सोमवार, 23 मार्च 2020

राज्यपाल अनुसुइया उइके ने कोण्डागांव जिले के ग्राम सल्फीपदर को गोद लेने की घोषणा


राज्यपाल सुश्री अनुसुईया उइके ने आज जिला कोण्डागांव के ग्राम सल्फीपदर के आदिवासी समाज के प्रतिनिधिमंडल ने मुलाकात की। इस दौरान राज्यपाल ने ग्राम सल्फीपदर को गोद लेने की घोषणा की। उन्होंने कहा कि जल्द ही इस क्षेत्र का दौरा करेगी और वहां पर अन्य समस्याओं को निराकरण करने का प्रयास करेगी। उन्होंने कहा कि महिलाओं द्वारा ग्राम सल्फीपदर में वन संरक्षण का कार्य किया जा रहा है, जो वाकई सराहनीय है। वास्तव में जल जंगल जमीन पर आदिवासियों का अधिकार है। वे वनों के असली मालिक है। वे सदियों से वनों की रक्षा करते आएं है। उन्होंने कहा कि 5वीं अनुसूची के तहत ग्रामसभा को व्यापक अधिकार दिए गए है। उक्त किसानों की पानी के समस्या और काली मिर्च की खेती से संबंधित आवश्यकताओं का प्रस्ताव बनाकर ग्रामसभा के माध्यम से प्रशासन को प्रेषित करें। प्रशासन द्वारा उनकी अवश्य मदद की जाएगी।
सुश्री उइके ने कहा कि आदिवासी वनभूमियों का सदियों से उपयोग कर रहे है। प्रशासन द्वारा सामुदायिक वन अधिकार पट्टा प्रदान किया जा रहा है। जिनको पट्टा ना मिला हो उनका सूची बनाकर एक आवेदन शासन को दे। पट्टे मिलने के पश्चात उनकों मालिकाना हक मिल जाएगा और अन्य समस्याओं से भी राहत मिलेगी। राज्यपाल ने समितियों के पंजीयन के कार्यवाही पूर्ण करने को कहा। श्री हरिसिंह सिदार ने बताया कि ग्राम सल्फीपदर के महिलाओं का समूह वनों को ना किसी को काटने देते है और ना जलाने देते है और किसी को पशु चराने भी नहीं देते। इस समूह द्वारा वृक्षों के नीचे काली मिर्च की खेती की जाती है। यह शत प्रतिशत जनभागीदारी पर आधारित है। काली मिर्च की बाजार में अच्छी मांग है, एक बार काली मिर्च बोने के बाद लंबे समय तक अच्छी उपज ली जा सकती है साथ ही वनों की संरक्षण भी होता है। उन्होंने बताया कि कुछ समय से पानी की कमी से फसल का नुकसान हो जा रहा है। प्रतिनिधिमंडल में उपस्थित किसानों ने राज्यपाल के समक्ष अन्य मुद्दों को भी रखा। इस अवसर पर ग्राम सल्फीपदर के बड़ी संख्या में ग्रामीण उपस्थित थे।

बस्तर का सल्फीपदर गांव, जहां हो रही काली मिर्च की सामुदायिक खेती


आईये आज आपको मिलवाते हैं हरिसिंह #सिदार से। #कोंडागांव के लंजोड़ा में रहते हैं और आदिवासी इलाकों का सतत दौरा करते हैं। उम्र 70 वर्ष के पार है।
सिदार जी आजकल एक अभियान में लगे हैं, जिससे इनके क्षेत्र के आदिवासी आर्थिक रूप से समर्थ हो जाएंगे। इनके गांव के पास है सल्फी पदर नामक अन्य गाँव। #साल के ऊंचे-ऊंचे वृक्षों से भरा सल्फी पदर एक आर्थिक क्रांति का उदाहरण बनने जा रहा है। हरिसिंह सिदार इन साल के पेड़ों के साथ #कालीमिर्च का पौधा लगवा रहे हैं। हरेक पेड़ के साथ एक कालीमिर्च की बेल लगाई जा रही है। ये कार्य सामुदायिक सहयोग से हो रहा है। सल्फी पदर के निवासी और स्थानीय प्रशासन व वन विभाग इसमें सहयोग कर रहे हैं।
हरिसिंह सिदार बताते हैं कि काली मिर्च की बेल वर्षों तक पैदावार देती है। इसकी कीमत भी अच्छी है। इसकी फसल से #आदिवासियों की आर्थिक स्थिति सुधरेगी। जंगल भी सुरक्षित हो जाएंगे। #नक्सलवाद#पलायन#मानव तस्करी जैसी समस्याओं से मुक्ति मिलेगी।
कोंडागांव में उन्नत किसान राजाराम त्रिपाठी काली मिर्च की खेती कर रहे हैं। उनसे ही प्रेरणा लेकर सिदार जी आदिवासियों के लिए इसे व्यापक रूप देने का प्रयास कर रहे हैं। बस्तर का क्लाइमेट दक्षिण भारत जैसा है। यहां काली मिर्च, नारियल, कोको, कॉफी जैसी फसल बड़े पैमाने पर ली जा सकती है। अब जरूरत है कि राज्य सरकार और मुख्यमंत्री श्री Bhupesh Baghel जी इस और ध्यान दे, तो बस्तर की तस्वीर बदल सकती है।
#फोटो राजाराम त्रिपाठी के कालीमिर्च उत्पादन क्षेत्र की है। पीछे साल के पेड़ों पर काली मिर्च की बेल नज़र आ रही है। साथ में हैं हरिसिंह सिदार जी।

