शनिवार, 17 मई 2014

अब बंदूक नहीं “हल”

यदि भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी वाकई गद्दीनशीन हो जाते हैं तो देश की नक्सल नीति में व्यापक बदलाव आएंगे। छत्तीसगढ़ सरकार के क्रियाकलाप और मोदी के भाषणों से इस बात के संकेत मिलना शुरु हो गए हैं।

छत्तीसगढ़ के सर्वाधिक नक्सल प्रभावित जिले दंतेवाड़ा के जिला पुलिस अधीक्षक नरेंद्र खरे ने पिछले दिनों एक बयान दिया कि अब माओवादियों से गोली से नहीं बल्कि बोली से बात होगी। जब भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी बस्तर में राजनीतिक सभा लेने आए तो उन्होंने भी खरे की बात को अपने शब्दों में आगे बढ़ाया कि मरना-मारना अब बहुत हो गया। अब नक्सली बंदूक छोड़ हल थाम लें। छत्तीसगढ़ के मुख्य सचिव विवेक ढांड भी धुर नक्सल प्रभावित इलाकों में जाकर बैठक ले रहे हैं। तो क्या इससे ये समझा जाए कि देश में नई सरकार के साथ-साथ नई नक्सल नीति का ब्ल्यू प्रिंट भी तैयार हो चुका है।

