बुधवार, 29 अक्टूबर 2014

मानव-हाथी संघर्षः राज्य सरकार बनी मूक दर्शक

बहुत साल पहले बॉलीवुड के एक फिल्म आई थी, हाथी मेरे साथी। इस मूवी में नायक और हाथी की दोस्ती ने सिनेमाहाल में बैठे दर्शक को खूब रुलाया, गुदगुदाया और प्रेरित किया था कि कैसे एक वन्य प्राणी भी इंसान का अच्छा दोस्त हो सकता है। लेकिन छत्तीसगढ़ में इन दिनों बिलकुल इसके उलट स्थिति बन रही है।

छत्तीसगढ़ में 250 से अधिक हाथी जंगलों में विचरण कर रहे हैं। इनमें से ज्यादातर हाथी भोजन की तलाश में गावों की तरफ रुख करते हैं और परिणामस्वरूप हाथियों और मानव के बीच द्वंद्व की स्थिति निर्मित होती है। प्रदेश में एक साल के भीतर करीब 23 लोगों की जान हाथियों ने ली है। ऐसा नहीं है कि केवल मानव ही मर रहे हैं, इस संघर्ष में हाथियों की जान भी जा रही है। लेकिन राज्य सरकार के कानों में जूं तक नहीं रेंग रही है।
पर्यावरण के क्षेत्र में काम कर रही अंतर्राष्ट्रीय संस्था ग्रीनपीस इंडिया ने हाल ही में एक रिपोर्ट जारी की है। इस रिपोर्ट में दावा किया गया है कि छत्तीसगढ़ में मानव-हाथी संघर्ष कई गुना बढ़ गया है। इतना ही नहीं, ग्रीनपीस का आरोप भी है कि हाथियों के विचरण वाले इलाकों में फैले कोल ब्लॉकों की लालच में जानबूझकर मानव-हाथी संघर्ष को बढ़ावा दिया जा रहा है, ताकि उस इलाके से हाथी और रहने वाले लोग, दोनों एक-दूसरे के डर से भाग जाएं
ग्रीनपीस की हालिया रिपोर्ट एलिफेंट इन द रूम में छत्तीसगढ़ के चार वन प्रभागों दक्षिण सरगुजा, कटघोरा, कोरबा और धर्मजयगढ़ में मानव हाथी संघर्ष का अध्ययन किया गया है। इन चारों इलाकों में दो कोल ब्लॉक हसदेव अरण्य और मंडरायगढ़ मौजूद है। कोल ब्लॉक की लालच में स्थानीय लोगों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के विरोध और चेतावनी के बावजूद राज्य सरकार ने लेमरू हाथी रिजर्व को अधिसूचित करने के बजाए ठंडे बस्ते में डाल दिया। लेमरू हाथी रिजर्व राज्य सरकार की एक महती योजना थी, जिसके द्वारा हाथियों के सरंक्षण और संवर्धन की योजना बनाई गई थी। राज्य सरकार के इस कदम के बाद यह कहा जाने लगा कि अफसर हाथियों को बचाने के बजाए जंगलों में पड़ने वाले कोल ब्लाक के खनन के लिए अधिक उत्सुक हैं।

दूसरी तरफ हालिया वर्षों में छत्तीसगढ़ में हाथियों की संख्या लगातार बढ़ है। ओडिशा और झारखंड में जंगलों की अंधाधुंध कटाई की वजह से 80 के दशक में हाथियों ने राज्य के जगंलों की तरफ पलायन शुरु किया था। यही कारण रहा कि मानव-हाथी संघर्ष बढ़ने से मानव मौत, जानवरों और संपत्ति को नुकसान पंहुचने लगा। पिछले पांच वर्षों में हाथियों के हमले में मरने वालों की संख्या 8 गुनी बढ़ गई। ग्रीनपीस की रिपोर्ट में भी दावा किया गया है कि साल 2005 के बाद प्रति साल कम से कम 25 लोगों की औसत मृत्यु सरकारी दस्तावेजों में दर्ज की गई है। 
ऐसा नहीं है कि नुकसान केवल मानव का हो रहा है। साल 2005 से 2013 के बीच छत्तीसगढ़ में 14 हाथियों की भी बिजली के झटके खाने से मौत हो गई है। इस पूरी अवधि में मानव-हाथी संघर्ष की वजह से 198 लोगों की मौत हुई। राज्य में 2004 से 2014 के बीच संपत्ति नुकसान की भी 8,657 और फसल नुकसान की 99,152 घटनाएं दर्ज की गईं। इस पूरी अवधि में मानव-हाथी संघर्ष की वजह से 2,140.20 लाख की राशि भी मुआवजे के तौर पर बांटी गई।
यह भी एक संयोग ही है कि जिन इलाकों में उक्त घटनाएं दर्ज की गई हैं, सरकार उन्हीं इलाकों के कोल ब्लाकों में खनन करने की इच्छुक है। इससे जान-माल का नुकसान बढ़ने की आशंका गहरा गई है।
ग्रीन पीस के कैंपेनर और रिपोर्ट के लेखक नंदीकेश शिवलिंगम ने  बताया कि कोल ब्लाक के एरिया में हाथियों की मौजूदगी और कोरबा व धर्मजयगढ़ में काम कर रहे पर्यावरण कार्यकर्ताओं की चेतावनी और सलाह के बावजूद राज्य सरकार संभवतः खनन के कारण ही प्रस्तावित लेमरू हाथी रिजर्व के प्रस्ताव से पीछे हट गई है। शिवलिंगम कहते हैं कि यह जंगल ना सिर्फ हाथियों के लिए बल्कि भालू, तेंदुओं और संभवतः बाघों का भी घर है। लेकिन विडंबना यह है कि केंद्र से लेमरू हाथी रिजर्व के लिए 2007 में हरी झंडी मिलने के बावजूद राज्य सरकार ने इसे रद्द कर दिया।
छत्तीसगढ़ में चल रहे मानव-हाथी संघर्ष पर अतंर्राष्ट्रीय गोल्डमैन पर्यावरण पुरस्कार प्राप्त सामाजिक कार्यकर्ता रमेश अग्रवाल कहते हैं कि राज्य सरकार द्वारा इन जंगलों से दूर हाथियों के लिए सुरक्षित क्षेत्र बनाने के लिए प्रस्ताव इस समस्या का हल नहीं है। हाथियों ने छत्तीसगढ़ के जंगलों में रहना और प्रजनन करना शुरु कर दिया है। राज्य के लोगों और वन जीवन की सुरक्षा के लिए एक सक्षम रणनीति की जरूरत है।
छत्तीसगढ़ में यह बहस तब शुरु हुई है, जब सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला देते हुए 214 कोल ब्लाक के आवंटन को अवैध घोषित कर दिया है। इसमें छत्तीसगढ़ के कोल ब्लाक भी शामिल हैं। हालिया फैसले से भारतीय जंगलों को बचाने की कोशिश कर रह कार्यकर्ताओं में खुशी है। शिवलिंगम भी कहते हैं कि सरकार को गलत को सही करने का एक मौका मिला है। अब हम केंद्र से मांग कर रह हैं कि वो जंगल क्षेत्र के भीतर स्थित कोल ब्लाकों की नीलामी से बचे और एक स्वंतत्र समिति का गठन करे, जो राज्य में हाथियों की गतिविधियों का अध्ययन करके उनके प्रवासी मार्ग और मानव-वन्यजीव संघर्ष के प्रबंधन के लिए उचित व आवश्यक सुझाव दे
दूसरी तरफ वन विभाग के अफसर मुआवजा बांटकर अपने कर्त्तव्यों की इतिश्री मान लेते हैं। राज्य सरकार ने अलग-अलग मुआवजा तय कर रखा है। इसमें हिंसक वन्यजीवों से जनहानि होने पर 3 लाख, स्थाई अपंगता होने पर 1.5 लाख, साधारण घायल होने पर 40 हजार, पशु हानि होने पर 20 हजार की राशि के मुआवजे का प्रावधान किया है। 
हाथियों की मौत का क्या?
मनुष्यों को तो राज्य सरकार मुआवजा बांटकर चुप करवा रही है। लेकिन मरने वाले हाथियों की क्षतिपूर्ति के बारे में राज्य सरकार के पास कोई एक्शन प्लान नहीं है। उलटे हाथियों को मारने के लिए (तथाकथित रूप से गांव में आने से रोकने के लिए) वन विभाग ने सोलर पॉवर फेंसिंग की है। ग्रामीण भी हाथियों को मारने के लिए करंट का इस्तेमाल कर रहे हैं। 2014-15 में अब तक चार हाथियों की मौत हो चुकी है। इसमें दो नर और दो मादा शामिल हैं। 




