गुरुवार, 15 अक्तूबर 2015

धान का कटोरा उगल रहा इतिहास के राज़

देश के नक्शे में छत्तीसगढ़ की अब एक नई पहचान बनने जा रही है। अब तक धान उगलने वाली छत्तीसगढ़ की धरती अब पहली से पांचवी सदी का इतिहास उगल रही है। छत्तीसगढ़ में मिल रहे अभिलेखों और इंडो ग्रीक-इंडो सिथियन सिक्कों से पता चलता है कि पहली से पांचवी शती में छत्तीसगढ़ एक महत्वपूर्ण प्राचीन शक्तिशाली व्यापारिक और राजनीतिक केंद्र रहा होगा।
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग भी इस तथ्य को पुष्ट करने के लिए प्रदेश के पुरातात्विक विभाग के साथ मिलकर कई पुरातात्विक साइट्स पर खनन कर रहा है।
हाल ही में सूबे की राजधानी रायपुर से करीब 40 किलोमीटर दूर बलौदाबाजार में पुरातात्विक स्थल डमरू में पहली से पांचवीं सदी के प्रमाण मिले हैं। यहां मिले पकी मिट्टी के अभिलेखों में पांच नए राजाओं के नाम भी पाए गए हैं। अभिलेख ब्राम्ही लिपि में हैं, जिसका परीक्षण भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) मैसूर में हुआ है। डमरू प्रदेश की पहली पुरातात्विक साइट है, जहां मिट्टी के किले की खुदाई की जा रही है। पुरातत्वविदों का दावा है कि डमरू में मिले अभिलेकों की मदद से छत्तीसगढ़ के इतिहास को पहली से पांचवीं सदी से जोड़ने में मदद मिलेगी।
इस बारे में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के अधीक्षक अरुण टी राज कहते हैं कि छत्तीसगढ़ में कहीं-कहीं प्राग-ऐतिहासिक काल (लोअर पैलियोलिथिकल काल) से जुड़ी वस्तुओं के भी प्रमाण मिले हैं। हम प्रदेश में अलग-अलग पुरातात्विक साइट्स पर खुदाई भी कर रहे हैं, या राज्य सरकार द्वारा खनन करवा रहे हैं ताकि इतिहास से पर्दा उठाया जा सके।
डमरू में पुरातत्वविद डॉ. शिवकांत वाजपेयी और राहुल सिंह की देखरेख में खुदाई हो रही है। डॉ.वाजपेयी कहते हैं कि अभिलेखों से जो प्रमाण मिल रहे हैं, उससे स्पष्ट हो रहा है कि सभी राजाओं का स्वतंत्र अस्तित्व था। अभिलेखों में राजाओं के नाम के साथ उनके राजकीय चिन्ह भी अंकित हैं। इसके अलावा कई अभिलेखों में स्वास्तिक के निशान भी मिल रहे हैं। अब तक छत्तीसगढ़ के इतिहास में कौशलक महेंद्र नामक शासक का उल्लेख सबसे पुराना है। इसके बारे में समुद्रगुप्त के प्रयास प्रशस्ति इलाहाबाद स्तंभ अभिलेख में जानकारी मिलती है।
डमरू का पुरातात्विक उत्खनन स्थल मिट्टी के परकोटे वाला गोलाकार गढ़ है। पुरातत्वविदों के अनुसार देश के किसी भी अन्य पुरास्थल पर इस तरह की आवासीय संरचनाएं उत्खनन में नहीं मिली हैं। इसका विस्तार लगभग 42 एकड़ में है, लेकिन अब तक सिर्फ दो एकड़ में ही खुदाई हो पाई है। यहां मिले अभिलेखों से पता चलता है कि डमरू एक महत्वपूर्ण प्राचीन शक्तिशाली व्यापारिक और राजनीतिक केंद्र रहा होगा।
डमरू में मिले मिट्टी के अभिलेखों में पांच नए राजाओं के नाम प्रकाश में आए हैं। इन राजाओं के बारे में अब तक किसी भी खुदाई में जानकारी नहीं मिली है। इसमें महाराज कुमार श्रीश्री धरस्य, श्री महाराज रूद्रस्य, महाराज श्री रस्य, महाराज कुमार श्री मट्टरस्य और सदामा श्री दामस्य का नाम है। उत्खनन में 40 मिट्टी के मुद्रांक मिले हैं, जिनमें अभी तक 9 मिट्टी के मुद्रांकों के अध्ययन के बाद छत्तीसगढ़ के पहली सदी से लेकर पांचवीं सदी ईस्वी के मध्य के नए शासकों के नाम सामने आए हैं।
डमरू की खुदाई में प्रचीन आवासीय गोलाकार संरचना के अलावा चूल्हे, प्रचीन मिट्टी के बर्तन, विभिन्न कालखंडों के सिक्के, अर्धकीमती पत्थरों के मनके, पकी हुई मिट्टी के खिलौने, हाथी दांत के कंघे और लौह एवं ताम्र उपकरण भी मिले हैं।
