दंतेवाड़ा के जिला पुलिस अधीक्षक नरेंद्र खरे ने पिछले दिनों एक बयान दिया कि अब माओवादियों से गोली से नहीं बल्कि बोली से बात होगी। जब भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी बस्तर में राजनीतिक सभा लेने आए तो उन्होंने भी खरे की बात को अपने शब्दों में आगे बढ़ाया कि मरना-मारना अब बहुत हो गया। अब नक्सली बंदूक छोड़ हल थाम लें। छत्तीसगढ़ के मुख्य सचिव विवेक ढांड भी धुर नक्सल प्रभावित इलाकों में जाकर बैठक ले रहे हैं। तो क्या इससे ये समझा जाए कि देश में नई सरकार के साथ-साथ नई नक्सल नीति का ब्ल्यू प्रिंट भी तैयार हो चुका है।

अप्रैल 2010 ताड़मेटला में तब तक के सबसे बड़े नक्सल हमले में 76 जवानों की मौत के बाद दंतेवाड़ा ने पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींचा था। केंद्र सरकार को भी दंतेवाड़ा में हुए इस हत्याकांड के बाद ये मानना पड़ा था कि नक्सलवाद केवल राज्यों की नहीं बल्कि राष्ट्र की समस्या है। तब तक नक्सलवाद से अपने दम पर जूझ रहे राज्यों के लिए केंद्र स्तर की एकीकृत योजना बनाने की कसरत शुरु हुई थी। इसी कड़ी में तत्कालीन गृहमंत्री पी चिंदबरम ने दो बार छत्तीसगढ़ आकर नक्सल रणनीति की दिशा तय करने के लिए बैठकें भी ली थीं। अब एक बार फिर बस्तर से ही माओवाद के खात्मे के लिए दिशा और दशा तय की जा रही है। ये दशा और दिशा क्या होगी, ये जानने के पहले दंतेवाड़ा एसपी नरेंद्र खरे के पूरे बयान पर गौर फरमा लें। खरे का कहना है कि पुलिस का पूरा जोर अब नक्सलियों की आत्मसमर्पण की नीति को बेहतर बनाने पर होगा। वर्ष 2014 में पुलिस माओवादियों को आत्म समर्पण के लिए प्रेरित करेगी। खरे ये भी कहते हैं कि छत्तीसगढ़ सरकार आंध्रप्रदेश की तर्ज पर समर्पण नीति को और बेहतर बनाने पर विचार कर रही है। भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी बस्तर आए तो उन्होंने सबसे पहले माओवादियों के बंदूक छोड़ने की अपील की। उन्होंने बस्तर से लेकर झारखंड़ के लोहदगा तक हर सभा में यही कहा कि मरने-मारने का समय चला गया है। अब नक्सलियों के हाथों में बंदूक नहीं हल होना चाहिए। मोदी ने इस बात पर जोर दिया कि नक्सल प्रभावित इलाकों का विकास उनकी प्राथमिकता में शामिल है। मोदी ने जगदलपुर में माओवादियों से अपील करते हुए नारा दिया, सबके साथ सबका विकास।
नक्सलियों पर मोदी का बयान आया और उसके बाद से ही छत्तीसगढ़ की नक्सल नीति में तेजी से परिवर्तन के संकेत मिलना भी शुरु हो गए हैं। पहले तो प्रदेश के नए नवेले मुख्य सचिव विवेक ढांड पद दो बार धुर नक्सल प्रभावित जिलों दंतेवाड़ा और सुकमा में पूरे सरकारी लाव लश्कर के साथ बैठक ले आए। वहीं पुलिस मुख्यालय ने भी छत्तीसगढ़ में नक्सलियों को आत्म-समर्पण के लिए प्रोत्साहित करने के लिए नई तैयारी शुरू कर दी है। उच्च पदस्थ पुलिस सूत्रों की मानें तो पीएचक्यू नक्सलियों की आत्म-समर्पण नीति में बड़ा बदलाव करने जा रहा है। बदलाव के पहले चरण में पति-पत्नी नक्सलियों के एक साथ समर्पण करने पर उनको ढाई लाख रुपए तत्काल देने की तैयारी की जा रही है। यह धनराशि नक्सली दंपती को अपना नया जीवन शुरू करने के लिए दिया जाएगा। आत्म-समर्पण करने के बाद राज्य सरकार की ओर से मिलने वाली सुविधाएं भी दी जाएंगी।
एडीजी नक्सल ऑपरेशन आरके विज का कहना है कि गृह विभाग को यह प्रस्ताव भेजा जा रहा है। आत्म-समर्पण करने के बाद नक्सलियों के सामने सबसे बड़ी समस्या नया जीवन शुरू करने की होती है। इस समय सबसे ज्यादा आर्थिक संकट सामने आता है, जिससे कई बार नक्सली दोबारा जंगलों की राह पकड़ लेते हैं। इसलिए इस बार हमारा फोकस उनकी आर्थिक स्थिति पर ही है ताकि वे दोबारा हिंसा का रास्ता ना अपनाएं
राज्य के मुख्य सचिव विवेक ढांड ने भी अपनी पहली मीटिंग में ही संकेत दिए थे कि नक्सल प्रभावित बस्तर पर उनका खास फोकस रहेगा। बीते पखवाड़े में वे दो बार बस्तर जा चुके हैं। पहले दंतेवाड़ा और फिर सुकमा में चीफ सेकेट्री ने बैठक लेकर जता दिया कि वे अपनी बात पर कायम हैं। इन बैठकों में राज्य के वरिष्ठ आईएएस अफसर भी उनके साथ थे। ढांड ने स्थानीय अफसरों से मिलकर वहां की कठिनाइयों को भी जाना। यहां ये बताना जरूरी है कि तीन साल पहले राज्य सरकार ने सभी विभागों के सचिवों से बस्तर में महीने में एक रात बिताने कहा था, मगर इसका पालन नहीं हुआ। बस्तर को सिर्फ पुलिस के भरोसे छोड़ दिया गया था। सीएस के इस कदम के बाद अब राज्य सरकार की नई रणनीति पर अमल शुरु हो गया लगता है।
इस वक्त छत्तीसगढ़ की जेलों में (जिनमें पांच केंद्रीय कारागार भी शामिल हैं) तकरीबन 1400 ऐसे आरोपित या सजायाफ्ता बंदी हैं, जिनपर नक्सली होने या नक्सली समर्थक होने का आरोप है। जेल सूत्रों की मानें तो इनमें हार्डकोर नक्सली कम, जन मिलिशिया और संघम सदस्य ज्यादा हैं। आंकड़ों पर नज़र डालें तो जगदलपुर जेल में नक्सली मामलों के 332 विचाराधीन कैदी बंद हैं। साथ ही यहां 25 सजायाफ्ता कैदी भी रखे गए हैं। दंतेवाड़ा जेल में नक्सली मामलों के करीब 350 विचाराधीन कैदी बंद हैं। कांकेर जेल में नक्सली मामलों के करीब 250 और दुर्ग जेल में तकरीबन 100 विचाराधीन कैदी बंद हैं। अंबिकापुर जेल में लगभग 100 और रायपुर में 150 कैदी हैं, जो नक्सली होने के आरोप में बंद हैं। इनके अलावा प्रदेश में लागू जनसुरक्षा कानून के तहत भी 100 कैदी जेलों में बंद हैं।
भले ही नक्सलियों को हिंसा छोड़कर शांति के रास्ते पर लाने की कवायद जोर शोर से जारी हो। लेकिन छत्तीसगढ़ में बंदूक छोड़कर मुख्य धारा में शामिल होने वाले माओवादियों को उंगली पर गिना जा सकता है। वर्ष 2010 में छत्तीसगढ़ में एक साल में 35 नक्सलियों ने आत्म-समर्पण किया। वर्ष 2013 में नक्सली गतिविधियों पर नियंत्रण करने के लिए पुलिस और अर्धसैनिक बलों के जवानों ने सघन अभियान चलाया था। वर्ष 2014 में अब तक केवल चार डिवीजल कमेटी के चार सदस्यों ने आत्मसमर्पण किया है। इसमें राजनांदगांव में भगत झाड़े, कांकेर में संतोषी और सूरज शामिल हैं। जबकि छत्तीसगढ़ में सक्रिय जानी सलाम ने आंध्रप्रदेश में आत्म-समर्पण किया। वैसे भी आंध्र प्रदेश में सरेंडर करने वालों की संख्या ज्यादा है। वहां नक्सली को सरेंडर पर बढ़िया मुआवजा और नौकरी तक दी जाती है। आंध्रा की पुनर्वास नीति ही नक्सलियों को सरेंडर करने के लिए लुभा रही है। जबकि छत्तीसगढ़ में आकर्षक व प्रभावी नीति न होने के पिछले 10 साल में एक भी बड़े नक्सली ने यहां सरेंडर नहीं किया है। सूबे में हथियारों के हिसाब से समर्पण की कीमत तय की जाती है। इसमें एलएमजी के साथ समर्पण करने वाले नक्सली को 4.50 लाख रुपए दिए जाते हैं। वहीं एके 47 के साथ 3 लाख रुपए, एसलआर के साथ 1.50 लाख, थ्री नॉट थ्री के साथ 75 हजार, 12 बोर की बंदूक के साथ 30 हजार दिए जाते हैं। ये राशि भी लंबी प्रक्रिया के बाद मिल पाती है। जबकि ओडिशा और आंध्रप्रदेश में समर्पण के साथ ही मुआवजे की राशि प्रदान की जाती है। पुनर्वास नीति के तहत उन्हें तत्काल मकान या नौकरी का आश्वासन देकर ज्वाइन भी कराया जाता है। इन राज्यों में गिरफ्तारी या एनकांउटर का खतरा नहीं रहता।
राज्य सरकार ने सरेंडर करने वाले नक्सलियों के लिए अलग-अलग पदों के हिसाब से अलग-अलग इनाम घोषित कर रखा है। यदि सेंट्रल कमेटी का सचिव सरेंडर करता है तो ईनाम की राशि 12 लाख होती है। वहीं सेंट्रल मिलट्री कमिशन प्रमुख के लिए 10 लाख, पोलित ब्यूरो सदस्य के लिए 7 लाख, स्टेट कमेटी सदस्य के लिए 3 लाख, पब्लिकेशन कमेटी के सदस्य के लिए 2 लाख, एरिया कमेटी सचिव के लिए 1.5 लाख, अन्य एरिया कमेटी सचिव के लिए 1 लाख, एलओसी कमांडर को समर्पण पर 50 हजार रुपए की राशि दी जाती है। वर्ष 2004 के बाद मुआवजा राशि नहीं बढ़ाई गई है।
इस बारे में प्रदेश के गृहमंत्री रामसेवक पैकरा कहते हैं कि नक्सलवाद राष्ट्रीय मुद्दा है। इस पर व्यापकता से विचार किए जाने की जरूरत है। दूसरी महत्वपूर्ण बात है कि माओवादी हिंसा की काट विकास है। ऐसे में नक्सल प्रभावित सभी राज्यों को मिलबैठकर इस समस्या पर समग्र नीति बनाने की जरुरत है। जिसकी दिशा में काम शुरु हो चुका है। अलग-अलग राज्यों में माओवादियों को लेकर अलग-अलग नीति का होना भी परेशानी को बढ़ाने का ही काम कर रहा है। इसलिए केंद्र में अपनी सरकार आने पर हमारी कोशिश होगी कि नक्सलवाद को लेकर देश में एकीकृत नीति बनाने की दिशा में पहल हो
स्वामी अग्निवेश की राय इस बारे में अलहदा है। वे मानते हैं कि यदि संविधान में उल्लेखित अधिकारों को सही तरीके से आदिवासियों तक पहुंचा दिया जाए तो इस समस्या का हल बगैर किसी कसरत के निकल आएगा। यदि नक्सल प्रभावित इलाकों में शांति चाहिए तो सबसे पहले जेलों में बंद निरपराध आदिवासियों को छोड़ना होगा। दूसरा ये कि पांचवी और छटी अनुसूची को लेकर जल्द निर्णय लेना होगा। ग्राम सभाओं को अधिकार देने होंगे। लेकिन दुर्भाग्य से छत्तीसगढ़ सरकार ने ऐसे कई मौके गवाएं हैं। जब वो आगे बढ़कर इस समस्या का जड़ से समाधान कर सकती थी। फिलहाल भी भाजपा की ऐसी कोई इच्छाशक्ति नहीं दिखती
नक्सलियों की रिहाई के लिए बनाई गई उच्च स्तरीय समिति की अध्यक्ष निर्मला बुच कहती हैं कि हमने करीब 150 सिफारिशें की हैं। जिनमें जमानत के वक्त राज्य सरकार किसी प्रकार की आपत्ति नहीं लेगी। हमारी समिति की सिफारिश के कारण कई नक्सलियों को जमानत भी मिली है। हमने नक्सलियों के सभी मामलों की समीक्षा की है। हम लगातार बैठक कर रहे हैं। चुनाव शुरु होने के पहले भी हमने बैठक ली थी। चुनाव खत्म होते ही हमारी एक बैठक होनी है। निर्मला बुच मध्यप्रदेश की मुख्य सचिव भी रह चुकी हैं। वर्ष 2012 में नक्सलियों ने तत्कालीन सुकमा कलेक्टर एलेक्स पॉल मेनन को अगवा कर लिया था। उन्हें छोड़ने के बदले नक्सलियों ने जेलों में बंद अपने साथियों की रिहाई मांगी थी। नक्सलियों की रिहाई की मांग पर बुच की अध्यक्षता में एक उच्च स्तरीय समिति बनाई थी। इसमें राज्य के मुख्य सचिव, प्रमुख सचिव गृह और डीजीपी को सदस्य बनाया गया था। निर्मला बुच सरकार की तरफ से नक्सलियों से मध्यस्थों से बात भी कर रही थीं।