गुरुवार, 16 अक्टूबर 2014

छग भी देगा स्मार्ट सिटी

भले ही छत्तीसगढ़ सरकार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सपने को साकार करने की दिशा में उत्साह से काम में जुट गई है। लेकिन यहां कुछ जायज से सवाल उठना लाजिमी है। विश्व के अन्य कई देशों में भी स्मार्ट सिटी की अवधारणा पर काम हो रहा है। ऐसे में भारत के लिहाज से स्मार्ट शहर की अवधारणा कैसी होनी चाहिए? खासकर मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, ओडिसा और झारखंड जैसे राज्यों में प्रस्तावित स्मार्ट शहर कहीं मध्यपवर्ग और निम्न आय वर्ग को और पीछे ना धकेंल दे, इस बात का भी ध्यान रखना हो। सवाल यही खड़ा होता है कि क्या विदेशी सपनों को उधार लेने से ही हमारे शहरों का उद्धार हो जाएगा या फिर हमें अपनी हकीकत को ध्यान में रखते हुए ऐसे विकास की रणनीति तय करनी होगी, जिसका उद्देश्य समावेशी हो। शहरों के बसने और उनके बढ़ने का अपना मॉडल रहा है, लेकिन पुराने शहरों से दूर नए शहर बसाने की योजना कितनी कारगर साबित होगी, इसका जवाब तो भविष्य के गर्भ में ही छुपा है।
इसी चिंता को जताते हुए छत्तीसगढ़ में काम कर रहे ऑक्सफेम के कार्यक्रम अधिकारी विजेंयद्र अजनबी कहते हैं कि स्मार्ट सिटी की कोई सर्वसम्मत परिभाषा नहीं है। मोटे तौर पर बढ़ते शहरीकरण की चुनौती से निपटने के लिए ऐसे शहर बसाने की योजना अस्तित्व में आई, जहां नवीनतम तकनीक का इस्तेमाल करते हुए पर्यावरण सम्मत मॉडल का विकास हो। इन शहरों में प्राकृतिक संसाधनों पर न्यूनतम बोझ होगा, नागरिक सेवाएं उपलब्ध कराने की सुचारू व्यवस्था होगी, प्रशासन कसा हुआ होगा और जीवन स्तर बेहतर होगा। नए शहर विकसित करने से आबादी के बोझ तले दबे जा रहे शहरों का बोझ भी कम होगा। लेकिन शहरों को बसाने की होड़ में हम कहीं स्लम्स को बढ़ावा तो नहीं दे रहे हैं। नए शहर बसाने की होड़ में गांवों को गंदी बस्तियों में तब्दील किया जा रहा है। इसका सबसे अच्छा उदाहरण भी नए रायपुर में देखने को मिल सकता है। शहर के विकास के बीच गांव इस तरह फंस गए हैं कि उनकी जल निकासी, खुली आबोहवा और जीवनयापन को तथाकथिक विकास ने अवरूद्ध कर दिया है। अब वे गांव से गंदी बस्तियों में तब्दील हो गए हैं। लोगों के पारंपरिक जीवनयापन के तरीके भी छीन लिए गए हैं, कभी खेतों में काम करने वाले लोग अब नए विकसित होते शहरों के घरों में झाडू बर्तन का काम करने को मजबूर हैं
देश को संभवतः पहली स्मार्ट सिटी देने जा रहे छत्तीसगढ़ के मामले में ध्यान रखने वाली बात ये भी है कि यहां की राज्य सरकार के पास एक शहर बसाने का अपना अनुभव भी है। राज्य सरकार अपने बलबूते पर कमल विहार जैसी टाउनशिप भी बना रही है। अकेले रायपुर विकास प्राधिकरण ने 8 टाउन डेवलपमेंट स्कीम बनाई है। 2022 तक रायपुर में होने वाली आबादी को ध्यान में रखकर बनाई गई इन योजनाओं को कमल विहार नाम दिया गया है। इसका कुल एरिया 14 हजार एकड़ है, यानि 8 कमल विहार 14 हजार एकड़ जमीन को अधिग्रहित करने के बाद बन पाएंगे। पहला कमल विहार रायपुर के बोरियाखुर्द, मठपुरैना और डूंडा इलाके की 1600 एकड़ जमीन पर बनाया जा रहा है। प्रदेश में पुराने रायपुर से 25 किलोमीटर की दूरी पर राज्य सरकार ने कई दर्जन गांवों की करीब 20 हजार एकड़ जमीन लेकर को मिलाकर नई राजधानी यानि नया रायपुर का निर्माण कर चुकी है। छत्तीसगढ़ के नए रायपुर की तारीफ खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ट्विटर के जरिए कर चुके हैं। इतना ही नहीं तालिबानी आतंकियों की वजह से पूरी तरह से बर्बाद हो चुकी अफगानिस्तान की राजधानी काबुल को नया रायपुर की तर्ज पर तैयार करने का प्लान बन रहा है। काबुल मेट्रोपोलिटन एरिया डेवलपमेंट ने नया रायपुर विकास प्राधिकरण से इसमें मदद मांगी है। काबुल में नया शहर बसाने का जिम्मा लेने वाली कंपनी जापान इंटरनेशनल को-ऑपरेशन एजेंसी ने पूरी दुनिया में बसाए गए नए शहरों के अध्ययन के बाद नया रायपुर के प्लान को सबसे सटीक पाया।
नया रायपुर विकास प्राधिकरण के सीईओ अमित कटारिया कहते हैं कि रायपुर में बनने वाली स्मार्ट सिटी को केंद्र सरकार ने बजट में शामिल कर लिया है। नया रायपुर पहले ही इसी तर्ज पर डिवेलप हो रहा है, अब पूरा रायपुर इसमें शामिल होगा।
हालांकि देश के पर्यावरणविद् 100 स्मार्ट सिटी को लेकर ज्यादा खुश नजर नहीं आ रहे हैं। मशहूर पर्यावरणविद् सुनीता नारायण अपने एक लेख के जरिए कहती हैं कि हम दूसरा शंघाई या दूसरा न्यूयार्क नहीं बसा सकते। मगर हम दूसरा इंदौर, मुबंई या गाजियाबाद बसा सकते हैं। जहां आवास, साफ पेयजल, सार्वजनिक परिवहन, कचरा निपटान की कारगर व्यवस्था हो। दूसरे शब्दों में कहें तो हम सबके लिए कल्याण और कुछ के लिए संपन्नता की व्यवस्ता कर सकते हैं। भारतीय शहर आज गंभीर संकट में है। यह संकट वित्तीय भी और योजनागत भी। इससे बढ़कर यह ऐसी मानसिकता का संकट है, जो शहरों की सडांध की असलियत और भयावहता को स्वीकारने को तैयार नहीं है
लेकिन इन सबके परे मैकिंसे ग्लोबल इंस्टीट्यूट (एमजीआई) की एक रिपोर्ट पर कर गौर करें तो तो लगता है कि देश ये स्मार्ट शहर बसाने का निर्णय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की दूरदर्शिता भी साबित हो सकता है। रिपोर्ट के मुताबिक अगले पंद्रह बरसों में आर्थिक गतिविधियों के केंद्र पश्चिम के विकसित देशों के शहर नहीं रह जाएंगे, बल्कि विकासशील देशों के नगरों का दबदबा होगा। मैकिंसे ग्लोबल इंस्टीट्यूट (एमजीआई) ने अरबन व‌र्ल्ड-मैपिंग इकोनॉमिक पावर ऑफ सिटीज रिपोर्ट में यह दावा किया है। एमजीआई ग्लोबल प्रबंधन परामर्श कंपनी मैकिंसे एंड कंपनी की व्यापार व आर्थिक शोध इकाई है। इस रिपोर्ट के मुताबिक, वर्ष 2025 में वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के मामले में विकासशील देशों के शहर आगे रहेंगे। फिलहाल, विश्व के कुल आर्थिक उत्पादन या जीडीपी में 600 शहरों का योगदान लगभग 60 फीसदी है। ये शहर मुख्य रूप से उत्तरी अमेरिका और यूरोप के विकसित देशों के हैं. रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्ष 2025 में नगरों की संख्या और ग्लोबल जीडीपी में उनके योगदान का अनुपात यही रहेगा, पर इसमें विकासशील देशों के 136 नए शहर शामिल हो जाएंगे। इनमें चीन के 100 और भारत के सूरत, हैदराबाद जैसे 13 शहर होंगे। दिल्ली, चेन्नई व मुंबई इस सूची में और ऊपरी पायदान पर चढ़ जाएंगे। वहीं, अगले 15 वर्षों में विकसित देशों के एक तिहाई शहर इस सूची से बाहर हो जाएंगे। इन 600 शहरों में वर्ष 2025 तक करीब 31 करोड़ और लोग जुड़ जाएंगे।
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शहर, जो पहले से स्मार्ट हैं
भारत में कई शहरों ने सुचारू रूप में नागरिक सेवाएं प्रधान करने के लिए स्मार्ट टेक्नोलॉजी का उपयोग करना शुरु कर दिया है। इनमें हैदराबाद, बैंगलुरू, सूरत, मंगलौर, दिल्ली, मुंबई, चैन्नई, पूणे, गुडगांव, चंडीगढ़, नोएडा, कानपुर, कोयंबतूर, जमशेदपुर शामिल हैं। यहां मेट्रो रैल उन्नत संचार व्यवस्था, उच्च तकनीक वाले ट्रैफिक सिस्टम, कचरा व साफ सफाई मैनेजमेंट के लिए जीपीआरएस की मदद, स्मार्ट मीटर, पानी की गुणवत्ता पर नजर रखने के लिए ऑन लाइन व्यवस्था जैसी सुविधाएं अपनाई जा रही हैं।
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विश्व के स्मार्ट शहर
दुनिया भर में कई छोटे-बड़े शहरों को स्मार्ट बनाने की दिशा में अपने-अपने स्तर पर काम किए जा रहे हैं। इनमे प्रमुखता से स्कॉटहोम, कैलिफोर्निया, रियो डि जेनेरो, सिंगापुर, पेरिस, साओ पाउलो (ब्राजील), वेंकूवर (कनाडा), मसदर सिटी (संयुक्त अरब अमीरात) के नाम लिए जाते हैं। इन्हीं शहरों के मॉडल को दुनिया के दूसरे देशों ने भी अपनाने की कोशिश की है। ये ऐसे स्मार्ट शहर हैं, जिन्होंने नई तकनीक को अपनाने के साथ ही पर्यावरण का भी विशेष ख्याल रखा है।
सिंगापुर-यह केवल अत्याधुनिक शॉपिंग डेस्टिनेशन ही नहीं है, बल्कि पर्यावरण और ऊर्जा सरंक्षण के क्षेत्र में भी इसने अलग मूल्य स्थापित किए हैं। 54 लाख आबादी वाले इस विशाल शहर में हरियाली के दर्शन भी सरल सुलभ हैं।
मसदर सिटी-संयुक्त अरब अमीरात में अबू धाबी के पास विकसित किया गया ये शहर विश्व भर के नगर नियोजकों का ध्यान खींच रहा है। यह शहर पूरी तरह सौर ऊर्जा व अन्य नवीकरण ऊर्जा स्त्रोतों द्वारा संचालित होगा। इसका निर्माण 2008 में शुरु हुआ था। इसका पहला चरण 2015 में पूरा होने की उम्मीद है।

