गुरुवार, 16 अक्टूबर 2014

पीडीएस यानि "पंजीकृत डकैती सिस्टम"

जिस सार्वजनिक वितरण प्रणाली ने छत्तीसगढ़ सरकार को 2011 से लगातार साल दर साल राष्ट्रीय स्तर के पुरस्कार दिलवाए, वही योजना अब सरकार के गले ही हड्डी बनती नजर आ रही है। फिलहाल तो राज्य सरकार के पास इस बात का कोई जवाब नहीं है कि 56 लाख परिवारों के प्रदेश में 70 लाख राशन कार्ड कैसे जारी कर दिए गए? दूसरी तरफ राशन दुकान धारकों और खाद्य विभाग के कुछ अफसरों के कारनामों ने सरकार को परेशानी में डाल दिया है। इस पूरे मसले में तीसरा ट्विस्ट भी आ गया है, वह है राशनकार्ड फर्जीवाड़े में हो रही जगहंसाई के कारण बागी हुए खाद्य विभाग के निरीक्षक राज्य सरकार को ही हड़काने में लग गए हैं।
नरेश बाफना छत्तीसगढ़ पीडीएस संचालक संघ के अध्यक्ष हैं। इन दिनों बाफना छत्तीसगढ़ के खाद्य विभाग के खिलाफ एक लड़ाई लड़ रहे हैं। लड़ाई है गरीबों को दिए जाने वाले राशन की जमाखोरी और भ्रष्टाचार करने वाले राशन दुकानदारों और इन्हें प्रश्रय देने वाले खाद्य विभाग के अफसरों पर कार्रवाई करवाने के प्रयासों की..बाफना ने छत्तीसगढ़ के राज्यपाल को भी एक पत्र लिखा है और बताया है कि छत्तीसगढ़ में किस तरह सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत राशन दुकानदार और बरसों से एक ही जगह जमें कुछ खाद्य अधिकारी मिलकर भ्रष्टाचार कर रहे हैं। बाफना के पास कई दस्तावेज हैं, जो ये इस मिलीभगत का स्पष्ट संकेत देते हैं। बाफना की शिकायत से शुरुआत इसलिए क्योंकि मोटे तौर पर ये समझा जा सके कि जब राजधानी रायपुर में सरकार की नाक के नीचे खाद्य अफसर और राशन दुकानदार मिलकर इन कारनामों को अंजाम दे रहे हैं तो सुदूर बस्तर जैसे इलाकों का तो भगवान ही मालिक है।
राजभवन को भेजी शिकायत, जिसमें बाफना ने लोकायुक्त से जांच करवाने की मांग की है, का एक छोटा सा नमूना देखें तो पता चलता है कि गरीबों का पेट भरने की नेकनीयत से शुरु की गई योजना को खाद्य विभाग के कुछ अफसरों ने राजधानी रायपुर में ही मजाक बनाकर रख दिया है। रायपुर शहर में आईडी क्रमांक 441001176 से 441001198 तक उचित मूल्य की दुकाने नियमों का उल्लंघन कर आवंटित कर दी गईं। छत्तीसगढ़ लोकसेवा गांरटी अधिनियम 2011 के तहत खाद्य विभाग में प्रदर्शित सूचना में स्पष्ट उल्लेख है कि राशन दुकान आवंटन करने की प्रक्रिया के तहत प्रमुख समाचार पत्रों में विज्ञापन प्रदर्शित करना जरूरी है। लेकिन बाफना का दावा है कि ऐसा कोई विज्ञापन जारी ही नहीं किया गया। जब उन्होंने सूचना के अधिकार के तहत इसकी जानकारी विभाग से मांगी तो उन्हें असंतोषजनक जवाब दिया गया।  
बाफना की दूसरी शिकायत पर गौर करें तो सूबे के राशन दुकानदारों ने कोर पीडीएस योजना के बाद जमकर अनाज की कालाबाजारी की। वर्ष 2012 में शुरु हुई योजना में कोर पीडीएस के तहत राशन दुकानों में अन्नपूर्णा एटीएमलगाए गए हैं, जिसमें उपभोक्ता अपने स्मार्ट राशन कार्ड के जरिए खुद राशन निकाल सकता है। इस कम्प्यूटरीकृत व्यवस्था के पीछे सरकार की मंशा पीडीएस में पारदर्शिता लाने की थी, लेकिन भ्रष्ट राशन दुकानदारों ने इसे भी भ्रष्टाचार का जरिया बना लिया। कैसे? इसे 29-11-2013 को खाद्य अफसरों द्वारा एक राशनदुकान में हुई कार्रवाई से समझिए।
29 नंबवर 2013 को रायपुर की चलो चले सामुदायिक विकास समिति की उचित मूल्य की दुकान जिसका आईडी क्रमांक 441001116 है, पर खाद्य विभाग की एक जांच टीम ने छापामार कार्रवाई की। इस दौरान दुकान में 145.82 क्विंटल चावल और 1.31 क्विंटल मटर दाल अधिक पाया गया। इतना ही नहीं राशनदुकानों में 23 स्मार्ट राशन कार्ड भी पाए गए। नाम ना छापने की शर्त पर अधिकारियों ने बताया कि ये स्मार्ट राशन कार्ड उन उपभोक्ताओं के नाम पर ही बनाए गए थे, जिनके पास पुराने तरीके के राशनकार्ड थे, लेकिन राशव दुकानदार ने उन्हें नए कार्ड ना देकर खुद ही रख लिए थे। उपभोक्ताओं को वो पुराने राशन कार्ड के आधार पर ही राशन आवंटित कर रहा था, जबकि नए स्मार्ट राशनकार्ड से खुद राशन निकाल कर कालाबाजारी कर रहा था। ठीक ऐसा ही 29 मार्च 2013 को कार्रवाई के दौरान एक अन्य दुकान में भी पाया गया। छापा मारने वाली खाद्य निरीक्षक प्रतिभा राठिया अपने जांच प्रतिवेदन में लिखती हैं कि जिला लिपिक प्राथमिक सहकारी उपभोक्ता भंडार की दुकान (आईडी क्रमांक 441001136) में जांच के दौरान छह नग स्मार्ट कार्ड रखे पाए गए। पूछताछ करने पर दुकानदार ने अफसरों को बताया कि जिन उपभोक्ताओं के नए राशनकार्ड जारी हो गए हैं, उन्हें इसकी जानकारी ना देकर दुकानदार ने नए कार्ड अपने ही पास रख लिए थे। जांच प्रतिवेदन में अफसर ने यह माना है कि पुराने स्मार्ट कार्ड उपभोक्ताओं से लेकर खाद्य कार्यालय में जमा नहीं किया गया, बल्कि विक्रेता ने नए राशनकार्ड अपने ही पास रखकर फर्जी एंट्री कर लाभ कमाने के उद्देश्य से कालाबाजारी की गई है।
यहां सवाल ये भी उठता है कि खुद खाद्य विभाग ने नए स्मार्ट राशनकार्ड बन जाने के बाद पुराने राशन कार्ड जमा करवाने के लिए सख्ती क्यों नहीं बरती। क्यों राशनदुकानदारों की लापरवाही को बर्दाश्त किया जाता रहा। लेकिन इस विषय पर खाद्य अफसरों ने चुप्पी साध रखी है।
रायपुर की जिला खाद्य अधिकारी दयामणि मिंज कहती हैं कि हम वही करते हैं, जैसा हमे निर्देश होता है। खाद्य विभाग सारे काम सरकारी आदेशों के तहत ही करता है
खैर ये तो हुई राजभवन पहुंची बाफना की शिकायतों की चर्चा। लेकिन इन शिकायतों से परे भी छत्तीसगढ़ में पीडीएस को लेकर जो कुछ चल रहा है, उसे पढ़कर आपके पैरों के नीचे की जमीन ही खिसक जाएगी। चाणक्य के कहे इन शब्दों “The biggest sin for a King is the death of any of his subjects due to hunger” को अधिकृत रूप से अपना कर्मवाक्य बनाते हुए छत्तीसगढ़ खाद्य विभाग ने पिछले कुछ सालों में ऐसा करिश्मा रच डाला कि यदि चाणक्य कहीं से देख पा रहे होंगे तो उन्हें अपने कथन की नए सिरे से परिभाषा तय करना पड़ रही होगी। अपनी सार्वजनिक वितरण प्रणाली को The model system of India कहने वाले छत्तीसगढ़ में इन दिनों पीडीएस को लेकर ही भूचाल आया हुआ है। भूचाल भी ऐसा, जिसका केंद्र तो रायपुर है, लेकिन उसकी फ्रिक्वेंसी दिल्ली तक मापी जा रही है। इस पूरे मामले को समझने के लिए हमें उन आंकड़ों पर ध्यान देना होगा, जिनके बल पर पहले तो राज्य सरकार ढेर सारे पुरस्कार ले आई, फिर विधानसभा चुनाव की नैया भी पार कर ली, लेकिन जब उसने इन आंकडों के झंझट से मुक्ति पानी चाही, तो उसकी सारी कलई खुल गई।
चूंकि ये पूरा खेल ही आंकड़ों का है, इसलिए हम इसे वर्ष 2011 में हुई जनगणना के अंतिम आकंडों से समझना शुरु करते हैं। जनगणना के मुताबिक छत्तीसगढ़ की कुल आबादी 2 करोड़ 55 लाख, 45 हजार 198 है। जनगणना के आंकड़ो अनुसार ही प्रदेश में 56 लाख पचास हजार 724 परिवार रहते हैं। वर्ष 2011 में ही प्रदेश में संचालित दस हजार 882 राशन दुकानों से करीब 34 लाख 31 हजार परिवारों को केवल एक व दो रुपए किलो की दर से हर माह 35 किलो चावल व दो किलो निशुल्क नमक दिया जा रहा था। तब तक फिर भी सब ठीक था, बावजूद इसके की केंद्र सरकार और छत्तीसगढ़ सरकार के बीच गरीबों के आंकड़ों को लेकर हमेशा से ही मतभेद ही रहा। केंद्र सरकार जहां छत्तीसगढ़ की कुल आबादी में से 42.52 फीसदी लोगों को गरीब मानती रही, वहीं छत्तीसगढ़ सरकार 68 फीसदी परिवारों को गरीब मानकर उन्हें सस्ता खाद्यान्न उपलब्ध करवाती रही। यहां तक फिर भी सब निर्विरोध चल रहा था, लेकिन कहानी में असल पेंच आया 2012 में, जब राज्य सरकार ने छत्तीसगढ़ खाद्य एवं पोषण सुरक्षा अधिनियम लागू किया। उसके बाद 2012 से अक्टूबर 2013 तक धडल्ले से खाद्य सुरक्षा के नाम पर लोगों के राशन कार्ड बनाए गए। इतने बनाए गए कि छत्तीसगढ़ में बसने वाले कुल 56 लाख परिवारों के 70 लाख राशन कार्ड बना दिए गए। ये हम नहीं कह रहे, ये खुद प्रदेश के खाद्य मंत्री पुन्नूलाल मोहिले ने छत्तीसगढ़ विधानसभा के मानसून सत्र में एक सवाल के जवाब में कहा है। खाद्य मंत्री ये भी मान रहे हैं कि इनमें से लाखों राशन कार्ड फर्जी थे। यही कारण है कि जून 2014 में यानि सरकार के सत्ता में आने के बाद राशन कार्ड जांच अभियान शुरु किया गया। जिसमें अब तक तकरीबन 12 लाख राशन कार्ड निरस्त किए जा चुके हैं। अभी भी चार लाख राशन कार्डों का सत्यापन होना बाकी है यानि फर्जी राशन कार्ड की संख्या और बढ़ सकती है।
बहुजन समाज पार्टी के विधाय केशवचंद्रा के सवाल के जवाब में खाद्य मंत्री पून्नूलाल मोहिले ने सदन में बताया कि छत्तीसगढ़ खाद्य एवं पोषण सुरक्षा अधिनियम 2012 के तहत वर्ष 2013 में 48.15 लाख प्राथमिकता राशन कार्ड, 17.02 लाख अंत्योदय राशन कार्ड, 4.29 लाख सामान्य राशन कार्ड और 9 हजार 358 निशक्तजन राशनकार्ड जारी किए गए थे। जून 2014 में शुरु किए गए राशन कार्ड जांच अभियान में 13 जुलाई 2014 तक 48.94 लाख राशन कार्डधारक परिवार पात्र पाए गए हैं। 
फर्जी राशनकार्ड के रूप में कांग्रेस को भी सरकार के खिलाफ एक नया हथियार मिल चुका है। मरवाही के विधायक अमित जोगी का आरोप लगाते हैं कि वर्ष 2012 में मुख्यमंत्री रमन सिंह ने नई दिल्ली में योजना आयोग सामने एक प्रेजेंटेशन दिया था, उस समय प्रदेश में 34 लाख बीपीएल परिवार थे, लेकिन ऐन चुनाव के वक्त बीपीएल परिवारों की संख्या एकाएक 70 लाख हो गई। ये गंभीर प्रश्न है, इसका जवाब सरकार को देना ही होगा
जबकि मुख्यमंत्री रमन सिंह ने राशनकार्ड निरस्तीकरण को लेकर कहा है कि गरीबों के राशन पर अपात्र लोगों का कोई अधिकार नहीं बनता। यदि पात्रता रखने वाले किसी राशनकार्ड धारक का कार्ड निरस्त हो गया है, तो कलेक्टर के माध्यम से उसकी पूरी सुनवाई होगी। रमन सिंह ये भी कहते हैं कि राज्य में गरीबों के लिए सस्ते राशन की व्यवस्था कभी बंद नहीं होगा। वे याद दिलाना नहीं भूलते कि छत्तीसगढ़ देश का पहला ऐसा राज्य है, जिसने अपने यहां के गरीबों और जरूरतमंद परिवारों के लिए देश का पहला खाद्य सुरक्षा और पोषण सुरक्षा कानून बनाकर उन्हें भरपेट भोजन के लिए पर्याप्त अनाज हासिल करने का कानूनी अधिकार दिया है। यह अधिकार उनसे कोई नहीं छीन सकता
प्रदेश में निरस्त किए गए 12 लाख 1942 राशन कार्डों में से अधिकांश राशन कार्ड खाद्य सुरक्षा कानून बनने के बाद बनाए गए थे। इन पर अक्टूबर 2013 से खाद्यान्न वितरण शुरु हुआ था। जून 2014 तक यानि नौ माह में इन कार्डों के जरिए अपात्र लोगों ने भी चार लाख 5 हजार 655 क्विंटल खाद्यान्न और 2403882 लीटर केरोसीन हजम कर लिया। निरस्त राशनकार्डों में 60 फीसदी प्राथमिकता वाले कार्ड (प्रतिमाह 25 किलो चावल, दस किलो गेंहू, शक्कर, दाल इत्यादी मिलता है), 30 फीसदी अंत्योदय वाले (हर माह दो रुपए की दर 35 किलो चावल) और केवल दस फीसदी सामान्य कार्ड (हर माह पांच किलो गेहूं और दस किलो चावल) थे।
बहरहाल, अब तक सरकार को लोकप्रिय बना रहा पीडीएस अब सरकार के लिए किसी आफत से कम साबित नहीं हो रहा है।
राजपरिवारों के भी बीपीएल राशन कार्ड
खैरागढ़ राजपरिवार के सदस्य भी पिछले एक साल से गरीबी रेखा के राशन कार्ड पर खाद्यन्न उठाते रहे हैं। खैरागढ़ में भाजपा मंडल अध्यक्ष व राजपरिवार वार्ड की पार्षद भी गरीबी रेखा की श्रेणी में है। भाजपा मंडल अध्यक्ष विकेश गुप्ता की पत्नी रेखा गुप्ता के नाम भूरा राशन कार्ड है।  वहीं राजफैमिली वार्ड की भाजपा पार्षद देवयानी सिंह पति किशोर सिंह के नाम भी बीपीएल श्रेणी का नील राशन कार्ड है।
आशा लाल अवनिंद्र सिंह  राशन कार्ड क्रमांक 42010030400750
किशोर विजय करण सिंह राशन कार्ड क्रमांक 42010303040128
गिरिश सिंह राशन कार्ड क्रमांक 42010303040130
देवयानी किशोर राशन कार्ड क्रमांक 42010303040127
सूर्यदमन सिंह राशन कार्ड क्रमांक 42010303040332
स्मृति नीलांबर राशन कार्ड क्रमांक 42010031600141
रेखा विकेश गुप्ता राशन कार्ड क्रमांक 42010303110278

