शुक्रवार, 27 मई 2011

छत्तीसगढ़ का संघर्ष

नक्सलवाद से जल रहे छत्तीसगढ़ को कभी भोले भाले आदिवासियों के प्रदेश के रूप में जाना जाता था। सूबे के बाशिंदों के लिए "छत्तीसगढ़िया सबले बढ़िया" का नारा ऐसे ही नहीं दिया गया था। लेकिन इस भोले भाले लोगों के प्रदेश में नक्सलवाद एक नासूर की तरह फैला और उन आदिवासियों का जीवन नर्क बना गया, जो उस प्रकृति की गोद में पल रहे थे, जिसे स्वर्ग की संज्ञा दी जाती है। ऐेसे में सबसे ज्यादा क्षोभ का विषय ये है कि जिस छत्तीसगढ़ में आज भी क्राइम रेट अन्य राज्यों की तुलना में बेहद कम है...जिस छत्तीसगढ़ में हत्या जैसे जघन्य अपराधों का आंकड़ा दूसरे राज्यों की तुलना में न्यूनतम है..उसी छत्तीसगढ़ में नक्सल हिंसा में मारे गए लोगों की संख्या में दिनों दिन इजाफा हो रहा है। नक्सलवाद के फैलने और इसके बेलगाम होने के कई कारण हो सकते हैं...अपने अपने स्तर पर राज्य सरकार, विपक्ष, पुलिस अफसर, पत्रकार, मानव अधिकार संगठन, बुद्धिजीवी या अन्य विश्लेषक इसके अलग अलग कारण बता सकते हैं...लेकिन असल कारण की पड़ताल तो तभी की जा सकती है, जब नक्सलवाद से सर्वाधिक प्रभावित, पीड़ित और शोषित आदिवासियों के बीच जाकर उनकी समस्याओं को सुना जाए...उनकी पीड़ा को समझा जाए। लेकिन इस वक्त इस ओर किसी का ध्यान नहीं है। मानव अधिकार संगठन केवल नक्सलियों की मौत पर हल्ला मचाते हैं, राजनीतिक दल नक्सल हमले के बाद अपनी राजनीतिक धार तेज करने के लिए बयानबाजी तक सीमित हैं...राज्य सरकार की अपनी मजबूरियां हैं....मीडिया हर नक्सल हमले को बेहतर से बेहतर कवरेज करने के चक्कर में है...हर नक्सल हमले के बाद सब के पास कुछ ना कुछ है...बस नहीं है तो उन निरीह आदिवासियों के पास सुकून, शांति और निर्भयता..बस नहीं तो आवास के पास इन सवालों के जबाव कि क्या छत्तीसगढ़ के आदिवासियों को कभी न्याय मिलेगा.क्या उन्हें कभी तुच्छ नक्सली हिंसा से छुटकारा मिल पाएगा....क्या देश के नाम शहीद हुए जवानों की आत्मा शांति पा सकेगी...
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