शुक्रवार, 24 जनवरी 2014

बदल रहा है बस्तर



बस्तर के धुर नक्सल प्रभावित इलाकों में जाते वक्त, जहां प्रकृति के सुंदर नजारे भी माओवाद की मनहूसियत में डूबे हैं, क्या कोई ये कल्पना भी कर सकता है कि वहां कुछ सुखद, दिल को आनंद देने वाला और संतोषजनक भी मिल सकता है। जी हां रायपुर से जगदलपुर जाते वक्त जैसे ही केशकाल घाटी पार होती है, वैसे ही एक गांव आता हैलंजोडा। लजोंडा यानि प्रकृति की गोद में पलता एक गांव और यहां चल रहा 400 बच्चों का आवासीय ऋषि विद्यालय। यही लंजोडा की पहचान बन चुकी है। गायत्री परिवार से जुड़े बी आर साहू ने इस विद्यालय की संकल्पना की और अपने सहयोगी नकुल नेताम के साथ इसे साकार रूप दिया।
वर्ष 1995 से लंजोडा में चल रहा ऋषि विद्यालय इसलिए भी चर्चित है, क्योंकि यहां बस्तर के दूर-दराज के आदिवासी बच्चों को लाकर जीवन का पाठ पढ़ाया जा रहा है। ये बच्चे या तो नक्सल हिंसा में अपने माता पिता खो चुके हैं या फिर पुलिस और नक्सलियों को गोलियों की आवाज सुनकर बड़े हुए हैं। इन बच्चों को दूर दराज से लाकर उन्हें लंजोडा में लाकर पढ़ाया लिखाया तो जाता ही है, उन्हें स्वावलंबन का पाठ भी पढ़ाया जा रहा है। पहली से दसवीं तक संचालित इस आवासीय विद्यालय में पढ़ाने वाले नवयुवक और नवयुवतियां भी बस्तर के दूर दराज इलाकों से आकर यहां रह रहे हैं। लंजोडा उस जगह से लगा हुआ है, जहां 1985 में अविभाजित मध्यप्रदेश के वक्त नक्सलियों ने पहला सबसे बड़ा विस्फोट किया था। लेकिन आज इसे विस्फोट की वजह से नहीं बल्कि ऋषि विद्यालय के कारण जाना जाता है।
ऋषि विद्यालय के सलाहकार सदस्य हरिसिंह सिदार कहते हैं कि नक्सल प्रभावित इलाके में ऐसे विद्यालय को चलाना किसी चुनौती से कम नहीं है। लेकिन अपने आदिवासी बच्चों का भविष्य सुधारने के लिए हम प्रयासरत हैं। बच्चे भी यहां खुश रहते हैं। हमारे विद्यालय के निकले कई आदिवासी बच्चे अच्छे-अच्छे मुकाम पर पहुंच चुके हैं। कई प्रशासनिक सेवाओं में भी गए हैं।
इस विद्यालय की खूबी ये है कि इसके संचालक बी आर साहू बच्चों के लिए खुद ही सारी भूमिकाएं निभाते हैं। कभी वे नाई बनकर सबके बाल काटते हैं, कभी पिता बनकर उनको दुलारते हैं। आश्रम की तर्ज पर चल रहे इस विद्यालय में साफ-सफाई से लेकर सारी जिम्मेदारियां शिक्षकों, बच्चों और बीआर साहू के परिवार के बीच बांटी गई हैं। देश का पहला वेस्ट वाटर रिसाइकल प्लांट भी यहां बनाया गया है। उपयोग हो चुके निस्तारित पानी को फिर से भूमि के अंदर इस्तमाल करने लायक बनाया जाता है। इससे आश्रम में कभी पानी की कमी नहीं होती।
यहां पढ़ रहा कोई बच्चा डॉक्टर बनना चाहता है तो कोई इंजीनियर। कुछ बच्चे पत्रकार भी बनना चाहते हैं ताकि बस्तर की सही तस्वीर को दुनिया के सामने रख पाएं। ये वे बच्चे हैं, जिनके सुनहरे भविष्य की उम्मीद उनके माता-पिता खो चुके थे। लेकिन ऋषि विद्यालय ने उनकी उम्मीदों को नए पंख दे दिए हैं। वो उस वक्त में, जब नक्सलियों ने बस्तर में चलने वाले अधिकांश विद्यालयों की इमारतें ध्वस्त कर दी हैं। नक्सलियों का कहना है कि इन इमारतों में अर्ध्यसैनिक बलों को ठहराया जाता है। इसलिए वे ऐसी किसी भी इमारत को अपने इलाकों में नहीं पसंद करते हैं।