विधायकों-पूर्व मंत्रियों ने भी खाया गरीबों का राशन
छत्तीसगढ़ के पूर्व मंत्री लीलाराम भोजवानी का नाम भूरा राशनकार्ड रखने वालों की सूची में शामिल है। इस कार्ड पर 15 किलो राशन व केरोसिन मिलता है। उनकी तीन बहुओं के नाम भी बीपीएल (गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करने वाला) और एपील (मध्यमवर्ग वाला) कार्ड बने हुए हैं। सरकारी नियम के मुताबिक आयकर और संपत्तिकर के दायरे में आने वाले 1000 वर्गफीट से अधिक के जमीन मालिक भूरा राशन कार्ड की पात्रता नहीं रखते। जाहिर है भोजवानी पूर्व मंत्री तो रहे ही हैं, पिछली सरकार में राज्य नागरिक आपूर्ति निगम के अध्यक्ष भी रहे हैं। भोजवानी का राजनांदगांव जिले में इंदिरानगर में आलीशान मकान है, फिर भी उनके पास भूरा राशन कार्ड है। राशनकार्ड की सूची पर गौर फरमाएं तो वार्ड 36 के निवासी के रूप में लीलाराम भोजवानी पिता स्व. मोटूमल भोजवानी का नाम राशन दुकान क्रमांक 421001033 में 43 वें नंबर पर शामिल है। उनका राशन कार्ड नंबर 72010013601036 है। भोजवानी की तीन बहुओं के नाम भी बीपीएल कार्ड पर एक रुपए किलों में चावल-गेंहू लेने का मामला सामने आया है।
इस बारे में लीलाराम भोजवानी कहते हैं कि मुझे नहीं मालूम यह कैसे और किसने बनवाया। मैं जानता हूं कि यह नियम के विपरीत है, लेकिन मैंने कार्ड नहीं बनवाया।
जिला खाद्य अधिकारी आर एल खरे कहते हैं कि लीलाराम भोजवानी के नाम भूरा राशनकार्ड बनना गलत है। इस मामले में जांच की जा रही है।
पूर्व मंत्री के घर तीन-तीन बीपीएल कार्ड पाए जाने के बाद राज्य शासन ने आनन फानन में खाद्य विभाग के सहायक खाद्य अधिकारी सुशील तिवारी को निंलबित कर दिया है।
केवल भाजपा नेताओं के बीपीएल कार्ड बने हैं, ऐसा भी नहीं है, खैरागढ़ के कांग्रेस विधायक गिरवर जंघेल की पत्नी चम्पा जंघेल के अलावा उनके परिवार के अन्य सदस्यों के नाम पर भी राशन कार्ड बनाए गए हैं। विधायक की मां गौरी जंघेल, भाभी फूलकैना और बड़े भाई की बहू प्रियंका, मीनाक्षी, रेखा व शीतला जंघेल के नाम पर भी भूरे रंग के राशन कार्ड जारी किए गए हैं।
राजनांदगांव के छुईखदान विकासखंड की ग्राम पंचायत अतरिया की सरपंच विनीता पति भानुप्रकाश के नाम पर भी भूरा राशन कार्ड बनाया गया है। छुईखदान जनपद उपाध्यक्ष योगेश जंघेल के परिवार के सदस्यों के नाम पर भी राशन कार्ड बने हैं। इनमें जनपद उपाध्यक्ष जंघेल की पत्नी कविता जंघेल व उनकी की मां अमृता जंघेल के नाम से भूरा राशन कार्ड बनाया गया है।
छुईखदान जनपद अध्यक्ष सवाना बाई जंघेल के परिवार के नाम से भी राशन कार्ड बनाए गए हैं। इनमें जनपद अध्यक्ष सवाना बाई जंघेल की बहू तारकेश्वरी व तीजबाई के नाम से नीला राशन कार्ड जारी हुए हैं। छुईखदान जनपद पंचायत के सदस्य रामकुमार पटेल के परिवार के नाम चार चार राशन कार्ड जारी हुए हैं। वे कांग्रेस से जुड़े हैं। जनपद सदस्य रामकुमार पटेल की भाई बहू गंगाबाई के नाम से नीला राशन कार्ड जारी हुआ है। गंगाबाई के पति चंद्रशेखर मुरई ग्राम पंचायत के सरपंच हैं। जनपद सदस्य रामकुमार की भाई बहू भुनेश्वरी व सरोज के नाम से भी नीला व जियन पति बालाराम के नाम से भूरा राशन कार्ड बनाया गया है। गंडई भाजपा मंडल के महामंत्री अनिल अग्रवाल की माता विजयारानी के नाम से भूरा राशन कार्ड जारी किया गया है। वहीं पूर्व नगर पंचायत अध्यक्ष रावल कोचर की पत्नी के नाम से भी भूरा राशन कार्ड बनाया गया है। उनके नाम से एक नहीं, बल्कि दो-दो राशन कार्ड जारी किए गए हैं। गंडई नगर पंचायत के पूर्व अध्यक्ष अश्वनी ताम्रकार की पत्नी सुनीता ताम्रकार के नाम से भी दो-दो राशन कार्ड जारी हुए हैं, एक नीला राशनकार्ड व दूसरा भूरा राशन कार्ड। उल्लेखनीय है कि सुनीता ताम्रकार भी नगर पंचायत अध्यक्ष रह चुकी हैं। राजनांदगांव जिला पंचायत सदस्य शशिदेवी जंघेल के नाम से भी नीला राशन कार्ड बनाए गए हैं। शशि देवी जंघेल भाजपा से जुड़ी हैं।
खैरागढ़ विधायक गिरवर जंघेल का कहना है कि हमारे परिवार के सदस्यों के नाम से राशन कार्ड कैसे बना, इसकी मुझे जानकारी नहीं है। राशन कार्ड के लिए हमने न तो हस्ताक्षर किए हैं और न ही फोटो दिए हैं। हमारे पास राशन कार्ड भी नहीं है और न ही राशन कार्ड से अब तक राशन लिया गया है
दूसरी तरफ विपक्ष ने राशन के नाम पर हुए करोड़ों के घोटाले को बिहार के चारा घोटाले से भी बड़ा घोटाला करार दिया और सीबीआई से जांच कराने की मांग की।
मरवाही के विधायक अमित जोगी कहते हैं कि सी. रंगराजन कमेटी की रिपोर्ट के अनुसार छत्तीसगढ़ में महज 27 लाख 6 हजार 300 गरीब परिवार हैं, जो बीपीएल हैं। मगर सरकार ने 71 लाख राशनकार्ड बनाए। जोगी आगे कहते हैं कि दरअसल केंद्र की मोदी सरकार ने सी. रंगराजन कमेटी को मान लिया है। पिछले आठ माह में 67 लाख परिवारों को 35 रुपए किलो चावल दिए गए, जिस पर 625 करोड़ रुपए खर्च हुए। इसमें केंद्र सरकार ने 78 फीसदी राशि लगाई, जिसमें 27 लाख गरीब परिवार शामिल हैं। बावजूद इसके 2 हजार 2 हजार 731 करोड़ रुपए का चावल किसको मिला? यह जांच का विषय है।
नेता प्रतिपक्ष टीएस सिंहदेव ने कहते हैं, राशनकार्ड के नाम पर सरकार जनता के साथ धोखा कर रही है। अब तक  हजारों राशनकार्ड निरस्त किए जा चुके हैं। सवाल ये उठता है कि साल 2012-13 में 46 लाख परिवारों के राशनकार्ड बने, साल 2013-14 में 56 लाख परिवार और चुनाव के दौरान 70 लाख परिवार तक कैसे पहुंच गए
सरकार भी इस मुद्दे पर चुप नहीं है। किन कारणों से राशनकार्ड निरस्त किए जा रहे हैं, इस पर खाद्यमंत्री पुन्नूलाल मोहले सिलसिलेवार जानकारी देते हैं। वे बताते हैं कि कुल 11 लाख 96 हजार 374 राशन कार्ड प्राथमिक रूप से अपात्र पाए गए हैं। लेकिन इसमें कोई फर्जीवाड़ा नहीं है। दरअसल इसमें जांच के दौरान 2 लाख 9 हजार 500 बताए गए पते में नहीं मिले, जबकि  24 हजार 340 लोगों ने राशनकार्ड सरेंडर किया। 12 हजार 342 राशन कार्ड डुप्लिकेट बनाए गए, जबकि 18 हजार 741 सरकारी कर्मचारियों के नाम राशनकार्ड बने। उन्होंने कहा, सभी गरीबों का राशनकार्ड निरस्त नहीं कर रहे हैं, जो अपात्र पाए गए हैं, केवल उनका कार्ड ही निरस्त किया जा रहा है।
फर्जी राशनकार्ड को लेकर सरकार और खाद्य विभाग के बीच भी तनातनी का दौर जारी है। फर्जीवाड़े के लिए दोषी ठहराए जाने और कार्रवाई के खिलाफ खाद्य अफसरों ने 19 अगस्त से अनिश्चितकालीन हड़ताल पर जाने की नोटिस थमा दी है। इस बीच निलंबित खाद्य निरीक्षकों और सहायक खाद्य निरीक्षकों की बहाली के संकेत मिलने लगे हैं। राज्य सरकार खाद्य विभाग के अफसरों को दोषी मानते हुए उन पर कार्रवाई कर रही है।इसी कड़ी में मुख्यमंत्री के विधानसभा क्षेत्र राजनांदगांव में खाद्य निरीक्षक कमल नारायण साहू के खिलाफ एफआईआर कर गिरफ्तार कर लिया गया है। वहीं रायपुर, महासमुंद व बालोद में खाद्य अधिकारियों को निलंबित कर दिया गया। इतना ही नहीं, रायपुर और बलौदाबाजार में ट्रांसपोर्टर की गलती के लिए खाद्य अफसरों पर कार्रवाई की गई है। इससे नाराज खाद्य नागरिक आपूर्ति कार्यपालिक कर्मचारी संघ ने 19 अगस्त से अनिश्चितकालीन हड़ताल पर जाने की नोटिस दे दिया है। खाद्य नागरिक आपूर्ति कार्यपालिक कर्मचारी का आरोप है कि नियमानुसार राशनाकार्ड के लिए हितग्राहियों की पहचान करने और राशनकार्ड जारी करने की जिम्मेदारी नगरीय निकायों की है। ऐसे में कार्ड में हुए फर्जीवाड़े के लिए खाद्य अफसरों को जिम्मेदार ठहराना लगत है। खाद्य अफसरों के विरोध का सरकार पर असर भी दिखने लगा है। सूत्रों के अनुसार निलंबित खाद्य अफसरों की बहाली के संकेत जिलों से मिलने लगे हैं। बताया जाता है कि निलंबित अफसरों की फाइल संबंधित कलेक्टरों ने मंगाई है। अगर ऐसा होता है तो ये मान लिया जाएगा कि सरकार ने खाद्य निरीक्षकों को क्लीन चिट दे दी है यानि फर्जीवाड़े का केंद्र कहीं ओर है।
बहरहाल, खाद्य नागरिक आपूर्ति कार्यपालिक कर्मचारी संघ के प्रांताध्यक्ष रामस्वरूप यदु और कार्यवाहक अध्यक्ष संजय दुबे ने एक प्रतिनिधिमंडल ने राज्य के खाद्य संचालक आर. प्रसन्ना से मुलाकात कर खाद्य निरीक्षकों पर हो रही कार्रवाही का विरोध किया है।
रामस्वरूप यदु कहते हैं कि नियमानुसार राशनकार्ड के लिए स्थानीय निकाय पात्र परिवारों की पहचान करता है और वहीं राशनकार्ड भी जारी करता है। ऐसे में गलत या बोगस राशनकार्ड के लिए खाद्य विभाग को जिम्मेदार ठहराना गलत है। पहले तो राज्य सरकार ने थोक में कार्ड बनवाए, अब उन्हें फर्जी बताकर निरस्त किया जा रहा है। इसमें निरीक्षकों की क्या गलती है। हम तो केवल अपना काम कर रहे हैं
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सबसे ज्यादा अपात्र महासमुंद में
प्रदेश के 27 जिलों में राशन कार्ड सत्यापन का काम चल रहा है। अब तक निरस्त हुए राशन कार्ड में सबसे ज्यादा आंकडा महासमुंद जिले का है। फर्जी राशनकार्ड के मामले में रायपुर 8वें नंबर पर हैं। वहीं सुदूर बस्तर के सुकमा जिले में सबसे कम फर्जी राशनकार्ड पाए गए हैं। मुख्यमंत्री का विधानसभा क्षेत्र राजनांदगांव फर्जी राशनकार्ड बनवाने के मामले में तीसरे नंबर पर है। राजनांदगांव में ही रहने वाले पूर्व मंत्री लीलाराम भोजवानी के पूरे परिवार का राशनकार्ड बनने का मामला भी सामने आया है। स्वयं भोजवानी, उनके बेटे और उनकी बहू के नाम अलग अलग गरीबी रेखा वाले राशन कार्ड ना केवल बनाए गए, बल्कि उन पर राशन भी उठाया जा रहा था। हालांकि भोजवानी ने ऐसे किसी भी प्रकार के राशन कार्ड बनवाने से इंकार किया है। वे कहते हैं कि उन्हें नहीं पता कि उनके राशन कार्ड कैसे बन गए।