बहरहाल, राय सबकी अपनी-अपनी हो सकती है। लेकिन सवाल ये है कि माओवादियों को लेकर देश की एकीकृत नीति क्या हो, जिससे उन्हें मुख्य धारा में जुड़ने के लिए प्रोत्साहित किया जा सके। इस दिशा में छत्तीसगढ़ ने देर से सही, लेकिन कदम को बढ़ा दिए हैं, लेकिन लगता है कि देश में भी नक्सल नीति को लेकर बड़े परिवर्तन होने का समय आ गया है। 

बुधवार, 7 मई 2014

मोदी के क्षत्रप “अबकी बार मोदी सरकार”... टीवी पर हर पांच मिनट में आने वाला ये विज्ञापन उन उम्मीदवारों के पेट में गुदगुदी पैदा कर रहा है...जो भाजपा की टिकट पर लोकसभा चुनाव लड़ रहे हैं। ये वे उम्मीदवार हैं, जो मोदी को प्रधानमंत्री बनता देखना पसंद करें या ना करें, लेकिन खुद कैबिनेट मंत्री बनने को आतुर हैं। इन्हें लगता है कि यदि National Democratic Alliance (NDA) की सरकार बनती है तो इन्हें जरूर नवाज़ा जाएगा। अकेले देश के हद्यस्थल मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में 9 उम्मीदवार ऐसे हैं, जो यदि जीतते हैं और “मोदी सरकार” आ जाती है तो, इनका मंत्री बनना तय माना जा रहा है। साथ ही मध्यप्रदेश के तीन राज्यसभा सासंद भी आस लगाए बैठे हैं कि उनके “अच्छे दिन आने वाले हैं”। भाजपा कार्यकर्ताओं की मानें तो देश में मोदी लहर है। इस जुमले से इस बात का सहज अंदाजा लगाया जा सकता है कि 2004 से केंद्र की सत्ता से बाहर बैठी भाजपा (साथ ही राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन) सरकार बनाने के लिए बेकरार है और इसके तारणहार केंद्रीय मंत्रीमंडल में स्थान पाने के लिए। भाजपा अपने प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार की घोषणा नरेंद्र दामोदर भाई मोदी के रूप में कर चुकी है। 16 मई को चुनाव परीणाम आने के बाद सरकार बनाने की स्थिति में मंत्रिमंडल का बाकी स्वरूप भी तय किया जाएगा। लेकिन उसके पहले ही मंत्रिमंडल में जगह पाने वालों की कसरत शुरु हो चुकी है। राज्यों में तरह-तरह के कयास लगाए जा रहे हैं और चुनाव नतीज़े आने के पहले ही मजबूत प्रोफाइल वाले उम्मीदवार मुंगेली लाल के हसीन सपनों में खो चुके हैं। लेकिन वास्तव में उनके सपने हकीकत में भी बदल सकते हैं, क्योंकि इनमें से कई नेताओं के पास पीएम पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी से ज्यादा अनुभव तो है ही, साथ ही वे सालों-साल से अपने-अपने इलाके के अजेय क्षत्रप भी बने हुए हैं। मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के क्षत्रपों में ये भावना इसलिए भी बलवती है क्योंकि जब भाजपा उत्तर भारत में कमजोर पड़ रही थी और दक्षिण में जमीन तलाश रही थी, तब मध्प्रदेश और छत्तीसगढ़ के क्षत्रपों ने पार्टी को निराश नहीं किया। यहां के मतदाताओं ने भी भाजपा पर विश्वास रखते हुए ना केवल राज्यों में उसकी सरकारें बनाईं, बल्कि लगातार लोकसभा में भी पार्टी के प्रत्याशियों को जीताकर भेजती रही। इसकी नतीजा ये रहा है कि चाहे मप्र हो या छग, दोनों ही प्रदेशों के भाजपा नेताओं का लोकसभा पहुंचने का सिलसिला जारी रहा। सुमित्रा महाजन (इंदौर सीट से लगातार 7 बार सासंद), रमेश बैस (रायपुर सीट लगातार 6 बार सासंद), सत्यानारायण जटिया (उज्जैन सीट लगातार 7 बार सासंद, फिलहाल राज्यसभा सदस्य), सुषमा स्वराज (तीन बार राज्यसभा और तीन बार लोकसभा सदस्य), नंदकुमार चौहान (खंडवा लोकसभा सीट से 4 बार सासंद), विष्णुदेव साय (रायगढ़ लोकसभा सीट से लगातार तीन बार सासंद), थावरचंद गेहलोत (चार बार सासंद, फिलहाल राज्यसभा सदस्य), पांच बार कांग्रेस की टिकट पर लोकसभा पहुंच चुके और अब भाजपा नेता दिलीप सिंह भूरिया, सरोज पांडे (भाजपा महिला मोर्चा की राष्ट्रीय अध्यक्ष) कुछ ऐसे ही नाम हैं। जिनका मोदी मंत्रिमंडल में जगह पाना तय माना जा रहा है। राष्ट्रीय स्वयं संघ की चली तो भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और मध्यप्रदेश से राज्यसभा सासंद प्रभात झा भी मंत्रिमंडल को सुशोभित कर सकते हैं। आखिर क्या वजह है कि ये नेता अपने अच्छे दिनों के प्रति आश्वस्त नज़र आ रहे हैं। ये समझने के लिए इनके राजनीतिक करियर पर नज़र डालनी जरूरी है। 1989 से लगातार भाजपा को जीत दिला रही सुमित्रा महाजन “ताई” 8वीं बार फिर इंदौर लोकसभा सीट से किस्मत आजमा रही हैं। वे केवल दावा ही नहीं कर रहीं, बल्कि उन्हें पूरा यकीन हैं कि वे इस बार भी जरूर जीतेंगी। “ताई” के इस दावे के पीछे कभी होल्कर स्टेट कहलाने वाले इंदौर के वो साढ़े तीन लाख मराठी मतदाता हैं, जो हर चुनाव में केवल और केवल “ताई” के लिए वोट करते आए हैं। इंदौर लोकसभा सीट के कुल 21 लाख मतदाताओं में ये साढ़े तीन लाख मराठी मत जादुई असर दिखाते हैं, क्योंकि वो शत-प्रतिशत पड़ते हैं। यही सुमित्रा महाजन की जीत का मूलमंत्र भी है। यही कारण है कि सुमित्रा महाजन कभी अपने निकटतम प्रतिद्वंदी को 11 हजार 480 वोट (सत्यनारायण पटेल, वर्ष 2009) से हराती हैं तो कभीं 1 लाख 93 हजार 936 वोट (रामेश्वर पटेल, वर्ष 2004) से। 1989 तक इंदौर सीट कांग्रेस का सुरक्षित गढ़ हुआ करती थी। महाजन ने अपने पहले चुनाव में अपराजेय कहलाने वाले दिग्गज कांग्रेस नेता प्रकाशचंद्र सेठी को 1 लाख 11 हजार 614 मतों से हराया था। सेठी इंदिरा गांधी सरकार में देश के गृह मंत्री रह चुके थे। महाजन बाजपेयी सरकार में केंद्रीय राज्य मंत्री मानव संसाधन विकास, संचार और सूचना प्रोद्योगिकी मंत्री रह चुकीं हैं। अब ताई यदि जीतती हैं तो हो सकता है कि देश की अगली लोकसभा अध्यक्ष फिर महिला ही हो। छत्तीसगढ़ की रायपुर लोकसभा सीट से 1989 में देश की नौंवी लोकसभा में पहुंचे रमेश बैस भी राजग सरकार में 1998 से 2004 में केंद्रीय राज्य मंत्री बने। उनके पास सूचना और प्रसारण, खनन, वन एवं पर्यावरण, steel and mines, जैसे महत्वपूर्ण विभाग रहे। बैस सातवीं बार चुनाव मैदान में हैं और अपनी जीत तय मानकर चल रहे हैं। भाजपा सूत्रों पर यकीन करें तो लोकसभा में पार्टी के मुख्य सचेतक की भूमिका निभा चुके रमेश बैस का वरिष्ठता के आधार पर कैबिनेट मंत्री बनना लगभग तय है। रमेश बैस तहलका से कहते हैं कि “मेरी जीत तो 101 फीसदी तय है। लेकिन एनडीए सरकार में मंत्री पद मिलेगा या नहीं, ये तो मोदी जी तय करेंगे। लेकिन इतना जरूर कहना चाहता हूं कि देश की जनता बदलाव चाहती है”। पंद्रहवीं लोकसभा की नेता प्रतिपक्ष रही सुषमा स्वराज विदिशा सीट से दूसरी बार और लोकसभा चुनाव में चौथी बार किस्मत आजमा रही हैं। सुषमा मध्यप्रदेश कोटे से ही केंद्रीय मंत्रिमंडल को सुशोभित करेंगी। वरिष्ठता के आधार पर सुषमा स्वराज को मोदी मंत्रिमंडल में जगह मिलना तय है। उनके सामने कांग्रेस ने पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के भाई लक्ष्मण सिंह को मैदान में उतारा है। भाजपा सुषमा की जीत के लिए पूरी जोर फूंक चुकी है। खुद सुषमा का दावा है कि वे इस बार चार लाख से ज्यादा मतों से चुनाव जीतेंगी। भाजपा के लिए सुरक्षित सीट का दर्जा पा चुकी विदिशा सीट इस लिए भी चर्चित है क्योंकि यहां से 1991 में अटलबिहारी बाजपेयी भी चुनाव लड़ चुके हैं। खुद मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान भी यहां से चार बार लोकसभा सासंद रह चुके हैं। वर्ष 1996 में पहली बार लोकसभा पहुंचने वाले नंदकुमार चौहान चार बार खंडवा सीट जीत चुके हैं। कभी निमाड़ अंचल में आने वाली खरगौन और खंडवा सीटों पर कांग्रेस नेता सुभाष यादव का अच्छा खासा प्रभाव हुआ करता था। यादव के इस प्रभाव को खत्म कर चौहान ने खंडवा सीट भाजपा की झोली में डाली। 