विश्व के सर्वश्रेष्ठ अर्थशास्त्रियों में से एक थे डॉ अंबेडकर


पिछले दिनों मध्यप्रदेश की औद्योगिक राजधानी #इंदौर में नेशनल #ब्लॉगर्स समिट में भाग लेने का मौका मिला। शिखर सम्मेलन का विषय था 'डॉ अंबेडकर के आर्थिक विचार'। 14 अप्रैल को उनकी जयंती भी नजदीक आ रही है। इसी बहाने आईये अंबेडकर को सही मायनों में समग्र रूप में जाने।
देश में बहुत कम लोग जानते हैं कि बाबा साहब डॉ भीमराव #अंबेडकर विश्व के एक सर्वश्रेष्ठ अर्थशास्त्री थे। समाजिक व राजनीतिक नेता वे बाद में थे, पहले एक अर्थशास्त्र के विद्यार्थी, फिर अध्यापक और फिर महान शोधार्थी थे।
समस्या ये हुई कि उन्हें केवल दलित नेता, संविधान निर्माता और बाद में राजनेता की फ्रेम में कैद कर दिया गया। उनके सम्पूर्ण व्यक्तित्व को देश जान ही नहीं पाया। उन्होंने अर्थशास्त्र के विषयों पर एक नहीं वरन दो पीएचडी की उपाधि प्राप्त की। पहली लन्दन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से..दूसरी कोलंबिया विश्वविद्यालय से। उनकी अनुशंसाओं के आधार पर #भारतीय #रिजर्व #बैंक का गठन हुआ। देश में सरकारी वित्त में भ्रष्टाचार रोकने के लिए #महालेखाकार की स्थापना हुई।
अर्थशास्त्र के क्षेत्र में आंबेडकर के योगदान और उनकी प्रतिष्ठा/विश्वसनीयता को जानने के लिए ये घटना सबसे महत्वपूर्ण है। वर्ष 1930 का दशक पूरे विश्व बाजार में भीषण मंदी लेकर आया था। ब्रिटिश सरकार के सामने भी गंभीर चुनौतियां थीं। अगस्त 1925 में ब्रिटिश सरकार ने भारत की मुद्रा प्रणाली का अध्ययन करने के लिए ‘रॉयल कमीशन ऑन इंडियन करेंसी एंड फाइनेंस’ का गठन किया था। इस आयोग की बैठक में हिस्सा लेने के लिए जिन 40 विद्वानों को आमंत्रित किया गया था, उनमें आंबेडकर भी थे। वे जब आयोग के समक्ष उपस्थित हुए तो वहां मौजूद प्रत्येक सदस्य के हाथों में उनकी लिखी पुस्तक ‘इवोल्यूशन ऑफ पब्लिक फाइनेंस इन ब्रिटिश इंडिया’ की प्रतियां थीं। बात यहीं खत्म नहीं होती, उस आयोग ने अपनी रिपोर्ट 1926 में प्रकाशित की थी। उसकी अनुशंसाओं के आधार पर कुछ वर्षों बाद ‘भारतीय रिजर्व बैंक’ की स्थापना हुई। इस बैंक की अभिकल्पना नियमानुदेश, कार्यशैली और रूपरेखा आंबेडकर की शोध पुस्तक ‘प्राब्लम ऑफ रुपया’ पर आधारित है।
उन्होंने उस वक़्त ये सिद्धान्त प्रतिपादित किया था कि महत्वपूर्ण उद्योगों पर सरकारी नियंत्रण होने चाहिए। साथ ही उन्होंने कृषि को सरकार के अधीन रखने की सलाह दी थी ताकि लघु व मध्यम किसानों की खेती के नुकसान से कमर ना टूटे। आज कृषि को लेकर उनका सिद्धान्त माना जाता तो देश में हजारों लाखों किसान आत्महत्या नहीं करते।
डॉ भीमराव अंबेडकर 1912 में बम्बई के प्रख्यात एलीफेंसटन कॉलेज से अर्थशास्त्र एवं राजनीतिशास्त्र में बी.ए. की डिग्री प्राप्त करने के बाद बड़ौदा के महाराजा द्वारा अध्ययन हेतु छात्रवृत्ति दिए जाने के बाद 1913 में अमेरिका के कोलंबिया विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया। 1915 में उन्होंने कोलंबिया विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में एम.ए. की पहली डिग्री प्राप्त की तथा 1916 में उन्होंने भारत का राष्ट्रीय लाभांश का विश्लेषणात्मक अध्ययन विषय पर थीसिस लिखकर दूसरी एम.ए. की डिग्री प्राप्त की। कोलंबिया विश्वविद्यिालय से डबल एम.ए. करने के बाद उन्होंने कोलंबिया विश्वविद्यालय में प्रख्यात अर्थशास्त्री आर्थर सेलिगमेन के अंतर्गत 1917 में पी.एच.डी. का पंजीयन कराया। बाद में भीमराव अंबेडकर इंग्लैंड चले गए। जहां 1921 में लन्दन स्कूल ऑफ इकानॉमिक्स अर्थशास्त्र में एम.एस.सी. की डिग्री प्राप्त की। उनकी थीसिस का विषय प्रोविंशियल डिसेंट्रलाइजेशन आफ इम्पीरियल फायनेंस इन ब्रिटिश इंडिया था। 1922 में जर्मनी के बॉन विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र का अध्ययन किया। भीमराव अंबेडकर ने 1923 में लन्दन स्कूल ऑफ इकानॉमिक्स से अर्थशास्त्र में डाक्टर आफ साइंस की डिग्री प्राप्त की। डॉक्टरेट की इस डिग्री के लिए- भारतीय रुपये की समस्या-कारण एवं समाधान विषय था। 1925 में उनकी थीसिस पुस्तक के रूप में प्रकाशित हुई। 1925 में रॉयल कमीशन आफ करेंसी एंड फायनेंस से उन्होंने अपनी थीसिस में प्राप्त निष्कर्ष के आधार पर चर्चा की। 1927 में उन्होंने कोलंबिया विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में डॉक्टरेट की दूसरी डिग्री प्राप्त की। केन्द्र एवं राज्य के वित्तीय संबंधों पर उनकी थीसिस की बहुत चर्चा हुई। उस समय उनकी गिनती दुनिया के जाने-माने अर्थशास्त्रियों में होने लगी। वे अपने आर्थिक विचारों के कारण फ्रेडरिक हेरिक की परम्परा में उदार पूंजीवादी अर्थशास्त्री माने जाने लगे थे।

बुधवार, 29 जनवरी 2020

बस्तर में नक्सलवाद के अलावा नारियल, कोको, लीची, अन्नानास, कॉफ़ी, कालीमिर्च भी है...


जब भी बस्तर की बात होती है नक्सलवाद से शुरू होकर नक्सलवाद पर ही खत्म हो जाती है। कुछ गिने-चुने दर्शनीय/धार्मिक स्थलों पर भी चर्चा हो जाती है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि बस्तर सकारात्मक संभावनाओं वाला क्षेत्र है। यहां नित-नए प्रयोग हो रहे हैं। यहां के बाशिंदे बस्तर की तस्वीर बदलने के लिए नई इबारत लिख रहे हैं। यहां कई स्थान ऐसे भी हैं, जिन्हें देखने के लिए हम प्रदेश के तक बाहर जाते हैं।

आईये, आज आपको ऐसे स्थान के बारे में बताते हैं,जिसके बारे में जानने के बाद वहां जहां जाए बिना आप रह नहीं पाएंगे।
रायपुर से जगदलपुर तो आपमें से कई लोग कई बार गए होंगे। लेकिन क्या कभी आप जगदलपुर जाते वक़्त कोंडागांव में रुके हैं। नहीं रुके, तो इस बार जरूर रुकियेगा। अपने हस्तशिल्प के लिए विश्वभर में ख्यात कोंडागांव में नारियल विकास बोर्ड का एक फार्म भी है। जहां प्रतिवर्ष 2 लाख नारियल की पैदावार होती है। यहां आकर लगता है कि आप दक्षिण भारत के किसी इलाके में हैं, क्योंकि यहां का क्लाइमेट बिल्कुल वैसा ही है। फार्म के पास में ही नारंगी नदी बह रही है। इस फार्म में साढ़े छह हजार नारियल के पेड़ लगे हैं। जल्द ही यहां नारियल तेल निकालने की यूनिट भी लगने वाली है। इस फार्म में केवल नारियल ही नहीं। कोको, लीची, कॉफ़ी, सिंदूर, नींबू, अन्नानास, दालचीनी, कालीमिर्च की भी बड़ी पैदावार हो रही है।

यहां पैदा हो रहा कोको आंध्रप्रदेश में बिकने जाता है। कोको से चॉकलेट बनाई जाती है। किसान यहां से 7 रुपये की दर से नारियल का पौधा खरीद भी सकते हैं। यहां होने वाला नारियल ऑक्शन के जरिये बेचा जाता है। आम लोग भी यहां से बेहद सस्ती दर से नारियल खरीद सकते हैं। केंद्र सरकार का ये उपक्रम राज्य प्रशासन की निगरानी में चलाया जा रहा है। यहां होने वाले नारियल और फ़ल उत्कृष्ट क्वालिटी के हैं और नज़ारे तो अनमोल हैं।

हमारे लिए भी कोई रजिस्टर बनाओ सरकार ताकि हमारी भी गिनती हो सके


बिना किसी अभिवादन के इस पत्र को शुरु करने की हमारी धृष्टता को क्षमा करते हुए हमारी भी सुनो सरकार।  माना कि हमारा नाम किसी रजिस्टर में दर्ज नहीं है। हम जिंदा भी हैं या नहीं, ये किसी को पता नहीं है। हमारा आधार कार्ड, मतदाता परिचय पत्र या किसी भी देश का नागरिक होने का कोई भी प्रमाण पत्र हमारे पास नहीं है। कहने को तो हम भी इंसान हैं, लेकिन हमारा कोई मानवाधिकार भी नहीं है। हम मानव तस्करी के शिकार लोग हैं। हमें तो ना हमारे परिजन, ना ही इस देश की पुलिस ढूंढ पाई है। हम आजाद तो होना चाहते हैं, लेकिन रिहाई की कोई उम्मीद हमें नज़र नहीं आती। हम इस देश के वो अदृश्य लोग हैं, जो जिंदा होते हुए भी दिखाई नहीं देते। इस देश के होते हुए भी अपनी नागरिकता साबित नहीं कर सकते। हमारी बीच में कई छोटे अबोध बच्चे ऐसे भी हैं, जो जरूरत पड़ने पर अपने मां-बाप के बारे में भी कुछ नहीं बता पाएंगे। सरकार हम स्वतंत्र भारत के ऐसे गण हैं, जिनके लिए कोई तंत्र काम नहीं करता।

हमने सुना है कि अभी-अभी नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के ताजा आकंडे आए हैं। रिपोर्ट कहती है कि 2018 में मानव तस्करी के महज 2 हजार 367 मामले दर्ज हुए हैं। लेकिन साहब हम तो यहां अनगिनत हैं। रोज देश के कोने-कोने से लाकर खपाए जा रहे हैं।

