मंगलवार, 17 दिसंबर 2013

पत्थर पर उगेगा “दगड़ धान”



केवल पानी में उगने वाला धान अब पथरीली जमीन पर भी उगाया जा सकेगा। छत्तीसगढ़ के इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय ने धान की ऐसी ही कई नई किस्मों को खोज निकाला है। इनमें पथरीली जमीन पर उगने वाला दगड़ धान, दुर्गेश्वरी, इंदिरा राजेश्वरी, बमलेश्वरी, दंतेश्वरी, डोकरा-डोकरी, तुलसी मंजरी, दो दाना, अम्मा रूठी और श्याम जीरा जैसी कई किस्में शामिल हैं।
धान केवल अनाज का एक रूप ही नहीं वरन छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक धरोहर है। वैसे भी सूबे को धान का कटोरा ऐसे ही नहीं कहा जाता है। यहां धान की 23 हजार 250 धान की प्रजातियां खोजी जा चुकी हैं। इसके अलावा धान की नई किस्मों की खोज जारी है। छत्तीसगढ़ के इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय ने अपने 600 एकड़ में फैले खेतों में इन प्रजातियों को संरक्षित और संवर्धन करने का काम कर रही है। विश्वविद्यालय का सेंटर फॉर बॉयोडायवर्सिटी रिसर्च एंड डेवलपमेंट धान की प्रजातियों के जर्म प्लाज्मा को सुरक्षित रखने का जिम्मा उठाए हुए है। कृषि वैज्ञानिकों का दावा है कि विश्व में फिलीपींस के बाद भारत में सबसे ज्यादा धान की किस्मों को खोजा और संरक्षित किया जा रहा है और इसमें छत्तीसगढ़ का योगदान सबसे ज्यादा है।
विश्वविद्यालय ने खुद भी धान की 15 ऐसी किस्मों को विकसित किया है, जिनकी अलग-अलग विशेषता है। इनमें से कई प्रजातियां ऐसी हैं, जो किसी भी परिस्थिति में पैदा की जा सकती है। मसलन दुर्गेश्वरीऔर इंदिरा राजेश्वरीकी फसल सूखा झेलने पर भी खराब नहीं होती। वहीं गर्मी के वक्त बोने के लिए दंतेश्वरीको विकसित किया गया है। दगड़ धान को पथरीली जमीन पर न्यूमतम पानी की उपलब्धता के साथ उगाया जा सकता है।
इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ एस के पाटिल कहते हैं कि छत्तीसगढ़ में विपुल संपदा उपलब्ध है। हमारे विश्वविद्यालय ने प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों से धान की कई किस्में खोजी है। कुछ खुद विकसित की हैं। लेकिन अभी बहुत काम किया जाना बाकी है। किसानों के पास अभी कई प्रजातियां उपलब्ध हैं, जो दुनिया से छिपी हुई हैं। उन्हें खोजकर सबके सामने लाने के लिए शोध जारी है। हम भारत सरकार से ज्यादा फंड की मांग भी कर रहे हैं। अभी तक राज्य सरकार के सहयोग से सालाना 25 लाख रुपए खर्च कर शोध, विश्लेषण और संरक्षण का काम किया जा रहा है। लेकिन इतना काफी नहीं है। लगातार नई किस्में खोजी जा रही हैं। पुरानी साढ़े तेईस हजार किस्मों को भी सुरक्षित रखना बड़ी जिम्मेदारी है। इसके लिए ज्यादा धन की आवश्यकता होगी
