शुक्रवार, 11 अप्रैल 2014

भाजपा v/s कांग्रेस नहीं, रमन v/s जोगी

इस आम चुनाव में जहां नरेंद्र मोदी नाम के धूमकेतु के उभरने से राष्ट्रीय राजनीति के आयाम बदले हैं। वहीं छत्तीसगढ़ की भावी राजनीति की तस्वीर भी साफ हो गई है। प्रदेश में दो ऐसे परिवार उभर रहे हैं, जो जब चाहें, जैसे चाहें, अपने दलों की लगाम खींचते नजर आ रहे हैं। अब सूबे की राजनीति की धुरी कांग्रेस और भाजपा से नहीं, बल्कि मुख्यमंत्री रमन सिंह और पूर्व मुख्यमंत्री अजीत से घूम रही है। ये ठीक बिलकुल वैसा ही है, जम्मू कश्मीर, पंजाब, बिहार और हरियाणा जैसे अन्य प्रदेशों में होता आया है। इन राज्यों में दशकों से तीन या चार परिवार ही सूबे की राजनीति चलाते आए हैं। चाहें क्षेत्रीय दल हों या राष्ट्रीय राजनीतिक दल, इन परिवारों ने सियासत की कमान अपने हाथों में थामे रखी है। इन राज्यों की राजनीति कुछ खास परिवारों द्वारा ही नियंत्रित रही है।
हरियाणा के तीनों लाल, देवीलाल, बंसीलाल और भजनलाल के इर्द गिर्द घूमने वाली राजनीति से भले ही तोनों लाल विदाई लेकर पंचतत्व में विलीन हो गए हों, मगर हरियाणा की राजनीति आज भी उनके पुत्र, पौत्र, भतीजे, बहिन, भाई, बेटियां और रिश्तेदार उनके वारिस बनकर राजनीति में सक्रिय हैं। जम्मू-कश्मीर में अब्दुल्ला वंश का राज है। शेख अब्दुल्ला, फारूक और अब उमर अब्दुल्ला की हुकूमत है। वहां मुफ्ती मोहम्मद सईद और महबूबा सईद भी हैं। यदि दक्षिण भारत में करुणानिधि, मारन और देवेगौड़ा के वंश महत्वपूर्ण ताकत हैं, तो ओडिशा में पटनायक वंश की तूती बोलती रही है। उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव के वंश का राज है, बिहार में रामविलास पासवान और लालू यादव का मजबूत राजनीतिक परिवार है। वहां कभी ललित नारायण मिश्र व जगन्नाथ मिश्र लोगों के दिलों पर हुकूमत करते थे। पंजाब में बादल परिवार की हुकूमत चल रही है। कभी अमिरदर सिंह और उनके परिवार का राज हुआ करता था। मध्यप्रदेश में राजमाता विजयाराजे सिंधिया का परिवार तो अपने आप में बहुदलीय है। खुद वह बीजेपी की शीर्ष नेता रहीं। वसुंधरा राजे बीजेपी की तरफ से राजस्थान की मुख्यमंत्री हैं। दिंवगत माधव राव सिंधिया कांग्रेस के बड़े नेता रहे। अब उनके पुत्र ज्योतिरादित्य सिंधिया मध्य प्रदेश से सांसद हैं।
छत्तीसगढ़ में भी भाजपा और कांग्रेस की सियासत में दो परिवारों का वर्चस्व दिखाई देने लगा है। या यू कहें कि सूबे की सियासत कांग्रेस वर्सेस भाजपा नहीं बल्कि अजीत जोगी वर्सेस रमन सिंह हो गई है तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। दोनों ही परिवारों ने कांग्रेस और भाजपा के कई दिग्गजों को किनारे लगा दिया है। कांग्रेस पर पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी के प्रभाव की बात करें तो वे अपने बेटे अमित को विधानसभा टिकट दिलवाने में सफल हो गए। इसके पहले जोगी अपने बेटे अमित को विधानसभा चुनाव में टिकट दिलाने के लिए पार्टी से लगभग बागी ही हो चुके थे। उन्होंने सूबे में ना केवल जोगी एक्सप्रेस चला डाली थी, बल्कि संगठन के दूसरे नेताओं को चुनौती देना भी शुरु कर दिया था। जब आलाकमान ने अमित जोगी की टिकट के लिए हरी झंडी दिखाई, तब