हमने ये भी सुना है कि एनसीआरबी के मुताबिक देश में अपहरण की घटनाएं 10.3 फीसदी बढ़ी हैं। 2018 में अपहरण के 1,05,734 केस दर्ज हुए हैं, जबकि 2017 में इनकी संख्या 95, 893 थी। इसके एक वर्ष पहले यानि 2016 में यह आंकडा 88,008 था।

2018 में 24,665 पुरुषों और 80,871 महिलाओं के अपहरण के मामले दर्ज किए गए थे। इनमें 15,250 लड़के और 48,106 लडकियां थीं। जबकि व्यस्क लोगों का आंकड़ा 42,180 था।

वर्ष 2018 में अपह्त हुए लोगों में से 22,755 पुरुषों और 69,382 महिलाओं को सकुशल बरादम कर लिया गया था। यानि 91,709 लोगों को जिंदा बरामद किया गया था, जबकि 428 मरने के बाद मिले थे।

साहब, हम आपको बताना चाहते हैं कि अपहरण केवल फिरौती मांगने के लिए नहीं किये जाते। मानव तस्कर भी कई बार अपहरण के जरिये लोगों को अपना शिकार बनाते हैं।

केंद्र सरकार के आंकड़ों के मुताबिक देश में वर्ष 2014 से 2019 तक यानि की छह वर्षों में 3 लाख 18 हजार 748 बच्चे गुम हुए हैं। एनसीआरबी कहता है कि देश में हर आठवें मिनट में एक बच्चा गायब हो रहा है। तो इन तीन लाख 18 हजार 748 गुम बच्चों में अकेले मध्यप्रदेश के 52 हजार 272, छत्तीसगढ़ के 12 हजार 963 और राजस्थान के 6175 बच्चे लापता हैं। 

मध्यप्रदेश में जहां मंडला, डिंडोरी, खंडवा, सिवनी, हरदा, बालाघाट और बैतूल जैसे इलाकों से बच्चियां तेजी से गायब हो रही हैं। जनवरी से नवंबर 2019 में मध्यप्रदेश से 7891 बच्चियां गुमशुदा हुई हैं। वहीं छत्तीसगढ़ में भी रायगढ़, जशपुर, सरगुजा, बस्तर से तेजी से बच्चियां तस्करों का शिकार हो रही हैं। दोनों ही प्रदेशों के ये आदिवासी बहुल इलाके हैं। वैसे देश का कोई भी प्रदेश इससे बचा नहीं है। झारखंड, पं बंगाल, ओडिशा, उत्तर-पूर्व के राज्य, पंजाब, हरियाणा समेत सभी राज्यों में मानव तस्करों के नेटवर्क काम करता है।

सरकार, हम ये भी बताना चाहते हैं कि मानव तस्कर कभी हमें बंधुआ मजदूरी के लिए तो कभी भिक्षावृत्ति के लिए शिकार बनाते हैं। कभी हम वेश्यावृत्ति के धंधे में ढकेले जाते हैं तो कभी हमारे अंगों की तस्करी करने के लिए हमें फंसाया जाता है।

ये भी सच है कि कई बार हम गरीबी और बेरोजगारी के कारण मानव तस्करों के शिकार बन जाते हैं। लेकिन हममें से कई लोग, खासकर बच्चे और लड़कियां अगवा कर, चुराकर या बहला-फुसलाकर उठाए जाते हैं।

हमारे लिए यूं तो 1956 में ही कानून बन गया था, लेकिन वह इतना लचर और पुराना है कि उसमें मानव तस्करी की विस्तृत व्याख्या तक नहीं पाई जाती। फिर मानव तस्करों ने कई बार अपने पैंतरे भी बदले हैं। लेकिन पुलिसिंग उन्हीं पुराने तरीकों से ही हो रही है। फिर उसपर से पुलिस, प्रशासन और समाज भी इस दावानल से हमें निकालने के लिए कोई रुचि नहीं दिखाता। लेकिन हम यहां से निकलना चाहते हैं सरकार। अगर आप तक हमारी बात पहुंचे तो जरूर हमारी भी रिहाई के लिए कोशिश करना। हमारे लिए भी कोई रजिस्टर बनाना ताकि हमारी भी गिनती हो सके। 


प्रार्थी
मानव तस्करी के शिकार
अनगिनत अभागे लोग

शनिवार, 30 नवंबर 2019

छत्तीसगढ़ की सुमिता पंजवानी ने धान की पराली से बनाया सैनेटरी नेपकिन


हमारे देश में अब भी 70 फीसदी महिलाएं सेनेटरी पैड नहीं खरीद पातीं। वे आज भी पुराने तरीकों जैसे कपड़े, अखबारों या सूखी पत्तियों का प्रयोग करती हैं. इसका कारण ये है कि वे सेनेट्री नैपकिंस को खरीदने में सक्षम नहीं हैं. एक रिपोर्ट के अनुसार गांवों-कस्‍बों के स्‍कूलों में कई बच्चियां, पीरियड्स के दौरान 5 दिन तक स्‍कूल मिस करती हैं. यही नहीं, 23 प्रतिशत बच्चियां, माहवारी शुरू होने के बाद पढ़ाई छोड़ देती हैं। 2011 में हुई एक रिचर्स के मुताबिक भारत में हर महीने 9000 टन मेंस्ट्रुअल वेस्ट उत्पन्न होता है, जो सबसे ज़्यादा सैनेटरी नैपकिन्स से आता है. इतना नॉन-बायोडिग्रेडेबल कचरा हर महीने जमीनों के अंदर धसा जा रहा है जिससे पर्यावरण को बहुत ज़्यादा नुकसान पहुंचता है. एक महिला द्वारा पूरे मेंस्ट्रुअल पीरियड के दौरान इस्तेमाल किए गए सैनेटरी नैपकिन्स से करीब 125 किलो नॉन-बायोडिग्रेडेबल कचरा बनता है. 2011 में हुई एक रिचर्स के मुताबिक भारत में हर महीने 9000 टन मेंस्ट्रुअल वेस्ट उत्पन्न होता है, जो सबसे ज़्यादा सैनेटरी नैपकिन्स से आता है. इतना नॉन-बायोडिग्रेडेबल कचरा हर महीने जमीनों के अंदर धसा जा रहा है जिससे पर्यावरण को बहुत ज़्यादा नुकसान पहुंचता है. खैर ये तो बात हुई सैनेटरी नैपकिन की। अब एक और ज्वलंत विषय यानि पराली की भी बात कर लेते हैं। दिल्ली में बढ़ते प्रदूषण का दोष पराली को ही दिया जा रहा है। ये शब्द आजकल किसी के लिए भी नया नहीं है। छ्त्तीसगढ़ में धान की पराली या पैरा को खेतों मे ही छोड़ दिया जाता है। या फिर जला दिया जाता है। लेकिन अब पराली का सबसे अच्छा उपयोग खोज निकाला गया है। जी हां पराली से सैनेटरी नैपकिन बनाकर दिखाया है छत्तीसगढ़ के एक जिले धमतरी में रहने वाली सुमीता पंजवानी ने।

सुमीता जी अध्यात्म से भी जुड़ी हुई हैं। वे जबलपुर के जवाहरलाल कृषि विश्वविद्यालय में जूनियर साइंटिस्ट रह चुकी हैं।  सुमिता बताती हैं कि पराली या पैरा जैसे वेस्ट में काफी सेल्यूलोज होता है, जिसे केमिकल की मदद से निकाला जाता है. ये एक तरह से कॉटन की तरह होता है, जो उपयोग के बाद डिकंपोज होकर मिट्टी में खाद की तरह मिल जाता है. बाजार में जो सेनिटरी नेपकिन उपलब्ध हैं, उनकी कीमतें सभी वर्ग की पहुंच में नहीं होती है, लेकिन पैरा से बना नेपकिन 2 से 3 रुपये में मिल सकेगा. तमाम ब्रांडेड नेपकीन में नायलोन होता है, जो डिकंपोज नहीं हो सकता और ये पर्यावरण को भी नुकसान पहुंचाता है. पैरा या पराली से बनी नेपकिन इन दोनों मामलो में बेहतर साबित होगी. सुमीता जैसी शक्तिस्वरूपा दूसरों के लिए प्रेरणास्त्रोत तो हैं ही, साथ ही उन लाखों महिलाओं के स्वास्थ्य की रक्षक बनने की दिशा में भी सुमीता कदम बढ़ा चुकी हैं।  

