रविवार, 14 मार्च 2010

सवाल नज़रिए का

सवाल नज़रिए का

जी हां, सवाल नज़रिए का है। जब-जब समाज के नज़रिए में बदलाव आता है। समाज में रहने वालों की सोच, उनका कृतित्व, उनका व्यक्तित्व सब बदल जाता है। इसे समझने के लिए प्रेम विवाह का उदाहरण काफी है। एक समय प्रेम विवाह को गलत माना जाता था। समाज के लोग प्रेम विवाह करने वालों को हिकारत की नज़र से देखते थे। लेकिन आज, आज समाज का नज़रिया बदला है। खुद माता पिता चाहते हैं कि उनके बच्चे अपने मन मुताबिक जीवनसाथी चुनें और वे न केवल निसंकोच अपनी सहमति देते हैं बल्कि उनका विवाह भी कराते हैं। तो बात नज़रिए की है, उसमें आए बदलाव की है। देश, काल, परिस्थिति के अनुसार नज़रिए में बदलाव आता ही है। जो बात आज बुरी लग रही है, हो सकता है, आज से पांच साल बाद उसे अच्छा माना जाए। इसलिए हमें किसी एक आवरण में बंधकर रहने की जरूरत नहीं है। समय के साथ बदलिए, क्योंकि न बदलने वाले न तो समय के साथ कदमताल कर पाते हैं न ही खुशनुमा जीवन जी पाते हैं। परिवर्तन प्रकृति का अटल नियम है और सबसे ज्यादा जरूरी है कि हमारा नज़रिया समय के साथ बदले। इसलिए कभी मत भूलिए कि-
जो आज नज़र आता है, हो सकता है कल न हो
ये धरा, ये अंबर और ये जल न हो
इसलिए समय के साथ चलते जाना है
हर परिवर्तन सुधार का एक बहाना ।
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