शनिवार, 24 मई 2014

NMDC के विरोध में आदिवासियों का मोर्चा




भारत का सबसे बड़ा लौह अयस्क उत्पादक और निर्यातक नेशनल मिनिरल डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन (एनएमडीसी) इन दिनों छत्तीसगढ़ में आदिवासियों के विरोध का सामना कर रहा है। प्रदेश के सर्वाधिक नक्सल प्रभावित जिले दंतेवाड़ा के किरंदुल और बचेली की लौह अयस्क खदानों ने इलाके के पर्यावरण को बुरी तरह प्रभावित किया है। खासकर इस इलाके के लोग लाल पानी पीने को मजबूर हैं। जिससे उनके मवेशी तो मर ही रहे हैं, वे भी कई घातक बीमारियों के शिकार हो रहे हैं। यही कारण है कि स्थानीय बाशिंदे एनएमडीसी का विरोध करने सड़कों पर उतर आए हैं। इस हफ्ते की शुरुआत में करीब ढाई हजार आदिवासियों ने रैली निकालकर NMDC के खिलाफ प्रदर्शन किया। 
हाथों में तख्तियां लिए करीब ढाई हजार आदिवासी महिला पुरुषों ने रविवार को एनएमडीसी के किरंदुल प्लांट की घेराबंदी कर दी। अपने लिए स्वच्छ पर्यावरण, रोजगार, स्वास्थ्य और शिक्षा मांग रहे आदिवासियों ने इलाके में बहुराष्ट्रीय कंपनियों के विस्तार को लेकर भी विरोध जताया। आदिवासियों को कोरापुट से लेकर बैलाडीला तक डल रही दोहरी रेल लाइन से भी ऐतराज है, क्योंकि उन्हें लगता है कि इससे उनका जीवन और दूभर हो जाएगा। दंतेवाड़ा के 55 गांवों के लोग NMDC का विरोध कर रहे हैं।
आंदोलन का नेतृत्व कर रहे रमेश सामू कहते हैं किअब हम अत्याचार नहीं सहेंगे। लौह अयस्क की अधिकता से लाल हुए पानी को पीकर हमारे बच्चे मौत के मुंह में जा रहे हैं। हमारे खेत फसल लेने के लायक नहीं रह गए। मवेशी दम तोड़ रहे हैं। रोजगार के नाम पर हमें केवल छला गया है। अब हम इस इलाके में नया खनन नहीं होने देंगे
ऐसा नहीं है कि एनएमडीसी का विरोध पहली बार हो रहा है। लेकिन यहां गौर करने लायक बात ये भी है कि ये विरोध उस वक्त फिर सुलगा है, जब नेशनल मिनिरल डवलपमेंट कॉर्पोरेशन (एनएमडीसी) को एक नई खदान बैलाडीला डिपोजिट 13’ में भी खनन के लिए फॉरेस्‍ट क्लियरेंस मिल गया है। अभी एनएमडीसी के पास कुल 14 खदानों में से चार यानि किंरदुल में डिपोजिट 14 और 11 सी एवं बचेली में डिपोजिट 5 और 10 सी-11ए में खनन की अनुमति है। पर्यावरण मंत्रालय की फॉरेस्‍ट एडवाइजरी कमेटी (FAC) की 29 और 30 अप्रैल 2014 को हुई एक अहम बैठक में NMDC को नई खदान के लिए फॉरेस्‍ट क्लियरेंस देने संबंधी निर्णय लिया गया है। इसके पहले मुख्यमंत्री रमन सिंह भी FAC को पत्र लिखकर बैलाडीला खदान की अनुमति देने का आग्रह कर चुके हैं। मुख्यमंत्री के पत्र में कहा गया था कि बैलाडीला की मदद से छत्‍तीसगढ़ के छोटे स्‍पांज आयरन एवं अन्‍य स्‍टील उद्योगों को आयरन ओर प्राप्‍त हो सकेगा। फिलहाल एनएमडीसी की मौजूदा खदानों से इन उद्योगों को अपनी जरूरत का सिर्फ 50 फीसदी आयरन ओर ही प्राप्‍त हो पा रहा है। आवश्‍यकतानुसार आयरन ओर की सप्‍लाई सुनिश्चित होने से राज्‍य में स्‍टील उत्‍पादन बढ़ाने में भी मदद मिल सकेगी। साथ ही नक्‍सल प्रभावित क्षेत्रों में लोगों को रोजगार के नए अवसर भी प्राप्‍त हो सकेंगे। एनएमडीसी के एक अधिकारी के मुताबिक बैलाडीला साइट 13 में करीब 300 मिलियन टन आयरन ओर का निक्षेप मौजूद है।