शक्तिस्वरूपा। साहस की मिसाल संतोषी दुर्गा। पोस्टमार्टम करने वाली छत्तीसगढ़ की एकमात्र महिला।

संतोषी दुर्गा, जिसके नाम में ही शौर्य और साहस समाया हुआ है। संतोषी दुर्गा एक ऐसी महिला हैं, जिनके बारे में जानकार आप उनको सलाम किए बिना नहीं रह सकेंगे। नक्सल प्रभावित बस्तर के एक जिले कांकेर की रहने वाली संतोषी दुर्गा संभवतः देश की अकेली महिला हैं, जो शवों की चीरफाड़ यानि पोस्टमार्टम करती हैं। इसमें भी एक खास बात ये है कि वे बगैर किसी नशे को किए ये काम करती हैं। अमूमन पुरुषों के वर्चस्व वाले इस कार्य को करने वाले लोग शराब या अन्य नशा लेने के बाद ही पोस्टमार्टम कर पाते हैं। संतोषी के पिता भी शराब पीकर शवों की चीरफाड का कार्य किया करते थे। जब संतोषी ने उन्हें शराब छोड़ने के लिए कहा तो उन्होने जबाव दिया कि वे बगैर नशा किए पोस्टमार्टम जैसा अमानवीय कार्य नहीं कर पाएंगे। तब संतोषी ने कहा कि वे यदि बगैर शराब पिए ये कार्य करके दिखाएं तो उन्हें शराब छोड़नी होगी। बस यहीं से संतोषी का सफर शुरु हुआ। नरहरपुर ब्लॉक में रहने वाली संतोषी दुर्गा अब तक 600 शवों का पोस्टमार्टम कर चुकी हैं। छह बहनों में सबसे बड़ी संतोषी दुर्गा उन तमाम लोगों के लिए मिसाल हैं, जो विपरीत परिस्थितियों में हार मान लेते हैं। कभी उनपर तंज कसने वाले लोग आज उनकी तारीफ करते थकते नहीं है।



https://janmantra.com/video-santosh-durga-an-example-of-courage-the-only-woman-from-chhattisgarh-to-do-post-mortem-santoshi-durga-the-only-woman-in-the-country-to-do-autopsy-of-dead-bodies/

पुरा वैभव को समेटे छत्तीसगढ़ का देवरानी-जेठानी मंदिर, रहस्यमीय रुद्र शिव की प्रतिमा



यदि आप छत्तीसगढ़ आ रहे हों तो आप रायपुर-बिलासपुर रोड़ पर स्थित देवरानी-जेठानी मंदिर जरूर जाएं। पांचवी शताब्दी में निर्मित ये मंदिर आपको भारत के पुरा वैभव की यात्रा पर ले जाएंगे। शिव के साधकों के लिए ये स्थान विशेष है। प्राचीन काल के दक्षिण कोसल के शरभपुरीय राजाओं ने गनियारी नदी के किनारे ताला नामक स्थल पर दो शिव मंदिरों का निर्माण करवाया था, जिन्हें देवरानी और जेठानी मंदिर के नाम से जाना जाता है। स्थानीय लोग इसे देवरानी-जेठानी का अर्थ कुंती-गांधारी बताते हैं।
प्रस्तर निर्मित अर्धभग्न देवरानी-जेठानी मंदिर दरअसल दो शिव मंदिर है। जो एक दूसरे के अगल-बगल में बने हुए हैं। देवरानी मंदिर का मुख पूर्व दिशा की ओर है। जबकि जेठानी मंदिर दक्षिणाभिमुखी है।
देवरानी मंदिर के पीछे की तरफ शिवनाथ की सहायक नदी मनियारी प्रवाहित हो रही है। इसका भू-विन्यास अनूठा है। इसमें गर्भगृह है। मंदिर की द्वारा शाखाओं पर नदी देवियों का अंकन है। सिरदल में गजलक्ष्मी का अंकित है। इसमें शिखर या छत नहीं है। इस मंदिर स्थलों में हिंदू मत के विभिन्न देवी देवताओं, अंतर देवता, पशु पौराणिक आकृतियां पुष्पाकंन विविध ज्यामितिक प्रतिमाएं व वास्तु खंड है।


रोमाचिंत करती रुद्र शिव की विलक्षण प्रतिमा
इसमें रुद्र शिव के नाम से पुकारी जाने वाली प्रतिमा महत्वपूर्ण है। यह विशाल प्रतिमा 2.70 मीटर ऊंची है। शास्त्र के लक्षणों की दृष्टि से विलक्षण प्रतिमा है। इसमें मानव अंग के रूप में अनेक पशु, मानव अथवा देवमुख व सिंहमुख बनाए गए हैं। इसके सर का जटा मुकुट (पगड़ी) सर्पों के जोड़े से बना हुआ है। रुद्रशिव का हाथ व उंगलियों को सर्प की भांति आकार दिया गया है। इसके अतिरिक्त प्रतिमा के ऊपरी भाग पर दोनों और सर्प फन छत्र कंधों के ऊपर प्रदर्शित है। इसी तरह बाएं पैर में लिपटे हुए फन युक्त सर्प का अंकन है। दूसरे जीव जंतुओं में मोर से कान का कुंडल, आंखों की भौंहे व नाक छिपकली से व लिंग कछुआ के मुंह से बना है। नेत्र में घोंघा है। मुख की ठुड्डी केकड़े से निर्मित है। भुजाएं मगर मुख से निकली हैं। सात मानव अथवा देवमुख शरीर के विभिन्न अंगो में निर्मित हैं। अद्वितीय होने के कारण इस प्रतिमा की सही पहचान को लेकर अभी भी विवाद बना हुआ है। शिव के किसी भी ज्ञात स्वरूप के शास्त्रोक्त प्रतिमा लक्षण पूर्ण रूप से नाम मिलने के कारण इसे शिव के किसी विशेष स्वरूप की मान्यता नहीं मिल पाई है। निर्माण शैली के आधार पर उस मंदिर व प्रतिमा को छटवी शताब्दी के पूर्वार्ध्द में रखा जा सकता है। स्थानीय लोग इसे पांचवी सदी में बनाया हुआ मानते हैं।


जेठानी मंदिर भी शिव का ही एक मंदिर है। जो छत या शिखिर विहीन है। लेकिन इसकी नक्काशी देखकर मन इसे बनाने वाले कलाकार के प्रति क्षद्धा से बरबस ही झुक जाता है। ये मंदिर भारतीय स्थापत्य शैली के अदभुत उदाहरण हैं। जो कई रहस्य समेटे हुए सदियों से मौन खड़ें हैं।
वर्ष 1976 में इन मंदिरों के अवशेष मलबे में दबे हुए नजर आए थे। इसके बाद भारतीय पुरातात्विक विभाग ने इसकी खुदाई और संरक्षण का काम शुरु किया। उसके बाद 1988 -89 में दोबारा इन मंदिरों में खुदाई हुई। स्थानीय निवासी इसे देवरानी जेठानी को कुंती-गांधारी से जोड़कर देखते हैं। वे इसे महाभारतकालीन मानते हैं।





बुधवार, 18 सितंबर 2019

श्रीपुर की रानी वासटा की अमर प्रेम कहानी, जिसने ताजमहल से 11 सौ वर्ष पूर्व बनाया था प्रेम का अमर स्मारक


(सर्वाधिकार लेखिकाधीन)