2009 में कांग्रेस की टिकट पर अरुण यादव ने नंदकुमार चौहान को पराजित कर दिया था। अब एक बार फिर नंदकुमार चौहान को सुभाष यादव के बेटे और पूर्व केंद्रीय मंत्री अरुण यादव चुनौती दे रहे हैं। यदि चौहान उन्हें हराकर अपनी गंवाई हुई सीट जीत लेते हैं तो उनके नंबर बढ़ने की पूरी संभावना है। छत्तीसगढ़ भाजपा के वर्तमान अध्यक्ष विष्णुदेव साय भी मोदी मंत्रिमंडल की शोभा बढ़ा सकते हैं। वे छत्तीसगढ़ में पार्टी का आदिवासी चेहरा हैं। इसी आदिवासी कोटे की बदौलत उनके मंत्रिमंडल में शामिल होने की संभावना जताई जा रही है। वे लगातार तीन बार से रायगढ़ सीट से सांसद हैं। 2008 में इन्हीं के नेतृत्व में राज्य में भाजपा की दूसरी बार सरकार बनने का श्रेय भी दिया जाता है। जिस रायगढ़ लोकसभा सीट से 1999 विष्णुदेव साय जीतकर पहली बार लोकसभा पहुंचे। यहीं से 1998 में अजीत जोगी ने अपने राजनीतिक जीवन का पहला चुनाव लड़ा था, जिसमें भाजपा के दिग्गज नेता नंदकुमार साय को हार का सामना करना पड़ा था। तहलका से बात करते हुए विष्णुदेव साय कहते हैं कि “1999 के पहले रायगढ़ सीट कांग्रेसियों की पहली पसंद हुआ करती थी। लेकिन हमने यहां से कांग्रेस का सूपड़ा साफ कर दिया। इतना तो तय है कि मोदी जी की सरकार बनेगी। लेकिन उनके मंत्रिमंडल की शोभा कौन बढ़ाएगा, ये तो वे ही तय करेंगे”। मध्यप्रदेश भाजपा के अध्यक्ष नरेंद्र तोमर भी इस दौड़ में शामिल हैं। 2009 में ग्वालियर सीट से लोकसभा पहुंचने वाले तोमर दोबारा अपनी किस्मत आजमा रहे हैं। पार्टी तोमर को 2009 में राज्यसभा भेजकर भी नवाज चुकी है। लेकिन कुछ महीनों बाद ही उन्हें ग्वालियर सीट से लोकसभा का टिकट दे दिया गया। सिंधिया राजघराने के सदस्यों ने इस सीट पर सात बार जीत दर्ज की है। भाजपा नेता राजमाता विजियाराजे सिंधिया ने एक बार, उनके बेटे और कांग्रेस नेता रहे माधवराव सिंधिया ने चार बार और उनकी बहन भाजपा नेता यशोधरा राजे सिंधिया ने दो बार इस सीट से लोकसभा चुनाव जीता है। इससे साबित होता है कि ग्वालियर सीट पर सिंधिया परिवार का जबर्दस्त प्रभाव रहा है। इसी सीट से अटल बिहारी बाजपेयी ने 1971 में जीत हासिल की तो 1984 में माधवराव सिंधिया से हार बैठे। यदि तोमर दूसरी बार इस हाईप्रोफाइल सीट को फतह करने में कामयाब होते हैं तो उन्हें इसका ईनाम मिल सकता है। इस बारे में नरेंद्र सिंह तोमर कहते हैं कि “मोदी लहर देश में परिवर्तन लाएगी। अपने बारे में मैं क्या कहूं। लेकिन हमारे प्रदेश से कई वरिष्ठ लोगों को प्रतिनिधित्व का मौका मिलेगा”। कभी मध्यप्रदेश के आदिवासी क्षेत्रों में कांग्रेस का परचम लहराने वाले दिलीप सिंह भूरिया अब भाजपा का झंडा बुलंद किए हुए हैं। प्रदेश की रतलाम-झाबुआ सीट से भाजपा के उम्मीदवार भूरिया यदि जीत हासिल करते हैं तो इन्हें भी आदिवासी कोटे से केंद्रीय मंत्रिमंडल में स्थान मिल सकता है। कांग्रेस का गढ़ मानी जाने वाली इस सीट पर पिछले 15 सालों से पूर्व केंद्रीय मंत्री कांतिलाल भूरिया का कब्जा है। दिलीप सिंह को कांतिलाल भूरिया का राजनीतिक गुरु भी माना जाता है। लेकिन पिछले चुनाव में दिलीप सिंह ने कांतिलाल के हाथों ही 57668 वोटों से हार गए थे। बावजूद इसके भाजपा ने एक बार फिर उनपर दांव खेला है। एक ही समय में महापौर, विधायक और सासंद रहकर गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में नाम दर्ज करवाने वाली भाजपा नेत्री सरोज पांडे भी महिला कोटे से केंद्रीय सरकार मे भूमिका पा सकती हैं। सरोज पांडे अभी भाजपा महिला मोर्चा की राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं। 2009 में जब वे लोकसभा सांसद बनी, तब वे वैशालीनगर सीट से विधायक भी थीं और दुर्ग नगर निगम की महापौर भी। लगातार सफलताएं हासिल करने के कारण भाजपा के आला नेताओं की पंसद बनकर भी उभरी हैं। इसका फायदा उन्हें मिल सकता है। इसी तरह तीसरी बार सतना सीट से भाग्य आजमा रहे गणेश सिंह भी वरिष्ठता के आधार पर केंद्रीय मंत्री बन सकते हैं। गणेश सिंह 2004 और 2009 में सतना सीट से भाजपा की टिकट पर जीत दर्ज कर चुके हैं। ऐसा नहीं है कि केवल लोकसभा चुनाव के उम्मीदवार ही मोदी से आशा लगाए हुए हैं। बल्कि मध्यप्रदेश से आने वाले तीन राज्यसभा सांसदों को भी नरेंद्र दामोदर भाई मोदी से बहुत उम्मीदे हैं। इनमें सबसे पहले नाम आता है प्रभात झा का। झा राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की पहली पसंद के रूप में मंत्रियों की फेहरिस्त में सबसे ऊपर रखे जाएंगे। 2008 और 2014 में मध्यप्रदेश से राज्यसभा सदस्य रह चुके हैं। मध्यप्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी निभा चुके झा फिलहाल भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं। अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित उज्जैन सीट को भाजपा का अभेद गढ़ बनाने वाले सत्यनारायण जटिया फिलहाल राज्यसभा सदस्य हैं। 1980 में पहली बार लोकसभा पहुंचने वाले जटिया सात बार उज्जैन सीट से जीतकर सांसद बन चुके हैं। ऐसे में वरिष्ठता के आधार पर वे सबसे मजबूत दावेदार हैं। जटिया बाजपेयी सरकार में 1998 से 2004 तक केंद्रीय श्रम, शहरी विकास और गरीबी उन्मूलन, सामाजिक न्याय मंत्री रह चुके हैं। इसके बाद नंबर आता है थावरचंद गेहलोत का। 1996 में लोकसभा सासंद बनने के पहले वे तीन बार मध्यप्रदेश में विधायक और कैबिनेट मंत्री रह चुके हैं। चार बार शाजापुर सीट से जीत हासिल कर चुके गेहलोत की चली तो उन्हें भी एक बार केंद्रीय राजनीति में चमकने का मौका मिल सकता है। हालांकि 2004 में सत्ता में आई यूपीए सरकार ने मंत्रियों के मामले में मप्र और छत्तीसगढ़ को निराश ही किया। इसके पहले कार्यकाल में जहां मध्यप्रदेश को कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया के रूप में दो मंत्री मिले। वहीं दूसरे कार्यकाल में कुछ समय के लिए अरुण यादव को केंद्रीय राज्य मंत्री बनाकर इस संख्या को तीन कर दिया गया था। जबकि UPA के पहले कार्यकाल में छत्तीसगढ़ की झोली खाली रखी गई, वहीं दूसरे कार्यकाल में चरणदास मंहत के रूप में एक केंद्रीय राज्य मंत्री दिया गया। लेकिन अब अगर एनडीए सरकार आती है, तो दोनों सूबों को मिलने वाले मंत्रियों की संख्या दुगुनी या तिगुनी हो सकती है।