कहीं जाकर जोगी एक्सप्रेस पर लगाम लगाई। वे खुद महासमुंद लोकसभा से चुनाव लड़ रहे हैं। जबकि वे एक साल के राजनीतिक वनवास पर चले गए थे। लेकिन उनका कथित वनवास समय के पहले ही ना केवल खत्म हो गया, बल्कि वे सन्यास दौरान भी वे पूरी तरह सक्रिय रहे। उनकी कोशिश ये भी थी कि इस लोकसभा चुनाव में ही वे अपनी पुत्रवधु ऋचा जोगी को भी कांकेर सीट से लांच कर दें। लेकिन यहां उनकी नहीं चली। हालांकि जोगी का महासमुंद से चुनाव लड़ना पहले से ही तय था। ऐसे में वे प्रदेश में शुक्ल परिवार की रही सही जड़ भी काट देने में सफल हो गए। दरअसल अजीत जोगी महासमुंद सीट से एक बार पूर्व केंद्रीय मंत्री वीसी शुक्ल (अब दिंवगत) को यहां से हरा चुके हैं। ये वो दौर था, जब 2004 में वीसी शुक्ल कांग्रेस से नाराज होकर भाजपा की टिकट पर लोकसभा चुनाव लड़ रहे थे। महासमुंद उनकी पारंपरिक सीट थी, लेकिन इस चुनाव में अजीत जोगी ने शुक्ल को 1 लाख 18 हजार 505 मतों से हरा दिया था। जबकि 1970 से 1990 यानि तीन दशक तक यहां पर वीसी शुक्ल की तूती बोलती थी। वे यहां से छह बार लोकसभा चुनाव जीते थे। जोगी एक बार फिर महासमुंद से शुक्ल परिवार के लिए चुनौती बन गए हैं। दरअसल इस सीट से वीसी शुक्ल की बेटी प्रतिभा पांडे और श्यामाचरण शुक्ल के बेटे अमितेश शुक्ल खुद के लिए या अपने बेटे भवानी शुक्ल के लिए दावेदारी कर रहे हैं। जोगी के नाम के ऐलान के साथ शुक्ल परिवार राजनीतिक वनवास शुरु हो गया है क्योंकि अमितेश हाल ही में विधानसभा चुनाव हार गए हैं और प्रतिभा लोकसभा चुनाव से खुद के राजनीतिक करियर की शुरुआत करने की तैयारी कर रही थी, लेकिन वे सफल नहीं हो पाईं।
इस बारे में अमितेश शुक्ल कहते हैं कि जब पार्टी झीरम घाटी में मारे गए कांग्रेस नेताओं के परिवार को दो-दो टिकट दे सकती है तो शुक्ल परिवार की उपेक्षा नहीं होनी चाहिए। पार्टी के लिए हमारी कई पीढ़ियों ने अपना जीवन समर्पित किया है। वहीं हमारे परिवार पर आज तक कोई दाग भी नहीं लगा। हमने हमेशा साफ सुथरी राजनीति की है
इस मसले पर अजीत जोगी कहते हैं कि राजनीतिक परिवार में जन्म लेना अलग बात है। लेकिन जब तक जनता किसी को आर्शीवाद नहीं दे देती, तब तक उसका राजनीतिक करियर शुरु नहीं हो सकता। अपनी योग्यता हर किसी को साबित करनी ही होती है, तभी उसे मौका मिलता है। कोई कितने ही बड़े नेता की संतान क्यों ना, उसे जनता के दरबार में खुद को साबित करना ही होता है। ऐसे में परिवारवाद कोई मुद्दा ही नहीं रह जाता
प्रदेश भाजपा की बात करें तो मुख्यमंत्री रमन सिंह एकमात्र ऐसा चेहरा बनकर उभरे हैं, जो सूबे के स्टार प्रचारक हैं। इसका फायदा उनके परिवार को तो होना ही था। हालांकि ऐसा नहीं है कि अचानक ही उनके बेटे अभिषेक सिंह को राजनांदगांव लोकसभा की टिकट मिल गई हो। इसकी पटकथा तो 2008 के विधानसभा चुनाव से ही लिखी जाने लगी थी। जब अभिषेक सिंह ने अपने पिता के चुनाव की कमान खुद संभाल ली थी। 