600 ईसवी का काल था। मगध नरेश सूर्य वर्मा की विजय पताका चहुं और फहरा रही थी। उनकी युवा हो रही राजकुमारी वासटा की सौंदर्य कीर्ति भी दूर-दूर तक फैली हुई थी। कई प्रतापी राजकुमार वासटा से विवाह के इच्छुक थे। लेकिन मगध नरेश सूर्य वर्मा दक्षिण कौशल के राजा हर्षगुप्त के विवाह प्रस्ताव को लेकर गंभीर हैं। वे राजकुमारी का विवाह हर्षगुप्त से करना चाहते हैं।
लेकिन ये कैसे संभव हो? राजगुरु के मस्तक पर चिंता की लकीरें देखकर सूर्य वर्मा भी विचलित हैं। क्यों संभव नहीं हो सकता राजगुरु? सूर्य वर्मा प्रतिप्रश्न करते हैं। हम वैष्णव हैं, वे शैव। दोनों की पूजा पद्धति, रीति-रिवाज भिन्न हैं, इष्ट भिन्न हैं। राजगुरु का उत्तर सुनकर मगध नरेश कुछ बोलते, उसके पहले ही राजकुमारी वासटा उपस्थित हो जाती हैं। अत्यंत रूपवती, धर्मानुरागी, वीरांगना पुत्री को देखकर सूर्य वर्मा का मस्तक ऊंचा होता हुआ प्रतीत हो रहा है। मन में उमड़ रहे प्रश्नों को वे सीधे राजकुमारी के सम्मुख रखने का निर्णय लेते हैं। राजकुमारी पिता के मन में चल रहे भावों से अच्छी तरह परिचित है, पिता कुछ बोलें, इसके पूर्व ही पुत्री निर्भीक होकर अपने मन की बात कह देती है। राजकुमारी वासटा कहती हैं कि पिताजी, आप चाहे वैष्णव कुल में मुझे ब्याहें या शैव कुल में। मैं केवल इतना कहना चाहती हूं कि आपकी ये पुत्री कभी आपका मस्तक झुकने नहीं देंगी। पिता के मन के सारे उहापोह समाप्त हो जाते हैं। वे धूमधाम से मगध की राजकुमारी का विवाह दक्षिण कौशल के शैव धर्मावलंबी श्रीपुर (मौजूदा सिरपुर) के राजा हर्षगुप्त से कर देते हैं। और इसी के साथ आरंभ होती है एक अमर प्रेम कहानी। जिसका गवाह खुद चीनी यात्री ह्वेन सांग है। जिसने अपनी यात्रा वृंतात में इसका वर्णन किया है। वासटा श्रीपुर की रानी बनकर हर्ष गुप्त के जीवन में आ गईं। चित्रोत्पला महानदी के घाट पर बसे श्रीपुर में चहुं और समृद्धि के ही दर्शन होते थे। कभी भी कोई अपराध श्रीपुर में सुनाई तक नहीं देता था।
वासटा और हर्ष गुप्त के प्रेम की मिसालें दी जाने लगी थीं। दोनों की प्रेम की निशानी पुत्र के रूप में महाशिव गुप्त भी आ जाते हैं। सब कुछ अच्छा ही चल रहा था, लेकिन ईश्वर को शायद कुछ और ही मंजूर था। राजा हर्ष गुप्त की श्वांस ईश्वर ने कम लिखीं थी। वे रानी वासटा को छोड़कर सदा सर्वदा के लिए दुनिया से कूच कर गए। ये ईसवी ६३५-६४० का वक्त था। जब श्रीपुर यानि सिरपुर की रानी वासटा ने राजा हर्षगुप्त की याद में अगाध प्रेम के प्रतीक लक्ष्मण मंदिर का निर्माण करवाया। अचानक राजा की मृत्यु से शोक में डूबी रानी वासटा प्रण लेती हैं कि वे पति की याद में स्मारक का निर्माण करवाएंगी। रानी वासटा लाल पत्थरों से लक्ष्मण स्मारक या मंदिर का निर्माण करवाती हैं, ताजमहल से भी 11 सौ वर्ष पूर्व। आज भी श्रीपुर में रानी वासटा के अमर प्रेम की गाथा गूंज रही है। सदियां बीतने के बाद भी लक्ष्मण स्मारक वैसे ही पूरे वैभव के साथ खड़ा है, जैसा कि अपने निर्माण के वक्त था।

(शैव धर्मावलंबी श्रीपुर (मौजूदा सिरपुर) में मगध नरेश सूर्यवर्मा की बेटी वैष्णव धर्मावलंबी वासटादेवी की प्रेम कहानी का उल्लेख हालांकि चीनी यात्री ह्वेन सांग ने भी अपनी यात्रा वृतांत किया है। लक्ष्मण मंदिर में दक्षिण कौशल की शैव और मगध की वैष्णव संस्कृति का अनूठा मिश्रण स्पष्ट परिलक्षित होता है। आगरा में अपनी चहेती बेगम मुमताज की स्मृति में शाहजहां ने ईसवी १६३१-१६५४ के मध्य ताजमहल का निर्माण कराया। मफेद संगमरमर के ठोस पत्थरों 
को दुनियाभर के बीस हजार से भी अधिक शिल्पकारों द्वारा तराशी गई इस कब्रगाह को मुमताज महल के रूप में 
प्रसिद्धि मिली। ताजमहल से लगभग ११ सौ वर्ष पूर्व शैव नगरी श्रीपुर में मिट्टी के ईंटों से बने स्मारक में विष्णु के दशावतार अंकित किए गए हैं और इतिहास इसे लक्ष्मण मंदिर के नाम से जानता है। 

लक्ष्मण मंदिर की सुरक्षा और संरक्षण के कोई विशेष प्रयास न किए जाने के बावजूद मिट्टी के ईंटों की यह इमारत चौदह सौ वर्षों के बाद भी शान से खड़ी हुई है। १२वीं शताब्दी में भयानक भूकंप के झटके में सारा 'श्रीपुर  जमींदोज़ हो गया। चौदहवीं-१५वीं शताब्दी में चित्रोत्पला महानदी की विकराल बाढ़ ने भी वैभव की नगरी को नेस्तानाबूद कर दिया लेकिन बाढ़ और भूकंप की इस त्रासदी में लक्ष्मण मंदिर अनूठे प्रेम का प्रतीक बनकर खड़े रहा है। हालांकि इसके बिल्कुल समीप बने राम मंदिर पूरी तरह ध्वस्त हो गया और पास ही बने तिवरदेव विहार में भी गहरी दरारें पड़ गई। साहित्यकार अशोक शर्मा ने ताजमहल को पुरूष के प्रेम की मुखरता और लक्ष्मण मंदिर को नारी के मौन प्रेम और समर्पण का जीवंत उदाहरण बताया है। उनका मानना है कि इतिहास गत धारणाओं के आधार पर ताजमहल और लक्ष्मण मंदिर का तुलनात्मक पुनर्लेखन किया जाए तो लक्ष्मण मंदिर सबसे प्राचीन प्रेम स्मारक सिद्ध होता है।)