पौधा किस्म और कृषक सरंक्षण अधिकार प्राधिकरण नई दिल्ली के अध्यक्ष आर आर हंचिनाल कहते हैं, मैं बहुत सारे राज्यों और उनके विश्वविद्यालों में गया हूं। लेकिन जैव विविधता को संरक्षित करने के काम में छत्तीसगढ़ और यहां का कृषि विश्वविद्यालय हमारे प्राधिकरण से भी आगे है। खासतौर पर कांकेर और जगदलपुर में अच्छा काम हो रहा है। यह सुनकर ही आश्चर्य हो रहा है कि छत्तीसगढ़ में धान की साढ़े तेईस हजार किस्में हैं। इनके जर्म प्लाज्मा को संरक्षित किया जा चुका है। अब आगे की खोज जारी है। हम भी किसानों को प्रोत्साहित कर रहे हैं कि उनके भी पास यदि कोई अछूती-अलग किस्म हो, तो वे भारत सरकार के इस प्राधिकरण को बताए।
हंचिलान आगे बताते हैं कि जैव विविधता में भारत का विश्व में पहला स्थान है। विश्व में जैव विविधता के 34 हॉट स्पाट खोजे गए हैं। जिमें चार अकेले भारत में है। इसमें से एक स्थान छत्तीसगढ़ में पाया गया है। यहां के धान की किस्में खनिज, विटामिन, प्रोटीन से भरपूर है। छत्तीसगढ़ में खोजी जा रही धान की नई किस्मों को देखकर लगता है कि प्रदेश खाद्य सुरक्षा के साथ साथ पौष्टिकता की सुरक्षा भी प्रदान कर रहा है। छत्तीसगढ़ के धान में चिकित्सीय गुण भी पाए जा रहे हैं। कई प्रकार की किस्में ऐसी हैं, जिन्हें खाने से मधुमेह जैसी बीमारियों में फायदा पहुंच रहा है।
प्रदेश के कृषि संचालक प्रतापराव कृदत्त कहते हैं कि, धान की इतनी किस्मों की खोज निश्चित ही अच्छा प्रयास है। फिलीपींस में जर्म प्लाज्म के संकलन में भारत का ही अहम योगदान है। इसमें छत्तीसगढ़ एक अलग नाम के साथ उभर रहा है। यहां धान की कई ऐसी किस्में खोजी गई हैं, जो इलायची के दाने से भी छोटी हैं। वहीं पक्षीराज किस्म के दाने उड़ते हुए पक्षियों की तरह नजर आते हैं, जो कि अद्भुत खोज है। वहीं खेराघुल किस्म का दाना सबसे छोटा होता है। ये अत्यधिक सुगंधित चावल है। लेकिन चावल जैसा दिखता नहीं है
भारत सरकार द्वारा 2011-12 में पादम जीनोम संरक्षण समुदाय पुरस्कार हासिल कर चुके महासमुंद जिले के किसान तुलसीदास साव कहते हैं, छत्तीसगढ़ में ना केवल धान बल्कि आम, नीबू और केले की भी कई ऐसी प्रजातियां मौजूद हैं, जिससे देश के दूसरे इलाके के किसान परिचित नहीं है। इन किस्मों के आम के पेड़ हर साल और नीबूं के पेड़ साल में दो से तीन बार फल दे रहे हैं। धान में तो प्रदेश काफी समृद्ध है ही। इसके अलावा विश्वविद्यालय ना केवल नई किस्मों की खोज कर रहा है, बल्कि किसानों को उससे परिचित भी करवा रहा है
वहीं कृषि वैज्ञानिक के के साहू कहते हैं कि धान की किस्मों के सरंक्षण का काम सराहनीय है। प्रदेश में हर किसान के पास अपनी अलग किस्म है। लेकिन केवल कुछ किस्में ही अपनी पहचान बना पाई हैं। जिसमें विष्णुभोग, दुबराज, बादशाह भोग जैसी सुगंधित प्रजातियां शामिल हैं। लेकिन अभी भी धान की कई अनजानी किस्में मौजूद हैं। जिनपर काम किया जाना बाकी है।