शुक्रवार, 11 अप्रैल 2014

भाजपा v/s कांग्रेस नहीं, रमन v/s जोगी

इस आम चुनाव में जहां नरेंद्र मोदी नाम के धूमकेतु के उभरने से राष्ट्रीय राजनीति के आयाम बदले हैं। वहीं छत्तीसगढ़ की भावी राजनीति की तस्वीर भी साफ हो गई है। प्रदेश में दो ऐसे परिवार उभर रहे हैं, जो जब चाहें, जैसे चाहें, अपने दलों की लगाम खींचते नजर आ रहे हैं। अब सूबे की राजनीति की धुरी कांग्रेस और भाजपा से नहीं, बल्कि मुख्यमंत्री रमन सिंह और पूर्व मुख्यमंत्री अजीत से घूम रही है। ये ठीक बिलकुल वैसा ही है, जम्मू कश्मीर, पंजाब, बिहार और हरियाणा जैसे अन्य प्रदेशों में होता आया है। इन राज्यों में दशकों से तीन या चार परिवार ही सूबे की राजनीति चलाते आए हैं। चाहें क्षेत्रीय दल हों या राष्ट्रीय राजनीतिक दल, इन परिवारों ने सियासत की कमान अपने हाथों में थामे रखी है। इन राज्यों की राजनीति कुछ खास परिवारों द्वारा ही नियंत्रित रही है।
हरियाणा के तीनों लाल, देवीलाल, बंसीलाल और भजनलाल के इर्द गिर्द घूमने वाली राजनीति से भले ही तोनों लाल विदाई लेकर पंचतत्व में विलीन हो गए हों, मगर हरियाणा की राजनीति आज भी उनके पुत्र, पौत्र, भतीजे, बहिन, भाई, बेटियां और रिश्तेदार उनके वारिस बनकर राजनीति में सक्रिय हैं। जम्मू-कश्मीर में अब्दुल्ला वंश का राज है। शेख अब्दुल्ला, फारूक और अब उमर अब्दुल्ला की हुकूमत है। वहां मुफ्ती मोहम्मद सईद और महबूबा सईद भी हैं। यदि दक्षिण भारत में करुणानिधि, मारन और देवेगौड़ा के वंश महत्वपूर्ण ताकत हैं, तो ओडिशा में पटनायक वंश की तूती बोलती रही है। उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव के वंश का राज है, बिहार में रामविलास पासवान और लालू यादव का मजबूत राजनीतिक परिवार है। वहां कभी ललित नारायण मिश्र व जगन्नाथ मिश्र लोगों के दिलों पर हुकूमत करते थे। पंजाब में बादल परिवार की हुकूमत चल रही है। कभी अमिरदर सिंह और उनके परिवार का राज हुआ करता था। मध्यप्रदेश में राजमाता विजयाराजे सिंधिया का परिवार तो अपने आप में बहुदलीय है। खुद वह बीजेपी की शीर्ष नेता रहीं। वसुंधरा राजे बीजेपी की तरफ से राजस्थान की मुख्यमंत्री हैं। दिंवगत माधव राव सिंधिया कांग्रेस के बड़े नेता रहे। अब उनके पुत्र ज्योतिरादित्य सिंधिया मध्य प्रदेश से सांसद हैं।
छत्तीसगढ़ में भी भाजपा और कांग्रेस की सियासत में दो परिवारों का वर्चस्व दिखाई देने लगा है। या यू कहें कि सूबे की सियासत कांग्रेस वर्सेस भाजपा नहीं बल्कि अजीत जोगी वर्सेस रमन सिंह हो गई है तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। दोनों ही परिवारों ने कांग्रेस और भाजपा के कई दिग्गजों को किनारे लगा दिया है। कांग्रेस पर पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी के प्रभाव की बात करें तो वे अपने बेटे अमित को विधानसभा टिकट दिलवाने में सफल हो गए। इसके पहले जोगी अपने बेटे अमित को विधानसभा चुनाव में टिकट दिलाने के लिए पार्टी से लगभग बागी ही हो चुके थे। उन्होंने सूबे में ना केवल जोगी एक्सप्रेस चला डाली थी, बल्कि संगठन के दूसरे नेताओं को चुनौती देना भी शुरु कर दिया था। जब आलाकमान ने अमित जोगी की टिकट के लिए हरी झंडी दिखाई, तब कहीं जाकर जोगी एक्सप्रेस पर लगाम लगाई। वे खुद महासमुंद लोकसभा से चुनाव लड़ रहे हैं। जबकि वे एक साल के राजनीतिक वनवास पर चले गए थे। लेकिन उनका कथित वनवास समय के पहले ही ना केवल खत्म हो गया, बल्कि वे सन्यास दौरान भी वे पूरी तरह सक्रिय रहे। उनकी कोशिश ये भी थी कि इस लोकसभा चुनाव में ही वे अपनी पुत्रवधु ऋचा जोगी को भी कांकेर सीट से लांच कर दें। लेकिन यहां उनकी नहीं चली। हालांकि जोगी का महासमुंद से चुनाव लड़ना पहले से ही तय था। ऐसे में वे प्रदेश में शुक्ल परिवार की रही सही जड़ भी काट देने में सफल हो गए। दरअसल अजीत जोगी महासमुंद सीट से एक बार पूर्व केंद्रीय मंत्री वीसी शुक्ल (अब दिंवगत) को यहां से हरा चुके हैं। ये वो दौर था, जब 2004 में वीसी शुक्ल कांग्रेस से नाराज होकर भाजपा की टिकट पर लोकसभा चुनाव लड़ रहे थे। महासमुंद उनकी पारंपरिक सीट थी, लेकिन इस चुनाव में अजीत जोगी ने शुक्ल को 1 लाख 18 हजार 505 मतों से हरा दिया था। जबकि 1970 से 1990 यानि तीन दशक तक यहां पर वीसी शुक्ल की तूती बोलती थी। वे यहां से छह बार लोकसभा चुनाव जीते थे। जोगी एक बार फिर महासमुंद से शुक्ल परिवार के लिए चुनौती बन गए हैं। दरअसल इस सीट से वीसी शुक्ल की बेटी प्रतिभा पांडे और श्यामाचरण शुक्ल के बेटे अमितेश शुक्ल खुद के लिए या अपने बेटे भवानी शुक्ल के लिए दावेदारी कर रहे हैं। जोगी के नाम के ऐलान के साथ शुक्ल परिवार राजनीतिक वनवास शुरु हो गया है क्योंकि अमितेश हाल ही में विधानसभा चुनाव हार गए हैं और प्रतिभा लोकसभा चुनाव से खुद के राजनीतिक करियर की शुरुआत करने की तैयारी कर रही थी, लेकिन वे सफल नहीं हो पाईं।
इस बारे में अमितेश शुक्ल कहते हैं कि जब पार्टी झीरम घाटी में मारे गए कांग्रेस नेताओं के परिवार को दो-दो टिकट दे सकती है तो शुक्ल परिवार की उपेक्षा नहीं होनी चाहिए। पार्टी के लिए हमारी कई पीढ़ियों ने अपना जीवन समर्पित किया है। वहीं हमारे परिवार पर आज तक कोई दाग भी नहीं लगा। हमने हमेशा साफ सुथरी राजनीति की है
इस मसले पर अजीत जोगी कहते हैं कि राजनीतिक परिवार में जन्म लेना अलग बात है। लेकिन जब तक जनता किसी को आर्शीवाद नहीं दे देती, तब तक उसका राजनीतिक करियर शुरु नहीं हो सकता। अपनी योग्यता हर किसी को साबित करनी ही होती है, तभी उसे मौका मिलता है। कोई कितने ही बड़े नेता की संतान क्यों ना, उसे जनता के दरबार में खुद को साबित करना ही होता है। ऐसे में परिवारवाद कोई मुद्दा ही नहीं रह जाता
प्रदेश भाजपा की बात करें तो मुख्यमंत्री रमन सिंह एकमात्र ऐसा चेहरा बनकर उभरे हैं, जो सूबे के स्टार प्रचारक हैं। इसका फायदा उनके परिवार को तो होना ही था। हालांकि ऐसा नहीं है कि अचानक ही उनके बेटे अभिषेक सिंह को राजनांदगांव लोकसभा की टिकट मिल गई हो। इसकी पटकथा तो 2008 के विधानसभा चुनाव से ही लिखी जाने लगी थी। जब अभिषेक सिंह ने अपने पिता के चुनाव की कमान खुद संभाल ली थी। 2013 में हुए विधानसभा चुनाव में भी अभिषेक राजनांदगांव ( जो कि रमन सिंह का विधानसभा क्षेत्र है) में रमन सिंह की चुनाव अभियान में सक्रिय रहे। तभी से ये कयास लगाए जा रहे थे कि वे यहां से लोकसभा चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे हैं। लेकिन कहानी में ट्विस्ट डालते हुए रमन सिंह ने ऐलान कर दिया कि राजानांदगांव से वर्तमान सासंद मधुसूदन यादव ही मैदान में उतरेंगे। लेकिन जब टिकट के नाम तय किए जाने थे, उसके ऐन पहले राजनांदगांव जिला भाजपा ने अभिषेक सिंह को उम्मीदवार बनाने की मांग तेज कर दी। नतीजन राजनांदगांव सीट से नामों का पैनल बनाकर दिल्ली भेजा गया। भाजपा की केंद्रीय चुनाव समिति और खुद प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी के ऐतराज के बावजूद अंततः अभिषेक के नाम का ऐलान कर दिया गया। रमन सिंह की धर्मपत्नी वीणा सिंह भले ही मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह की पत्नी साधनी सिंह के समान सक्रिय ना दिखती हों। लेकिन सीएम हाउस से चलने वाली राजनीतिक गतिविधियों पर वे पूरा नियंत्रण रखती हैं। वे भले ही कभी राजनीतिक पर्दे पर नहीं आई हों, लेकिन वे पर्दे के पीछे वे पूरी तरह सक्रिय रहती हैं। चाहें तो सीएम के विधानसभा क्षेत्र के लोगों की तकलीफें दूर करने की बात हो या भाजपा नेताओं के दुख दर्द सुनने की। वीणा सिंह बकायदा रोज शाम सीएम हाउस में लोगों से मेल मुलाकात कर रमन सिंह के दायित्वों को हल्का करने में उनकी मदद करती हैं।
इस बारे में भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव और छत्तीसगढ़ प्रभारी जगतप्रकाश नड्डा कहते हैं कि इसमें कोई दो राय नहीं कि प्रदेश में रमन सिंह एक लोकप्रिय नेता हैं। दरअसल ये आम चुनाव का वक्त है और हमारे पास केंद्र में नरेंद्र मोदी और छत्तीसगढ़ रमन सिंह हैं, जिनके बल पर हम प्रदेश में अधिकतम सीटें जीतेंगे। रमन सिंह ने पिछले दस सालों में बेंहतरीन काम किए हैं, जिन्हें नकारा नहीं जा सकता। जहां तक अजीत जोगी की बात है तो इसकी चिंता को कांग्रेस को करनी चाहिए

छत्तीसगढ़ भाजपा में इससे पहले लखीराम अग्रवाल और बलिराम कश्यप जैसे नेताओं की ठसक चलती थी। लेकिन वक्त के साथ ये दोनों नेता तो दुनिया में रहे नहीं, लेकिन इनके बेटे जरूर अपने पिता की विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं। लखीराम अग्रवाल के बेटे अमर अग्रवाल सूबे के स्वास्थ्य मंत्री हैं। वहीं बलिराम कश्यप के बेटे दिनेश कश्यप बस्तर से सांसद तो हैं ही, इस बार भाजपा ने उन्हें ही उम्मीदवार बनाया है। उनके छोटे भाई केदार कश्यप प्रदेश के स्कूल शिक्षा मंत्री हैं। लेकिन रमन के प्रभाव के आगे इनके कद के छोटे हो गए हैं। वहीं कृषि मंत्री बृजमोहन अग्रवाल भी अपने परिवार के वर्चस्व की लड़ाई लड़ने में मशगूल हैं। कांग्रेस में मोतीलाल वोरा भी अपने परिवार को स्थापित करने की लड़ाई लड़ रहे हैं। उनका बेटा अरुण वोरा इस विधानसभा चुनाव में जरूर दुर्ग सीट से जीत हासिल कर चुका है। लेकिन पिछले चुनाव में लगातार हार का सामना कर चुके अरुण में वो दम नजर नहीं आता, जो वोरा परिवार के वर्चस्व को आगे बढ़ाने में मदद कर सके। बहरहाल छत्तीसगढ़ की राजनीतिक बिसात के सारे मोहरे रमन सिंह और अजीत जोगी के इशारों पर चलते दिखाई दे रहे हैं। ये बात अलग है कि शह और मात का ये खेल ये कितने दिनों तक यूं ही अकेले खेल पाते हैं।  