बुधवार, 24 जुलाई 2019

मुर्गी का अंडा और राजनीति

इस विषय पर मैं लिखना शुरु करें और आप पढ़ना, मैं आपको दो बातों से अवगत करवाना चाहती हूं कि मैं शुद्ध शाकाहारी परिवार से हूं। मेरे घर में लहसुन-प्याज भी नहीं आता। मांसाहार तो पूर्णतः वर्जित है, और तो और जिस अंडे पर मैं लिखना चाह रही हूं, उसकी दुकान के सामने से मुंह पर रुमाल रखकर निकलती हूं। दूसरी बात ये कि यह पोस्ट पूरी तरह गैरराजनीतिक है (हर पोस्ट की तरह)। चूंकि मैं भी एक मां हूं तो तीन-चार दिन तक लिखूं कि ना लिखूं की ऊहापोह से निकलकर आज जो मैं लिख रही हूं, पूरी जिम्मेदारी के साथ लिख रही हूं। छत्तीसगढ़ में आजकल ‘मुर्गी के अंडे’ की राजनीति चरम पर है। ऐसे विषयों को मुद्दा बनते देखकर लगता है कि राजनीति में केवल स्वार्थ का स्थान है, परमार्थ के लिए कोई जगह नहीं बची। विपक्ष को बस विरोध करना है, भले ही उस विरोध की कीमत जनमानस ही क्यों ना चुकाए। तो मामला ये है कि राज्य सरकार मध्यान्ह भोजन में बच्चों को अंडा देना चाहती है। इसका कई सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक संगठनों द्वारा विरोध हो रहा है। लोग इसे धर्म से जोड़कर देख रहे हैं। लेकिन विरोध करने वाले ये नहीं समझ पा रहे कि ये जरूरी नहीं है कि हर बच्चा अंडा खाए ही। अंडा खाना ना खाना बच्चे की इच्छा पर छोड़ दिया जाए। लेकिन मैं एक बात स्पष्ट कर दूं कि छत्तीसगढ़ समेत कई राज्य कुपोषण की मार झेल रहे हैं। कागजों के आंकड़ों के इतर जमीनी हकीकत भयावह है। अंडे में विटामिन ए, बी, बी12, विटामिन डी और विटामिन ई भरपूर मात्रा में होता है। इसके अलावा फॉलेट, सेलेनियम और कई खनिज लवण इसमें पाए जाते हैं। इसमें कोलीन पाया जाता है, जिससे स्मरण शक्ति तो बढ़ती ही है, कार्यक्षमता भी बढ़ जाती है। अंडे के सेवन से आंखों की मांसपेशियां मजबूत होती हैं। इसमें मौजूद एंटीऑक्सीडेंट रेटीना को मजबूत करता है। इसे खाने से पेट देर तक भरा रहता है। इससे बाल और नाखून भी मजबूत होते हैं। इसमें आयरन भी होता है, जो लाल रक्त कोशिकाओं के विकास के लिए जरूरी होता है। मैं अंडे का विज्ञापन नहीं कर रही हूं, बल्कि समझा रही हूं कि सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों के लिए अंडा एक महत्वपूर्ण पोषक तत्व का काम करेगा। अंडे के अतिरिक्त भी कई अन्य प्रकार के खाद्य पदार्थों में पोषक तत्व हैं, जिनसे यही सब फायदे हो सकते हैं। लेकिन अकेले अंडे में ही ये सब पोषण मौजूद होता है। सबसे जरूरी बात कि मध्यान्ह भोजन में अंडे परोसे जाने का विरोध वो लोग कर रहे हैं, जिनके बच्चे शायद ही सरकारी स्कूलों में पढ़ते होंगे। मतलब ये अंडा उनके बच्चों को तो नहीं खाना है। सरकारी स्कूल में पढ़ने वाले 95 फीसदी बच्चे गरीब, वंचित, शोषित परिवारों के होते हैं। हम ये तो पता नहीं कर रहे कि उनकी मंशा क्या है, उनकी जरूरत क्या है, बस अपना विरोध थोप रहे हैं। तो जो स्कूलों में अंडा देने का विरोध कर रहे हैं, क्या अपने स्तर पर इन बच्चों का पोषण ठीक करने के लिए पहल भी करेंगे कि फिर केवल राज्य सरकार का मुंह ताकेंगे।
मेरा सात साल का बच्चा है, मैं उसे अंडा नहीं देती, क्योंकि मैं शाकाहारी हूं और मुझे पता है कि अंडे के अतिरिक्त वही पोषण मैं उसे कैसे दे सकती हूं। मैं उसे सही पोषक तत्व देने के लिए आर्थिक रूप से सक्षम भी हूं। लेकिन यदि किसी गरीब के बच्चे को मुफ्त में पोषण मिल रहा हो तो उसका विरोध कितना उचित है। रही बात इसे मांसाहार या शाकाहार से जोड़ने की, तो ये उन बच्चों के परिवारों को तय करने दीजिए कि उन्हें क्या चाहिए। मेरा केवल इतना ही निवेदन है कि बच्चों के विषय पर राजनीति नहीं की जानी चाहिए। यदि करना ही है तो केवल समस्या पर नहीं समाधान पर भी बात होनी चाहिए। केवल हल्ला करने का मकसद करने की इस राजनीति में कुपोषण से बर्बाद होते बच्चों की हाय भी आपको ही लगेगी। ये मत भूलिएगा। #प्रियंकाकौशल

हम सुधरेंगे तभी बच पाएंगी नदियां



गंगे च यमुने चैव गोदावरी सरस्वती।
नर्मदे सिंधुकावेरीजलेsस्मिंन् सन्निधिं कुरू।।
यह सब जानते हैं कि  नदियां जीवनदायिनी होती हैं। किसी भी राष्ट्र के सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, भौतिक एवं सांसकृतिक इतिहास और विकास में इनका स्थान विशिष्ट होता है। इतिहास हमें बताता है कि आदिकाल से ही सभ्यताओं का विकास नदियों के किनारे हुआ है। खासकर भारतीय संदर्भ में देखें तो हमारे देश, हमारी संस्कृति, हमारी जीवन शैली ही विभिन्न नदियों के इर्द-गिर्द घूमती नजर आती है। हमारी संस्कृति की उत्पत्ति, उसके विकास में सात नदियों (बाद में शनैः शनैः देश की अन्य नदियां भी हमारे विकास में सहायक सिद्ध हुईं) का महत्वपूर्ण योगदान माना गया है। यहां तक कि हमारी पहचान ही सप्त सिंधु के रूप में होती थी। यह सप्तसिंधु नाम ही विश्व के सर्वाधिक प्राचीन ग्रंथ ऋग्वेद में पाया गया है। वस्तुतः यह नाम वैदिक भारत का ही नाम था। ऐसे भी प्रमाण मिले हैं कि हमारे पड़ोसी राष्ट्र भी हमें सप्तसिंधु के नाम से ही पुकारते थे। इन्हीं सात पावन सरिताओं के तट पर हमारी संस्कृति विकसित हुई, फली-फूली और जैसे-जैसे हम आगे बढ़े, अन्य पावन सरिताओं ने हमारे जीवन में खुशहाली भरी। नदियां हमें केवल पेयजल ही उपलब्ध नहीं करातीं, बल्कि हमारे आर्थिक विकास का तानाबाना भी बुनती हैं। ये सिंचाई और परिवहन का भी प्रमुख स्त्रोत रही हैं। ये अपने प्रवाह के साथ विभिन्न प्रकार के महत्वपूर्ण तत्व लाकर अपने तटों पर छोड़ देती हैं, जो कृषि में सहायक होते हैं। मिट्टी को उपजाऊ बनाते हैं, और हमारे लिए समृद्धि का द्वार खोल देते हैं। नदियों के बगैर बड़े-बड़े कल कारखानों, उद्योगों की स्थापना भी संभव नहीं है। लेकिन हमें पोषित, पल्लवित, पुष्पित करने वाली जीवनदायिनी नदियों का दोहन करते-करते हम भूल गए कि उनका सरंक्षण भी उतना ही जरूरी है, जितना कि हमारे लिए जीवित रहना। हम यह भी भूल गए कि यदि नदियां ही नहीं रहीं, तो हमारे अस्तित्व पर भी संकट मंडराने लगेगा। उसका दुष्परिणाम यह हुआ कि देश की तकरीबन सभी नदियों के सामने अस्तित्व का संकट खड़ा हो गया है। 70 फीसदी तो इतनी प्रदूषित हैं कि जल्द ही वे नदी कहलाने लायक भी नहीं रहेंगी। यह नदियां इस कदर प्रदूषित हैं कि उनमें जलीय पौधों और जंतुओं का जीना दूभर है। नदियों की पूजा करने और उन्हें आस्था का केंद्र मानने वाले देश में उनका यह हाल बताता है कि अपने जीवनदायिनी जलस्रोतों के साथ हम क्या सलूक कर रहे हैं। हमारी बहुत सारी नदियां गरमी का मौसम आते-आते दम तोड़ देती हैं। कई नदियां हमेशा के लिए ही लुप्त हो गई हैं, कई गंदे नाले में परिवर्तित हो चुकी हैं।
अक्सर हम औद्योगीकरण को इसके लिए जिम्मेदार ठहराते हैं, लेकिन नदी पूजने वाले भी इसके लिए कम दोषी नहीं हैं। वे भी नदियों को प्रदूषित करने में बड़ी भूमिका निभा रहे हैं। इसका सबसे बड़ा उदाहरण खुद गंगा है। जिसकी सफाई के लिए केंद्र सरकार को पृथक से विभाग बनाना पड़ा और उसका बजट अरबों रुपयों पर पहुंच गया। एक अध्ययन बताता है कि छत्तीसगढ़ की महानदी, अरपा व मध्य प्रदेश की नर्मदा और सोन में बहने वाले पानी की गुणवत्ता को नष्ट करने में 43 फीसदी स्थानीय नागरिक जिम्मेदार हैं। ऐसी हालत कमोबेश पूरे देश की है। 90 फीसदी लोग तो नदियों के जीवन के बारे में सोचते तक नहीं। नदियों की यह हालत तब हुई है, जब हमारे देश में नदियों को मां की संज्ञा दी गई है। उनकी परिक्रमा कर हम खुद को धन्य पाते हैं, अपने तीज-त्यौहारों में उनका स्मरण करते हैं और महाआरतियों के जरिए उनके प्रति श्रद्धा भी प्रकट करते हैं। लेकिन नहीं करते तो उनके संक्षण का काम। अब समय आ गया है कि हम तय करें कि नदियों में और गंदगी नहीं बहाई जाएगी। नदियों में औद्योगिक कचरों और शहरी नालियों के मुंह नदियों में नहीं खोले जाएंगे। बल्कि उनके निस्तारण के लिए पृथक व्यवस्था की जाएगी। इस काम में सरकार के साथ आम जनता को भी अपनी भागीदारी सुनिश्चित करनी होगी। गंदे पानी के निस्तारण के लिए ट्रीटमेंट प्लांट की स्थापना नदियों को संरक्षित करने में अहम भूमिका निभा सकती है। हमें भी यह याद रखना होगा कि हम अपनी आने वाली पीढ़ी को क्या देना चाहते हैं। नदियों से खिलवाड़ सीधे-सीधे पर्यावरण से खिलवाड़ है। अपने जीवन से खिलवाड़ है। आजादी के दस साल बाद 1957 में योजना आयोग ने कहा था कि देश में 240 गावों में पानी नहीं है। यह आंकड़ा वर्तमान में दो लाख गांवों से ऊपर चला गया है। अगर यूं ही चलता रहा तो हमें नदियों का पानी पीने के लिए तो क्या आचमन के लिए भी उपलब्ध नहीं रहेगा। #प्रियंकाकौशल #PriyankaKaushal

