गुरुवार, 24 सितंबर 2015

आयरलैंड, मोदी और सावरकर




आयरलैंड पहुंचे भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का स्वागत संस्कृत के श्लोक से हुआ। आयरिश बच्चों के मुंह से संस्कृत श्लोक सुनने के बाद मोदी की पहली टिप्पणी थी कि अगर भारत में ऐसा होता तो सेकुलरिज्म पर सवाल उठ जाता। प्रधानमंत्री की टिप्पणी पर कांग्रेस को आपत्ति है और उसके नेता मनीष तिवारी कहते हैं कि मोदी की ये चुटकी कांग्रेस पर बल्कि भारत पर है
सबसे पहली बात तो यह कि, हां यह सच है कि यह टिप्पणी भारत पर ही है, तो इसमें गलत क्या है। कांग्रेस के मनीष तिवारी जी और कांग्रेस यह समझ नहीं पा रहे हैं कि नरेंद्र मोदी ने जो बात संस्कृत को लेकर आयरलैंड की सरजमीं पर कही हैं, उनके मायने कितने गहरे हैं। आज जिस संस्कृत को पूरा विश्व एक वैज्ञानिक भाषा के तौर पर स्वीकार कर चुका है, उसे कांग्रेस के इंडिया,दैट इज़ भारतमें हम धर्म विशेष से जोड़कर देखते हैं। हमने कभी अपनी विरासतों पर गर्व नहीं किया। उल्टे जवाहरलाल नेहरू जैसे कुछ लोग सार्वजनिक रूप से स्वीकार करते रहे कि वे अपने धर्म, संस्कृति और परंपराओं को लेकर शर्मिंदा होते हैं। कांग्रेस सुभाषचंद्र बोस जैसे क्रांतिकारियों की जासूसी करवाती रही और उन्हें जीते-जी मार दिया गया। दूसरी बात यह कि, अपनी विरासत पर गर्व करना सीखना हो तो आयरलैंड से सीखा जा सकता है।
आयरलैंड ने भी भारत की तरह लंबे संघर्ष के बाद अंग्रेजों से पूर्ण स्वतंत्र राष्ट्र को प्राप्त किया था, लेकिन उसने कभी उन वीरों को नहीं भुलाया, जिनकी बदौलत वे इस मंजिल तक पहुंचे थे। उस देश ने अपनी विधानसभाओं के पार्श्वभाग की दीर्घाओं में अपने क्रांतिकारी संघर्ष की पूरी कहानी चित्रित करवाई ताकि उनकी स्मृति हर क्षण बनी रहे। साथ ही क्रांति की गाथाएं प्रेरणा देती रहे। आयरलैंड ने कभी अपनी क्रांति को हिंसा कहकर परिभाषित नहीं किया, जैसा कि दुर्भाग्यजनक रूप से तथाकथित नरमपंथियों ने हिंदुस्थान में किया। 15 वर्ष की आयु में अपनी कुलदेवी भगवती दुर्गा के समक्ष स्वाधीनता के लिए संघर्ष करने का संकल्प लेने वाले वीर विनायक दामोदर सावरकर ने वर्ष 1928 में कहा था कि हमारे बंगलों में थोड़ा बहुत स्वार्थ त्याग करने वाले लोगों की तस्वीरें मिल जाएंगी, किंतु न तो कान्हेरे की तस्वीर मिलेगी न वैद्य की मिलेगी। हिंदुस्तान के हित के लिए दुनिया भर में फैले कितने ही देशभक्तों के एक पन्ने का चरित्र भी उपलब्ध नहीं है
1928 में कही गई सावरकर की बात सत्य ही तो साबित हो रही है, आज हम देश को स्वतंत्र करवाने वाले कितने वीरों को जानते हैं, केवल उंगलियों में गिने जा सकने वाले नाम ही हमें पता हैं, देश पर न्यौछावर हो जाने वाले असंख्य क्रांतिकारियों के नाम तो हम तक पहुंच ही नहीं पाए। खुद सावरकर ने अभिनव भारत नाम की छोटी सी क्रांतिकारी टोली के माध्यम से मां भारती को परतंत्रता से मुक्ति दिलाने का लंबा अभियान चलाया। अभिनव भारत ने देश में ही नहीं बल्कि विदेश में भी ब्रितानिया हुकूमत की जड़ों को हिलाकर रख दिया। महान राष्ट्रभक्त श्याम जी वर्मा, भाई परमानंद, लाला हरदयाल,निरंजन पाल, ज्ञानचंद्र वर्मा, मदनलाल धींगरा, श्रीराम राजू, विष्ण गणेश पिंगले, शचींद्रनाथ सान्याल, जितेंद्रनाथ, मैडम कामा जैसे अनगिनत नाम गुमनामी के अंधेरे में खो गए। उन्होंने कभी खुद को महिमा मंडित भी नहीं किया। उनका तो एकमात्र उद्देश्य राष्ट्र की निस्वार्थ सेवा करना था। उसे परतंत्रता की बेडियों से स्वतंत्र कराना था।
यह सावरकर का ही निस्वार्थ संकल्प था कि मातृभूमि की स्वतंत्रता के बाद, अंग्रेजो के विरुद्ध सशस्त्र क्रांति का लक्ष्य प्राप्त करने के बाद, वर्ष 1958 में पूना में आयोजित एक विशेष समारोह में अभिनव भारत संस्था का विसर्जन कर दिया गया। स्वार्थ जैसा शब्द उनके शब्दकोश में ही नहीं था, यही कारण था कि स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद अभिनव भारत संस्था को विसर्जित कर दिया गया। नहीं तो देश में ऐसे भी उदाहरण है कि आजादी के पूर्व बनी संस्थाएं कालांतर-प्रकारातंर में देश की राजनीतिक पार्टी के रूप में परिवर्तित हो गई और परिवार विशेष के राजनीतिक स्वार्थपूर्ति का साधन बनी।

प्रियंका कौशल
स्वतंत्र पत्रकार
9303144657


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