धुर नक्सल प्रभावित गांव आमापल्ली की मनोरमा ऋषि विद्यालय में पांचवी कक्षा में पढ़ती है। मनोरमा डॉक्टर बनना चाहती है। मनोरमा कहती है कि उसका सपना जरूर पूरा होगा। मैं मन लगाकर पढ़ाई कर रही हूं। डॉक्टर बनकर अपने लोगों का मुफ्त इलाज करूंगी।
चेरावाड़ी की मोनिका टीचर बनकर अपने गांववालों को पढ़ाना चाहती है। दस साल की मोनिका अभी पांचवी में पढ़ रही है। उसके गांव में कोई भी पढ़ा लिखा नहीं है। वो सबको पढ़ाकर समझदार बनाना चाहती है। वहीं केशकाल का दीपक मंडावी भी शिक्षक ही बनना चाहता है। उसे भी अपने गांव के अशिक्षित होने की टीस महसूस होती है। वो अभी सातवीं कक्षा का छात्र है। इनकी तरह ही युवराज नेताम, दयानंद, आकाश भी शिक्षक बन दूसरों को शिक्षित करना चाहते हैं। ये बच्चे कहते हैं कि अशिक्षा के कारण ही आज हमारा बस्तर जल रहा है। यदि लोग पढ़े लिखे और समझदार होते तो अपना भला बुरा समझ सकते थे।
इन बच्चों के लिए हर तकनीकी समान जुटाने वाले नकुल नेताम खुद इंजीनियर बनते बनते रह गए। कोंडागांव के रहने वाले नेताम के पास उस वक्त फीस भरने के लिए धन नहीं था। लेकिन उन्हें भगवान ने ही इंजीनियर बनाकर भेजा है। भले ही वे डिग्री ना ले पाए हों, लेकिन ऋषि विद्यालय के बच्चों के लिए जरूरी हर तकनीकि संसाधन वे खुद जुटाते और बनाते हैं। चाहे बच्चों का खाना ले जाने वाली ट्राली हो, या फिर गंदे पानी को फिर इस्तेमाल योग्य बनाने की प्रक्रिया। हर काम नकुल नेताम की छाप दिखाई देती है। वहीं बच्चों के लिए अपना परिवार छोड़ चुके विजय राय भी दिन रात केवल आदिवासी बच्चों की सेवा में लगे हुए हैं। राय का परिवार रायपुर में रहता है, जबकि राय पिछले 16 सालों से बस्तर के बच्चों का जीवन संवारने के लिए प्रत्यनशील हैं।

बस्तर में चल रहा ये स्कूल वाकई में अद्वीतीय है। केवल इसलिए नहीं है कि ये बस्तर में चल रहा है, बल्कि इसलिए कि यहां पढ़ने वाले बच्चों की आंखों में एक नये सवेरे की झलक दिखाई देती है। ऐसी झलक, जिसमें बस्तर की पहचान माओवाद नहीं, बल्कि अपनी तरक्की और खुशहाली नजर आती है। ये बच्चे बड़े होकर अपने इलाके की तस्वीर बदलना चाहते हैं। वे डॉक्टर बनकर अपने लोगों की मुफ्त चिकित्सा करना चाहते हैं, शिक्षक बनकर उन्हें पढ़ाना चाहते हैं। भविष्य के प्रति उत्साह देखकर तो यही लगता है कि बगैर किसी सहायता और अनुदान के चल रहा ये विद्यालय सही मायने में इलाके की तस्वीर बदलने में महती भूमिका निभाएगा। 

शुक्रवार, 10 जनवरी 2014

अब हरि भजें या राम




2013 का विधानसभा चुनाव छत्तीसगढ़ का राजनीतिक चेहरा और उसकी रंगत बदलने के लिए याद किया जाएगा। इस चुनाव ने भाजपा और कांग्रेस दोनों ही दलों के करीब पांच दर्जन नेताओं को कहीं का नहीं छोड़ा। पराजय का सामना कर चुके कई दिग्गजों का भविष्य ही अब दांव पर लग गया है। अब ना तो पार्टियों को सूझ रहा है ना ही इन नेताओं को, कि इनका होगा क्या?