मंगलवार, 23 जुलाई 2019

लैंगिक समानता या पूरकता!




वर्तमान में लैंगिक समानता, नारी मुक्ति आंदोलन, महिला सशक्तिकरण जैसे कई जुमले आम हो गए हैं। वर्ष 1848 से पश्चिम में उत्पन्न हुआ सिनेका फाल्स डिक्लयरेशनअपने नए रंग रूप के साथ 90 के दशक से होता हुआ इक्कीसवीं सदी में प्रवेश कर चुका है। पश्चिमी विद्वानों के साथ-साथ एशियाई विचारक भी मानते हैं कि विश्व में 1848 से लेकर 2015 तक नारीवाद की चार लहरें प्रवाहित हुईं। इसका केंद्र पश्चिम ही था, जहां स्त्रियों की स्थिति अत्यधिक दयनीय थी। उन्हें न तो मतदान का अधिकार था, न ही समाज में सम्मान प्राप्त करने का। शायद इसलिए भी कि पश्चिम में आस्था का केंद्र बने धर्मग्रंथ बाइबिल में यह कहा गया है कि मैं कहता हूं कि स्त्री न उपदेश करे और न ही पुरुष पर आज्ञा चलाए, परंतु चुपचाप रहे, क्योंकि आदम पहले, उसके बाद हव्वा बनाई गई और आदम बहकाया न गया, पर स्त्री बहकने में आकर अपराधिनी हुई (नया नियम, 1-तीमुथियुस 2/12-15)। पश्चिम की धरती पर शुरू हुए इस तथाकथित नारी मुक्ति आंदोलन के कारण संयुक्त राष्ट्र संघ ने 1975 में कई प्रस्ताव पारित किए और इस वर्ष को महिला वर्ष घोषित किया एवं अगले दस वर्षों (1975 से 1985 तक) में महिलाओं की स्थिति सुधारने के लिए कई प्रयास किए।
भारतीय परिप्रेक्ष्य में भी इन आंदोलन को लेकर कई तरह की प्रतिक्रियाएं हुईं। जो आज तक अनवरत् जारी हैं। लेकिन हम लक्ष्य को हासिल नहीं कर पाए हैं, उल्टे भारतीय समाज में स्त्री-पुरुष लैंगिक अनुपात किन्हीं-किन्हीं राज्यों में खतरे के निशान पर पहुंच गया है, महिलाओं के विरुद्ध हिंसा बढ़ गई, बलात्कार जैसी वीभत्स और निंदनीय घटनाओं की पुनरावृत्ति आम बात हो गई है। तो आखिर हमसे कहां भूल हो गई कि महिलाएं अपना सम्मान खोने के लिए विवश हैं। दरअसल हम पश्चिम के आंदोलन को, उनके कारणों, स्थिति और दशा को समझे बगैर ही अपने समाज में लागू करने की कोशिश करते रहे हैं। हमारे भारतीय परिप्रेक्ष्य में, या यूं कहें कि वैश्विक परिवेश में भी लैंगिक समानता शब्द ही गलत है। जबकि यह लैंगिक पूरकता होना चाहिए। हम कैसा समाज चाहते हैं, हमें इस पर विचार करना ही होगा। लेकिन इसके साथ-साथ हमें यह भी याद रखना होगा कि हम अपनी गौरवशाली संस्कृति और परंपराओं को विस्मृत कर भविष्य के बारे में कैसे सोच पाएंगे। स्त्री-पुरुष को एक-दूसरे के समान नहीं, वरन् एक-दूसरे का पूरक बनना है। लैंगिक समानता की अवधारणा ही गलत है, क्योंकि इससे परस्पर प्रतिस्पर्धा बढ़ती है, एक-दूसरे के प्रति सम्मान में कमी आती है। कौन श्रेष्ठ है, कौन नहीं ऐसे शोध शुरु हो जाते हैं। होना तो यह चाहिए कि स्त्री और पुरूष की पूरकता की बात की जाए। हम एक दूसरे के पूरक हो सकते हैं, समान नहीं क्योंकि स्त्री के बिना पुरुष और पुरुष के बगैर स्त्री परिवार, कुनबा, कुटुम्ब, समाज, राज्य, राष्ट्र का निर्माण नहीं कर सकते। जैसे स्वयं शिव भी शक्ति के बगैर अधूरे हैं, सीता के बगैर राम का कोई अस्तित्व हो ही नहीं सकता, बिना राधा कृष्ण की भक्ति की ही नहीं जा सकती ठीक वैसे ही बगैर नारी के कोई भी पुरुष ना तो इस दुनिया में आ ही सकता है ना पोषित पल्लिवत होकर जीवन के लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है। हमें इन तथाकथित स्त्री मुक्ति आंदोलन की जरूरत भी नहीं है क्योंकि हम जानते हैं कि भारत में महिलाओं का स्थान शक्तिशाली रहा है। ऋग्वेद काल में भी महिलाओं को सम्मानित स्थान प्राप्त था। वैदिक साहित्य में ऐसे प्रमाण मिलते हैं, जिससे स्पष्ट होता है कि स्त्रियों को अध्यात्मिक पथ चुनने की पूर्ण स्वतंत्रता थी। वेदकाल में 36 ऋषिकाएं मिलती हैं। गार्गी, मैत्रेयी, मदालसा, कात्यायनी इसका ही उदाहरण है। हमारे यहां मनुस्मृति में, श्रीमद्भागवत गीता में, स्कंद पुराण में, अत्रिसंहिता में, रामचरित मानस में और यहां तक कि सभी वेदों, पुराणों, उपनिषदों में बार-बार यह उल्लेख मिलता है कि इस देश में स्त्री हमेशा ही पुरुषों से अग्रणी रही है, क्योंकि भारतीय समाज यह अच्छी तरह जानता है कि बगैर नारी के संसार का सृजन ही संभव नहीं है। वह दादी है, नानी है, माता है, बहन है, पुत्री है, पत्नी है और न जाने कितने आवश्यक संबंधों में हम उसे पाते हैं। मनुस्मृति में कहा गया है कि - उपाध्यायादन्शाचार्य आचार्यणां शतं पिता। सहस्त्रं तु पितृन्माता गौरवातिरिच्यते।। अर्थात् दस उपाध्यायों की अपेक्षा आचार्य, सौ आचार्यों की अपेक्षा पिता और सहस्त्र पिताओं की अपेक्षा माता का गौरव अधिक है। सभी गुरुजनों में माता को परम गुरु माना गया है।गुरूणां चैव सर्वेषां माता परमको गुरुः” । यह भी कहा गया है कि “प्रीणाति मातरं येन पृथिवी तेन पूजिता।।“  यानि मनुष्य जिस क्रिया से माता को प्रसन्न कर लेता है, उस क्रिया से सम्पूर्ण पृथ्वी का पूजन हो जाता है।
जबकि पाश्चात्य परम्पराओं का अध्ययन करने पर पता चलता है कि वहां के जीवन में अपेक्षाकृत नारी का स्थान नीचा रखा गया है। यूनान और रोम का सामाजिक-राजनीतिक दर्शन तो स्पष्ट तौर पर नारी विरोधी रहा है। अरस्तु यूनान में 324 ईसा पूर्व से 384 ई.पू. तक रहा। करीब पंद्रह सौ वर्षों तक उसके विचारों को स्वीकार किया जाता रहा। अरस्तु की नजर में प्रजनन में नारी का कोई योगदान नहीं था। उसने जोर देकर कहा कि नारी स्वतंत्रता तथा राजनीतिक गतिविधियों में भाग लेने योग्य नहीं है। इसे सिद्ध करने के लिए तर्क दिए गए कि ईश्वर तथा समाज की महानता के सामने नारी तुच्छ है। एच.जी.वैल्स की दी आउट लाइन ऑफ हिस्ट्री तथा मैकमिलन पब्लिशिंग की 1921 न्यूयार्क नाम पुस्तक में यह सामने आता है कि यह विचार रोम के लोगों को प्रभावित करने लगा और मध्यकाल तक संपूर्ण यूरोप में फैल गया। थामस एक्यिनस नामक साधु ने अरस्तु के विचारों को इक्कीस भागों में पेश किया और प्रचारित किया। जब समय बीतने के साथ-साथ पश्चिमी देशों में स्त्रियों को आदर-सम्मान नहीं मिल सका तो उन्होंने विद्रोह का रास्ता अपनाया। नारी ने अपनी व्यक्तिगत स्वतंत्रता को पाने के लिए संघर्ष किया। लेकिन समय के साथ यही नारी स्वतंत्रता का आंदोलन लैंगिक संघर्ष में बदल गया। यह आंदोलन नारी के अधिकारों का भले ही समर्थक रहा हो, लेकिन नारी को सम्मान कभी नहीं दिला सका। स्त्री पुरूष के इस संघर्ष ने सामाजिक और पारिवारिक ताने-बाने को ही बिगाड़ कर रख दिया। परीणामस्वरूप अत्याधुनिक अमेरिका में स्त्री-पुरुषों में खाई बढ़ गई। इसका परिणाम हुआ कि 41 फीसदी बच्चे अविवाहित माताओं से पैदा हुए। उनमें भी आधे किशोरी कन्याओं से जन्मे। 1955 में केवल 55 फीसदी पति पत्नी घर में एक साथ रहते थे। 2010 तक आते-आते यह संख्या 48 फीसदी रह गई। 12 फीसदी अकेली महिलाएं और 15 फीसदी अकेले पुरुषों के परिवार हो गए हैं। 11 फीसदी से अधिक अमेरिकी युगल लिव इन रिलेशनशिप में रहते हैं। करीब 60 फीसदी अमेरिकन स्त्री पुरुष विवाह ही नहीं करते। यही कारण था कि अमेरिकी राष्ट्रपति ने विवाह कानून में सुधार के लिए 2012 में कानून बनाया। फादरलेस अमेरिका जैसे शीर्षक वाली किताबें बाजार में आईं। इंग्लैंड की स्थिति तो इससे भी बुरी है। यहां 47 फीसदी बच्चे अविवाहित लड़कियों की संताने हैं। बाइबिल इन इंडियाहिंदू ऑरिजिन ऑफ हबर्रेस एंड क्रिश्चियन रेवेलेशन में फ्रेंच लेखक लुइस जेकोलियर कहते हैं कि भारत में एक ऐसी उच्च स्तर की सभ्यता रही है, जो पाश्चात्य सभ्यता से कहीं अधिक प्राचीन है, जिसमें नारी को पुरूष के समान समझा जाता है और परिवार तथा समाज में समान स्थान दिया जाता है
कुल मिलाकर हमें फिर से इस प्रश्न पर विचार करना होगा कि हम अपने पुरातन गौरव की तरफ लौटना चाहते हैं या अंधेरी कोठरी में दीवारों से सर टकराना चाहते हैं। हमारे सामने समस्याएं भी हैं तो समाधान भी। बस हमें नए सिरे से समस्याओं और समाधान पर विचार करना होगा। पश्चिम के पास तो समाधान ही नहीं है, हमें तो उसके लिए भी निवारण का प्रबंध करना है। यह हमारी ही जिम्मेदारी है, क्योंकि भारत को विश्व गुरू की संज्ञा ऐसे ही नहीं दे दी गई है। अंत में इतना ही, मां की ममता, नेह बहन का और पत्नी का धीर हूं
मेरा परिचय इतना कि मैं भारत की तस्वीर हूं...
युद्ध का साहस, शिव की शक्ति और काली रणवीर हूं..
मेरा परिचय इतना कि मैं भारत की तस्वीर हूं...