अप्रैल 2010 ताड़मेटला में तब तक के सबसे बड़े नक्सल हमले में 76 जवानों की मौत के बाद दंतेवाड़ा ने पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींचा था। केंद्र सरकार को भी दंतेवाड़ा में हुए इस हत्याकांड के बाद ये मानना पड़ा था कि नक्सलवाद केवल राज्यों की नहीं बल्कि राष्ट्र की समस्या है। तब तक नक्सलवाद से अपने दम पर जूझ रहे राज्यों के लिए केंद्र स्तर की एकीकृत योजना बनाने की कसरत शुरु हुई थी। इसी कड़ी में तत्कालीन गृहमंत्री पी चिंदबरम ने दो बार छत्तीसगढ़ आकर नक्सल रणनीति की दिशा तय करने के लिए बैठकें भी ली थीं। अब एक बार फिर बस्तर से ही माओवाद के खात्मे के लिए दिशा और दशा तय की जा रही है। ये दशा और दिशा क्या होगी, ये जानने के पहले दंतेवाड़ा एसपी नरेंद्र खरे के पूरे बयान पर गौर फरमा लें। खरे का कहना है कि पुलिस का पूरा जोर अब नक्सलियों की आत्मसमर्पण की नीति को बेहतर बनाने पर होगा। वर्ष 2014 में पुलिस माओवादियों को आत्म समर्पण के लिए प्रेरित करेगी। खरे ये भी कहते हैं कि छत्तीसगढ़ सरकार आंध्रप्रदेश की तर्ज पर समर्पण नीति को और बेहतर बनाने पर विचार कर रही है। भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी बस्तर आए तो उन्होंने सबसे पहले माओवादियों के बंदूक छोड़ने की अपील की। उन्होंने बस्तर से लेकर झारखंड़ के लोहदगा तक हर सभा में यही कहा कि मरने-मारने का समय चला गया है। अब नक्सलियों के हाथों में बंदूक नहीं हल होना चाहिए। मोदी ने इस बात पर जोर दिया कि नक्सल प्रभावित इलाकों का विकास उनकी प्राथमिकता में शामिल है। मोदी ने जगदलपुर में माओवादियों से अपील करते हुए नारा दिया, सबके साथ सबका विकास।
नक्सलियों पर मोदी का बयान आया और उसके बाद से ही छत्तीसगढ़ की नक्सल नीति में तेजी से परिवर्तन के संकेत मिलना भी शुरु हो गए हैं। पहले तो प्रदेश के नए नवेले मुख्य सचिव विवेक ढांड पद दो बार धुर नक्सल प्रभावित जिलों दंतेवाड़ा और सुकमा में पूरे सरकारी लाव लश्कर के साथ बैठक ले आए। वहीं पुलिस मुख्यालय ने भी छत्तीसगढ़ में नक्सलियों को आत्म-समर्पण के लिए प्रोत्साहित करने के लिए नई तैयारी शुरू कर दी है। उच्च पदस्थ पुलिस सूत्रों की मानें तो पीएचक्यू नक्सलियों की आत्म-समर्पण नीति में बड़ा बदलाव करने जा रहा है। बदलाव के पहले चरण में पति-पत्नी नक्सलियों के एक साथ समर्पण करने पर उनको ढाई लाख रुपए तत्काल देने की तैयारी की जा रही है। यह धनराशि नक्सली दंपती को अपना नया जीवन शुरू करने के लिए दिया जाएगा। आत्म-समर्पण करने के बाद राज्य सरकार की ओर से मिलने वाली सुविधाएं भी दी जाएंगी।
एडीजी नक्सल ऑपरेशन आरके विज का कहना है कि “गृह विभाग को यह प्रस्ताव भेजा जा रहा है। आत्म-समर्पण करने के बाद नक्सलियों के सामने सबसे बड़ी समस्या नया जीवन शुरू करने की होती है। इस समय सबसे ज्यादा आर्थिक संकट सामने आता है, जिससे कई बार नक्सली दोबारा जंगलों की राह पकड़ लेते हैं। इसलिए इस बार हमारा फोकस उनकी आर्थिक स्थिति पर ही है ताकि वे दोबारा हिंसा का रास्ता ना अपनाएं”।
राज्य के मुख्य सचिव विवेक ढांड ने भी अपनी पहली मीटिंग में ही संकेत दिए थे कि नक्सल प्रभावित बस्तर पर उनका खास फोकस रहेगा। बीते पखवाड़े में वे दो बार बस्तर जा चुके हैं। पहले दंतेवाड़ा और फिर सुकमा में चीफ सेकेट्री ने बैठक लेकर जता दिया कि वे अपनी बात पर कायम हैं। इन बैठकों में राज्य के वरिष्ठ आईएएस अफसर भी उनके साथ थे। ढांड ने स्थानीय अफसरों से मिलकर वहां की कठिनाइयों को भी जाना। यहां ये बताना जरूरी है कि तीन साल पहले राज्य सरकार ने सभी विभागों के सचिवों से बस्तर में महीने में एक रात बिताने कहा था, मगर इसका पालन नहीं हुआ। बस्तर को सिर्फ पुलिस के भरोसे छोड़ दिया गया था। सीएस के इस कदम के बाद अब राज्य सरकार की नई रणनीति पर अमल शुरु हो गया लगता है।
इस वक्त छत्तीसगढ़ की जेलों में (जिनमें पांच केंद्रीय कारागार भी शामिल हैं) तकरीबन 1400 ऐसे आरोपित या सजायाफ्ता बंदी हैं, जिनपर नक्सली होने या नक्सली समर्थक होने का आरोप है। जेल सूत्रों की मानें तो इनमें हार्डकोर नक्सली कम, जन मिलिशिया और संघम सदस्य ज्यादा हैं। आंकड़ों पर नज़र डालें तो जगदलपुर जेल में नक्सली मामलों के 332 विचाराधीन कैदी बंद हैं। साथ ही यहां 25 सजायाफ्ता कैदी भी रखे गए हैं। दंतेवाड़ा जेल में नक्सली मामलों के करीब 350 विचाराधीन कैदी बंद हैं। कांकेर जेल में नक्सली मामलों के करीब 250 और दुर्ग जेल में तकरीबन 100 विचाराधीन कैदी बंद हैं। अंबिकापुर जेल में लगभग 100 और रायपुर में 150 कैदी हैं, जो नक्सली होने के आरोप में बंद हैं। इनके अलावा प्रदेश में लागू जनसुरक्षा कानून के तहत भी 100 कैदी जेलों में बंद हैं।