वैंकूवर-कनाडा का यह महानगर डिजीटल गवर्नेंस की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। साथ ही इसने 2020 तक विश्व का सबसे हरा भरा शहर बनने का संकल्प रखा है। यहां बिजली से चलने वाले वाहनों को बड़े पैमाने पर प्रोत्साहित किया जा रहा है। 

जवानों का टूटता मनोबल

जगदलपुर से निकलकर सड़कविहीन रास्तों से होते हुए जब आप 56 किलोमीटर का रास्ता तय करते हुए तोंगपाल पुलिस थाने पहुंचते हैं तो इस बात का अंदाजा सहज ही हो जाता है कि हम यहां अपनी खुद की रिस्क पर हैं। यहां मिलने वाले सीआरपीएफ के जवान हों या छत्तीसगढ़ पुलिस के सिपाही, सबके चेहरों पर एक सा तनाव आपको अहसास दिलाता है कि महसूस की जा रही शांति केवल छलावा भर है। कभी भी-कुछ भी हो सकता है। खैर बस्तर को कवर करने वाले पत्रकारों के लिए इसमें नया कुछ भी नहीं है, वे ऐसी परिस्थितियों का हमेशा सामना करते रहते हैं। फिलहाल बात सुकमा जिले के तहत आने वाले तोंगपाल की, जो केंद्रीय सुरक्षा बल (सीआरपीएफ) के 16 जवानों और एक पुलिस कांस्टेबल के निलंबन के कारण चर्चा में है।
सीआरपीएफ ने कड़ी अनुशासनात्मक कार्रवाई करते हुए अपने 16 जवानों को निलंबित कर दिया है। वहीं एक पुलिस के सिपाही को भी सीआरपीएफ की रिपोर्ट के आधार पर निलंबित किया गया है। निलंबित जवानों में से 13 कांस्टेबल रैंक के, जबकि चार अन्य इंस्पेक्टर व सहायक सब-इंस्पेक्टर रैंक के अधिकारी हैं। इन 17 जवानों पर आरोप है कि ये इस साल के शुरूआत में नक्सलियों के साथ हुई मुठभेड़ में अपने साथियों को मदद देने के बजाए मैदान छोड़कर भाग खड़े हुए थे। इस मुठभेड़ में एक नागरिक समेत कुल 16 लोगों की मौत हुई थी। जिनमें सीआरपीएफ के 11, पुलिस के चार जवान मारे गए थे। सीआरपीएफ के आरोप के मुताबिक छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले में इस साल 11 मार्च को दरभा थाना क्षेत्र में तैनात सीआरपीएफ की 80वीं बटालियन के जवान ग्राम टहकवाड़ा के लिए रोड़ ओपनिंग पार्टी के लिए रवाना किए गए थे। इस 46 सदस्यीय टुकड़ी के 20 जवान घात लगाए नक्सलियों के एंबुश में फंस गए थे। इस हमले में विक्रम निषाद नामक एक ग्रामीण भी मारा गया था, जो घटना के वक्त अपनी मोटरसाइकिल से गुजर रहा था। इस खूनी मुठभेड़ के तुरंत बाद कोर्ट ऑफ इन्क्वायरी बैठा दी गई थी। इसकी जांच में सामने आया है कि नक्सलियों द्वारा घात लगाकर किए गए इस हमले में सीआरपीएफ जवानों की आगे चल रही टुकड़ी फंस गई थी। जबकि पीछे आ रहे 17 जवान ऐसी विषम परिस्थिति में अपने साथियों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर लोहा लेने के बजाय वहां से जान बचाकर भाग खड़े हुए।
सीआरपीएफ निदेशक जनरल दिलीप त्रिवेदी का कहना है कि शुरुआती जांच में दोषी मिले इन जवानों को छत्तीसगढ़ के आइजी ने निलंबित कर दिया है। पूरी जांच तीन महीने के भीतर पूरी कर ली जाएगी। एक दशक से ज्यादा समय से नक्सल प्रभावित इलाकों में नक्सलियों से मोर्चा संभाल रही सीआरपीएफ की ओर से अपने जवानों के खिलाफ यह दुर्लभ अनुशासनात्मक कार्रवाई है
सीआरपीएफ के अधिकारियों का कहना है कि जांच में पता चला है कि अगर इन जवानों ने मुंहतोड़ जवाब दिया होता तो कई जानें बचाई जा सकती थीं और करीब 200 नक्सलियों में से कई ढेर भी किए जा सकते थे। करीब तीन घंटे तक चली इस मुठभेड़ में नक्सली शहीद जवानों से बड़ी संख्या में हथियार लूट ले गए थे।
ये तो हुए सीआरपीएफ के आरोप और अब तक की कार्यवाही, लेकिन इस एक प्रकरण का दूसरा पहलू भी है, जिसे नज़रअंदाज किया जा रहा है। दरअसल छत्तीसगढ़ में CRPF जवानों के निलंबन का यह प्रकरण कई गंभीर सवाल भी खड़े कर रहा है, जिस पर गौर किया जाना बेहद जरूरी है। पहला सवाल तो यह ही कि क्या सर पर कफन बांधकर नक्सल इलाकों में काम कर रहे जवानों का मनोबल टूट रहा है, दूसरा सवाल यह कि आखिर इन जवानों की मानसिक व भौतिक परिस्थितियों पर क्या पुनर्विचार नहीं किया जाना चाहिए। इस घटना ने छत्तीसगढ़ में एक नई बहस छेड़ दी है।
हालांकि तोंगपाल पुलिस थाने के एसआई शिशुपाल सिन्हा ने तहलका को बताया कि जिस दिन घटना हुई, वह उस दिन शासकीय कार्य से कहीं बाहर गए हुए थे, लेकिन मौके पर मौजूद लोग बताते हैं कि जवान भागे नहीं थे, बल्कि वे भी फायरिंग में फंस गए थे। यही कारण था कि वे अपने साथी जवानों की मदद नहीं कर पाए थे
पुलिस मुख्यालय ने इस पूरे विवाद से दूरी बना ही है। अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक मुकेश गुप्ता कहते हैं कि सीआरपीएफ के मामले में वे क्या बोल सकते हैं। यदि उन्होंने कार्रवाई की है, तो सही ही की होगी।