श से "शौचालय विहीन"

भाग्य की तस्वीर गढ़ने के लिए बने शिक्षा के मंदिर शौचालयों के अभाव में लाखों छात्राओं का जीवन अंधकारमय कर रहे हैं। राधा, फौजिया और सुनीता की कहानी उन हजारों हजार लड़कियों का दर्द बयां करने के लिए काफी है, जिन्होंने ना चाहते हुए भी अपनी पढ़ाई अधूरी छोड़ दी। शौचालयविहीन विद्यालयों ने पढ़ाई के दौरान इन लड़कियों के जीवन को नारकीय तो बना ही दिया था और पढ़ाई छोड़ने के कारण अब यह लड़कियां अपने अस्तित्व को ही खो चुकी हैं।
छत्तीसगढ़ में 47 हजार 526 स्कूल हैं। इनमें 17 हजार से ज्यादा स्कूलों में छात्रों और छात्राओं दोनों के लिए शौचालय ही नहीं हैं। इनमें प्रदेश के 8 हजार 164  कन्या विद्यालय भी शामिल हैं, जहां छात्राओं के लिए शौचालय नहीं है। फलस्वरूप छात्राएं स्कूल जाने से कतराती हैं। कुछ समय पहले रायपुर से अलग होकर नया जिला बना गरियाबंद में 1561 स्कूलों में से 604 स्कूलों में छात्राओं के लिए शौचालय नहीं है, जबकि 206 स्कूलों में छात्रों के लिए शौचालय नहीं है। आदिवासी बाहुल्य वाले इलाकों में हालात ज्यादा बदतर हैं। सूबे में हजारों छात्राएं सिर्फ इसलिए स्कूल छोड़ने को विवश हो गई हैं क्योंकि शौचालय नहीं होने की वजह से उन्हें कई बार असहज स्थिति का सामना करना पड़ जाता है।
राधा (17 वर्ष) (बदला हुआ नाम) रायपुर के सबसे सघन इलाके मोदहापारा में रहती है। तीसरी कक्षा उत्तीर्ण करने के बाद उसने मुड़कर स्कूल की तरफ नहीं देखा। ऐसा नहीं है कि वह पढ़ना नहीं चाहती थी, या उसके परिजन उसे पढ़ाना नहीं चाहते थे। लेकिन उसकी मजबूरी यह थी कि उसके स्कूल में शौच या लघुशंका के लिए कोई सुविधा उपलब्ध नहीं थी। ऐसे में जब पढ़ाई के दौरान अपने इन प्राकृतिक क्रियाकलापों को निपटाने के लिए उसे दो किलोमीटर दूर स्थित अपने घर का रुख करना पड़ता था, तब उसका कष्ट नारकीय हो जाता था। अक्सर होने वाले इस कष्ट से मुक्ति पाने के लिए उसने खुद ही स्कूल नहीं जाने का फैसला कर लिया। चूंकि राधा के मां बाप मजदूरी करते थे, इसलिए उन्होंने भी बेटी के इस फैसले में मौन सहमति जता दी। आज राधा एक दफ्तर में पानी-चाय पिलाने का काम करती है, अपने आसपास पढ़ी लिखी लड़कियों को देखकर उसके मन में कसक उठती है कि काश वह भी पढ़ लिख पाती तो आज उसे दूसरों को चाय पिलाने का काम नहीं करना पड़ता।
राधा की कहानी में सबसे बड़ी विंडबना यह है कि वह तो प्रदेश की राजधानी रायपुर में रहती है। तब भी उसे उसके विद्यालय में शौचालय की सुविधा नहीं मिल पाई। पर राधा अकेली लड़की नहीं है, जिसका भविष्य़ केवल इसलिए अंधकार में चला गया, क्योंकि उसके स्कूल में शौचालय नहीं था, बल्कि राधा की ही सहेली फौजिया (बदला हुआ नाम) (15 वर्ष) की भी यही कहानी है। फौजिया के पिता शेख उस्मान फलों का ठेला लगाते हैं। उस्मान अपनी इकलौती संतान को खूब पढ़ाना चाहते थे, ताकि समुदाय में उनका मान सम्मान बढ़ सके। लेकिन शासकीय प्राथमिक शाला कचना में पढ़ने वाली फौजिया ने पांचवी कक्षा के बाद अपनी पढ़ाई छोड़ दी। अब फौजिया नमकीन बनाने वाले एक कारखाने में काम करती है। राधा और फौजिया के साथ ही अकेले रायपुर में हजारों लड़कियां ऐसी हैं, जिन्होंने या तो स्कूल छोड़ दिया या फिर पढ़ाई के दौरान उस यातना को भोगने को मजबूर हैं, जिसकी तरफ आजादी के 67 साल बीतने के बाद भी केंद्र और राज्य सरकारों ने गंभीरता से ध्यान ही नहीं दिया। केंद्रीय मानव संसाधन मंत्रालय के हालिया सर्वे के मुताबिक अकेले रायपुर के 78 स्कूलों में छात्राओं और 220 स्कूलों में छात्रों के लिए शौचालय की व्यवस्था नहीं है। वहीं राजधानी के 1000 स्कूलों में छात्राओं के 583 और छात्रों के लिए बने 516 शौचालय खराब स्थिति में हैं। इन शौचालयों का इस्तेमाल करना स्वास्थ्य के लिए खतरनाक हो गया है। ये स्थिति तब है, जब रायपुर को राजधानी बने ही 13 साल हो गए हैं।
स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर जब लाल किले की प्रचीर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बेझिझक स्वीकार करते हुए यह कहा कि अधिकांश स्कूलों में शौचालय नहीं हैं। उन्होंने सांसदों को एक साल के भीतर सांसद निधि से स्कूलों में शौचालय निर्माण कराने की बात कही। तब एक लड़की यह सुनते हुए जोर-जोर से रोने लगी। यह लड़की 13 साल की सुनीता (बदला हुआ नाम) है। एक साल पहले सुनीता के साथ जो घटना घटी, उसने उसकी जिंदगी ही बदल दी। दरअसल सुनीता छत्तीसगढ़ के एक जिले धमतरी में एक सरकारी स्कूल में सातवीं कक्षा में पढ़ रही थी। एक दिन उसके लिए आफत का दिन बनकर आया। सुनीता लघुशंका के लिए स्कूल के पास ही बड़े एक खंडहर में चली गई। आमतौर पर वह और उसकी सहेलियां इस खंडहर को शौचालय के रूप में इस्तेमाल कर रही थीं। लेकिन उस दिन सुनीता की सहेली किसी कारणवश स्कूल नहीं आई थी। जब सुनीता लघुशंका से फारिग हो रही थी, तभी दो युवकों ने आकर उसे पीछे से दबोच लिया। शायद वह युवक स्कूल की छात्राओं को बहुत दिन से ताक रहे थे। उस दिन सुनीता को अकेले खंडहर में जाते देख उन्हें मौका मिल गया। लेकिन सुनीता की किस्मत शायद उन लड़कियों से अच्छी थी, जो दुर्भाग्य से दरिंदों की गिरफ्त में फंस जाती हैं। उसी वक्त चार अन्य स्कूली छात्राओं ने खंडहर में प्रवेश किया और उन्हें देखकर दोनों दरिंदे भाग खड़े हुए। लेकिन उस दिन के बाद परिजनों ने सुनीता का स्कूल छुड़वा दिया। उस दुर्घटना के बाद खुद सुनीता भी स्कूल नहीं जाना चाहती थी। लेकिन संयोगवश प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मुंह से स्कूलों में शौचालय की बात सुनकर सुनीता के जख्म फिर हरे हो गए।
सुनीता की तकलीफ जायज़ है क्योंकि कभी सूचना प्रोद्योगिकी में तरक्की तो कभी धान के उत्पादन के लिए, तो कभी सावर्जनिक वितरण प्रणाली को कम्प्युटरीकृत करने के लिए देश में अव्वल रहने वाला छत्तीसगढ़ अब पिछड़ा राज्य नहीं कहलाता। हर साल प्रति व्यक्ति आय में तेजी हो रही बढ़ोत्तरी छत्तीसगढ़ की आर्थिक समृद्धि का प्रतीक बनती जा रही है। राज्य सरकार के दावे के अनुसार 2011-12 में जहां राज्य की प्रति व्यक्ति आय 44 हजार 505 रुपए थी वह 2012-13 में 50 हजार 691 रुपए हो गई। वर्ष 2013-14 में यह 56 हजार 990 रुपए होने का अनुमान है। लेकिन इसके बावजूद छत्तीसगढ़ उन राज्यों में भी शुमार है, जहां हजारों स्कूलों में आज भी शौचालय नहीं हैं और जहां हैं, वे कंडम स्थिति में पहुंच चुके हैं। उनका इस्तेमाल करना भी स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। यह हम नहीं कह रहे बल्कि केंद्रीय मानव संसाधन मंत्रालय (एचआरडी) की एक रिपोर्ट कह रही है।
रिपोर्ट बताती है कि प्रदेश में जिन स्कूलों में छात्राओं के लिए शौचालय बनाया गया था, वह रख-रखाव के अभाव में अनुपयोगी हो चुके हैं। इसमें रायपुर में 583, कांकेर में 156, धमतरी में 150, बेमेतरा में 213, मुंगेली में 149 और बलौदाबाजार में 135, सूरजपुर में 503, बस्तर में 359, सरगुजा में 323, गरियाबंद में 235, कोरबा में 238, कोरिया में 189, जशपुर में 166 शौचालय कंडम स्थिति में पहुंच गए हैं। आदिवासी क्षेत्र के स्कूलों में शौचालय की स्थिति पर बात करें तो यहां स्थिति सर्वाधिक खराब है। बस्तर में 738, सूरजपुर में 683, सरगुजा में 560, गरियाबंद में 394, जशपुर में 369, कोरिया में 358 और कांकेर में 323 स्कूलों में शौचालय का निर्माण किया गया, लेकिन अब वे खराब हालत में पहुंच गए हैं।
इसी पखवाड़े की शुरुआत में राज्य के स्कूल शिक्षा मंत्री केदार कश्यप खुद भी शौचालय विहीन स्कूलों को लेकर चिंता जता चुके हैं। कश्यप ने नए रायपुर स्थित मंत्रालय में आला अफसरों की बैठक बुलाकर उन्हें जल्द से जल्द स्कूलों में शौचालयों के निर्माण के निर्देश दिए हैं। हो सकता है कि कश्यप की यह बैचेनी नरेंद्र मोदी की मंशा से जुड़ी हो। लेकिन इसे यह देर आए दुरुस्त आए ही कहा जाएगा।
केदार कश्यप तहलका से कहते हैं कि यह सच है कि कई छात्राओं ने केवल इसी कारण स्कूल आना छोड़ दिया है। लेकिन हम उन लड़कियों के लिए भी किसी ऐसी योजना पर विचार कर रहे हैं, जो उनकी स्कूली पढ़ाई फिर से शुरु करवा सके
स्कूली शिक्षा के सचिव सुब्रत साहू का कहना है कि प्रदेश के सभी स्कूलों में शौचालय की समुचित व्यवस्था की दिशा में काम शुरू कर दिए हैं। आने वाले समय में सभी स्कूलों में इसकी बेहतर व्यवस्था देखने को मिलेगी
भले ही स्कूल शिक्षा मंत्री स्कूल छोड़ रही छात्राओं पर दुख जता रहे हैं, लेकिन ऐसा नहीं है कि वे इसे रोक नहीं सकते। छत्तीसगढ़ में स्कूल शिक्षा विभाग तीसरा ऐसा विभाग है, जिसका सालाना बजट दूसरे विभागों से कहीं ज्यादा होता है। इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि राज्य निर्माण के वक्त यानि वर्ष 2001-2002 में स्कूल शिक्षा विभाग का बजट केवल 813 करोड़ 58 लाख था, जो 2013-14 में बढ़कर 6 हजार 298 करोड़ हो गया है। बजट में जो बिंदु विशेष रूप से उल्लेखित किए गए हैं, उसमें कहीं भी शौचालय निर्माण को शामिल करने की जहमत भी नहीं उठाई गई है। जबकि शालाओं में मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए (जिसमें प्रयोगशाला उपकरण के साथ फर्नीचर खरीदी को भी शामिल किया गया है) 175 करोड़ का प्रावधान किया गया है। जाहिर है कि मूलभूत सुविधाओं में शौचालय भी आता है, लेकिन इसके निर्माण में राज्य सरकार ने कुछ कम ही दिलचस्पी दिखाई है।
छत्तीसगढ़ में लंबे समय से काम कर रहे है ऑक्सफैम इंडिया के कार्यक्रम अधिकारी विजेंद्र अजनबी कहते हैं कि स्कूलों में आवश्यक सुविधाओं का अभाव लड़कियों में कई बीमारियों को भी जन्म दे रहा है। हमारी टीम के सामने लगातार कई ऐसे मामले आए हैं, जो चिंताजनक हैं

यह तो ठीक है कि राज्य बनने के तेरह साल बाद ही सही इस संवेदनशील मुद्दे पर प्रदेश सरकार सक्रिय होती दिख रही है, लेकिन शौचलयविहीन स्कूलों की संख्या में सूबे के स्कूल शिक्षा मंत्रालय के आंकड़े केंद्र के आंकड़ों से कुछ अलहदा हैं। राज्य सरकार की मानें तो केवल दस हजार स्कूलों में शौचालय नहीं है। अगर राज्य सरकार के आंकड़ों को ही सच माना जाए तो दस हजार की संख्या भी छोटी नहीं होती। इन दस हजार स्कूलों में लाखों छात्राएं अपना भविष्य गढ़ने आती होंगी। लेकिन उनके मानसिक कष्ट की कल्पना केवल वही कर सकता है, जिसने कभी ऐसी परिस्थितियों का सामना किया होगा। यहां एक बात यह भी ध्यान में रखनी होगी कि बात केवल लड़कियों की या उनके स्वास्थ्य भर की नहीं है। लाखों बालक भी इस असुविधा का सामना कर रहे हैं। एक अनुमान के मुताबिक समय पर लघुशंका ना जाने पर प्रतिवर्ष आठ लाख लोग संक्रमण और कीडनी संबंधी रोगों के शिकार हो जाते हैं। इनमें बच्चों की संख्या शामिल नहीं है। लेकिन हम उन्हें शौचालय विहीन स्कूलों में भेजकर उन बीमारियों की तरफ ही धकेल रहे हैं। सरकारी मशीनरी को ध्यान रखना होगा कि कल देश का भविष्य गढ़ने वाली इस पीढ़ी के साथ ऐसा अन्याय करने वालों को समय माफ नहीं करेगा। 

शुक्रवार, 26 सितंबर 2014

अनुशासन और हीनता के बीच!