बुधवार, 17 जुलाई 2019

साक्षी के नाम खुला पत्र..


#साक्षी तुम्हें पता भी है तुमने कितनी लड़कियों की जिंदगी बर्बाद कर दी है। साक्षी क्या तुम जानती हो कि तुमने कितनी लड़कियों के सपनों का गला घोंटा है। साक्षी क्या तुम जानती हो कि तुमने लड़कियों को कितने पीछे धकेल दिया है, बिलकुल वहीं..जहां से वे संघर्ष कर आगे बढ़ी थीं। तुम्हारे प्रेम से दुनिया को कोई दिक्कत नहीं थी, लेकिन तुमने जो उसका तमाशा बनवाया है, उससे तुम ही आज कटघरे में खड़ी हो, और तुम्हारे साथ खड़ी हैं वे अनगिनत बेकसूर लड़कियां, जिन्हें अब उनके माँ, बाप, भाई ही शक की नज़र से देख रहे हैं। तुम्हे यदि जान का खतरा था तो न्याय पाने के और भी तरीके थे। तुमने वीडियो जारी किया, चलो उसे भी जायज़ मान लिया जाए। लेकिन जिस तरह तुमने न्यूज़ चैनल में बैठकर अपने परिवार की इज्जत हवा में उछली है ना, उससे तुम्हारी नीयत पर शक पैदा होता है। तुम अकेली लड़की नहीं हो, जिसने परिवार के ख़िलाफ़ जाकर विवाह किया है, लेकिन उन्होंने अपने पिता की इज्जत यूं तार-तार नहीं की। यदि प्रेम विवाह के बाद कि प्रतिक्रिया सहने के साहस नहीं था, तो ऐसा कदम ही क्यूं उठाया। तुम्हारे कृत्य से षड्यंत्र की बू आ रही है। वीडियो में जिस तरह तुम अपने पिता का नाम ले रही थी ना, उसमें घृणा का भाव जाहिर हो रहा था। तुम अपने पिता को समझा नहीं धमका रही थीं। तुम्हारी भाषा से तो नहीं लगा कि तुम डरी हुई हो। जिस तरह से सजी संवरी बैठी थी, उसे देखकर भी नहीं लगा कि तुम जान बचाने के लिए मारी-मारी फिर रही थीं। हर पिता अपनी बेटी को अरमानों के साथ विदा करना चाहता है, कोई बात नहीं कि तुमने अपने परिवार को विश्वास में लिए बिना ही रवाना हो गयी, पर एक बात याद रखना कि तुम्हारे कृत्य से (प्रेम विवाह करने से नहीं, बल्कि परिवार की भद्द पिटाने के कारनामे से) आज हम सब लड़कियां शर्मिंदा हैं। जो तुमने किया वो प्रेम नहीं केवल आकर्षण का शिकार होना है। क्योंकि जो अपने माता-पिता से प्रेम नहीं कर सकता, वो किसी से क्या प्रेम करेगा और क्या निभाएगा। अंत में एक बात याद रखना, हमारे यहां कहावत है-- जो ना माने बड़ों की सीख, ले कटोरा मांगे भीख। और एक बात यदि किसी न्यूज़ चैनल में बैठकर समस्याएं हल हो जाती तो देश की 80 फीसदी समस्याओं का समाधान हो गया होता। मैं खुद मीडिया से हूँ और मुझे कहने में कोई समस्या नहीं कि हम लोगों की परेशानी कम करने के बजाए बढ़ा रहे हैं। औऱ जाते-जाते सुन लो कि मीडिया को ना तुम्हारी जान बचाने में रुचि है ना ही तुम्हारे पिता जी की इज्ज़त बचाने में कोई इंटरेस्ट। तुम्हारे जैसे मूर्ख केवल मीडिया की टीआरपी बढ़ाने के टूल हो, इससे ज्यादा कुछ नहीं..#प्रियंकाकौशल