शुक्रवार, 21 मार्च 2014

किसमें कितना है दम

छत्तीसगढ़ की 11 लोकसभा सीटों को लेकर कांग्रेस और भाजपा ने अपने-अपने उम्मीदवार घोषित कर दिए हैं। प्रत्याशियों के ऐलान के साथ स्पष्ट हुए राजनीतिक समीकरण से तय हो गया है कि किस सीट पर किसका पलड़ा भारी रह सकता है। फिलहाल सूबे की 11 में से 10 सीटें भाजपा के पास हैं, जबकि एकमात्र सीट कोरबा पर कांग्रेस का कब्जा है। लेकिन इस चुनाव में कांग्रेस ज्यादा से ज्यादा सीटें जीतना चाहती है। हालांकि भाजपा ने भी काफी सोच समझकर हर सीट पर उम्मीदवार तय किए हैं। भाजपा ने सात पुराने चेहरों को मौका दिया है, जबकि पांच नए चेहरों को मैदान में उतारा है। उसमें छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह के बेटे अभिषेक सिंह का नाम भी शामिल है। जिन्हें राजनांदगांव लोकसभा क्षेत्र से भाजपा का उम्मीदवार बनाया गया है। छत्तीसगढ़ में तीन चरण में लोकसभा चुनाव होना है। पहले चरण में यानि 10 अप्रैल को बस्तर लोकसभा सीट के लिए मतदान होगा। जबकि 17 अप्रैल को राजनांदगांव, कांकेर और महासमुंद मे वोट डाले जाएंगे। जबकि 24 अप्रैल को रायपुर, बिलासपुर, दुर्ग, जांजगीर चांपा, रायगढ़, कोरबा और सरगुजा में मतदान होगा। लेकिन दूसरे चरण की दो सीटों पर सबकी नजरें टिकी रहेंगी, क्योंकि राजनांदगांव में सूबे के वर्तमान मुख्यमंत्री रमन सिंह तो महासमुंद में पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी की प्रतिष्ठा दांव पर लगी हुई है।
नक्सलवाद से जूझ रहे छत्तीसगढ़ में सबसे बड़ी चुनौती माओवाद प्रभावित सीटों पर शांतिपूर्वक चुनाव संपन्न करवाना है। यही कारण है कि पहले चरण में केवल एक बस्तर सीट पर मतदान होना है। माओवादियों के नापाक मंसूबों को नाकाम करने के लिए फिलहाल सुरक्षा बलों की 65 कंपनियां बस्तर पहुंच रही हैं। इनमें केंद्रीय रिजर्व सुरक्षा बल, आईटीबीपी, बीएसएफ शामिल हैं। हालांकि राज्य सरकार ने केंद्र ने और अर्ध्यसैनिक बलों की मांग की है। बस्तर से कांग्रेस ने महेंद्र कर्मा के बेटे दीपक कर्मा को टिकट दिया है। महेंद्र कर्मा मई 2013 में झीरम घाटी हमले में मारे गए थे। भाजपा ने दीपक के मुकाबले अपने वर्तमान सासंद दिनेश कश्यप पर ही भरोसा जताया है। वहीं आम आदमी पार्टी की उम्मीदवार सोनी सोरी दोनों को कड़ी चुनौती देती नजर आ रही है। सोनी सोनी पर नक्सलियों की मदद के आरोप हैं। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट से उन्हें जमानत मिली है। आप की टिकट मिलते ही सोनी सोरी ने भाजपा और कांग्रेस दोनों पर शाब्दिक प्रहार शुरु कर दिया है। अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित ये सीट वैसे भी भाजपा के लिए टेढ़ी खीर साबित हो सकती है। इसका कारण विधानसभा चुनाव में भाजपा ने बस्तर लोकसभा में आने वाली 12 में 8 सीटों पर फतह हासिल की थी। जिसका फायदा कांग्रेस को लोकसभा चुनाव में मिल सकता था, लेकिन सोनी सोरी की उम्मीदवारी ने कांग्रेस की संभावनाओं को भी क्षीण कर दिया है। बस्तर सीट पर त्रिशंकु मुकाबला देखने लायक होगा।
दूसरे चरण में छत्तीसगढ़ की माओवाद प्रभावित सीटों पर ही चुनाव होने हैं। इनमें राजनांदगांव, कांकेर, महासमुंद लोकसभा सीट शामिल हैं। राजनांदगांव सीट पर मुख्यमंत्री रमन सिंह के बेटे अभिषेक सिंह किस्मत आजमाएंगे। यहां से भाजपा के वर्तमान सासंद मधुसूदन यादव की टिकट काटी गई है। दिलचस्प बात ये है कि नरेंद्र मोदी भी इस सीट को लेकर चिंता जता चुके हैं। सूत्र बताते हैं कि मोदी ने उम्मीदवार की जीत तय करने के लिए किसी एक की जिम्मेदारी तय करने की हिदायत भी दी है। कांग्रेस ने यहां से नए चेहरे कमलेश्वर वर्मा को टिकट देकर इलाके के लोधी समाज को साधने की कोशिश की है। राजनांदगांव सीट पर सबकी नजरें होंगी क्योंकि इसपर खुद मुख्यमंत्री की प्रतिष्ठा दांव पर लगी हुई है। हालांकि राजनांदगांव में आने वाली अधिकांश विधानसभा सीटों पर कांग्रेस का कब्जा है। लेकिन बावजूद इसके भाजपा को यहां से जीत की उम्मीद है। कांकेर लोकसभा सीट में भाजपा ने वर्तमान सासंद सोहन पोटाई का टिकट काटकर पूर्व वन मंत्री और मौजूदा विधायक विक्रम उसेंडी को टिकट दिया है। नक्सलियों के शहरी नेटवर्क के तार सोहन पोटाई और उनके समर्थकों से जुड़ने के आरोपों के कारण उनका टिकट कटना तय हो गया था। कांग्रेस ने यहां से फूलोदेवी नेताम को टिकट दिया है। फूलोदेवी नेता अजीत जोगी गुट की नेता मानी जाती हैं। लेकिन विधानसभा चुनाव में कांकेर की अधिकतम सीट गवां चुकी भाजपा हर हाल में अपनी लोकसभा सीट बचाए रखने की जुगत में है। यही कारण है कि ऐन चुनाव के पहले रमन सिंह ने आदिवासियों को तोहफा देते हुए पांच प्रकार के लघु वनोपज की सीधी खरीदी करने का ऐलान किया था। हालांकि भाजपा का ये अस्त्र कितना कारगर होगा, ये तो चुनाव के नतीजे ही बता पाएंगे। लेकिन भाजपा के उम्मीदवार विक्रम उसेंडी उतने दमदार उम्मीदवार नहीं है, जितनी की फूलोदेवी नेताम हैं।
महासमुंद सीट से भाजपा ने वर्तमान सांसद चंदूलाल साहू को दोहराया है। साहू बहुल इस सीट पर भी भाजपा चेहरा बदलना चाहती थी, लेकिन कोई योग्य चेहरा नहीं मिल पाने पर साहू को ही फिर मौका दिया गया। इस सीट पर कांग्रेस ने पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी को उम्मीदवार घोषित किया है। हालांकि इस सीट पर दिंवगत केंद्रीय मंत्री विद्याचरण शुक्ल की बेटी प्रतिभा पांडे भी टिकट की दावेदारी कर रही थीं। लेकिन उनकी दावेदारी को दरकिनार करते हुए जोगी को मैदान में उतारा गया है। जोगी के चुनाव लड़ने से अब सबकी नजरें महासमुंद से भी नहीं हटेंगी। ध्यान रहे कि जोगी एक साल के राजनीतिक सन्यास पर चल रहे थे, लेकिन पार्टी आलाकमान ने उनका राजनीतिक वनवास बीच में खत्म कर उन्हें युद्ध के मैदान में भेज दिया है। महासमुंद सीट पर कांग्रेस का पलड़ा इसलिए भारी दिखाई दे रहा है कि जोगी यहां से पहले भी सासंद रह चुके हैं। 2004 में वीसी शुक्ल कांग्रेस से नाराज होकर भाजपा की टिकट पर लोकसभा चुनाव लड़ रहे थे। महासमुंद उनकी पारंपरिक सीट थी, लेकिन इस चुनाव में अजीत जोगी ने शुक्ल को 1 लाख 18 हजार 505 मतों से हरा दिया था। जबकि 1970 से 1990 यानि तीन दशक तक यहां पर वीसी शुक्ल सासंद रहे थे। वे यहां से छह बार लोकसभा चुनाव जीते थे। जोगी की इच्छा महासमुंद से ही चुनाव लड़ने की थी, जिस पर आलाकमान ने भी अपनी मुहर लगा दी।
सूबे की सबसे अहम सीट रायपुर से भाजपा ने वर्तमान सांसद रमेश बैस पर ही भरोसा जताया है। बैस लोकसभा में पार्टी के मुख्य सचेतक भी हैं। बैस लगातार छह बार से रायपुर सीट से भाजपा के सांसद हैं। कांग्रेस ने एक नाटकीय घटनाक्रम के तहत रायपुर से छाया वर्मा को प्रत्याशी बनाया है। कांग्रेस ने रायपुर सीट से एक पखवाड़े में तीन उम्मीदवार बदल दिए। दरअसल कांग्रेस ने सबसे छाया वर्मा को ही रायपुर से टिकट दिया। लेकिन सप्ताह भर बाद ही छाया वर्मा का टिकट काटकर पूर्व मंत्री सत्यनारायण शर्मा (रायपुर ग्रामीण विधानसभा सीट से मौजूदा विधायक) को टिकट दे दिया गया। इसे लेकर कुर्मी समाज कांग्रेस के विरोध में उतर आया। छाया वर्मा कुर्मी समाज (पिछड़ा वर्ग) से हैं, जिससे कि रमेश बैस भी आते हैं। विरोध को देखते हुए दो दिन के भीतर ही फिर शर्मा का टिकट निरस्त कर छाया वर्मा को उम्मीदवार घोषित कर दिया गया।
दूसरी महत्वपूर्ण सीट दुर्ग से भाजपा ने मौजूदा सांसद सरोज पांडे पर ही भरोसा जताया है। पांडे भाजपा महिला मोर्चा की राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं। वहीं कांग्रेस ने इनके मुकाबले ताम्रध्वज साहू को टिकट दिया है। साहू हाल ही में विधानसभा चुनाव हारे हैं। दुर्ग में साहू समाज बहुलता में निवास करता है, इसी बात को ध्यान में रखकर साहू को टिकट दिया गया है।
रायगढ़ सीट पर एक बार फिर भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष विष्णुदेव साय को मौका दिया है। यह सीट लगातार तीन बार से भाजपा के खाते में जा रही है। पहले सीट लंबे समय तक कांग्रेस के कब्जे में रही है। यहां से अजीत जोगी भी सासंद रह चुके हैं। इस सीट पर कांग्रेस ने आरती सिंह को उतारा है। पार्टी की पहली सूची में सारंगढ़ राजपरिवार की मेनका सिंह को टिकट दिया गया था। लेकिन सप्ताह भर के बाद ही जशपुर जिले की कांग्रेस अध्यक्ष आरती सिंह को टिकट दे दिया गया।
सरगुजा सीट से भाजपा ने नए चेहरे कमलभान सिंह को मैदान में उतारा है। सरगुजा में गोंड जाति के लोग सबसे ज्यादा संख्या में निवास करते हैं। इसके बाद उरांव और कंवर समाज का नंबर आता है। 2009 के लोकसभा चुनाव में ये सीट भाजपा के खाते में आई थी। यहां से मुरारीलाल सिंह चुनाव जीते थे, लेकिन अपना कार्यकाल खत्म करने के पहले ही नंबवर 2013 में उनका निधन हो गया। कांग्रेस ने इस सीट से रामदेव राम को मौका दिया है। रामदेव राम इलाके के खासे लोकप्रिय नेता हैं।
कोरबा सीट से कांग्रेस ने चरणदास मंहत को दोहराया है। कोरबा सीट परिसीमन के बाद 2009 में अस्तित्व में आई थी। इस सीट से महंत ने करुणा शुक्ला को हराया था। इस बार भाजपा ने बंशीलाल महतो को मौका दिया है।
सूबे की एकमात्र अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित सीट जांजगीर चांपा से भाजपा ने मौजूदा सासंद कमला पाटले को दोबारा मौका दिया है। वहीं कांग्रेस ने नए चेहरे प्रेमचंद जायसी को मौका दिया है। इस सीट पर रोचक मुकाबला होगा।
बिलासपुर में कांग्रेस के टिकट से इस बार करुणा शुक्ला चुनाव लड़ेंगी। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेई की भतीजी और 32 सालों तक भाजपा में रहीं करुणा हाल ही में कांग्रेस में शामिल हुई हैं। भाजपा ने यहां से नए चेहरे लखन साहू को मैदान में उतारा है। हालांकि बिलासपुर सीट पर ब्राह्मण मतदाता बहुतायात में निवास करते हैं। ऐसे में करुणा का पलड़ा भारी नजर आ रहा है।
पौने दो करोड़ मतदाता करेंगे भाग्य का फैसला