पुलिस मुख्यालय में पदस्थ एक अन्य उच्च पदस्थ अफसर भी मानते हैं कि जब जवानों को विशेष साहस दिखाने पर कई तरह से उपकृत किया जाता है, उन्हें आउट ऑफ टर्म प्रमोशन दिया जाता है तो गलती होने पर सजा क्यों नहीं दी जा सकती। वे कहते हैं कि हमारी फोर्स बेहद विपरीत परिस्थितियों में काम करती है, वहां जवानों की संख्या से ज्यादा उनका साहस मायने रखता है। सबको साथ मिलकर काम करना होता है, तभी सकारात्मक परीणामों तक पहुंचा जा सकता है। अब अगर ऐसे में टीमवर्क ही ना रहे, टीम भावना ही ना रहे तो कैसे काम चलेगा। कोई भी जवान कैसे अपने साथियों पर भरोसा कर पाएगा। जहां तक मनःस्थिति का सवाल है तो मौत से किसे डर नहीं लगता, लेकिन हमारे जवान अपनी जिम्मेदारी को समझते हुए मौत से भी दो-दो हाथ करते हैं। अधिकारी कहते हैं, देखिए लीडरशिप की अवधारणा केवल पुलिस या सुरक्षा बलों में होती है, किसी और सरकारी महकमे में नहीं। ये लीडरशिप यही है कि यदि आपके अफसर ने हुकुम दिया कि कूदो मतलब कूदो, अब यदि जवान अपना दिमाग लगाने लग जाए तो वो कूदेगा ही नहीं, ऑर्डर ही नहीं मानेगा
लेकिन उनके ही विभाग का तोंगपाल थाने में ही पदस्थ एक पुलिसकर्मी ने नाम ना छापने की शर्त पर कहता है कि जवानों की स्थिति को समझे बगैर उनपर गलत कार्रवाई की गई है। अगर जवानों को कायरता ही दिखानी होती तो वे पहले ही ड्यूटी से मना कर देते। बिलकुल विपरीत परिस्थिति में हर संघर्ष करने वाले जवान कायर नहीं है। वे बरसात में भी हर एंटी नक्सल ऑपरेशन में भाग लेते रहे हैं। आप देखिए ना जवानों को, वे कैसे रह रहे हैं। कई कैम्प तो दुनिया से कटे हुए हैं, उन्हें हैलीकॉप्टर के जरिए भोजन और दवाईयां भेजी जाती हैं। ना उनके फोन में नेटवर्क है, ना ही कोई दूसरी सुविधा। कई बात तो छुट्टी मिलने के बाद जवानों को जगदलपुर आने में ही दो से तीन दिन लग जाते हैं, रायपुर पहुंचते-पहुंचते पूरा हफ्ता खराब हो जाता है, बताइए कितने दबाव में काम कर रहे हैं लोग, लेकिन यह किसी को नहीं दिखाई दे रहा है। चाहे पुलिसवाला हो या सीआरपीएफवाला, दोनों ही जटिल परिस्थितियों में अपनी सेवाएं दे रहे हैं
पुलिसकर्मी की बात का समर्थन करते हुए तोंगपाल (सुकमा जिला) में ही काम करने वाले स्थानीय पत्रकार संतोष तिवारी तहलका से कहते हैं कि यहां की परिस्थितियां तो आम आदमी के जीने के लायक भी नहीं है। ना सड़कें हैं, ना मोबाइल फोन में नेटवर्क है। हम जगदलपुर से केवल 56 किलोमीटर दूर बैठे हैं, लेकिन सड़कविहीन रास्ते के कारण जगदलपुर पहुंचने में ही दो से ढ़ाई घंटे लग जाते हैं। बस्तर के अंदरूनी इलाकों में कैम्प कर रहे सीआरपीएफ जवानों की हालत तो और भी बदतर है। उन्हें कभी कीटों (छोटे कीड़े) के प्रकोप का सामना करना पड़ रहा है तो कभी मलेरिया उनकी जान ले रहा है। जान जोखिम में डालकर तो वे काम कर ही रहे हैं, लेकिन ना तो उनके पास बातचीत की सुविधा है, ना ही बेहतर चिकित्सा व्यवस्था। रोज-रोज एक ही ऊबाऊ काम करके उनका मनोबल भी टूटता है।
इस वक्त पूरे छत्तीसगढ़ में सीआरपीएफ, आईटीबीपी जैसे सुरक्षा बलों की 36 बटालियन तैनात हैं। इनमें से 29 बटालियन अकेले बस्तर में लगाई गई हैं। एक बटालियन में 780 जवान होते हैं, लेकिन मोर्चे पर लड़ने के लिए 400 से 450 जवान ही मौजूद होते हैं। बस्तर में तैनात जवानों को नक्सलियों के इतर भी कई मुसीबतों का सामना करना पड़ता है। नक्सलियों से पहले मच्छरों से उनका मुकाबला होता है। छत्तीसगढ़ में मई से लेकर नंबवर तक मच्छरों का प्रकोप रहता है। खासकर बस्तर में अनगिनत लोग मलेरिया के कारण काल के गाल में समा जाते हैं। इस साल की जुलाई तक ही राज्य मलेरिया कार्यालय द्वारा इकट्ठे किए गए आंकड़ों पर गौर करें तो अकेले बस्तर मेंमलेरिया के 23 हजार 774 मलेरिया पीड़ित मरीज मिल चुके हैं। हर साल कई जवान भी मलेरिया के कारण मर जाते हैं, हालांकि मलेरिया से मरने वाले जवानों का अधिकृत आंकड़ा कहीं भी उपलब्ध नहीं है। मच्छरों के प्रकोप का अंदाजा आप इस बात से लगा सकते हैं कि इस साल अमेरिका की ब्यूरो ऑफ डिप्लोमेटिक सिक्योरिटी द्वारा अमेरिकी नागरिकों के लिए जारी यात्रा एडवायजरी में छत्तीसगढ़ ना जाने की सलाह दी है, इसका कारण नक्सली व मच्छर बताए गए हैं। एडवायरी में कहा गया है कि छत्तीसगढ़ में मलेरिया होना जानलेवा साबित हो सकता है। छत्तीसगढ़ में बस्तर एक ऐसा इलाका है, जहां फेल्सीफेरम मलेरिया ज्यादा फैलता है। इस मलेरिया में यदि सात दिनों के भीतर पीड़ित को सही दवा ना मिले, तो उसकी मौत निश्चित हो जाती है।
उसमान खान भी सुकमा जिले में आने वाले छिंदगढ़ जैसे घोर नक्सल प्रभावित इलाके के पत्रकार हैं। छिंदगढ़ तोंगपाल से भी 36 किलोमीटर अंदर है। खान कहते हैं कि मलेरिया भी जवानों का मनोबल तोड़ रहा है। इस वक्त तो यानि अगस्त-सितंबर को हमारे इलाके में मलेरिया का सबसे ज्यादा असर होता है। हर साल दर्जनों लोग दवाई के अभाव में मर जाते हैं। अभी भी कई जवान मलेरिया से जूझ रहे हैं। पिछले साल करीब डेढ़ दर्जन जवान केवल मलेरिया के कारण मौत के मुंह में चले गए थे
बस्तर में नक्सल मोर्चों पर तैनात जवानों के सामने कई परेशानियां हैं। जिन्हें उनके आला अधिकारी कितना समझते हैं, ये तो वे ही जानें, लेकिन कभी परिस्थितिवश उत्पन्न समस्याओं पर चर्चा होती नज़र नहीं आती। एंटी नक्सल ऑपरेशन की रणनीति बनाते वक्त भी राज्य सरकार के प्रतिनिधि और अफसर मलेरिया, मोबाइल नेटवर्क, जवानों को मनोवैज्ञानिक उपचार देने जैसे मुद्दों पर खास बात करते हुए नहीं दिखाई देते हैं। बहरहाल, तोंगपाल-दरभा प्रकरण को केंद्र में रखकर सीआरपीएफ और पुलिस के आला अफसरों को एक बार इन बिंदुओं पर भी जरूर गौर करना चाहिए।  