एनएमडीसी की खदानों से स्थानीय और राष्ट्रीय लौह उद्योगों की जरूरतें तो पूरी की जा रही हैं। लेकिन स्थानीय आदिवासियों के हितों की पूरी तरह अनदेखी कर दी गई है। लौह अयस्क की खदानों में खनन के कारण स्थानीय नदी-नालों का रंग लाल हो गया है। इस पानी से जहां स्थानीय लोगों को खेत खराब हो गए हैं। हालांकि एनएमडीसी में पर्यावरण प्रबंधन के तहत जल प्रदूषण को रोकन के लिए चेक डैम और टेलिंग डैम बनाए गए हैं। लेकिन इसके बावजूद माइनिंग एरिया के चारो तरफ का करीब 35 हजार हैक्टेयर क्षेत्र का पर्यावरण बुरी तरह प्रभावित हो चुका है। यह पूरा इलाका वन रहित हो गया है। इस इलाके के करीब 100 किलोमीटर के विस्तार में बहने वाली शंखिनी और डंकिनी नदियां लाल दलदल वाले क्षेत्रों में बदल गई हैं। सैंकडों गांवों का पानी प्रदूषित हो गया है। साथ ही सिंचाई की सुविधा भी छीन गई है।
एनएमडीसी किरंदुल के डायरेक्टर प्रोडक्शन वी के सतपथी तहलका से कहते हैं कि हम अपनी क्षमताओं में रह कर जितना कर सकते हैं, उतना कर रहे हैं। लोगों की मांग हैं कि उनके इलाके का विकास हो, उन्हें रोजगार मिले, चिकित्सा सुविधा और शिक्षा मिल सके। ये हमारा काम नहीं, राज्य सरकार का है। लेकिन अपने सामाजिक सरोकारों के तहत में ये सामुदायिक सुविधाएं रहवासियों को उपलब्ध करवा रहे हैं। ये राज्य सरकार की जिम्मेदारी है कि वो लोगों को बेहतर जीवन उपलब्ध करवाए
दंतेवाड़ा पुलिस महानिरीक्षक नरेंद्र खरे कहते हैं कि ग्रामीणों ने प्रशासन से अनुमित लेकर रैली निकाली थी। उनकी मांगे पानी, रोजगार और मुआवाजे के संबंध में थी। हालांकि रैली के दौरान कोई अशांति प्रिय घटना नहीं हुई। गांववालें शांतिपूर्वक अपना प्रदर्शन कर रहे हैं
दंतेवाड़ा जिले की अपनी खदानों से NMDC प्रतिदिन करीब 60,000 टन अयस्क का उत्पादन करती है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार भारत के कुल कोयला और लौह अयस्क भंडार का पांचवां हिस्सा छत्तीसगढ़ में है। दंतेवाड़ा में बैलाडिला की पहाडियों में देश के सबसे अच्छे लौह अयस्क की खदानें है। यहां 14 खदानों में 1.2 अरब टन इस्पात का भंडार है, जिसमें इस्पात की मात्रा 66 फीसदी है।

नक्सलियों का गढ़ कहे जाने वाले इस क्षेत्र में एनएमडीसी 1960 से काम कर रही है। सार्वजनिक क्षेत्र की इस कंपनी के पास 788 एकड़ जमीन है। लेकिन इसकी खदानों ने बचेली और किरंदुल के आदिवासियों का जीना मुहाल कर दिया है। यही वो दो इलाके हैं, जहां नक्सली सबसे ज्यादा उत्पात मचाते हैं। ऐसे में स्थानीय आदिवासियों की स्थिति दो पाटों के बीच फंसने जैसी हो गई है। 
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