भाजपा और कांग्रेस दोनों ही राजनीतिक दलों के खांटी और दिग्गज कहलाने वाले 64 नेता सत्ता सुख से वंचित हो चुके हैं। ये नेता अपने संगठन में अच्छा दखल रखते हैं। लेकिन विधानसभा चुनाव में परास्त होने के बाद इन महारथियों के भविष्य पर प्रश्नचिंह लग गया है। हालांकि इनमें से कुछ के लोकसभा चुनाव लड़ने की संभावना है, किंतु अत्यंत छोटे से प्रदेश में, जहां लोकसभा की केवल 11 सीटें है, इन 64 नेताओं का भविष्य संवरना थोड़ा मुश्किल लगता है। ऐसे में अधिकांश के पास सिवाए इंतजार के कोई विकल्प नहीं है। विधानसभा चुनाव में भाजपा के 34 (इनमें से 13 का टिकट कटा और 21 चुनाव हार गए) और कांग्रेस के 30 विधायकों (इनमें से तीन को टिकट नहीं मिला, बाकी 27 चुनाव हार गए) का पांच साल का राजनीतिक वनवास मतदाताओं ने तय कर दिया है। सत्ता पक्ष यानि भाजपा के लिए दूसरा विकल्प जरूर मौजूद है कि हारे हुए अपने नेताओं को मंडल, निगम या आयोगों में बैठाकर उनका राजनीतिक करियर बचाया जाए। लेकिन कांग्रेस के नेताओं के पास तो केवल लोकसभा की ही उम्मीद बाकी है।
कांग्रेस के पास हारे हुए दिग्गजों की लंबी सूची है, जिनमें प्रमुख रूप से पूर्व नेता प्रतिपक्ष रविंद्र चौबे, पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी, पूर्व पंचायत मंत्री अमितेश शुक्ल, मोहम्मद अकबर शामिल हैं। अब इन्हें लोकसभा चुनाव में उतारना भी कांग्रेस के लिए बड़ी चुनौती है। रविंद्र चौबे दुर्ग लोकसभा से चुनाव लड़ना चाहते हैं, जहां से 2008 में उनके अग्रज यानि बड़े भाई प्रदीप चौबे ने किस्मत आजमाई थी। लेकिन जीत हासिल हुई थी पहली बार लोकसभा चुनाव लड़ने मैदान में उतरी भाजपा की उम्मीदवार सरोज पांडे को। अगर रविंद्र चौबे को दुर्ग लोकसभा की सीट मिल भी जाती है तो उनके भाई इससे वंचित रह जाएंगे।
खुद रविंद्र चौबे कहते हैं कि, पार्टी यदि चाहेगी तो वे जरूर दुर्ग लोकसभा से चुनाव लड़ना चाहेंगे। विधानसभा चुनाव में भले ही कांग्रेस की सरकार नहीं बन पाई और 27 विधायक भी हारे, लेकिन बावजूद इसके पार्टी का वोट प्रतिशत तो बढ़ा ही है, जो कि अच्छा संकेत है। लोकसभा चुनाव में हम जरूर प्रदेश की सीटों पर भाजपा को पटखनी देंगे
बात करें पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी की, तो वे बिलासपुर लोकसभा से चुनाव लड़ना चाह रहे हैं। इसके दो कारण हैं। पहला ये कि उनका इलाका मरवाही बिलासपुर संभाग के तहत ही आता है, दूसरा इस इलाके को पहले से ही खुद के लिए तैयार करते आ रहे हैं। ये दूसरी बात है कि 2008 में उनकी धर्मपत्नि रेणु जोगी बिलासपुर लोकसभा में भाजपा के दिग्गज नेता दिलीप सिंह जूदेव से हार गई थीं। लेकिन बावजूद इसके जोगी परिवार के लिए सबसे सुरक्षित लोकसभा सीट यही मानी जा रही है।
हालांकि अजीत जोगी की मानें तो वे लोकसभा चुनाव नहीं लड़ना चाहते। उनका कहना है कि वे एक क्षेत्र में बंधकर पार्टी के लिए काम नहीं कर पाऊंगी। पार्टी के लिए बेहतर यही है कि मैं किसी सीट से चुनाव ना लड़कर पूरे प्रदेश में कांग्रेस के लिए काम करुंगा
पंडित श्यामाचरण शुक्ल के सुपुत्र अमितेश शुक्ल भी महासमुंद से दावेदारी कर रहे हैं। हालांकि उनकी ये भी इच्छा है कि उन्हें नहीं तो उनके बेटे भवानी शुक्ल को यहां से लोकसभा टिकट दे दी जाए। वैसे भी महासमुंद सीट लंबे समय तक शुक्ल परिवार के आधिपत्य वाली सीट रही है। 1957 में कांग्रेस के टिकट पर वीसी शुक्ल (अमितेश के चाचा) ने महासमुंद सीट से लोकसभा का चुनाव जीतकर भारतीय संसद में सबसे युवा सांसद बने थे। इसके बाद वे नौ बार इस सीट से सासंद चुने गए। 2004 के चुनाव के ठीक पहले वीसी शुक्ल भाजपा में चले गए. महासमुंद सीट से वे फिर चुनावी मैदान में उतरे, पर अजीत जोगी ने उन्हें हरा दिया। अब महासमुंद सीट पर अमितेश की नजर है।