छत्तीसगढ़ के नक्सलविरोधी अभियान में तैनात सीआरपीएफ जवानों पर अनुशासनहीनता की कार्रवाई तो काफी चर्चा में है लेकिन उनके मुश्किल हालात पर कोई बात नहीं कर रहा.
जगदलपुर जिले से निकलकर सड़कविहीन रास्तों से होते हुए जब आप 56 किलोमीटर का रास्ता तय करते हुए तोंगपाल पुलिस थाने पहुंचते हैं तो इस बात का अंदाजा सहज ही हो जाता है कि हम यहां अपने खुद के जोखिम पर है. सीआरपीएफ के जवान हों या छत्तीसगढ़ पुलिस के सिपाही,  यहां सबके चेहरों पर एक-सा तनाव आपको अहसास दिलाता है कि महसूस की जा रही शांति केवल छलावा भर है. कभी भी-कुछ भी हो सकता है. अतीत की घटनाएं भी यही बताती हैं. हालांकि बस्तर को कवर करने वाले पत्रकारों के लिए इसमें नया कुछ भी नहीं है. वे ऐसी परिस्थितियों का हमेशा सामना करते रहते हैं. फिलहाल बात सुकमा जिले के तहत आने वाले ‘तोंगपाल’ की, जो केंद्रीय सुरक्षा बल (सीआरपीएफ) के 16 जवानों और एक पुलिस कांस्टेबल के निलंबन के कारण चर्चा में है.
हाल ही में सीआरपीएफ ने कड़ी अनुशासनात्मक कार्रवाई करते हुए अपने 16 जवानों को निलंबित कर दिया है. वहीं एक पुलिस के सिपाही को भी सीआरपीएफ की रिपोर्ट के आधार पर निलंबित किया गया है. निलंबित जवानों में से 13 कांस्टेबल रैंक, जबकि चार अन्य इंस्पेक्टर व सहायक सब-इंस्पेक्टर रैंक के अधिकारी हैं. इन 17 जवानों पर आरोप है कि ये इस साल की शुरुआत में नक्सलियों के साथ हुई मुठभेड़ में अपने साथियों को मदद देने के बजाए मैदान छोड़कर भाग खड़े हुए थे. इस मुठभेड़ में एक नागरिक समेत कुल 16 लोगों की मौत हुई थी. जिनमें सीआरपीएफ के 11, पुलिस के चार जवान शामिल थे. सीआरपीएफ के आरोप के मुताबिक छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले में इस साल 11 मार्च को दरभा थाना क्षेत्र में तैनात सीआरपीएफ की 80वीं बटालियन के जवान ग्राम टहकवाड़ा के लिए रोड़ ओपनिंग पार्टी के तौर पर रवाना किए गए थे. इस 46 सदस्यीय टुकड़ी के 20 जवान नक्सलियों के एंबुश  (घात लगाकर किया जाने वाला हमला) में फंस गए थे. इस हमले में विक्रम निषाद नामक एक ग्रामीण भी मारा गया था, जो घटना के वक्त अपनी मोटरसाइकिल से गुजर रहा था. इस खूनी मुठभेड़ के तुरंत बाद कोर्ट ऑफ इन्क्वायरी बैठा दी गई थी. इसकी जांच में सामने आया है कि नक्सलियों द्वारा घात लगाकर किए गए इस हमले में सीआरपीएफ जवानों की आगे चल रही टुकड़ी फंस गई थी. जबकि पीछे आ रहे 17 जवान ऐसी विषम परिस्थिति में अपने साथियों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर लोहा लेने के बजाय वहां से जान बचाकर भाग खड़े हुए.
10 साल में 2,129 मौतें
इंस्टीट्यूट ऑफ कॉनफ्लिक्ट मैनेजमेंट (दिल्ली) के आंकड़े बताते हैं कि पिछले दस साल में छत्तीसगढ़ में माओवादी हिंसा में 2,129 लोग मारे गए हैं. इनमें सुरक्षा बल के जवानों और आम नागरिकों की मौत का आंकड़ा 1,447 है. पिछले चार साल मे नक्सली हमलों में तेजी आई है. वर्ष 2011 के बाद माओवादियों ने अपने पुराने मिथक तोड़ते हुए बीते चाल साल में राजनेताओं और आम लोगों को भी अपना निशाना बनाना शुरू कर दिया है. 2011 से लेकर 2014 तक माओवादियों ने कई बड़ी घटनाओं को अंजाम दिया है. वहीं साउथ एशिया टैररिज्म पोर्टल से उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक माओवादी हिंसा के कारण 2005 से 2012 के बीच छत्तीसगढ़ में कुल 1,855 मौतें हुई हैं. इनमें 569 आम नागरिकों, सुरक्षा बलों के 693 जवान और 593 माओवादियों की मौत शामिल है.
सीआरपीएफ निदेशक जनरल दिलीप त्रिवेदी जानकारी देते हैं कि शुरुआती जांच में दोषी मिले इन जवानों को छत्तीसगढ़ के आईजी ने निलंबित कर दिया है और पूरी जांच तीन महीने के भीतर पूरी कर ली जाएगी. एक दशक से ज्यादा समय से इन इलाकों में नक्सलियों से मोर्चा ले रही सीआरपीएफ की ओर से अपने जवानों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई का यह दुर्लभ मामला है. सीआरपीएफ के अधिकारियों का कहना है कि जांच में पता चला है कि अगर इन जवानों ने मुंहतोड़ जवाब दिया होता तो कई जानें बचाई जा सकती थीं और करीब 200 नक्सलियों में से कई ढेर भी किए जा सकते थे. करीब तीन घंटे तक चली इस मुठभेड़ में नक्सली शहीद जवानों से बड़ी संख्या में हथियार लूट ले गए थे.
हालांकि सीआरपीएफ के आरोप और अब तक की कार्रवाई  से इतर इस प्रकरण का दूसरा पहलू भी है, जिसे नजरअंदाज किया जा रहा है. दरअसल छत्तीसगढ़ में सीआरपीएफ जवानों के निलंबन का यह प्रकरण कई गंभीर सवाल खड़े कर रहा है. पहला तो यही है कि क्या सर पर कफन बांधकर नक्सल इलाकों में काम कर रहे जवानों का मनोबल टूट रहा है? दूसरा सवाल है कि क्या इन जवानों की मानसिक व भौतिक परिस्थितियों पर पुनर्विचार की जरूरत नहीं है? ये ऐसे मसले हैं जिनपर नक्सविरोधी अभियान शुरू होने के बाद कई बार आवाज उठती रही है लेकिन इस घटना के बाद यह बहस और गंभीर हो गई है.
फिलहाल नक्सल विरोधी अभियान में सीआरपीएफ के कंधे से कंधा मिलाकर अभियान चलानेवाली राज्य पुलिस ने आधिकारिक रूप से इस पूरे विवाद से दूरी बना ली है. छत्तीसगढ़ के अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक मुकेश गुप्ता कहते हैं, ‘ सीआरपीएफ के मामले में हम क्या बोल सकते हैं. यदि उन्होंने कार्रवाई की है, तो सही ही होगी.’  पुलिस मुख्यालय में पदस्थ एक अन्य उच्च पदस्थ अफसर भी मानते हैं कि जब जवानों को विशेष साहस दिखाने पर कई तरह से उपकृत किया जाता है, आउट ऑफ टर्म प्रमोशन दिया जाता है तो गलती होने पर सजा क्यों नहीं दी जा सकती. वे कहते हैं,  ‘हमारी फोर्स बेहद विपरीत परिस्थितियों में काम करती है. यहां जवानों की संख्या से ज्यादा उनका साहस मायने रखता है. सबको साथ मिलकर काम करना होता है तभी सकारात्मक परिणामों तक पहुंचा जा सकता है. अब अगर ऐसे में टीम भावना ही ना रहे तो कैसे काम चलेगा. कोई भी जवान कैसे अपने साथियों पर भरोसा कर पाएगा?’
दंतेवाड़ा और बस्तर में मई से नवंबर के बीच मलेरिया का भारी प्रकोप रहता है और हर साल सैकड़ाें जवान इससे ग्रसित होते हैं
वैसे सीआरपीएफ जवानों पर कार्रवाई पर यहां एक राय नहीं है. तोंगपाल पुलिस थाने के एसआई शिशुपाल सिन्हा तहलका से बात करते हुए कहते हैं कि जिस दिन घटना हुई वे उस दिन शासकीय कार्य से कहीं बाहर गए हुए थे लेकिन, ‘ मौके पर मौजूद लोग बताते हैं कि जवान भागे नहीं थे, बल्कि वे भी फायरिंग में फंस गए थे. यही कारण था कि वे अपने साथी जवानों की मदद नहीं कर पाए.’ कुछ पुलिसकर्मी जवानों पर कार्रवाई को भी परिस्थितियों के हिसाब से गलत मानते हैं. तोंगपाल थाने में ही पदस्थ एक पुलिसकर्मी नाम न छापने की शर्त पर कहते हैं, ‘जवानों की स्थिति को समझे बगैर उनपर गलत कार्रवाई की गई है. अगर जवानों को कायरता ही दिखानी होती तो वे पहले ही ड्यूटी से मना कर देते. बिलकुल विपरीत परिस्थिति में संघर्ष करनेवाले जवान कायर नहीं है. वे बरसात में भी हर एंटी नक्सल ऑपरेशन में भाग लेते रहे हैं. आप देखिए न जवानों को, वे कैसे रह रहे हैं. कई कैंप तो दुनिया से कटे हुए लगते हैं. उन्हें हैलीकॉप्टर के जरिए भोजन और दवाइयां भेजी जाती हैं. न उनके फोन पर नेटवर्क मिलता है, न ही कोई दूसरी सुविधा. कई बार तो छुट्टी मिलने के बाद जवानों को जगदलपुर आने में ही दो से तीन दिन लग जाते हैं. रायपुर पहुंचते-पहुंचते पूरा हफ्ता खराब हो जाता है. बहुत दबाव के बीच जवानों को काम करना पड़ रहा है.’
इस पुलिसकर्मी की बातों को तोंगपाल तक की यात्रा करते हुए आसानी से समझा जा सकता है. बस्तर के अंदरूनी इलाकों में कैम्प कर रहे सीआरपीएफ जवानों की हालत तो और भी बदतर है. उन्हें कभी कीटों (छोटे कीड़े) के प्रकोप का सामना करना पड़ रहा है तो कभी मलेरिया उनकी जान ले रहा है. जान जोखिम में डालकर तो वे काम कर ही रहे हैं, लेकिन न तो उनके पास बातचीत की सुविधा है, न ही बेहतर चिकित्सा व्यवस्था. रोज-रोज एक ही उबाऊ काम करके उनका मनोबल भी टूटता है. तोंगपाल में ही काम करनेवाले स्थानीय पत्रकार संतोष तिवारी कहते हैं, ‘यहां की परिस्थितियां आम आदमी के जीने लायक नहीं हैं. न सड़कें हैं, न मोबाइल फोन में नेटवर्क है.’
इस वक्त पूरे छत्तीसगढ़ में सीआरपीएफ, आईटीबीपी जैसे सुरक्षा बलों की 36 बटालियन तैनात हैं. इनमें से 29 बटालियन अकेले बस्तर में लगाई गई हैं. एक बटालियन में 780 जवान होते हैं, लेकिन मोर्चे पर लड़ने के लिए 400 से 450 जवान ही मौजूद होते हैं. बस्तर में तैनात जवानों को नक्सलियों के अलावा कई मोर्चों पर लड़ाई करनी पड़ती है. नक्सलियों से पहले मच्छरों से उनका मुकाबला होता है. छत्तीसगढ़ में मई से लेकर नवंबर तक मच्छरों का प्रकोप रहता है. खासकर बस्तर में अनगिनत लोग मलेरिया के कारण काल के गाल में समा जाते हैं. इस साल की जुलाई तक ही राज्य मलेरिया कार्यालय द्वारा इकट्ठे किए गए आंकड़ों पर गौर करें तो अकेले बस्तर में 23 हजार 774 मलेरिया पीड़ित मरीज मिल चुके हैं. हर साल मलेरिया से जवानों की मौत की घटनाएं भी सामने आती रहती हैं.  हालांकि मलेरिया से मरने वाले जवानों का आधिकारिक आंकड़ा कहीं भी उपलब्ध नहीं है. छत्तीसगढ़ में बस्तर एक ऐसा इलाका है, जहां ‘फेल्सीफेरम’ मलेरिया ज्यादा फैलता है. इस मलेरिया में यदि सात दिनों के भीतर पीड़ित को सही दवा ना मिले, तो उसकी मौत निश्चित हो जाती है.
उसमान खान भी सुकमा जिले में आने वाले छिंदगढ़ जैसे घोर नक्सल प्रभावित इलाके के पत्रकार हैं. छिंदगढ़ तोंगपाल से भी 36 किलोमीटर अंदर है. खान कहते हैं, ‘मलेरिया भी जवानों का मनोबल तोड़ रहा है. इस वक्त तो यानी अगस्त-सितंबर को हमारे इलाके में मलेरिया का सबसे ज्यादा असर होता है. हर साल दर्जनों लोग दवाई के अभाव में मर जाते हैं. अभी भी कई जवान मलेरिया से जूझ रहे हैं. पिछले साल करीब डेढ़ दर्जन जवान केवल मलेरिया के कारण मौत के मुंह में चले गए थे.’
बस्तर में नक्सल मोर्चों पर तैनात जवानों के सामने कई परेशानियां हैं. जिन्हें उनके आला अधिकारी कितना समझते हैं, ये तो वे ही जानें, लेकिन कभी इनपर चर्चा होती नजर नहीं आती. बहरहाल, तोंगपाल-दरभा प्रकरण में सीआरपीएफ के जवानों के निलंबन की वजह से ये मुद्दे फिर चर्चा में हैं लेकिन इनपर क्या कार्रवाई होगी यह किसी को नहीं पता.