कांकेर लोकसभा क्षेत्र में 14 लाख 42 हजार 279, कोरबा लोकसभा क्षेत्र में 14 लाख 12 हजार 551, जांजगीर-चांपा लोकसभा क्षेत्र में 17 लाख 35 हजार 479, दुर्ग लोकसभा क्षेत्र में 18 लाख 43 हजार 686, बस्तर लोकसभा क्षेत्र में 12 लाख 94 हजार 546, बिलासपुर लोकसभा क्षेत्र में 17 लाख 9 हजार 935, महासमुंद लोकसभा क्षेत्र में 15 लाख 11 हजार 43, राजनांदगांव लोकसभा क्षेत्र में 15 लाख 80 हजार 456, रायगढ़ लोकसभा क्षेत्र में 16 लाख 13 हजार 058, रायपुर लोकसभा क्षेत्र में 18 लाख 75 हजार 452 और सरगुजा लोकसभा क्षेत्र में 15 लाख 10 हजार 663 मतदाता पंजीकृत है।  कुल मतदाताओं की संख्या 1 करोड़ 75 लाख 29 हजार 148 है जिसमें महिला मतदाताओं की संख्या 86 लाख 46 हजार 307 और पुरुष मतदाताओं की संख्या 88 लाख 81 हजार 306 है जबकि अन्य मतदाताओं की संख्या 1535 शामिल है।