अमितेश शुक्ल कहते हैं कि हमारे परिवार ने ताउम्र पार्टी के हित में ही काम किया है, चाहे कैसी भी परिस्थिति रही हो। विधानसभा चुनाव में जीत हार लगी रहती है, इससे मायूस होकर बैठना ठीक नहीं है। अभी लोकसभा चुनाव सामने है, देखिए पार्टी आलाकमान यदि हम पर विश्वसास जताती हैं तो मैं जरूर महासमुंद से किस्मत आजमाना चाहूंगा।
कांग्रेस ने दो मुस्लिम प्रत्याशियों को विधानसभा टिकट दिया था, लेकिन दोनों ही हार गए। इनमें से एक मोहम्मद अकबर कांग्रेस के कद्दावर अल्पसंख्यक नेता माने जाते हैं। उन्होंने अपनी परंपरागत सीट पंडरिया के बजाए इस बार कबीरधाम (कवर्धा) से चुनाव लड़ने का जोखिम लिया, लेकिन हार गए। अब अकबर रायपुर लोकसभा सीट से चुनाव लड़ने के इच्छुक बताए जा रहे हैं। ये अलग बात है कि रायपुर से वर्तमान सासंद रमेश बैस (भाजपा) पिछले छह चुनाव से लगातार ये सीट जीत रहे हैं। 2008 में उन्होंने भूपेश बघेल को पराजित किया था। इस बार मोहम्मद अकबर इस सीट के प्रबल दावेदार हो सकते हैं। लेकिन कांग्रेस के उच्च पदस्थ सूत्रों की मानें तो रायपुर ग्रामीण विधानसभा सीट से जीतकर आए सत्यनारायण शर्मा भी सबको चौंकाते हुए इस सीट से लोकसभा टिकट की दावेदारी कर सकते हैं। कांग्रेस के पास रायपुर की महापौर किरणमयी नायक का भी विकल्प है। ऐसे में मोहम्मद अकबर को रायपुर लोकसभा सीट की टिकट लेने के लिए कई दावेदारों से टकराना पड़ेगा।
मोहम्मद अकबर अभी इस बारे में कुछ भी बोलना नहीं चाहते। फिलहाल वे कवर्धा विधानसभा सीट पर मिली हार की समीक्षा में व्यस्त हैं। लेकिन उन्हें ये भी विश्वास है कि पार्टी आलाकमान उनपर भरोसा जरूर जताएगा।
भाजपा की फेहरिस्त में भी कई वरिष्ठ नेता मौजूद हैं। इनमें पूर्व उच्च शिक्षा मंत्री रामविचार नेताम, पूर्व पंचायत मंत्री हेमचंद यादव, पूर्व कृषि मंत्री चंद्रशेखर साहू जैसे नेता हैं, जो विधानसभा चुनाव में तो परास्त होकर सत्ता की दौड़ से बाहर हो गए हैं।
रामविचार नेताम सरगुजा के पुराने क्षत्रप हैं। हाल ही में सांसद मुरारीलाल सिंह के आकस्मिक निधन से सरगुजा लोकसभा सीट रिक्त भी हो गई है, साथ ही नेताम को मिलने वाली चुनौती भी। नेताम रामनुजगंज से विधानसभा चुनाव भी हार चुके हैं। ऐसे में पार्टी उन्हें सरगुजा लोकसभा सीट से टिकट देकर केंद्र की राजनीति में भेज सकती है। हालांकि खुद नेताम विधानसभा चुनाव में मिली हार से अचंभित हैं। उनके शब्दों में जानें तो लोकसभा चुनाव लड़ने की मेरी कोई इच्छा नहीं है, फिलहाल तो मैं अपनी हार के कारण ढूंढ रहा हूं। लेकिन यदि पार्टी उचित समझती है, तो मैं किसी भी प्रकार की जिम्मेदारी लेने में पीछे ना ही हटा हूं ना ही कभी पीछे हटूंगा 
पूर्व कृषि मंत्री चंद्रशेखर साहू का नाम भी महासमुंद लोकसभा सीट के लिए चल पड़ा है। दरअसल महासमुंद साहू बहुल क्षेत्र है। वहां से वर्तमान सांसद भी साहू समुदाय से ही हैं। उनके करीबियों की मानें तो विधानसभा चुनाव में हार का सामना करने के बाद चंद्रशेखर साहू घर नहीं बैठना चाहते हैं, संगठन में भी उनकी कोई रूचि नहीं है, लेकिन वे लोकसभा लड़कर मतदाताओं के नजदीक बने रहना चाहते हैं। यही कारण है कि चुनाव हारने के बाद भी भाजपा सरकार के हर कार्यक्रम में नजर आए। चाहे मंत्रिमंडल का शपथग्रहण समारोह हो या मंत्रियों द्वारा पदभार ग्रहण का कार्यक्रम। जबकि दूसरे हारे हुए मंत्रियों ने कार्यक्रमों में कोई विशेष रूचि नहीं दिखाई। साहू की इस सक्रियता के मायने यही निकाले जा रहे हैं कि वे लोकसभा सीट के लिए लाबिंग कर रहे हैं।
दुर्ग शहर से हारे पंचायत मंत्री हेमचंद यादव भी लोकसभा टिकट की दौड़ में शामिल हैं। हालांकि उनके लिए सीट तय करना खुद उनके लिए और संगठन के लिए मशक्कत का काम है। उनके समर्थक उन पर दुर्ग लोकसभा सीट से ही लड़ने का दबाव बना रहे हैं। जबकि इस सीट से अभी भाजपा की राष्ट्रीय अध्यक्ष सरोज पांडे सांसद हैं। केंद्र के नेताओं से सरोज पांडे की नजदीकियां यादव की टिकट में रोड़ा बनेगी, ये भी निश्चित है। कोई कारण भी नहीं है कि दुर्ग से सरोज पांडे का टिकट काटकर हेमचंद यादव को दिया जाए। ऐसे में हेमचंद यादव की मंशा कितनी पूरी हो पाएगी, ये बड़े नेताओं के मूड पर निर्भर करेगा।