शनिवार, 13 सितंबर 2014

कांग्रेस के बुरे दिन

मध्य भारत में कांग्रेस में ऐन मौके पर खुद उम्मीदवार द्वारा पार्टी की लानत मलानत करने की एक नई परिपाटी बनती जा रही है। ऐसा इसलिए लगता है क्योंकि ये केवल एक बार नहीं बार बार हो रहा है। चाहे मध्यप्रदेश का विदिशा का लोकसभा चुनाव हो या छत्तीसगढ़ की अंतागढ़ विधानसभा सीट का ताजातरीन मामला हो..दोनों ही बार कांग्रेस को उसके ही प्रत्याशियों ने गहरे गड्ढे में उतारने में कोई कसर नहीं छोड़ी है।
छत्तीसगढ़ की धुर नक्सल प्रभावित अंतागढ़ विधानसभा सीट पर उपचुनाव होने वाले हैं। विभिन्न दलों के दिग्गजों का राजनीतिक अखाड़ा बनी इस सीट पर पहली बार मुख्य विपक्षी दल का कोई प्रत्याशी नहीं है। अंतागढ़ विधानसभा क्षेत्र के 202 मतदान में से 190 अतिसंवेदनशील है। इस बार यह सीट नक्सल प्रभावित होने के कारण नहीं बल्कि राजनीतिक उठापटक का केंद्र बन जाने के कारण सुर्खियों में है। वर्ष 2013 में हुए विधानसभा के चुनाव में भाजपा के विक्रम उसेंडी ने कांग्रेस के मंतूराम पवार को 5171 मतों से हराकर इस सीट पर कब्जा बरकरार रखा था। लेकिन उसेंडी के सांसद बनने के बाद अंतागढ़ सीट रिक्त हुई है। कांग्रेस ने इस सीट से एक बार फिर मंतूराम पवार को मौका देने का फैसला किया। पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी ने पवार को प्रत्याशी बनाए जाने का यह कहकर विरोध किया था कि वह पहले भी कुछ चुनाव हारे है। वैसे पवार जोगी के करीबी माने जाते हैं और पवार को टिकट देने में प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष भूपेश बघेल की मुख्य भूमिका थी। पवार ने नामांकन दाखिल कर दिया और उनके नाम पर पर्चे, पोस्टर और अन्य चुनाव सामाग्री भी छपकर तैयार हो गई। लेकिन पवार ने कांग्रेस को बड़ा झटका देते हुए चुनाव से पहले ही उम्मीदवारी वापस ले ली। पवार के इस कदम से हड़बड़ाई प्रदेश कांग्रेस कमेटी ने पवार से संपर्क करने की कोशिश की लेकिन पवार ऐसे गायब हुए कि सीधे दूसरे दिन एक होटल में संवाददाता सम्मेलन में ही सामने आए। इधर पवार के इस कदम के बाद पार्टी में आरोप प्रत्यारोप का दौर शुरू हो गया जिसमें राज्य सरकार का नाम भी आ गया।  कांग्रेस के इस फजीहत की स्थिति में आने के लिए जोगी का कहना था कि पवार ने पहले ही चुनाव लड़ने से इंकार कर दिया था तब उन्हें टिकट क्यों दिया गया। उन्होंने कहा कि वर्तमान प्रदेश अध्यक्ष को सभी को विश्वास में लेकर और सभी की सलाह से कार्य करना चाहिए। उधर पवार ने प्रदेश कांग्रेस कमेटी पर असहयोग का आरोप लगाते हुए कहा कि उनके मना करने के बावजूद उन्हें उम्मीदवार बनाया गया।
पीसीसी अध्यक्ष भूपेश बघेल ने हालांकि आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि पवार का बयान सफेद झूठ के अलावा कुछ नहीं है।  बघेल ने कहा कि पवार का फैसला कांग्रेस को नीचा दिखाने वाला था इसलिए उन्हें तत्काल पार्टी से निष्कासित कर दिया गया। लेकिन इस मामले में षड्यंत्र हुआ है और इसका खुलासा जल्द हो जाएगा। उन्होंने इस मामले में राज्य सरकार पर भी निशाना साधा और कहा कि देश में हुए उपचुनाव में भाजपा की हार हो रही है और इसलिए ही राज्य में संभावित हार से डरी भाजपा ने इस तरह का हथकंडा अपनाया है। बघेल ने आरोप लगाया कि भाजपा ने अपने प्रत्याशी को निर्विरोध चुनने की कोशिश की और इसके लिए अन्य उम्मीदवारों को डराया धमकाया गया जिसके चलते अंतागढ़ उपचुनाव में अन्य 10 उम्मीदवारों ने भी अपना नाम वापस ले लिया। इस सीट पर अब दो उम्मीदवारों के बीच ही मुकाबला हो रहा है। कांग्रेस के आरोप पर भाजपा की तरफ से अंतागढ़ उप चुनाव के प्रभारी और उच्च शिक्षा मंत्री प्रेम प्रकाश पांडेय कहते हैं कि इस उपचुनाव में भाजपा प्रत्याशी भोजराज नाग की जीत तय है। कांग्रेस को अपनी अंदरूनी कलह से पहले उबरना चाहिए बाद में दूसरों पर आरोप लगाना चाहिए। छत्तीसगढ़ में कई गुटों में बंटी कांग्रेस लगातार कमजोर हो रही है और पिछले एक दशक से ज्यादा समय से वह सत्ता से बाहर है।
पवार प्रकरण पर मुख्यमंत्री रमन सिंह ने भी चुटकी लेते हुए कहा कि कांग्रेस पहले अपना घर संभाले, फिर भाजपा से दो दो हाथ करने की सोचे।
उधर, इस प्रकरण को लेकर भाजपा के भीतर भी कई तरह की बातें हो रही हैं। नाम ना छापने की शर्त पर प्रदेश भाजपा के एक पदाधिकारी ने तहलका को बताया कि भाजपा प्रत्याशी भोजराज नाग गौंड आदिवासी जरूर है, लेकिन उनकी पृष्ठभूमि छत्तीसगढ़ नहीं बल्कि महाराष्ट्र से संबंधित है। वे महाराष्ट्र के आदिवासी गौंड है, स्थानीय ना होने के कारण अंतागढ़ विधानसभा सीट पर उनके खिलाफ अंदर ही अंदर विरोध हो रहा था। भाजपा कार्यकर्ता ही भोजराज नाग को उम्मीदवार बनाए जाने से खुश नहीं थे। ऐसे में पार्टी के भीतर ये डर बैठ गया था कि नाग हार भी सकते हैं। कांग्रेस भी इस बात को जानती थी, और यही कारण था कि कांग्रेस नेता इस उपचुनाव में मंतूराम पवार की जीत तय मान कर चल रहे थे।
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करोड़ों की डील का आरोप
अब जब मंतूराम ने खुद ही नामांकन वापस ले लिया है, तब कांग्रेस के ही नेता खुलेआम आरोप लगा रहे हैं कि मंतूराम ने भाजपा के साथ मिलकर 5 करोड़ की डील की है। कांग्रेस पदाधिकारी बीआर खूंटे कहते हैं कि मंतू ने नाम वापस लेने के लिए पांच करोड़ लिए हैं। कांग्रेस में चर्चा है कि मंतूराम ने कथित कांग्रेस के एक दिग्गज नेता के साथ मिलकर भाजपा से 20 करोड़ रुपए लिए हैं। लेकिन यह महज़ अफवाहें ही है, क्योंकि किसी के पास भी इस प्रकार की किसी डील का पुख्ता सबूत नहीं है।
विदिशा लोकसभा चुनाव की याद ताजा
अंतागढ़ उपचुनाव का कांग्रेस द्वारा बिना लड़े ही भाजपा को वॉक ओवर देने के मामले ने वर्ष 2009 के विदिशा (मध्यप्रदेश) लोकसभा चुनाव की यादें ताजा कर दीं। इस चुनाव में भाजपा ने सुषमा स्वराज को मैदान में उतारा था, वहीं कांग्रेस की तरफ से राजकुमार पटेल प्रत्याशी थे। लेकिन ऐन मौके पर पटेल का नामांकन रद्द हो गया था, वह भी इस कारण से कि उन्होंने तय समय सीमा में अपना बी फॉर्म जमा नहीं किया था। इसके बाद कांग्रेस ने राजकुमार पटेल को पार्टी से निष्कासित कर दिया था। इस मामले ने इसलिए तूल पकड़ा था कि एक तो इस सीट पर स्वराज भाजपा प्रत्याशी थीं, वहीं राजकुमार पटेल कांग्रेस के पुराने नेता थे, वे दिग्विजय सरकार में मंत्री रह चुके थे, उनके द्वारा समय पर बी फार्म जमा नहीं करने वाली बात को कई लोग नहीं पचा पा रहे थे। हालांकि मध्यप्रदेश में ये कोई इकलौता मामला नहीं है, जिसमें भाजपा को वॉकओवर मिल गया हो। वर्ष 2013 में संपन्न विधानसभा चुनाव में भी कांग्रेस प्रदेश की 230 सीटों में से केवल 229 पर ही चुनाव लड़ पाई थी। दरअसल सिंगरौली के देवसर निर्वाचन क्षेत्र के कांग्रेस प्रत्याशी डॉ एचएल प्रजापति का नामांकन भी खारिज हो गया था। कारण ये बताया गया था कि प्रजापति का सरकारी सेवा में इस्तीफा मंजूर नहीं हो पाया था। इसलिए उन्हें चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य साबित कर दिया गया। इसी साल मध्यप्रदेश की अशोक नगर सीट पर भी कांग्रेस प्रत्याशी जसपाल सिंह जज्जी का नामाकंन जाति संबंधी विवाद के चलते निरस्त कर दिया गया था, लेकिन प्रत्याशी की पुनर्विचार याचिका के बाद उनका नामांकन मान्य कर लिया गया। गौर करने वाली बात ये है कि कभी भाजपा प्रत्याशियों के साथ इस तरह के वाकये नहीं पेश आते।