धान में 62 गुण होते हैं। जो हरेक किस्म को दूसरी से अलग करते हैं। किसी की पत्ती बड़ी होती है तो किसी का दाना। कोई धान की सुगंधित किस्म होती है, तो किसी में कोई सुगंध नहीं होती। इसी तरह धान की फसल पकने में अलग-अलग समय निर्धारित होता है। किसी प्रजाति की फसल 105 दिन में पक कर तैयार हो जाती है तो किसी को पकने में 135 दिन का वक्त लगता है। विश्वविद्यालय ने जिन खास किस्मों को खोजा है। उनमें सबकी अलग-अलग खासियत है। मसलन दो दाना और राम लक्ष्मण में एक ही खोल में दो दाने पाए जाते हैं। कभी-कभी तीन दाने भी मिल जाते हैं। इसी तरह महासमुंद से खोजा गया हनुमान लंगूर में सबसे लंबा दाना पाया जाता है। सराई फूल कमजोरी दूर करने के लिए लाभकारी है। वहीं महाराजी नई माताओं के लिए लाभकारी है। खासतौर से उनके लिए जिन्हें प्रसूति के वक्त ज्यादा रक्त बहने से कमजोरी आई हो। गाथुवन से जोड़ों के दर्द की शिकायत दूर की जा सकती है। नारियल चुडी विशेष रूप से दलदली जमीन और गहरे पानी में उगाया जाने वाला धान है। रोटी चपाती और ब्रेड बनाने के लिए उपयुक्त धान है। वहीं हाथीपंजारा नाम के ही अनुरूप मोटा धान है। तुलसी की मंजरी के जैसा दिखने वाली किस्म है तुलसी मंजरी। वहीं जीरे के अनुरूप दिखने वाली प्रजाती है जीरा धान। इन धान की प्रजातियों के जर्म प्लाज्मा को रायपुर में संरक्षित किया गया है ताकि आने वाली पीढ़ियां भी इनका फायदा उठा सकें।
बहरहाल धान के कटोरे को समृद्ध बनाने के लिए किसान, वैज्ञानिक और विशेषज्ञ दिन-रात मेहनत कर रहे हैं। सूबे के कृषि वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि वो समय भी जल्द आएगा, जब प्रदेश की धान की नई किस्में देश और दुनिया के हिस्सों में भी उगाई जाएंगी। फिलवक्त तो छत्तीसगढ़ में परंपरागत किस्मों के अलावा नई किस्मों की पैदावार लेने का प्रयोग शुरु किया जा चुका है। जो विश्व के सामने एक नजीर पेश करेगा।
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पूर्वजों द्वारा संरक्षित किस्मों की खोज
धान की नई किस्मों की खोज जारी है। इसमें अब केंद्र सरकार भी बढ़चढ़ कर भाग ले रही है। केंद्र द्वारा किसानों को भी प्रोत्साहित किया जा रहा है कि वे भारत सरकार के 2001 में बनाए गए कानून पौध किस्म और कृषक अधिकार संरक्षण के तहत अपनी किस्मों को खुद के नाम से पंजीकृत करवाएं। इसके लिए केंद्र सरकार द्वारा गठित प्राधिकरण के रजिस्ट्रार डॉ रवि प्रकाश कहते हैं कि हमारे पूर्वजों ने ना केवल धान बल्कि दूसरी फसलों के बीजों का सरंक्षण कर नई पीढ़ियों को हस्तांतरित किया। अब हमारा दायित्व है कि हम ना केवल उन्हें खोजें बल्कि बोयें भी। अब केंद्र सरकार ने किसानों को मालिक के रूप में किस्मों का पंजीकरण कराने का अधिकार दे दिया है। ऐसा करके हम नई किस्में खोज रहे हैं, वहीं किसानों को अपने पूर्वजों द्वारा संरक्षित प्रजातियों का मालिकाना हक मिल रहा है। भविष्य में जिससे उन्हें कई फायदे होंगे।
इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय द्वारा विकसित किस्में
महामाया (1995), श्यामला(1997), पूर्णिमा(1997), दंतेश्वरी(1997), बमलेश्वरी(2001), इंदिरा सुंगधित धान(2004), जलडूबी(2006), समलेश्वरी(2006), इंदिरा सोना(2006), कर्मा महसूरी(2007), महेश्वरी(2009), इंदिरा बरानी धान(2010), इंदिरा राजेश्वरी और दुर्गेश्वरी(2011)।
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