इस वक्त भाजपा और कांग्रेस दोनों के लिए ही अपने हारे हुए दिग्गज नेताओं की खिसकती जमीन को बचाना बड़ी चुनौती बनती नजर आ रही है। लेकिन प्रदेश की महज 11 लोकसभा सीटों से हर किसी को संतुष्ट करना नामुमकिन है। अब तो हारे हुए दिग्गजों के पास यही चारा है कि वे या तो हरि भजें या राम, या जोगी की तरह पूरे प्रदेश में पार्टी के लिए काम करने का विकल्प चुनते हुए खुद ही लोकसभा ना लड़ने का ऐलान कर और भी बड़े बन जाएं।

गुरुवार, 26 दिसंबर 2013

कैसे जुटेगा फंड



छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह ने कामकाज संभालते ही अपने घोषणापत्र को अमलीजामा पहनाना शुरु कर दिया है, चूंकि वे खुद वित्तमंत्री का दायित्व भी निभाएंगे, ऐसे में बतौर वित्तमंत्री उनके लिए अपनी नई घोषणाओं के लिए फंड जुटाना बड़ी चुनौती होगी। राज्य में वित्तीय वर्ष 2013-14 के लिए 44,169 करोड़ का बजट अनुमान था, जो 2014-15 में बढ़कर करीब 48 हजार करोड़ के पार पहुंच जाएगा।
रमन सिंह ने शपथ लेते ही निर्देश जारी कर दिए हैं कि 1 जनवरी 2014 से 47 लाख परिवारों को 1 रुपए प्रति किलो की दर से चावल दिया जाए। घोषणा पत्र के अपने वादे को पूरा करते हुए समर्थन मूल्य पर धान बेचने वाले किसानों को प्रति क्विंटल 300 रुपए बोनस देने के आदेश भी दे दिया गया है। साथ ही अटल बिहारी बाजपेयी के जन्मदिवस यानि 25 दिसंबर 2013 से अटल बीमा योजना लागू करने के निर्देश भी जारी कर दिए गए हैं, जिसके तहत प्रदेश के लगभग 17 लाख खेतिहर मजदूरों को जीवन व दुर्घटना बीमा किया जाएगा। आदिवासी और वनवासियों के लिए तेंदूपत्ता की तर्ज पर इमली, चिरौंजी, महुआ, लाख और कोसा को न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीदने का फरमान भी जारी कर दिया गया। ये सब सुनने और देखने में सुखद जरूर लग सकता है, लेकिन राज्य सरकार को इसके लिए मोटी कीमत चुकानी होगी। सरकार को पहले से जारी योजनाओं के लिए भी वित्त की पूर्ति करनी है, ऐसे में इन नई रियायतों के लिए राजकोष पर चार से पांच हजार करोड़ का अतिरिक्त भार पड़ने का अनुमान है।
रमन सिंह के अपने तीसरे कार्यकाल के पहले ही दिन लोकलुभावन योजनाओं के क्रियान्वयन की लंबी सूची को आम लोग भले ही सुशासन से जोड़कर देख रहे हैं, लेकिन इसके लिए राज्य सरकार को बड़ी रकम जुटानी होगी, जो कि अपने आप में एक बड़ी चुनौती है।
राज्य सरकार पर नई घोषणाओं को अमलीजामा पहनाने में पड़ने वाले वित्तीय भार को हम पिछले बजट से समझ सकते हैं। वित्तीय वर्ष 2013-14 के लिए 44,169 करोड़ का बजट अनुमान प्रस्तुत किया गया था। इसमें खाद्यान्न सुरक्षा अधिनियम के तहत लगभग 42 लाख गरीब परिवारों को दो और तीन रुपए प्रति किलो की रियायती दर पर तथा 8 लाख सामान्य परिवारों को ए.पी.एल. दर पर खाद्यान्न उपलब्ध कराने का प्रावधान था। इस पर लगभग 2000 करोड़ का खर्च अनुमानित था अब नए निर्देशों के तहत प्रति परिवार 1 रुपए किलो की दर से चावल उपलब्ध करवाया जाना है यानि योजना पर खर्च दुगुना हो जाएगा।
वहीं वर्ष 2012-13 में खरीदे गए 70 लाख मीट्रिक टन धान के बदले 270 रुपए प्रति क्विंटल की दर से अकेले बोनस देने के लिए 1750 करोड़ का प्रावधान किया गया था। अब नई घोषणा के तहत सरकार को प्रति क्विंटल 300 रुपए बोनस देना है यानि इस मद पर भी राशि दुगुनी ही होनी है। इसका एक कारण ये भी है कि हर साल धान खरीदी का आंकड़ा बढ़ रहा है। राज्य सरकार ने वर्ष 2010-11 में ही 51 लाख  मीट्रिक टन धान खरीद कर  किसानों को 5000 करोड़ रूपए धान की कीमत और बोनस के रूप में दिए थे । 2013 में धान खरीदी का आंकड़ा 70 लाख मीट्रिक टन पर पहुंच गया।