धर्म से बहिष्कृत “साईं”



जाको राखे साईंया, मार सके ना कोय, बाल ना बांका कर सके, जो जग बैरी होय....पीढ़ियों से सुनी जा रही इस कहावत के अस्तित्व पर अब ग्रहण लगता नजर आ रहा है...क्योंकि जिस साईं के बल पर बुराईयों पर जीत पाने का दम इन पक्तियों के जरिए भरा जाता रहा है, अब उसके अस्तित्व को धर्मसंसद में धर्म विरुद्ध करार दे दिया गया है।   
राजू सेठ (30 वर्ष) की पान की गुमटी है। धर्मसंसद के फैसले से बेखबर राजू कहता है कि जिसको जो भगवान अच्छा लगे, वो उसे माने। वैसे भी इस विवाद में पड़े कौन, हमें तो दो वक्त की रोटी कमाने से फुर्सत नहीं है। राजू सेठ की बात यहां इसलिए मायने रखती है, क्योंकि उसकी पान की दुकान ठीक वहीं स्थित है, जहां धर्मसंसद आयोजित कर साईं को प्रामाणिकता के सर्टिफिकेट देने का प्रपंच रचा गया। राजू सेठ को धर्मसंसद देखने-सुनने की ना तो फुर्सत है, ना ही उत्सुकता क्योंकि भीड़ के कारण उसकी अच्छी खासी कमाई हो रही है।
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से करीब 130 किलोमीटर दूर स्थित कबीरधाम (कवर्धा) में शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती के चार्तुमास के कारण पिछले दो महीने से बहुत गहमागहमी है। लेकिन इस सप्ताह के दो दिन 24 और 25 अगस्त कुछ ज्यादा की खास रहे, खास इसलिए क्योंकि कबीरधाम में दो दिनों तक साधु संतों और उनके अनुयायियों का मेला लगा रहा। मौका था शंकराचार्य द्वारा बुलाई गई 19वीं धर्मसंसद का। धर्मसंसद का एंजेडा तो लंबा चौड़ा था, लेकिन मुख्य विषय था शिर्डी के साईं को भगवान होने या ना होने का सर्टिफिकेट देने का। इसपर दो दिनों तक बहस चली, शास्त्रार्थ किया गया, लेकिन दिलचस्प बात ये कि शास्त्रार्थ करने के लिए दूसरा पक्ष मौजूद ही नहीं था। शिर्डी के साईं संस्थान से कोई प्रतिनिधि इस धर्मसंसद में नहीं आया। तीन साईं भक्तों मनुष्यमित्र (मध्यप्रदेश), प्रेमकुमार और अशोक कुमार (दोनों दिल्ली) ने साईं को पक्ष रखने की हिमाकत की तो उनकी बात को पूरा सुने बगैर उनके कपड़े फाड़कर मंच से नीचे उतार दिया गया। दरअसल मनुष्यमित्र ने मंच पर पहुंचकर यह कह दिया कि साधु संत गौ हत्या जैसे विषयों पर धर्म संसद क्यों नहीं बुलाते, धर्म से जुड़े दूसरे मुद्दों पर अनशन क्यों नहीं करते, तब एक साधु ने साईं भक्त की चुनौती स्वीकार करते हुए निर्जल अनशन का ऐलान कर दिया। इस पर कुछ अन्य साधुओं ने सांई भक्त के कपड़े फाड़ दिए। पुलिस ने बीच बचाव करते हुए साईं भक्तों को सुरक्षित मंच से उतारकर कार्यक्रम से बाहर निकालकर सीधे रायपुर पहुंचा दिया।
इसके बाद दो दिन तक चली धर्मसंसद में काशी विद्वत परिषद ने अपना फैसला सुनाया कि साईं भगवान नहीं है। ना ही गुरु है, ना ही संत ना ही अवतार, इसलिए साईं की पूजा बंद होनी चाहिए। धर्म संसद ने एक फैसला और लिया है कि देश में भविष्य में कोई साईं मंदिर नहीं बनाया जाए। सनातन धर्म के मंदिरों में साईं की प्राण प्रतिष्ठा नहीं की जाएगी। अपने फैसले के बारे में काशी विद्वत परिषद ने तर्क दिया कि दो दिन के मंथन के बाद साईं किसी भी कसौटी पर खरे नहीं उतरे हैं, इसलिए उन्हें भगवान कहना वेद सम्मत या धर्म सम्मत नहीं है।
जिन करोड़ों लोगों के लिए धर्मसंसद ये फैसला सुना रही थी, उन्हीं में से एक राजेश चौहान (36वर्ष) के विचार भी राजू सेठ से अलहदा नहीं हैं। धर्मसंसद के आयोजन स्थल तक लोगों को पहुंचाने वाले पेशे से ड्रायवर चौहान को भी इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि कौन किसको पूज रहा है, या किसको पूजा जाना चाहिए। उसे तो बस अपने बच्चों को पढ़ा-लिखाकर बड़ा आदमी बनाना है क्योंकि चौहान नहीं चाहता कि उसके बच्चे भी उसकी तरह ड्रायवरी करें।
कबीरधाम की धर्म संसद में पहुंचे 13 अखाड़ा प्रमुखों को शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती का समर्थन करते हुए शिर्डी के साईंबाबा को भगवान मानने से इंकार कर दिया है। अखाड़ा प्रमुखों ने एक स्वर में कहा कि साईं का कोई ऐतिहासिक व धार्मिक प्रमाण नहीं है। निरंजनी अखाड़ा के अध्यक्ष नरेंद्र गिरी का कहना है कि जब धर्म पर संकट आता है, तब धर्मसंसद का आयोजन किया जाता है। यह 19 वां धर्मसंसद है। धार्मिक मुद्दों का निपटारा कोर्ट नहीं कर सकती, इसे धर्मसंसद में ही निपटाया जाता है। फकीर को भगवान मानना पूरी तरह से गलत है। शंकराचार्य इसी बात का तो विरोध कर रहे हैं
पंचायती जूना अखाड़ा हरिद्वार के प्रमुख संत हरिगिरि का कहना है कि हिंदू सनातन धर्म की सुदृढ़ धार्मिक परंपराओं से कुछ लोग अंजान हैं। वेदों और शास्त्रों में सप्रमाण वर्णित व्यक्ति ही भगवान है। इसी प्रामाणिकता के आधार पर हिंदू धर्म में पूजा करने की पंरपरा है। लाखों हिंदू भटकर साईं की पूजा करने लगे हैं। उन्हीं समझा बुझाकर सही राह पर लाया जाएगा। साईं ट्रस्ट का नाम लिए बगैर स्वामी हरिगिरि ने कहा कि आपको व्यवसाय करना है, तो करिए। लेकिन हिंदूओं को भ्रमित मत करिए। लोगों को समझाने का काम शंकराचार्य और संतों का है। हमने अपना काम कर दिया है, धीरे-धीरे लोग भी इसे मानेंगे
शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती ने धर्म संसद के दौरान साईं को असत्य, अचेतन और अयोग्य करार दिया। उन्होंने कहा कि साईं का कोई अस्तित्व ही नहीं है। साईं संस्थान से किसी भी प्रतिनिधि के धर्म संसद में नहीं पहुंचने के सवाल पर शंकराचार्य ने कहा कि वे लोग विज्ञापन जारी करते हैं, लेकिन धर्म संसद में पहुंचकर विमर्श करने को तैयार नहीं है। जब वे जवाब देने को तैयार नहीं है तो उनको जिम्मेदारी लेनी होगी कि धर्म संसद में जो निर्णय हो, उसे वे मानेंगे। शंकराचार्य ने साईं के अवतार के बारे में प्रमाण मांगते हुए कहा कि सनातन धर्म में शिव, गणेश, विष्णु और सूर्य या उनके अवतारों की पूजा होती है। साईंभक्त ये स्पष्ट करें कि साईं किनके अवतार हैं।
धर्मसंसद पर भाजपा, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ व विश्व हिंदू परिषद पर भी निशाना साधा गया। धर्मसंसद में शामिल होने आए भारत साधु समाज के उपाध्यक्ष एवं महामंडेश्वर स्वामी डॉ प्रेमानंद जी महाराज ने कहा कि भाजपा हिंदुओं की रक्षा करने वाली पार्टी होने का दावा करती है। लेकिन धर्म संसद में भाजपा, संघ या विहिप की तरफ से कोई प्रतिनिधि नहीं आया।
दूसरी तरफ धर्म संसद से दूरी बनाते हुए साईं ट्रस्ट शिर्डी के जनसपंर्क अधिकारी मोहन यादव का कहना है कि हम धर्म संसद के फैसले पर कोई टिप्पणी या प्रतिक्रिया नहीं देना चाहते।  
वहीं साईं भक्त संजय साईं ने धर्म संसद को पाखंड बताते हुए इसका विरोध किया है। संजय का आरोप है कि साईं ट्रस्ट साधु संतों को शिर्डी बुलाकर साईंबाबा की पूजा संबंधित सारी बातें स्पष्ट कर चुका है। लेकिन इसके बावजूद भी धर्म संसद का आयोजन किया जाना पाखंड की पराकाष्ठा है। संजय ने कहा कि कवर्धा में धर्म संसद के मंच पर जिस तरह एक साईं भक्त के साथ बदसलूकी की गई, हमें इसकी आशंका थी, इसलिए शिर्डी साईं संस्थान से कोई प्रतिनिधि धर्म संसद में नहीं पहुंचा
इनका समर्थन
जूना अखाड़ा, निरंजनी अखाड़ा, महानिर्वाणी अखाड़ा, अटल अखाड़ा, आनंद अखाड़ा, पंचाग्नि अखाड़ा, नागपंथी गौरखनाथ अखाड़ा, वैष्णव अखाड़ा, निर्मोही अखाड़ा, निर्मल पंचयाती अखाड़ा, उदासीन अखाड़ा, रामनंदी गिंदवरी अखाड़ा समेत काशी विद्वतपीठ, महामंडलेश्वरों के धर्माचार्यों ने साईं के मुद्दे पर शंकराचार्या का समर्थन किया है।
धर्म की राजनीति या राजनीति का धर्म