मंगलवार, 18 मार्च 2014

मोदी के लिए अमेरिका करेगा कॉल




यदि लोकसभा चुनाव के मौके पर आपके फोन पर आई कॉल में अमेरिका का नंबर दिखाई पड़ रहा हो तो चौंकिएगा मत...क्योंकि पूरे चुनाव के दौरान अमेरिका से रोजाना हजारों फोनकॉल्स के जरिए नरेंद्र मोदी के लिए वोट मांगे जाएंगे। ना केवल नरेंद्र मोदी के लिए, बल्कि भाजपा के स्थानीय लोकसभा उम्मीदवारों के लिए भी अमेरिका में बैठे प्रवासी भारतीय अभियान चलाने की तैयारी कर रहे हैं। इसके लिए बकायदा हिंदुस्तान के हर कोने से मतदाताओं के फोन नंबर अमेरिका भेजे जा रहे हैं। 
इतना ही नहीं नरेंद्र मोदी को देश का अगला प्रधानमंत्री बनाने के लिए अमेरिका समेत कई देशों से फंड इकट्ठा किया जा रहा है। मोबाइल नंबर पर मिस कॉल दिलवाकर प्रवासी भारतीयों को मोदी के समर्थन में रजिस्टर किया जा रहा है। नए वॉलेंटियर बनाए जा रहे हैं। OFBJP272.COM अभियान चलाया जा रहा है। हिंदुस्तान में तो केवल रन फॉर यूनिटी चलाया जा रहा है, जबकि यूएस में एक कदम आगे बढ़कर न्यू जर्सी जैसे ठंडे इलाकों में (जहां फिलहाल दौड़ना मुमकिन नहीं है) योगा फॉर यूनिटी भी आयोजित किया जा रहा है। जिन इलाकों में दौड़ लगाई जा सकती है, वहां यूएस रन फॉर यूनिटी कार्यक्रम भी कराए जा रहे हैं। नमो चाय पार्टी केवल भारत में ही नहीं बल्कि मिशीगन, न्यू जर्सी, न्यूयॉर्क, वाशिंगटन डीसी, नार्थ कारोलिना में भी आयोजित की जा रही है... और ये सब हो रहा है ओवरसीस फ्रेंड्स ऑफ बीजेपी के बैनरतले। नरेंद्र मोदी को देश का अगला प्रधानमंत्री बनवाने के लिए भाजपा के प्रवासी भारतीय कार्यकर्ता कमर कसकर मैदान में उतर चुके हैं।
चार हजार सदस्यों वाले OFBJP US (overseas friends of bjp US) ने अमेरिका में रहने वाले 3 मिलियन भारतीयों को रिझाने के लिए कई तरह के कैम्पेन चला रखे हैं। इसमें कोई शक नहीं कि इस चुनावी युद्ध में सबसे बड़े हथियार के रूप में सोशल मीडिया यानि फेसबुक, ट्विटर, फोन कॉल्स और वेबसाइट OFBJP272.COM का इस्तेमाल किया जा रहा है। लेकिन इन सबसे इतर बात ये है कि भाजपा की तरफ से प्रधानमंत्री पद के भावी उम्मीदवार नरेंद्र मोदी सैटेलाइट के जरिए यूएसए में रहने वाले भारतीयों से लाइव कॉफ्रेंस कर सहयोग मांगने की योजना पर काम कर रहे हैं। मोदी जल्द ही गांधीनगर (गुजरात) से अमेरिका के प्रवासी भारतीयों को संबोधित करेंगे।
Overseas friends of bjp US chapter के अध्यक्ष चंद्रकांत पटेल ने तहलका को बताया कि इस चुनाव में प्रवासी भारतीय कुछ ज्यादा रुचि रख रहे हैं। ये भी तय है कि वे इस आम चुनाव में महत्वपूर्ण रोल भी निभाएंगे। हमारी योजना दो तरह से नरेंद्र मोदी के लिए अभियान चलाने की है। पहला तो भारत पहुंचकर चुनाव प्रचार करने का। दूसरा यहीं से बैठे-बैठे फोन कॉल्स के जरिए लोगों को भाजपा के पक्ष में मतदान करने के लिए अपील करने का। इसके लिए हम नए वॉलेंटियर बना रहे हैं। इनकी संख्या हजारों में पहुंच चुकी है। इनमें से आधे चुनाव के वक्त भारत जाएंगे और भाजपा के पक्ष में चुनाव प्रचार करेंगे। हर सदस्य हिंदुस्तान के उन इलाकों में जाकर कैम्पेन चलाएगा, जहां का वो खुद रहने वाला है। मैं छत्तीसगढ़ के चिरमिरी इलाके का हूं तो मैं वहां जाकर ही मोदी के पक्ष में माहौल बनाउंगा। कुछ वालेंटियर अमेरिका में ही रहकर फोनकॉल्स और एसएमएस के जरिए लोगों को भाजपा के पक्ष में मत देने के लिए प्रोत्साहित करेंगे। हमारा एक वालेटिंयर एक दिन में कम से कम 200 लोगों को फोन करेगा
हाल ही में OFBJP US के अध्यक्ष बने चंद्रकांत पटेल फ्लोरिडा के टेम्पा में रहते हैं। 1989 में यूएस पहुंचे पटेल इलेक्ट्रॉनिक्स और माइक्रोचिप मैन्यूफैक्चरिंग के व्यवसाय से जुड़े हुए हैं। वे छत्तीसगढ़ के चिरमिरी क्षेत्र के रहने वाले हैं। अमेरिका जाने से पहले वे चिरमिरी के जिला भाजपा अध्यक्ष भी रह चुके हैं। उनका परिवार जनसंघ से जुड़ा रहा है। अब वे अमेरिका में सक्रिय हैं। इस समय भले ही वे और उनका संगठन मोदी के प्रचार में जुटा है। लेकिन आम तौर पर वे भारत से अमेरिका पहुंचने वाले भाजपा नेताओं के लिए कार्यक्रमों आयोजित करते हैं। भाजपा के पक्ष में माहौल तैयार करते हैं। भाजपा विरोधी बातों को देश के बाहर काउंटर करने की जिम्मेदारी भी OFBJP की ही है। overseas friends of bjp के यूएस चैप्टर की नींव 1991 में पूर्व उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने रखी थी। इसमें सदस्यता प्राप्त करने के लिए विद्यार्थियों से लेकर सिनीयर सिटीजन्स तक कई कैटेगरी है। इसमें प्रायमरी मेम्बर्स, एसोसिएट मेम्बर और एक्टिव मेम्बर्स के लिए अलग-अलग सदस्यता शुल्क निर्धारित है। जो 1 डॉलर से लेकर 100 डॉलर तक है। ये देश के बाहर सबसे पुराना और सबसे बड़ा संगठन है, जो भाजपा की एक इकाई के रूप में काम करता है।
OFBJP ने MODI FOR PM, DONATE FOR MODI जैसे अभियान चला रखे हैं। जहां प्रवासी भारतीय मोदी के लिए धन भी दान कर रहे हैं। ये राशि सीधे भाजपा के खाते में जा रही है। जबकि OVERSEAS FRIENDS OF BJP का कोर ग्रुप अपने स्तर पर भी चंदा इकट्ठा कर रहा है। जो अमेरिका में ही चल रहे प्रचार पर खर्च किया जा रहा है।
भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव जगतप्रकाश नड्डा कहते हैं कि, नरेंद्र मोदी को लेकर एकतरफा लहर चल पड़ी है। इससे विदेशों में रहने वाले भारतीय कैसे बच सकते हैं। हमारे अप्रवासी भारतीय बंधु भी वातावरण बनाने में सहयोग कर रहे हैं। लेकिन मैं ऐसा मानता हूं कि देश के सभी लोगों का रुझान मोदी जी की तरफ जा रहा है। लोगों को उनमें पूरी आस्था है। अप्रवासी भारतीय भी अब परिवर्तन चाहते हैं। यही कारण है कि वे खुले दिल से मोदी जी को सपोर्ट कर रहे हैं