इस मसले पर मुख्यमंत्री रमन सिंह कहते हैं कि अपनी घोषणाओं को हम हर हाल में पूरा करेंगे। जहां तक बजट का सवाल है, हम अपने वित्तीय अनुशासन से इसकी पूर्ति करेंगे। लेकिन सीएम ये नहीं बताते कि वे किस तरह के वित्तीय अनुशासन की बात कर रहे हैं।
वर्ष 2013-14 में बजट पेश करते हुए मुख्यमंत्री रमन सिंह ने कहा था कि राज्य की कुल प्राप्तियाँ 43,977 करोड़ तथा कुल  व्यय 44,169  करोड़ अनुमानित किया गया है। इन वित्तीय प्राप्ति और व्यय में अंतर के कारण 192  करोड़ का शुध्द घाटा अनुमानित है। साथ ही वर्ष 2012-13 के संभावित घाटे 1,485 करोड़ को शामिल करते हुये कुल बजटीय घाटा 1,677 करोड़ अनुमानित है। इस घाटे की पूर्ति वित्तीय अनुशासन तथा अतिरिक्त आय के संसाधन जुटाकर की जाएगी। यानि 2013-14 में ही 1 हजार 677 करोड़ का घाटा अनुमानित था।
प्रदेश के पूर्व वित्त मंत्री और कांग्रेस नेता रामचंद्र सिंहदेव तहलका से कहते हैं कि राज्य सरकार तो कंगाल हो चुकी है। पिछले ही साल सरकार ने कामकाज चलाने के लिए अब तक का सबसे बड़ा लोन यानि साढ़े तीन हजार करोड़ रुपया राष्ट्रीयकृत बैंकों से लिया था। इससे ही आप अंदाजा लगा सकते हैं कि सरकारी खजाना बिलकुल खाली हो चुका है। अब कैसे योजनाओं को पूरा किया जाएगा, ये तो मुख्यमंत्री ही जानें
जबकि वर्ष 2000 में जब छत्तीसगढ़ का गठन हुआ था, तब अविभाजित मध्यप्रदेश के हिस्से के रूप में छत्तीसगढ़ के भौगोलिक क्षेत्र के लिए कुल बजट प्रावधान केवल पांच हजार 704 करोड़ रूपए था, जो अलग राज्य बनने के बाद क्रमशः बढ़ता गया और अब तेरह सालों में 40 हजार करोड़ रूपए से अधिक हो गया है।
हालांकि सूबे के मुखिया को अपने घोषणा पत्र में किए गए वादों को पूरा करने की जल्दी शायद इसलिए भी है कि लोकसभा चुनाव सामने हैं, या फिर रमन सिंह अपनी हैट्रिक से गदगद हैं और जनता का अहसान चुकाना चाहते हैं। किंतु योजनाओं को लागू करने की जल्दबाजी चाहे किसी भी कारण हो, लेकिन इस त्वरित क्रियान्वयन में मुख्यमंत्री एक बात भूल रहे हैं कि इन योजनाओं को लागू करने के लिए राज्य पर पड़ने वाले वित्तीय भार से वे कैसे निपटेंगे। सरकार का खर्च तो हर साल बढ़ रहा है, लेकिन आय कैसे बढ़ेगी, इसका जबाव फिलहाल किसी के पास नहीं है, लेकिन हां, मंत्रालय में घोषणा पत्र के क्रियान्वयन के लिए बैठकों का दौर जारी है।

मंगलवार, 17 दिसंबर 2013

पत्थर पर उगेगा “दगड़ धान”



केवल पानी में उगने वाला धान अब पथरीली जमीन पर भी उगाया जा सकेगा। छत्तीसगढ़ के इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय ने धान की ऐसी ही कई नई किस्मों को खोज निकाला है। इनमें पथरीली जमीन पर उगने वाला दगड़ धान, दुर्गेश्वरी, इंदिरा राजेश्वरी, बमलेश्वरी, दंतेश्वरी, डोकरा-डोकरी, तुलसी मंजरी, दो दाना, अम्मा रूठी और श्याम जीरा जैसी कई किस्में शामिल हैं।
धान केवल अनाज का एक रूप ही नहीं वरन छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक धरोहर है। वैसे भी सूबे को धान का कटोरा ऐसे ही नहीं कहा जाता है। यहां धान की 23 हजार 250 धान की प्रजातियां खोजी जा चुकी हैं। इसके अलावा धान की नई किस्मों की खोज जारी है। छत्तीसगढ़ के इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय ने अपने 600 एकड़ में फैले खेतों में इन प्रजातियों को संरक्षित और संवर्धन करने का काम कर रही है। विश्वविद्यालय का सेंटर फॉर बॉयोडायवर्सिटी रिसर्च एंड डेवलपमेंट धान की प्रजातियों के जर्म प्लाज्मा को सुरक्षित रखने का जिम्मा उठाए हुए है। कृषि वैज्ञानिकों का दावा है कि विश्व में फिलीपींस के बाद भारत में सबसे ज्यादा धान की किस्मों को खोजा और संरक्षित किया जा रहा है और इसमें छत्तीसगढ़ का योगदान सबसे ज्यादा है।