मोदी का नहीं हम सबका अभियान


प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वच्छ भारत अभियान का ऐलान कर उस हरेक वर्ग को राहत देने का काम किया है, जिसे रोजाना कहीं ना कहीं गंदगी से दो चार होना पड़ता है। स्वच्छ भारत अभियान का सबसे ज्यादा फायदा उस तबके को मिलेगा, जिसके पास साफ-सफाई की सुविधा भोगने के लिए जेब में मोटी रकम नहीं होती। यह अभियान गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करने वालों के साथ ही मध्यमवर्गीय और उच्च मध्यमवर्गीय लोगों के लिए संजीवनी का काम करेगा। हम सब जानते हैं कि भारतीयों की आम मानसिकता केवल अपने घर को चमकाने की रही है, घर में झाडू लगाकर कचरा हम सड़कों पर फेंक देते हैं। हम तब भी नहीं सुधरते, जब हम घरों से बाहर निकलते हैं तो हमारा ही फैलाया कचरा हमारा जीवन मुहाल सा कर देता है। सबसे ज्यादा कष्ट रेल में सफर करने के दौरान होता है, हिंदुस्तान में तकरीबन सात हजार स्टेशन हैं। रेलवे स्टेशन से लेकर डब्बों तक पसरी गंदगी से किसी नारकीय जीवन की भासना होने लगती है। यात्रा लंबी हो तो किसी सजा से कम नहीं लगती। लेकिन अब चूंकि खुद प्रधानमंत्री इस समस्या को समझ रहे हैं, संभवतः उन्होंने भी कई बार इस कष्ट का सामना किया होगा। मोदी आम भारतीय की मानसिकता को भी भलीभांति समझते हैं। इसलिए इस अभियान में हरेक आमों खास को शरीक होने को कहा गया है। एक जागरूक नागरिक के नाते इस अभियान में शामिल होते वक्त हमें भी यह याद रखना होगा कि देश में गंदगी से हुए संक्रमण के कारण बड़ी संख्या में बच्चे जन्म लेने के साथ ही मौत के मुंह में समा जाते हैं। प्रति वर्ष 20 लाख से अधिक बच्चे अपना पांचवां जन्म दिन नहीं मना पाते। अंतर्राष्ट्रीय चिकित्सा पत्रिका लांसेट में छपे लेख में दावा किया गया है कि हर साल भारत में दो लाख से ज्यादा मौतें मलेरिया की वजह से हो जाती हैं। स्वाभाविक हैं कि मलेरिया मच्छरों के काटने से होता है और मच्छर गंदगी के कारण ही पनपते हैं। ये तो केवल बानगी भर है, बीमारीजनित रोगों से मरने वालों की सालाना संख्या कई लाखों में होगी। आशा ही नहीं विश्वास भी है कि लोग इस अभियान के जरिए अपनी जिम्मेदारी समझेंगे और केवल एक दिन नहीं, बल्कि हमेशा अपने आसपास, अपने कार्यस्थल, सार्वजनिक स्थलों की साफ-सफाई का ख्याल रखकर एक उज्जवल, स्वच्छ, बीमारी रहित भारत का स्वप्न साकार करेंगे।


पीडीएस यानि "पंजीकृत डकैती सिस्टम"