शिर्डी के साईंबाबा के मामले में केंद्र की नई-नवेली सरकार, भाजपा, कांग्रेस सब चुप हैं। शुरुआत में केंद्रीय जलसंसाधन मंत्री उमा भारती ने जरूर शंकराचार्य की बात को काटते हुए टिप्पणी कर दी थी, लेकिन बात उनके इस्तीफे की मांग तक आ गई तो उमा ने भी चुप्पी साध ली। उमा की बात काटते हुए कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह शंकराचार्य का दबी जुबान से समर्थन कर दिया था। लेकिन अब कहीं से कोई प्रतिक्रिया नहीं आ रही है। दरअसल शिर्डी के साईंबाबा की प्रामाणिता पर सवाल उठाने वाले शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती को कांग्रेस समर्थक माना जाता रहा है। ये अलग बात है कि शंकराचार्य ने धर्मसंसद के लिए भाजपा शासित प्रदेश छत्तीसगढ़ को चुना। शंकराचार्य चातुर्मास के लिए कवर्धा आए थे। मुख्यमंत्री रमन सिंह का पैतृक निवास भी कवर्धा में ही है। शंकराचार्य ने रमन सिंह के निवास से चंद कदमों दूर ही अपना डेरा डाला हुआ है। उन्हें राज्य अतिथि का दर्जा दिया गया है। सबसे महत्वपूर्ण बात ये कि धर्म संसद में आने वाले 28 साधु संतों को भी राज्य अतिथि का दर्जा दिया गया यानि कहा जा सकता है कि धर्म संसद राज्य सरकार के सरंक्षण में ही बुलाई गई। अब यहां गौर करने वाली बात ये है कि महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। इसमें कोई दो राय नहीं कि शिर्डी महाराष्ट्र में धार्मिक आस्था का बड़ा केंद्र है। महाराष्ट्र में स्थित तीन ज्यार्तिलिंग घृष्णेश्वर (औरंगाबाद), भीमाशंकर (पुणे) और त्र्यंबकेश्वर(नासिक) कभी चढ़ावे को लेकर सुर्खियों में नहीं रहते, जबकि शिर्डी में चढ़ने वाले अकूत चढ़ावे की आए दिन चर्चा होती है, जाहिर है कि भक्तों की आमद शिर्डी में ही ज्यादा होती है। साईं से महाराष्ट्र का दलित समुदाय भी गहरा जुड़ा हुआ है। साईं के प्रचार प्रसार में इस समुदाय का भी खासा योगदान रहा है। मतदाताओं का एक बड़ा समूह शिर्डी में आस्था रखता है, ऐसे में ऐन चुनाव के वक्त ना तो भाजपा ना ही कांग्रेस इस मुद्दे पर बैठे ठाले बवाल पैदा करना नहीं चाहते। शिवसेना और मनसे ने भी मौन धारण कर रखा है। इसी पर पेंच यह है कि शंकराचार्य समेत धर्मसंसद में शामिल होने वाले साधु संत भाजपा से जवाब चाहते हैं, आयोजन के दौरान केवल भाजपा को बार बार कोसा गया, जबकि कांग्रेस पर किसी ने टीका टिप्पणी नहीं की। अब भाजपा संगठन या सरकार के तौर पर यदि इस मुद्दे पर कोई प्रतिक्रिया जाहिर करती है, तो लाखों साईंभक्तों की आस्था पर चोट होगी, जिसका का खामियाजा भाजपा को महाराष्ट्र समेत दूसरे राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनाव में चुकाना पड़ सकता है। शंकराचार्य का यह चक्रव्यूह भाजपा भी खूब समझ रही है, यही कारण है कि भाजपा शासित प्रदेश होने के बावजूद पार्टी या सरकार का कोई जनप्रतिनिधि धर्मसंसद के आसपास भी नहीं फटका।
धर्मसंसद में पारित 8 प्रस्ताव
-साईं भगवान, गुरु, अवतार, संत नहीं। पूजा बंद हो।
-गंगा साफ हो।
-अध्योध्या में राम मंदिर बने।
-गौहत्या व कसाई खाने बंद हों।
-नकली साधुओं का बहिष्कार।
-स्कूलों में रामायण, महाभारत व वेदों की पढ़ाई।
-नारियों का सम्मान हो, हमें अपना आचरण सुधारने की जरूरत।
-धर्मांतरण रोकना होगा।
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न्यायिक लड़ाई के लिए भी तैयारी
साईं द्वारिकापुरी और ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती मंदिरों में साईं की फोटो अथवा मूर्ति लागने के खिलाफ न्यायिक लड़ाई भी लड़ने को तैयार हैं। इसकी शुरुआत शंकराचार्य ने इस साल के शुरु होते ही नैनीताल हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को लैटर पिटीशन भेजकर सनातन धर्म मंदिरों में साईं की मूर्तियां हटाने का आग्रह करने के साथ कर दी थी। इस पिटीशन में कहा गया था कि सनातन धर्म के मठ मंदिरों में देवी देवताओं के साथ साईं की मूर्ति अथवा फोटो लगाई जा रही है। यहां तक की साईं से संबंधित साहित्य में वेद उपनिषद के मंत्र तक बदल दिए गए हैं। इस बारे में शंकराचार्य के प्रवक्ता अजय गौतम कहते हैं कि जब बाइबिल, कुरान आदि धर्मग्रंथों की शब्दावली को नहीं बदला जा सकता तो वेद उपनिषद के मंत्रों में साईं को शामिल कर करोड़ों लोगों की आस्था से खिलवाड़ क्यों किया जा रहा है। गौतम आगे कहते हैं कि आंध्र प्रदेश व मद्रास हाईकोर्ट ने अलग अलग फैसलों में साफ किया है कि साईं भगवान नहीं फिलॉस्फी हैं। इस वर्ष जून में हरिद्वारा में आयोजित धर्म संसद में भी शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद साईं की मूर्तियां हटाने का प्रस्ताव पारित करवा चुके हैं।
क्यों बढ़ रहा है साईं पर विवाद
शिर्डी के साईंबाबा को लेकर इस नए विवाद की जड़ में आखिर ऐसा क्या है, जो इसे इतना तूल दे रहा है। क्या इसके पीछे शिर्डी में चढ़ने वाला चढ़ावा है, या फिर कुछ और। लेकिन धर्मसंसद में हुई बहस ने कई ऐसी बातों की तरफ ध्यान खींचा, जिन पर एक बार तो विचार होना ही चाहिए। आइए एक नज़र उन बिंदुओं पर भी-
साईं बाबा से राम तक
हिंदू साधु संतों ने इस बात पर भी घोर आपत्ति जताई कि करीब दशक भर पहले तक साईं के आगे बाबा शब्द लगाया जाता था, लेकिन अब उन्हें साईंराम के रूप में स्थापित किया जा रहा है। पहले लोग सीताराम का जाप किया करते थे, अब उन्हें साईंराम सिखाया जा रहा है। पहले लोग गुरुवार को भगवान विष्णु का व्रत रखते थे, लेकिन उस व्रत की जगह साईं के व्रत ने ले ली है।
भक्त चढ़ाते हैं बेहिसाब चढ़ावा
शिर्डी के साईं बाबा को लेकर अक्सर कुछ इस तरह की खबरें पढ़ने को मिलती रही हैं। मसलन साईं बाबा को स्वर्ण मुकुट भेंट। साईं भक्त ने दान किए दो करोड़ के हीरे। साईंबाबा को 40 लाख की स्वर्ण माला भेंट। वर्ष 2014 की शुरुआत में ही यानि क्रिसमत और न्यू ईयर के मौके पर 10 लाख से ज्यादा भक्तों ने साईं के दर्शन कर लिए थे। नए साल के एक हफ्ते बाद जब साईं मंदिर ट्रस्ट ने नोटों के बंडल बनाकर गिनती की तो पता चला कि मंदिर के खजाने में 15 करोड़ 13 लाख नकद और बड़ी मात्रा में सोने-चांदी के जेवरात आए हैं। वर्ष 2012 में शिर्डी के साईंबाबा मंदिर में श्रद्धालुओं ने 274 करोड़ रुपए नकद चढ़ावा चढ़ाया था। जो 2011 की तुलना में 20 फीसदी अधिक थी। नकद रुपयों के अलावा भक्तों ने 36 किलो सोना और 373 किलो चांदी भी चढ़ाई थी। साईं संस्थान के कार्यकारी अधिकारी किशोर मोरे की मानें तो साईं बाबा के ट्रस्ट का वित्तीय वर्ष जनवरी से शुरु होकर जनव री को ही समाप्त होता है। मोरे के मुताबिक साईं संस्थान ट्रस्ट की कुल संपत्ति लगभग 800 करोड़ की है।
चढ़ावे के घपले का आरोप
साल 2012 में एक आरटीआई कार्यकर्ता संजय काले ने तत्कालीन मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण को पत्र लिखकर शिर्डी में चढ़ाए गए चढ़ावे में घपले का आरोप लगाया था। सूचना के अधिकार में प्राप्त दस्तावेजों के आधार पर संजय काले ने आरोप लगाया था कि साल 2008 में 19 किलो सोना गलाने के लिए भेजा गया, जब सोना गलकर आया तो उसमें 8 फीसदी की कमी दिखाई गई थी। वहीं 2009 में 53 किलो सोना गलाने के लिए भेजा गया, तब उसमें 12 फीसदी और 2012 में 37 किलो सोना गलाने के बाद 13.5 फीसदी की कमी दिखाई गई थी। सोने के अलावा साल 2008 में 270 किलो चांदी, साल 2009 में 430 किलो चांदी और 2012 में 513 किलो चांदी गलवाई गई और तीनों ही बार उसमें 24 फीसदी की कमी दर्शाई गई। काले ने चह्वाण को पत्र लिखर उच्च स्तरीय जांच करवाने की मांग भी की थी। हालांकि बाद में मामले को रफा दफा कर दिया गया।
साईं के प्रचार के तरीकों पर भी आपत्ति