विश्वविद्यालय ने खुद भी धान की 15 ऐसी किस्मों को विकसित किया है, जिनकी अलग-अलग विशेषता है। इनमें से कई प्रजातियां ऐसी हैं, जो किसी भी परिस्थिति में पैदा की जा सकती है। मसलन दुर्गेश्वरीऔर इंदिरा राजेश्वरीकी फसल सूखा झेलने पर भी खराब नहीं होती। वहीं गर्मी के वक्त बोने के लिए दंतेश्वरीको विकसित किया गया है। दगड़ धान को पथरीली जमीन पर न्यूमतम पानी की उपलब्धता के साथ उगाया जा सकता है।
इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ एस के पाटिल कहते हैं कि छत्तीसगढ़ में विपुल संपदा उपलब्ध है। हमारे विश्वविद्यालय ने प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों से धान की कई किस्में खोजी है। कुछ खुद विकसित की हैं। लेकिन अभी बहुत काम किया जाना बाकी है। किसानों के पास अभी कई प्रजातियां उपलब्ध हैं, जो दुनिया से छिपी हुई हैं। उन्हें खोजकर सबके सामने लाने के लिए शोध जारी है। हम भारत सरकार से ज्यादा फंड की मांग भी कर रहे हैं। अभी तक राज्य सरकार के सहयोग से सालाना 25 लाख रुपए खर्च कर शोध, विश्लेषण और संरक्षण का काम किया जा रहा है। लेकिन इतना काफी नहीं है। लगातार नई किस्में खोजी जा रही हैं। पुरानी साढ़े तेईस हजार किस्मों को भी सुरक्षित रखना बड़ी जिम्मेदारी है। इसके लिए ज्यादा धन की आवश्यकता होगी
पौधा किस्म और कृषक सरंक्षण अधिकार प्राधिकरण नई दिल्ली के अध्यक्ष आर आर हंचिनाल कहते हैं, मैं बहुत सारे राज्यों और उनके विश्वविद्यालों में गया हूं। लेकिन जैव विविधता को संरक्षित करने के काम में छत्तीसगढ़ और यहां का कृषि विश्वविद्यालय हमारे प्राधिकरण से भी आगे है। खासतौर पर कांकेर और जगदलपुर में अच्छा काम हो रहा है। यह सुनकर ही आश्चर्य हो रहा है कि छत्तीसगढ़ में धान की साढ़े तेईस हजार किस्में हैं। इनके जर्म प्लाज्मा को संरक्षित किया जा चुका है। अब आगे की खोज जारी है। हम भी किसानों को प्रोत्साहित कर रहे हैं कि उनके भी पास यदि कोई अछूती-अलग किस्म हो, तो वे भारत सरकार के इस प्राधिकरण को बताए।
हंचिलान आगे बताते हैं कि जैव विविधता में भारत का विश्व में पहला स्थान है। विश्व में जैव विविधता के 34 हॉट स्पाट खोजे गए हैं। जिमें चार अकेले भारत में है। इसमें से एक स्थान छत्तीसगढ़ में पाया गया है। यहां के धान की किस्में खनिज, विटामिन, प्रोटीन से भरपूर है। छत्तीसगढ़ में खोजी जा रही धान की नई किस्मों को देखकर लगता है कि प्रदेश खाद्य सुरक्षा के साथ साथ पौष्टिकता की सुरक्षा भी प्रदान कर रहा है। छत्तीसगढ़ के धान में चिकित्सीय गुण भी पाए जा रहे हैं। कई प्रकार की किस्में ऐसी हैं, जिन्हें खाने से मधुमेह जैसी बीमारियों में फायदा पहुंच रहा है।
प्रदेश के कृषि संचालक प्रतापराव कृदत्त कहते हैं कि, धान की इतनी किस्मों की खोज निश्चित ही अच्छा प्रयास है। फिलीपींस में जर्म प्लाज्म के संकलन में भारत का ही अहम योगदान है। इसमें छत्तीसगढ़ एक अलग नाम के साथ उभर रहा है। यहां धान की कई ऐसी किस्में खोजी गई हैं, जो इलायची के दाने से भी छोटी हैं। वहीं पक्षीराज किस्म के दाने उड़ते हुए पक्षियों की तरह नजर आते हैं, जो कि अद्भुत खोज है। वहीं खेराघुल किस्म का दाना सबसे छोटा होता है। ये अत्यधिक सुगंधित चावल है। लेकिन चावल जैसा दिखता नहीं है
भारत सरकार द्वारा 2011-12 में पादम जीनोम संरक्षण समुदाय पुरस्कार हासिल कर चुके महासमुंद जिले के किसान तुलसीदास साव कहते हैं, छत्तीसगढ़ में ना केवल धान बल्कि आम, नीबू और केले की भी कई ऐसी प्रजातियां मौजूद हैं, जिससे देश के दूसरे इलाके के किसान परिचित नहीं है। इन किस्मों के आम के पेड़ हर साल और नीबूं के पेड़ साल में दो से तीन बार फल दे रहे हैं। धान में तो प्रदेश काफी समृद्ध है ही। इसके अलावा विश्वविद्यालय ना केवल नई किस्मों की खोज कर रहा है, बल्कि किसानों को उससे परिचित भी करवा रहा है