जिस सार्वजनिक वितरण प्रणाली ने छत्तीसगढ़ सरकार को 2011 से लगातार साल दर साल राष्ट्रीय स्तर के पुरस्कार दिलवाए, वही योजना अब सरकार के गले ही हड्डी बनती नजर आ रही है। फिलहाल तो राज्य सरकार के पास इस बात का कोई जवाब नहीं है कि 56 लाख परिवारों के प्रदेश में 70 लाख राशन कार्ड कैसे जारी कर दिए गए? दूसरी तरफ राशन दुकान धारकों और खाद्य विभाग के कुछ अफसरों के कारनामों ने सरकार को परेशानी में डाल दिया है। इस पूरे मसले में तीसरा ट्विस्ट भी आ गया है, वह है राशनकार्ड फर्जीवाड़े में हो रही जगहंसाई के कारण बागी हुए खाद्य विभाग के निरीक्षक राज्य सरकार को ही हड़काने में लग गए हैं।
नरेश बाफना छत्तीसगढ़ पीडीएस संचालक संघ के अध्यक्ष हैं। इन दिनों बाफना छत्तीसगढ़ के खाद्य विभाग के खिलाफ एक लड़ाई लड़ रहे हैं। लड़ाई है गरीबों को दिए जाने वाले राशन की जमाखोरी और भ्रष्टाचार करने वाले राशन दुकानदारों और इन्हें प्रश्रय देने वाले खाद्य विभाग के अफसरों पर कार्रवाई करवाने के प्रयासों की..बाफना ने छत्तीसगढ़ के राज्यपाल को भी एक पत्र लिखा है और बताया है कि छत्तीसगढ़ में किस तरह सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत राशन दुकानदार और बरसों से एक ही जगह जमें कुछ खाद्य अधिकारी मिलकर भ्रष्टाचार कर रहे हैं। बाफना के पास कई दस्तावेज हैं, जो ये इस मिलीभगत का स्पष्ट संकेत देते हैं। बाफना की शिकायत से शुरुआत इसलिए क्योंकि मोटे तौर पर ये समझा जा सके कि जब राजधानी रायपुर में सरकार की नाक के नीचे खाद्य अफसर और राशन दुकानदार मिलकर इन कारनामों को अंजाम दे रहे हैं तो सुदूर बस्तर जैसे इलाकों का तो भगवान ही मालिक है।
राजभवन को भेजी शिकायत, जिसमें बाफना ने लोकायुक्त से जांच करवाने की मांग की है, का एक छोटा सा नमूना देखें तो पता चलता है कि गरीबों का पेट भरने की नेकनीयत से शुरु की गई योजना को खाद्य विभाग के कुछ अफसरों ने राजधानी रायपुर में ही मजाक बनाकर रख दिया है। रायपुर शहर में आईडी क्रमांक 441001176 से 441001198 तक उचित मूल्य की दुकाने नियमों का उल्लंघन कर आवंटित कर दी गईं। छत्तीसगढ़ लोकसेवा गांरटी अधिनियम 2011 के तहत खाद्य विभाग में प्रदर्शित सूचना में स्पष्ट उल्लेख है कि राशन दुकान आवंटन करने की प्रक्रिया के तहत प्रमुख समाचार पत्रों में विज्ञापन प्रदर्शित करना जरूरी है। लेकिन बाफना का दावा है कि ऐसा कोई विज्ञापन जारी ही नहीं किया गया। जब उन्होंने सूचना के अधिकार के तहत इसकी जानकारी विभाग से मांगी तो उन्हें असंतोषजनक जवाब दिया गया।  
बाफना की दूसरी शिकायत पर गौर करें तो सूबे के राशन दुकानदारों ने कोर पीडीएस योजना के बाद जमकर अनाज की कालाबाजारी की। वर्ष 2012 में शुरु हुई योजना में कोर पीडीएस के तहत राशन दुकानों में अन्नपूर्णा एटीएमलगाए गए हैं, जिसमें उपभोक्ता अपने स्मार्ट राशन कार्ड के जरिए खुद राशन निकाल सकता है। इस कम्प्यूटरीकृत व्यवस्था के पीछे सरकार की मंशा पीडीएस में पारदर्शिता लाने की थी, लेकिन भ्रष्ट राशन दुकानदारों ने इसे भी भ्रष्टाचार का जरिया बना लिया। कैसे? इसे 29-11-2013 को खाद्य अफसरों द्वारा एक राशनदुकान में हुई कार्रवाई से समझिए।
29 नंबवर 2013 को रायपुर की चलो चले सामुदायिक विकास समिति की उचित मूल्य की दुकान जिसका आईडी क्रमांक 441001116 है, पर खाद्य विभाग की एक जांच टीम ने छापामार कार्रवाई की। इस दौरान दुकान में 145.82 क्विंटल चावल और 1.31 क्विंटल मटर दाल अधिक पाया गया। इतना ही नहीं राशनदुकानों में 23 स्मार्ट राशन कार्ड भी पाए गए। नाम ना छापने की शर्त पर अधिकारियों ने बताया कि ये स्मार्ट राशन कार्ड उन उपभोक्ताओं के नाम पर ही बनाए गए थे, जिनके पास पुराने तरीके के राशनकार्ड थे, लेकिन राशव दुकानदार ने उन्हें नए कार्ड ना देकर खुद ही रख लिए थे। उपभोक्ताओं को वो पुराने राशन कार्ड के आधार पर ही राशन आवंटित कर रहा था, जबकि नए स्मार्ट राशनकार्ड से खुद राशन निकाल कर कालाबाजारी कर रहा था। ठीक ऐसा ही 29 मार्च 2013 को कार्रवाई के दौरान एक अन्य दुकान में भी पाया गया। छापा मारने वाली खाद्य निरीक्षक प्रतिभा राठिया अपने जांच प्रतिवेदन में लिखती हैं कि जिला लिपिक प्राथमिक सहकारी उपभोक्ता भंडार की दुकान (आईडी क्रमांक 441001136) में जांच के दौरान छह नग स्मार्ट कार्ड रखे पाए गए। पूछताछ करने पर दुकानदार ने अफसरों को बताया कि जिन उपभोक्ताओं के नए राशनकार्ड जारी हो गए हैं, उन्हें इसकी जानकारी ना देकर दुकानदार ने नए कार्ड अपने ही पास रख लिए थे। जांच प्रतिवेदन में अफसर ने यह माना है कि पुराने स्मार्ट कार्ड उपभोक्ताओं से लेकर खाद्य कार्यालय में जमा नहीं किया गया, बल्कि विक्रेता ने नए राशनकार्ड अपने ही पास रखकर फर्जी एंट्री कर लाभ कमाने के उद्देश्य से कालाबाजारी की गई है।
यहां सवाल ये भी उठता है कि खुद खाद्य विभाग ने नए स्मार्ट राशनकार्ड बन जाने के बाद पुराने राशन कार्ड जमा करवाने के लिए सख्ती क्यों नहीं बरती। क्यों राशनदुकानदारों की लापरवाही को बर्दाश्त किया जाता रहा। लेकिन इस विषय पर खाद्य अफसरों ने चुप्पी साध रखी है।
रायपुर की जिला खाद्य अधिकारी दयामणि मिंज कहती हैं कि हम वही करते हैं, जैसा हमे निर्देश होता है। खाद्य विभाग सारे काम सरकारी आदेशों के तहत ही करता है
खैर ये तो हुई राजभवन पहुंची बाफना की शिकायतों की चर्चा। लेकिन इन शिकायतों से परे भी छत्तीसगढ़ में पीडीएस को लेकर जो कुछ चल रहा है, उसे पढ़कर आपके पैरों के नीचे की जमीन ही खिसक जाएगी। चाणक्य के कहे इन शब्दों “The biggest sin for a King is the death of any of his subjects due to hunger” को अधिकृत रूप से अपना कर्मवाक्य बनाते हुए छत्तीसगढ़ खाद्य विभाग ने पिछले कुछ सालों में ऐसा करिश्मा रच डाला कि यदि चाणक्य कहीं से देख पा रहे होंगे तो उन्हें अपने कथन की नए सिरे से परिभाषा तय करना पड़ रही होगी। अपनी सार्वजनिक वितरण प्रणाली को The model system of India कहने वाले छत्तीसगढ़ में इन दिनों पीडीएस को लेकर ही भूचाल आया हुआ है। भूचाल भी ऐसा, जिसका केंद्र तो रायपुर है, लेकिन उसकी फ्रिक्वेंसी दिल्ली तक मापी जा रही है। इस पूरे मामले को समझने के लिए हमें उन आंकड़ों पर ध्यान देना होगा, जिनके बल पर पहले तो राज्य सरकार ढेर सारे पुरस्कार ले आई, फिर विधानसभा चुनाव की नैया भी पार कर ली, लेकिन जब उसने इन आंकडों के झंझट से मुक्ति पानी चाही, तो उसकी सारी कलई खुल गई।