जानकारों की मानें तो 1970 के बाद शिर्डी के साईंबाबा की लोकप्रियता तेजी से बढ़ी। मनोज कुमार की साईंबाबा आधारित फिल्म ने शिर्डी के मंदिर को जनमानस के दिलों में स्थापित करने में बड़ी भूमिका निभाई। बॉलीवुड सेलीब्रिटीज़ ने भी साईंबाबा की लोकप्रियता बढ़ाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। नाम ना छापने की शर्त पर एक पुजारी कहते हैं कि आपको याद होगा कि करीब 20 से 25 साल पहले पर्चे बंटवाकर साईंबाबा की मार्केटिंग की जाती थी। उनपर लिखा होता था कि इन पर्चों को पढ़ने के बाद इसे फलानी संख्या में छपवाकर बाटेंगे तो दस दिन के भीतर आपको फलां चमत्कार देखने को मिलेंगे, अगर नहीं बांटेगे तो आपका फलां नुकसान हो जाएगा। फलां ने पर्चा बांटा तो उसकी शादी हो गई, उसकी नौकरी लग गई वगैरह-वगैरह। 1987 से 1994 तक यह पर्चा वितरण बहुत चला था। जनता धर्मभीरू है, कभी उसे डरा धमकाकर उसके मानस में नया अवतार, भगवान या संत बैठाया जाता है, तो कभी फिर धर्म के नाम पर डराकर उसके आस्था के प्रतीक बदलने की कोशिश की जाती है। हिंदुस्तान में ये सदियों से चला आ रहा है।