भले ही नक्सलियों को हिंसा छोड़कर शांति के रास्ते पर लाने की कवायद जोर शोर से जारी हो। लेकिन छत्तीसगढ़ में बंदूक छोड़कर मुख्य धारा में शामिल होने वाले माओवादियों को उंगली पर गिना जा सकता है। वर्ष 2010 में छत्तीसगढ़ में एक साल में 35 नक्सलियों ने आत्म-समर्पण किया। वर्ष 2013 में नक्सली गतिविधियों पर नियंत्रण करने के लिए पुलिस और अर्धसैनिक बलों के जवानों ने सघन अभियान चलाया था। वर्ष 2014 में अब तक केवल चार डिवीजल कमेटी के चार सदस्यों ने आत्मसमर्पण किया है। इसमें राजनांदगांव में भगत झाड़े, कांकेर में संतोषी और सूरज शामिल हैं। जबकि छत्तीसगढ़ में सक्रिय जानी सलाम ने आंध्रप्रदेश में आत्म-समर्पण किया। वैसे भी आंध्र प्रदेश में सरेंडर करने वालों की संख्या ज्यादा है। वहां नक्सली को सरेंडर पर बढ़िया मुआवजा और नौकरी तक दी जाती है। आंध्रा की पुनर्वास नीति ही नक्सलियों को सरेंडर करने के लिए लुभा रही है। जबकि छत्तीसगढ़ में आकर्षक व प्रभावी नीति न होने के पिछले 10 साल में एक भी बड़े नक्सली ने यहां सरेंडर नहीं किया है। सूबे में हथियारों के हिसाब से समर्पण की कीमत तय की जाती है। इसमें एलएमजी के साथ समर्पण करने वाले नक्सली को 4.50 लाख रुपए दिए जाते हैं। वहीं एके 47 के साथ 3 लाख रुपए, एसलआर के साथ 1.50 लाख, थ्री नॉट थ्री के साथ 75 हजार, 12 बोर की बंदूक के साथ 30 हजार दिए जाते हैं। ये राशि भी लंबी प्रक्रिया के बाद मिल पाती है। जबकि ओडिशा और आंध्रप्रदेश में समर्पण के साथ ही मुआवजे की राशि प्रदान की जाती है। पुनर्वास नीति के तहत उन्हें तत्काल मकान या नौकरी का आश्वासन देकर ज्वाइन भी कराया जाता है। इन राज्यों में गिरफ्तारी या एनकांउटर का खतरा नहीं रहता।
राज्य सरकार ने सरेंडर करने वाले नक्सलियों के लिए अलग-अलग पदों के हिसाब से अलग-अलग इनाम घोषित कर रखा है। यदि सेंट्रल कमेटी का सचिव सरेंडर करता है तो ईनाम की राशि 12 लाख होती है। वहीं सेंट्रल मिलट्री कमिशन प्रमुख के लिए 10 लाख, पोलित ब्यूरो सदस्य के लिए 7 लाख, स्टेट कमेटी सदस्य के लिए 3 लाख, पब्लिकेशन कमेटी के सदस्य के लिए 2 लाख, एरिया कमेटी सचिव के लिए 1.5 लाख, अन्य एरिया कमेटी सचिव के लिए 1 लाख, एलओसी कमांडर को समर्पण पर 50 हजार रुपए की राशि दी जाती है। वर्ष 2004 के बाद मुआवजा राशि नहीं बढ़ाई गई है।
इस बारे में प्रदेश के गृहमंत्री रामसेवक पैकरा कहते हैं कि “नक्सलवाद राष्ट्रीय मुद्दा है। इस पर व्यापकता से विचार किए जाने की जरूरत है। दूसरी महत्वपूर्ण बात है कि माओवादी हिंसा की काट विकास है। ऐसे में नक्सल प्रभावित सभी राज्यों को मिलबैठकर इस समस्या पर समग्र नीति बनाने की जरुरत है। जिसकी दिशा में काम शुरु हो चुका है। अलग-अलग राज्यों में माओवादियों को लेकर अलग-अलग नीति का होना भी परेशानी को बढ़ाने का ही काम कर रहा है। इसलिए केंद्र में अपनी सरकार आने पर हमारी कोशिश होगी कि नक्सलवाद को लेकर देश में एकीकृत नीति बनाने की दिशा में पहल हो”।
स्वामी अग्निवेश की राय इस बारे में अलहदा है। वे मानते हैं कि “यदि संविधान में उल्लेखित अधिकारों को सही तरीके से आदिवासियों तक पहुंचा दिया जाए तो इस समस्या का हल बगैर किसी कसरत के निकल आएगा। यदि नक्सल प्रभावित इलाकों में शांति चाहिए तो सबसे पहले जेलों में बंद निरपराध आदिवासियों को छोड़ना होगा। दूसरा ये कि पांचवी और छटी अनुसूची को लेकर जल्द निर्णय लेना होगा। ग्राम सभाओं को अधिकार देने होंगे। लेकिन दुर्भाग्य से छत्तीसगढ़ सरकार ने ऐसे कई मौके गवाएं हैं। जब वो आगे बढ़कर इस समस्या का जड़ से समाधान कर सकती थी। फिलहाल भी भाजपा की ऐसी कोई इच्छाशक्ति नहीं दिखती”।
नक्सलियों की रिहाई के लिए बनाई गई उच्च स्तरीय समिति की अध्यक्ष निर्मला बुच कहती हैं कि “हमने करीब 150 सिफारिशें की हैं। जिनमें जमानत के वक्त राज्य सरकार किसी प्रकार की आपत्ति नहीं लेगी। हमारी समिति की सिफारिश के कारण कई नक्सलियों को जमानत भी मिली है। हमने नक्सलियों के सभी मामलों की समीक्षा की है। हम लगातार बैठक कर रहे हैं। चुनाव शुरु होने के पहले भी हमने बैठक ली थी। चुनाव खत्म होते ही हमारी एक बैठक होनी है”। निर्मला बुच मध्यप्रदेश की मुख्य सचिव भी रह चुकी हैं। वर्ष 2012 में नक्सलियों ने तत्कालीन सुकमा कलेक्टर एलेक्स पॉल मेनन को अगवा कर लिया था। उन्हें छोड़ने के बदले नक्सलियों ने जेलों में बंद अपने साथियों की रिहाई मांगी थी। नक्सलियों की रिहाई की मांग पर बुच की अध्यक्षता में एक उच्च स्तरीय समिति बनाई थी। इसमें राज्य के मुख्य सचिव, प्रमुख सचिव गृह और डीजीपी को सदस्य बनाया गया था। निर्मला बुच सरकार की तरफ से नक्सलियों से मध्यस्थों से बात भी कर रही थीं।

बहरहाल, राय सबकी अपनी-अपनी हो सकती है। लेकिन सवाल ये है कि माओवादियों को लेकर देश की एकीकृत नीति क्या हो, जिससे उन्हें मुख्य धारा में जुड़ने के लिए प्रोत्साहित किया जा सके। इस दिशा में छत्तीसगढ़ ने देर से सही, लेकिन कदम को बढ़ा दिए हैं, लेकिन लगता है कि देश में भी नक्सल नीति को लेकर बड़े परिवर्तन होने का समय आ गया है। 

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