हालांकि कांग्रेस मोदी फॉर पीएम नाम के इस अंतर्राष्ट्रीय अभियान से कोई इत्तेफाक नहीं रखती। ना ही उसे लगता है कि इससे भाजपा को कोई फायदा होगा। इस बारे में कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव मुकुल वासनिक कहते हैं कि, हर दल अपने तरीके से चुनाव जीतने की कोशिश कर रहा है। लेकिन केंद्र में सरकार तो हमारी ही बनेगी। कांग्रेस पार्टी अपनी 10 साल की उपलब्धियों के बल जनता से वोट मांगेगी। हमें पूरा भरोसा है, जैसे-जैसे चुनाव का वक्त नजदीक आएगा, वातावरण में कई बदलाव आएंगे। जहां तक भारत के बाहर मोदी की बढ़ती लोकप्रियता की बात है, इसमें कोई तथ्य नहीं है। ये केवल भाजपा का भ्रामक प्रचार है
चंद्रकांत पटेल बताते हैं कि सिंतबर 2013 में उनकी नरेंद्र मोदी के साथ हुई बैठक में तय किया गया था कि कोई भी अप्रवासी भारतीय भारत आकर नेताओं की परिक्रमा नहीं करेगा। कहने का मतलब ये कि सभी एनआरआई अपने-अपने मूल स्थानों पर जाकर अपने रिश्तेदारों, दोस्तों और पास पड़ोसियों को भाजपा के पक्ष में मतदान करने के लिए चुनाव प्रचार करेंगे। हमारे साथ कई अमेरिकी युवा भी होंगे, जिनके माता-पिता भारतीय मूल के हैं। हम उन युवाओं को भी जोड़ रहे हैं, जो आईटी सेक्टर से हैं। जिनके पास एच-1 वीजा या भारतीय पासपोर्ट है।
भाजपा के इस ग्लोबल संगठन ने आम चुनाव की तैयारी काफी पहले ही शुरु कर दी थी। इसके लिए पार्टी के आला नेताओं के साथ कई दौर की मीटिंग्स भी हो चुकी हैं। भाजपा के कई नेता बारी-बारी से वीडिया काफ्रेंस के जरिए भी विदेश में बसे भारतीयों से बात कर रहे हैं। उनसे भाजपा को 272 सीटों के जादुई आंकड़े तक पहुंचाने के लिए हर संभव मदद की अपील कर रहे हैं।
इस वक्त पूरी दुनिया की नज़र भारत में होने वाले आम चुनावों पर हैं। ऐसे में विदेशों में बसे लाखों भारतीय इससे कैसे अछूते रह सकते हैं। वे अपने ड्राइंग रूम्स में लगे टीवी सेट या इंटरनेट के जरिए हिंदुस्तान में पल-पल घट रही राजनीतिक घटनाओं पर नजर बनाए हुए हैं। अब ये बात और है कि उनका रूझान मोदी की तरफ है या राहुल गांधी की तरफ। वे भाजपा को 272 के आंकड़े के पार देखना चाहते हैं या कांग्रेस को। या फिर उनके मन में कोई तीसरा विकल्प पसंद के तौर पर उभर रहा है। ये तो वक्त आने पर ही पता चलेगा। लेकिन इतना तय है कि भाजपा अपने कुशल प्रबंधन के साथ कई वर्गों को साधने में लगी हुई है, जिसमें से अप्रवासी भारतीयों का एक बड़ा, संपन्न और निर्णायक वर्ग भी शामिल है।


गुरुवार, 6 मार्च 2014

अटल भी भाजपा से नाराज-करुणा


पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी भाजपा की वर्तमान कार्यप्रणाली से खुश नहीं है। भले ही वे स्वास्थगत कारणों से कुछ भी नहीं बोल पा रहे हों, लेकिन वे भाजपा पर हावी एक गुट को लेकर चिंतित रहते हैं। ये आरोप हैं अटल बिहारी बाजपेयी की भतीजी करुणा शुक्ला का। कभी भाजपा की टिकट से लोकसभा सांसद रहीं करुणा शुक्ला हाल ही में कांग्रेस में शामिल हुई हैं। शुक्ला का कहना है कि कांग्रेस में शामिल होने के पहले और बाद में वे अटल जी से मिलने उनके आवास गई थीं। तब अटल जी के साथ रह रहे अन्य परिजनों ने उनके कदम का समर्थन करते हुए उनकी हौंसला अफजाई की थी।
कांग्रेस का पक्ष लेते हुए करुणा शुक्ला ने कहा कि भाजपा भ्रष्टाचारियों से भरी पड़ी है। जबकि कांग्रेस ने हमेशा अपने भ्रष्ट नेताओं पर कार्रवाई कर कड़ा संदेश दिया है। शुक्ला ने छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह पर कटाक्ष करते हुए कहा कि भ्रष्टाचार को लेकर सीएम के जीरो टॉलरेंस की परते उधड़नी अभी बाकी हैं। अभी तो भाजपा सरकार को कई तरह का टॉलरेंससहना होगा। शुक्ला ने ये आरोप भी लगाया कि जिस राम जेठमलानी ने अटल बिहारी बाजपेयी के खिलाफ बगावती तेवर अपनाकर चुनाव लड़ा था, भाजपा ने उन्हीं को राज्यसभा भेजकर अटल जी को भुला देने के संकेत दे दिए थे। करुणा शुक्ला ने नरेंद्र मोदी पर निशाना साधते हुए कहा कि भाजपा ने जिस व्यक्ति को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया है, उसने ना तो पतिधर्म निभाया ना ही राजधर्म। वे ऐसी पार्टी में नहीं रहना चाहती थीं, जिसने उनके स्वाभिमान की रक्षा नहीं की। शुक्ला ने आरोप लगाया कि भाजपा एक गुट विशेष की पार्टी रह गई है।

विधानसभा चुनाव के वक्त बगावती तेवर के कारण पार्टी छोड़ने वाली करुणा शुक्ला 32 साल तक भाजपा में रही हैं। इस दौरान उन्होंने भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व में भी कई महत्वपूर्ण पदों पर काम किया है। वे भाजपा महिला मोर्चा की राष्ट्रीय अध्यक्ष भी रह चुकी हैं। वे छत्तीसगढ़ भाजपा में भी वे पांच विभिन्न अहम समितियों में भूमिका निभाती रही हैं। हालांकि करुणा शुक्ला की मुख्यमंत्री रमन सिंह से कभी नहीं पटी। 2009 में हुए विधानसभा चुनाव में वे कोरबा लोकसभा सीट पर कांग्रेस के चरणदास महंत से हार गई थीं। तभी से उनके और भाजपा संगठन के बीच दूरियां बढ़ना शुरु हो गई थीं। फिलहाल कांग्रेस करुणा शुक्ला को एक उपलब्धि के तौर पर देख रही है। भले ही शुक्ला के कांग्रेस की टिकट पर बिलासपुर से चुनाव लड़ने की संभावना के कारण कांग्रेस का स्थानीय नेतृत्व दो फाड़ हो गया हो।