वहीं कृषि वैज्ञानिक के के साहू कहते हैं कि धान की किस्मों के सरंक्षण का काम सराहनीय है। प्रदेश में हर किसान के पास अपनी अलग किस्म है। लेकिन केवल कुछ किस्में ही अपनी पहचान बना पाई हैं। जिसमें विष्णुभोग, दुबराज, बादशाह भोग जैसी सुगंधित प्रजातियां शामिल हैं। लेकिन अभी भी धान की कई अनजानी किस्में मौजूद हैं। जिनपर काम किया जाना बाकी है।
धान में 62 गुण होते हैं। जो हरेक किस्म को दूसरी से अलग करते हैं। किसी की पत्ती बड़ी होती है तो किसी का दाना। कोई धान की सुगंधित किस्म होती है, तो किसी में कोई सुगंध नहीं होती। इसी तरह धान की फसल पकने में अलग-अलग समय निर्धारित होता है। किसी प्रजाति की फसल 105 दिन में पक कर तैयार हो जाती है तो किसी को पकने में 135 दिन का वक्त लगता है। विश्वविद्यालय ने जिन खास किस्मों को खोजा है। उनमें सबकी अलग-अलग खासियत है। मसलन दो दाना और राम लक्ष्मण में एक ही खोल में दो दाने पाए जाते हैं। कभी-कभी तीन दाने भी मिल जाते हैं। इसी तरह महासमुंद से खोजा गया हनुमान लंगूर में सबसे लंबा दाना पाया जाता है। सराई फूल कमजोरी दूर करने के लिए लाभकारी है। वहीं महाराजी नई माताओं के लिए लाभकारी है। खासतौर से उनके लिए जिन्हें प्रसूति के वक्त ज्यादा रक्त बहने से कमजोरी आई हो। गाथुवन से जोड़ों के दर्द की शिकायत दूर की जा सकती है। नारियल चुडी विशेष रूप से दलदली जमीन और गहरे पानी में उगाया जाने वाला धान है। रोटी चपाती और ब्रेड बनाने के लिए उपयुक्त धान है। वहीं हाथीपंजारा नाम के ही अनुरूप मोटा धान है। तुलसी की मंजरी के जैसा दिखने वाली किस्म है तुलसी मंजरी। वहीं जीरे के अनुरूप दिखने वाली प्रजाती है जीरा धान। इन धान की प्रजातियों के जर्म प्लाज्मा को रायपुर में संरक्षित किया गया है ताकि आने वाली पीढ़ियां भी इनका फायदा उठा सकें।
बहरहाल धान के कटोरे को समृद्ध बनाने के लिए किसान, वैज्ञानिक और विशेषज्ञ दिन-रात मेहनत कर रहे हैं। सूबे के कृषि वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि वो समय भी जल्द आएगा, जब प्रदेश की धान की नई किस्में देश और दुनिया के हिस्सों में भी उगाई जाएंगी। फिलवक्त तो छत्तीसगढ़ में परंपरागत किस्मों के अलावा नई किस्मों की पैदावार लेने का प्रयोग शुरु किया जा चुका है। जो विश्व के सामने एक नजीर पेश करेगा।
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पूर्वजों द्वारा संरक्षित किस्मों की खोज
धान की नई किस्मों की खोज जारी है। इसमें अब केंद्र सरकार भी बढ़चढ़ कर भाग ले रही है। केंद्र द्वारा किसानों को भी प्रोत्साहित किया जा रहा है कि वे भारत सरकार के 2001 में बनाए गए कानून पौध किस्म और कृषक अधिकार संरक्षण के तहत अपनी किस्मों को खुद के नाम से पंजीकृत करवाएं। इसके लिए केंद्र सरकार द्वारा गठित प्राधिकरण के रजिस्ट्रार डॉ रवि प्रकाश कहते हैं कि हमारे पूर्वजों ने ना केवल धान बल्कि दूसरी फसलों के बीजों का सरंक्षण कर नई पीढ़ियों को हस्तांतरित किया। अब हमारा दायित्व है कि हम ना केवल उन्हें खोजें बल्कि बोयें भी। अब केंद्र सरकार ने किसानों को मालिक के रूप में किस्मों का पंजीकरण कराने का अधिकार दे दिया है। ऐसा करके हम नई किस्में खोज रहे हैं, वहीं किसानों को अपने पूर्वजों द्वारा संरक्षित प्रजातियों का मालिकाना हक मिल रहा है। भविष्य में जिससे उन्हें कई फायदे होंगे।
इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय द्वारा विकसित किस्में
महामाया (1995), श्यामला(1997), पूर्णिमा(1997), दंतेश्वरी(1997), बमलेश्वरी(2001), इंदिरा सुंगधित धान(2004), जलडूबी(2006), समलेश्वरी(2006), इंदिरा सोना(2006), कर्मा महसूरी(2007), महेश्वरी(2009), इंदिरा बरानी धान(2010), इंदिरा राजेश्वरी और दुर्गेश्वरी(2011)।