चूंकि ये पूरा खेल ही आंकड़ों का है, इसलिए हम इसे वर्ष 2011 में हुई जनगणना के अंतिम आकंडों से समझना शुरु करते हैं। जनगणना के मुताबिक छत्तीसगढ़ की कुल आबादी 2 करोड़ 55 लाख, 45 हजार 198 है। जनगणना के आंकड़ो अनुसार ही प्रदेश में 56 लाख पचास हजार 724 परिवार रहते हैं। वर्ष 2011 में ही प्रदेश में संचालित दस हजार 882 राशन दुकानों से करीब 34 लाख 31 हजार परिवारों को केवल एक व दो रुपए किलो की दर से हर माह 35 किलो चावल व दो किलो निशुल्क नमक दिया जा रहा था। तब तक फिर भी सब ठीक था, बावजूद इसके की केंद्र सरकार और छत्तीसगढ़ सरकार के बीच गरीबों के आंकड़ों को लेकर हमेशा से ही मतभेद ही रहा। केंद्र सरकार जहां छत्तीसगढ़ की कुल आबादी में से 42.52 फीसदी लोगों को गरीब मानती रही, वहीं छत्तीसगढ़ सरकार 68 फीसदी परिवारों को गरीब मानकर उन्हें सस्ता खाद्यान्न उपलब्ध करवाती रही। यहां तक फिर भी सब निर्विरोध चल रहा था, लेकिन कहानी में असल पेंच आया 2012 में, जब राज्य सरकार ने छत्तीसगढ़ खाद्य एवं पोषण सुरक्षा अधिनियम लागू किया। उसके बाद 2012 से अक्टूबर 2013 तक धडल्ले से खाद्य सुरक्षा के नाम पर लोगों के राशन कार्ड बनाए गए। इतने बनाए गए कि छत्तीसगढ़ में बसने वाले कुल 56 लाख परिवारों के 70 लाख राशन कार्ड बना दिए गए। ये हम नहीं कह रहे, ये खुद प्रदेश के खाद्य मंत्री पुन्नूलाल मोहिले ने छत्तीसगढ़ विधानसभा के मानसून सत्र में एक सवाल के जवाब में कहा है। खाद्य मंत्री ये भी मान रहे हैं कि इनमें से लाखों राशन कार्ड फर्जी थे। यही कारण है कि जून 2014 में यानि सरकार के सत्ता में आने के बाद राशन कार्ड जांच अभियान शुरु किया गया। जिसमें अब तक तकरीबन 12 लाख राशन कार्ड निरस्त किए जा चुके हैं। अभी भी चार लाख राशन कार्डों का सत्यापन होना बाकी है यानि फर्जी राशन कार्ड की संख्या और बढ़ सकती है।
बहुजन समाज पार्टी के विधाय केशवचंद्रा के सवाल के जवाब में खाद्य मंत्री पून्नूलाल मोहिले ने सदन में बताया कि छत्तीसगढ़ खाद्य एवं पोषण सुरक्षा अधिनियम 2012 के तहत वर्ष 2013 में 48.15 लाख प्राथमिकता राशन कार्ड, 17.02 लाख अंत्योदय राशन कार्ड, 4.29 लाख सामान्य राशन कार्ड और 9 हजार 358 निशक्तजन राशनकार्ड जारी किए गए थे। जून 2014 में शुरु किए गए राशन कार्ड जांच अभियान में 13 जुलाई 2014 तक 48.94 लाख राशन कार्डधारक परिवार पात्र पाए गए हैं। 
फर्जी राशनकार्ड के रूप में कांग्रेस को भी सरकार के खिलाफ एक नया हथियार मिल चुका है। मरवाही के विधायक अमित जोगी का आरोप लगाते हैं कि वर्ष 2012 में मुख्यमंत्री रमन सिंह ने नई दिल्ली में योजना आयोग सामने एक प्रेजेंटेशन दिया था, उस समय प्रदेश में 34 लाख बीपीएल परिवार थे, लेकिन ऐन चुनाव के वक्त बीपीएल परिवारों की संख्या एकाएक 70 लाख हो गई। ये गंभीर प्रश्न है, इसका जवाब सरकार को देना ही होगा
जबकि मुख्यमंत्री रमन सिंह ने राशनकार्ड निरस्तीकरण को लेकर कहा है कि गरीबों के राशन पर अपात्र लोगों का कोई अधिकार नहीं बनता। यदि पात्रता रखने वाले किसी राशनकार्ड धारक का कार्ड निरस्त हो गया है, तो कलेक्टर के माध्यम से उसकी पूरी सुनवाई होगी। रमन सिंह ये भी कहते हैं कि राज्य में गरीबों के लिए सस्ते राशन की व्यवस्था कभी बंद नहीं होगा। वे याद दिलाना नहीं भूलते कि छत्तीसगढ़ देश का पहला ऐसा राज्य है, जिसने अपने यहां के गरीबों और जरूरतमंद परिवारों के लिए देश का पहला खाद्य सुरक्षा और पोषण सुरक्षा कानून बनाकर उन्हें भरपेट भोजन के लिए पर्याप्त अनाज हासिल करने का कानूनी अधिकार दिया है। यह अधिकार उनसे कोई नहीं छीन सकता
प्रदेश में निरस्त किए गए 12 लाख 1942 राशन कार्डों में से अधिकांश राशन कार्ड खाद्य सुरक्षा कानून बनने के बाद बनाए गए थे। इन पर अक्टूबर 2013 से खाद्यान्न वितरण शुरु हुआ था। जून 2014 तक यानि नौ माह में इन कार्डों के जरिए अपात्र लोगों ने भी चार लाख 5 हजार 655 क्विंटल खाद्यान्न और 2403882 लीटर केरोसीन हजम कर लिया। निरस्त राशनकार्डों में 60 फीसदी प्राथमिकता वाले कार्ड (प्रतिमाह 25 किलो चावल, दस किलो गेंहू, शक्कर, दाल इत्यादी मिलता है), 30 फीसदी अंत्योदय वाले (हर माह दो रुपए की दर 35 किलो चावल) और केवल दस फीसदी सामान्य कार्ड (हर माह पांच किलो गेहूं और दस किलो चावल) थे।
बहरहाल, अब तक सरकार को लोकप्रिय बना रहा पीडीएस अब सरकार के लिए किसी आफत से कम साबित नहीं हो रहा है।
राजपरिवारों के भी बीपीएल राशन कार्ड
खैरागढ़ राजपरिवार के सदस्य भी पिछले एक साल से गरीबी रेखा के राशन कार्ड पर खाद्यन्न उठाते रहे हैं। खैरागढ़ में भाजपा मंडल अध्यक्ष व राजपरिवार वार्ड की पार्षद भी गरीबी रेखा की श्रेणी में है। भाजपा मंडल अध्यक्ष विकेश गुप्ता की पत्नी रेखा गुप्ता के नाम भूरा राशन कार्ड है।  वहीं राजफैमिली वार्ड की भाजपा पार्षद देवयानी सिंह पति किशोर सिंह के नाम भी बीपीएल श्रेणी का नील राशन कार्ड है।
आशा लाल अवनिंद्र सिंह  राशन कार्ड क्रमांक 42010030400750
किशोर विजय करण सिंह राशन कार्ड क्रमांक 42010303040128
गिरिश सिंह राशन कार्ड क्रमांक 42010303040130
देवयानी किशोर राशन कार्ड क्रमांक 42010303040127
सूर्यदमन सिंह राशन कार्ड क्रमांक 42010303040332
स्मृति नीलांबर राशन कार्ड क्रमांक 42010031600141
रेखा विकेश गुप्ता राशन कार्ड क्रमांक 42010303110278