2013 में हुए विधानसभा चुनाव में भी अभिषेक राजनांदगांव ( जो कि रमन सिंह का विधानसभा क्षेत्र है) में रमन सिंह की चुनाव अभियान में सक्रिय रहे। तभी से ये कयास लगाए जा रहे थे कि वे यहां से लोकसभा चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे हैं। लेकिन कहानी में ट्विस्ट डालते हुए रमन सिंह ने ऐलान कर दिया कि राजानांदगांव से वर्तमान सासंद मधुसूदन यादव ही मैदान में उतरेंगे। लेकिन जब टिकट के नाम तय किए जाने थे, उसके ऐन पहले राजनांदगांव जिला भाजपा ने अभिषेक सिंह को उम्मीदवार बनाने की मांग तेज कर दी। नतीजन राजनांदगांव सीट से नामों का पैनल बनाकर दिल्ली भेजा गया। भाजपा की केंद्रीय चुनाव समिति और खुद प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी के ऐतराज के बावजूद अंततः अभिषेक के नाम का ऐलान कर दिया गया। रमन सिंह की धर्मपत्नी वीणा सिंह भले ही मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह की पत्नी साधनी सिंह के समान सक्रिय ना दिखती हों। लेकिन सीएम हाउस से चलने वाली राजनीतिक गतिविधियों पर वे पूरा नियंत्रण रखती हैं। वे भले ही कभी राजनीतिक पर्दे पर नहीं आई हों, लेकिन वे पर्दे के पीछे वे पूरी तरह सक्रिय रहती हैं। चाहें तो सीएम के विधानसभा क्षेत्र के लोगों की तकलीफें दूर करने की बात हो या भाजपा नेताओं के दुख दर्द सुनने की। वीणा सिंह बकायदा रोज शाम सीएम हाउस में लोगों से मेल मुलाकात कर रमन सिंह के दायित्वों को हल्का करने में उनकी मदद करती हैं।
इस बारे में भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव और छत्तीसगढ़ प्रभारी जगतप्रकाश नड्डा कहते हैं कि इसमें कोई दो राय नहीं कि प्रदेश में रमन सिंह एक लोकप्रिय नेता हैं। दरअसल ये आम चुनाव का वक्त है और हमारे पास केंद्र में नरेंद्र मोदी और छत्तीसगढ़ रमन सिंह हैं, जिनके बल पर हम प्रदेश में अधिकतम सीटें जीतेंगे। रमन सिंह ने पिछले दस सालों में बेंहतरीन काम किए हैं, जिन्हें नकारा नहीं जा सकता। जहां तक अजीत जोगी की बात है तो इसकी चिंता को कांग्रेस को करनी चाहिए

छत्तीसगढ़ भाजपा में इससे पहले लखीराम अग्रवाल और बलिराम कश्यप जैसे नेताओं की ठसक चलती थी। लेकिन वक्त के साथ ये दोनों नेता तो दुनिया में रहे नहीं, लेकिन इनके बेटे जरूर अपने पिता की विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं। लखीराम अग्रवाल के बेटे अमर अग्रवाल सूबे के स्वास्थ्य मंत्री हैं। वहीं बलिराम कश्यप के बेटे दिनेश कश्यप बस्तर से सांसद तो हैं ही, इस बार भाजपा ने उन्हें ही उम्मीदवार बनाया है। उनके छोटे भाई केदार कश्यप प्रदेश के स्कूल शिक्षा मंत्री हैं। लेकिन रमन के प्रभाव के आगे इनके कद के छोटे हो गए हैं। वहीं कृषि मंत्री बृजमोहन अग्रवाल भी अपने परिवार के वर्चस्व की लड़ाई लड़ने में मशगूल हैं। कांग्रेस में मोतीलाल वोरा भी अपने परिवार को स्थापित करने की लड़ाई लड़ रहे हैं। उनका बेटा अरुण वोरा इस विधानसभा चुनाव में जरूर दुर्ग सीट से जीत हासिल कर चुका है। लेकिन पिछले चुनाव में लगातार हार का सामना कर चुके अरुण में वो दम नजर नहीं आता, जो वोरा परिवार के वर्चस्व को आगे बढ़ाने में मदद कर सके। बहरहाल छत्तीसगढ़ की राजनीतिक बिसात के सारे मोहरे रमन सिंह और अजीत जोगी के इशारों पर चलते दिखाई दे रहे हैं। ये बात अलग है कि शह और मात का ये खेल ये कितने दिनों तक यूं ही अकेले खेल पाते हैं।  
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