विधायकों-पूर्व मंत्रियों ने भी खाया गरीबों का राशन
छत्तीसगढ़ के पूर्व मंत्री लीलाराम भोजवानी का नाम भूरा राशनकार्ड रखने वालों की सूची में शामिल है। इस कार्ड पर 15 किलो राशन व केरोसिन मिलता है। उनकी तीन बहुओं के नाम भी बीपीएल (गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करने वाला) और एपील (मध्यमवर्ग वाला) कार्ड बने हुए हैं। सरकारी नियम के मुताबिक आयकर और संपत्तिकर के दायरे में आने वाले 1000 वर्गफीट से अधिक के जमीन मालिक भूरा राशन कार्ड की पात्रता नहीं रखते। जाहिर है भोजवानी पूर्व मंत्री तो रहे ही हैं, पिछली सरकार में राज्य नागरिक आपूर्ति निगम के अध्यक्ष भी रहे हैं। भोजवानी का राजनांदगांव जिले में इंदिरानगर में आलीशान मकान है, फिर भी उनके पास भूरा राशन कार्ड है। राशनकार्ड की सूची पर गौर फरमाएं तो वार्ड 36 के निवासी के रूप में लीलाराम भोजवानी पिता स्व. मोटूमल भोजवानी का नाम राशन दुकान क्रमांक 421001033 में 43 वें नंबर पर शामिल है। उनका राशन कार्ड नंबर 72010013601036 है। भोजवानी की तीन बहुओं के नाम भी बीपीएल कार्ड पर एक रुपए किलों में चावल-गेंहू लेने का मामला सामने आया है।
इस बारे में लीलाराम भोजवानी कहते हैं कि मुझे नहीं मालूम यह कैसे और किसने बनवाया। मैं जानता हूं कि यह नियम के विपरीत है, लेकिन मैंने कार्ड नहीं बनवाया।
जिला खाद्य अधिकारी आर एल खरे कहते हैं कि लीलाराम भोजवानी के नाम भूरा राशनकार्ड बनना गलत है। इस मामले में जांच की जा रही है।
पूर्व मंत्री के घर तीन-तीन बीपीएल कार्ड पाए जाने के बाद राज्य शासन ने आनन फानन में खाद्य विभाग के सहायक खाद्य अधिकारी सुशील तिवारी को निंलबित कर दिया है।
केवल भाजपा नेताओं के बीपीएल कार्ड बने हैं, ऐसा भी नहीं है, खैरागढ़ के कांग्रेस विधायक गिरवर जंघेल की पत्नी चम्पा जंघेल के अलावा उनके परिवार के अन्य सदस्यों के नाम पर भी राशन कार्ड बनाए गए हैं। विधायक की मां गौरी जंघेल, भाभी फूलकैना और बड़े भाई की बहू प्रियंका, मीनाक्षी, रेखा व शीतला जंघेल के नाम पर भी भूरे रंग के राशन कार्ड जारी किए गए हैं।
राजनांदगांव के छुईखदान विकासखंड की ग्राम पंचायत अतरिया की सरपंच विनीता पति भानुप्रकाश के नाम पर भी भूरा राशन कार्ड बनाया गया है। छुईखदान जनपद उपाध्यक्ष योगेश जंघेल के परिवार के सदस्यों के नाम पर भी राशन कार्ड बने हैं। इनमें जनपद उपाध्यक्ष जंघेल की पत्नी कविता जंघेल व उनकी की मां अमृता जंघेल के नाम से भूरा राशन कार्ड बनाया गया है।
छुईखदान जनपद अध्यक्ष सवाना बाई जंघेल के परिवार के नाम से भी राशन कार्ड बनाए गए हैं। इनमें जनपद अध्यक्ष सवाना बाई जंघेल की बहू तारकेश्वरी व तीजबाई के नाम से नीला राशन कार्ड जारी हुए हैं। छुईखदान जनपद पंचायत के सदस्य रामकुमार पटेल के परिवार के नाम चार चार राशन कार्ड जारी हुए हैं। वे कांग्रेस से जुड़े हैं। जनपद सदस्य रामकुमार पटेल की भाई बहू गंगाबाई के नाम से नीला राशन कार्ड जारी हुआ है। गंगाबाई के पति चंद्रशेखर मुरई ग्राम पंचायत के सरपंच हैं। जनपद सदस्य रामकुमार की भाई बहू भुनेश्वरी व सरोज के नाम से भी नीला व जियन पति बालाराम के नाम से भूरा राशन कार्ड बनाया गया है। गंडई भाजपा मंडल के महामंत्री अनिल अग्रवाल की माता विजयारानी के नाम से भूरा राशन कार्ड जारी किया गया है। वहीं पूर्व नगर पंचायत अध्यक्ष रावल कोचर की पत्नी के नाम से भी भूरा राशन कार्ड बनाया गया है। उनके नाम से एक नहीं, बल्कि दो-दो राशन कार्ड जारी किए गए हैं। गंडई नगर पंचायत के पूर्व अध्यक्ष अश्वनी ताम्रकार की पत्नी सुनीता ताम्रकार के नाम से भी दो-दो राशन कार्ड जारी हुए हैं, एक नीला राशनकार्ड व दूसरा भूरा राशन कार्ड। उल्लेखनीय है कि सुनीता ताम्रकार भी नगर पंचायत अध्यक्ष रह चुकी हैं। राजनांदगांव जिला पंचायत सदस्य शशिदेवी जंघेल के नाम से भी नीला राशन कार्ड बनाए गए हैं। शशि देवी जंघेल भाजपा से जुड़ी हैं।
खैरागढ़ विधायक गिरवर जंघेल का कहना है कि हमारे परिवार के सदस्यों के नाम से राशन कार्ड कैसे बना, इसकी मुझे जानकारी नहीं है। राशन कार्ड के लिए हमने न तो हस्ताक्षर किए हैं और न ही फोटो दिए हैं। हमारे पास राशन कार्ड भी नहीं है और न ही राशन कार्ड से अब तक राशन लिया गया है
दूसरी तरफ विपक्ष ने राशन के नाम पर हुए करोड़ों के घोटाले को बिहार के चारा घोटाले से भी बड़ा घोटाला करार दिया और सीबीआई से जांच कराने की मांग की।
मरवाही के विधायक अमित जोगी कहते हैं कि सी. रंगराजन कमेटी की रिपोर्ट के अनुसार छत्तीसगढ़ में महज 27 लाख 6 हजार 300 गरीब परिवार हैं, जो बीपीएल हैं। मगर सरकार ने 71 लाख राशनकार्ड बनाए। जोगी आगे कहते हैं कि दरअसल केंद्र की मोदी सरकार ने सी. रंगराजन कमेटी को मान लिया है। पिछले आठ माह में 67 लाख परिवारों को 35 रुपए किलो चावल दिए गए, जिस पर 625 करोड़ रुपए खर्च हुए। इसमें केंद्र सरकार ने 78 फीसदी राशि लगाई, जिसमें 27 लाख गरीब परिवार शामिल हैं। बावजूद इसके 2 हजार 2 हजार 731 करोड़ रुपए का चावल किसको मिला? यह जांच का विषय है।
नेता प्रतिपक्ष टीएस सिंहदेव ने कहते हैं, राशनकार्ड के नाम पर सरकार जनता के साथ धोखा कर रही है। अब तक  हजारों राशनकार्ड निरस्त किए जा चुके हैं। सवाल ये उठता है कि साल 2012-13 में 46 लाख परिवारों के राशनकार्ड बने, साल 2013-14 में 56 लाख परिवार और चुनाव के दौरान 70 लाख परिवार तक कैसे पहुंच गए
सरकार भी इस मुद्दे पर चुप नहीं है। किन कारणों से राशनकार्ड निरस्त किए जा रहे हैं, इस पर खाद्यमंत्री पुन्नूलाल मोहले सिलसिलेवार जानकारी देते हैं। वे बताते हैं कि कुल 11 लाख 96 हजार 374 राशन कार्ड प्राथमिक रूप से अपात्र पाए गए हैं। लेकिन इसमें कोई फर्जीवाड़ा नहीं है। दरअसल इसमें जांच के दौरान 2 लाख 9 हजार 500 बताए गए पते में नहीं मिले, जबकि  24 हजार 340 लोगों ने राशनकार्ड सरेंडर किया। 12 हजार 342 राशन कार्ड डुप्लिकेट बनाए गए, जबकि 18 हजार 741 सरकारी कर्मचारियों के नाम राशनकार्ड बने। उन्होंने कहा, सभी गरीबों का राशनकार्ड निरस्त नहीं कर रहे हैं, जो अपात्र पाए गए हैं, केवल उनका कार्ड ही निरस्त किया जा रहा है।
फर्जी राशनकार्ड को लेकर सरकार और खाद्य विभाग के बीच भी तनातनी का दौर जारी है। फर्जीवाड़े के लिए दोषी ठहराए जाने और कार्रवाई के खिलाफ खाद्य अफसरों ने 19 अगस्त से अनिश्चितकालीन हड़ताल पर जाने की नोटिस थमा दी है। इस बीच निलंबित खाद्य निरीक्षकों और सहायक खाद्य निरीक्षकों की बहाली के संकेत मिलने लगे हैं। राज्य सरकार खाद्य विभाग के अफसरों को दोषी मानते हुए उन पर कार्रवाई कर रही है।इसी कड़ी में मुख्यमंत्री के विधानसभा क्षेत्र राजनांदगांव में खाद्य निरीक्षक कमल नारायण साहू के खिलाफ एफआईआर कर गिरफ्तार कर लिया गया है। वहीं रायपुर, महासमुंद व बालोद में खाद्य अधिकारियों को निलंबित कर दिया गया। इतना ही नहीं, रायपुर और बलौदाबाजार में ट्रांसपोर्टर की गलती के लिए खाद्य अफसरों पर कार्रवाई की गई है। इससे नाराज खाद्य नागरिक आपूर्ति कार्यपालिक कर्मचारी संघ ने 19 अगस्त से अनिश्चितकालीन हड़ताल पर जाने की नोटिस दे दिया है। खाद्य नागरिक आपूर्ति कार्यपालिक कर्मचारी का आरोप है कि नियमानुसार राशनाकार्ड के लिए हितग्राहियों की पहचान करने और राशनकार्ड जारी करने की जिम्मेदारी नगरीय निकायों की है। ऐसे में कार्ड में हुए फर्जीवाड़े के लिए खाद्य अफसरों को जिम्मेदार ठहराना लगत है। खाद्य अफसरों के विरोध का सरकार पर असर भी दिखने लगा है। सूत्रों के अनुसार निलंबित खाद्य अफसरों की बहाली के संकेत जिलों से मिलने लगे हैं। बताया जाता है कि निलंबित अफसरों की फाइल संबंधित कलेक्टरों ने मंगाई है। अगर ऐसा होता है तो ये मान लिया जाएगा कि सरकार ने खाद्य निरीक्षकों को क्लीन चिट दे दी है यानि फर्जीवाड़े का केंद्र कहीं ओर है।
बहरहाल, खाद्य नागरिक आपूर्ति कार्यपालिक कर्मचारी संघ के प्रांताध्यक्ष रामस्वरूप यदु और कार्यवाहक अध्यक्ष संजय दुबे ने एक प्रतिनिधिमंडल ने राज्य के खाद्य संचालक आर. प्रसन्ना से मुलाकात कर खाद्य निरीक्षकों पर हो रही कार्रवाही का विरोध किया है।
रामस्वरूप यदु कहते हैं कि नियमानुसार राशनकार्ड के लिए स्थानीय निकाय पात्र परिवारों की पहचान करता है और वहीं राशनकार्ड भी जारी करता है। ऐसे में गलत या बोगस राशनकार्ड के लिए खाद्य विभाग को जिम्मेदार ठहराना गलत है। पहले तो राज्य सरकार ने थोक में कार्ड बनवाए, अब उन्हें फर्जी बताकर निरस्त किया जा रहा है। इसमें निरीक्षकों की क्या गलती है। हम तो केवल अपना काम कर रहे हैं
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सबसे ज्यादा अपात्र महासमुंद में
प्रदेश के 27 जिलों में राशन कार्ड सत्यापन का काम चल रहा है। अब तक निरस्त हुए राशन कार्ड में सबसे ज्यादा आंकडा महासमुंद जिले का है। फर्जी राशनकार्ड के मामले में रायपुर 8वें नंबर पर हैं। वहीं सुदूर बस्तर के सुकमा जिले में सबसे कम फर्जी राशनकार्ड पाए गए हैं। मुख्यमंत्री का विधानसभा क्षेत्र राजनांदगांव फर्जी राशनकार्ड बनवाने के मामले में तीसरे नंबर पर है। राजनांदगांव में ही रहने वाले पूर्व मंत्री लीलाराम भोजवानी के पूरे परिवार का राशनकार्ड बनने का मामला भी सामने आया है। स्वयं भोजवानी, उनके बेटे और उनकी बहू के नाम अलग अलग गरीबी रेखा वाले राशन कार्ड ना केवल बनाए गए, बल्कि उन पर राशन भी उठाया जा रहा था। हालांकि भोजवानी ने ऐसे किसी भी प्रकार के राशन कार्ड बनवाने से इंकार किया है। वे कहते हैं कि उन्हें नहीं पता कि उनके राशन कार्ड कैसे बन गए।