छत्तीसगढ़ पुरातत्व विभाग के संचालक राकेश चतुर्वेदी मानते हैं कि डमरू में मिल रहे अभिलेख पांचवी शताब्दी के दौरान छत्तीसगढ़ के इतिहास की जानकारी में देने में सहायक होंगे। फिलहाल इन पर अध्ययन के लिए भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग की मदद ली जा रही है।
छत्तीसगढ़ के कांकेर में भी पुरातात्विक महत्व के लगभग 4000 साल पुराने सिक्कों और अंगूठी के आकार के सोने के आभूषण मिले हैं। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग को मिले इन सोने के आभूषणों पर जनजातीय कला अंकित है। इन पर घोड़े और बकरे जैसे जानवरों के चित्र उकेरे गए हैं। साथ ही सोने की दो अंगूठी भी मिली है। ऐसा माना जा रहा है कि ये सोना ताम्रप्रस्तरयुगीन संस्कृति के हैं। उस समय जानवरों को सोने पर उकेरने की प्रथा के प्रमाण मिलते हैं।
एएसआई को कांकेर के एक गांव हथकोडेंल में तालाब की खुदाई के दौरान यह यह आभूषण मिले। तालाब की खुदाई के दौरान ग्रामीणों को यह आभूषण मिले। इन पर कलात्मक सींग का चित्र भी उकेरा गया है।
अभी इस बात की जानकारी नहीं मिल पाई है कि यह सोना किस काल का है। कांकेर में राजपरिवार लंबे समय तक सक्रिय था। इसलिए इन सोने के आभूषणों का अलग महत्व समझा जा रहा है। हालांकि वरिष्ठ पुरातत्वविद इसे न तो गहना मान रहे हैं, न ही सोने का सिक्का ही मानने को तैयार है। उनका मानना है कि यह किसी राजपरिवार का राजप्रतीक हो सकता है।
वरिष्ठ पुरातत्ववेत्ता निरंजन महावर का कहना है कि प्राचीन समय में जब किसी नए तालाब की खुदाई होती थी, तो तालाब का आकाश से विवाह कराया जाता था। इसमें तालाब के बीच में एक लकड़ी का स्तंभ स्थापित किया जाता था। उस समय सोना दान करने की परंपरा भी थी। ऐसा माना जाता था कि तालाब का विवाह नहीं कराने से या तो क्षेत्र में बारिश नहीं होगी, या फिर तालाब में पानी नहीं रुकेगा।
वरिष्ठ पुरातत्ववेत्ता निरंजन महावर यह भी कहते हैं कि सोने के इन टुकड़ों को देखकर यह अनुमान लगाया जा सकता है कि यह किसी राज्य के प्रतीक हैं। कांकेर और उसके आसपास दसवीं शताब्दी से पहले वाकाटक राजाओं का राज था। उसके बाद दक्षिण भारत के कई राजाओं ने राज किया। संभवत: यह सोने के प्रतीक चिन्ह उस समय प्रचलन में रहे हों। 
पुरातात्विक सलाहकार एके शर्मा इस बात से इत्तेफाक नहीं रखते। वे कहते हैं कि यह सोने के सिक्के नहीं है। विश्व में कहीं भी चार हजार साल पुराने सिक्कों का प्रचलन नहीं रहा है। भारत में सिक्कों का प्रचलन 2500 साल पहले शुरू हुआ। हो सकता है कि यह रोमन आक्रमण का प्रमाण हो। राजिम में रोमन आए थे, इसके प्रमाण मिले हैं। यह कांकेर तक भी जा सकते हैं।
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के अधीक्षक पुरातत्ववेत्ता अरुण टी राज कहते हैं कि यह डॉलर जैसा दिखने वाला सोने का छल्ला है, जिस पर पशु के चित्र उकेरे गए हैं। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के अधिकारियों को इसकी जानकारी दी गई है। जांच में ही स्पष्ट हो पाएगा कि यह सोना किस समय का है। हो सकता है कि उस समय इस्तेमाल होने वाले गहने हों, लेकिन अभी स्थिति स्पष्ट नहीं है।
छत्तीसगढ़ के एक अन्य पुरातात्विक महत्व के स्थल तरीघाट की खुदाई में टेराकोटा का जिराफ मिला है। पुरातत्वविद् इसके 2500 से 3000 वर्ष पुराना होने का अनुमान लगा रहे हैं। तरीघाट राजधानी रायपुर से 35 किलोमीटर दूर पाटन के पास है। यहां लंबे समय से खुदाई चल रही है। वर्ष 2013-14 की खुदाई में सबसे महत्वपूर्ण टेराकोटा के जिराफ को माना जा रहा है। इससे पहले भोपाल (मध्यप्रदेश) के पास भीमबेटका की गुफा में जिराफ के शैलचित्र मिले हैं। यह दस हजार से 20 हजार साल पुराने हैं। वहीं ओडिशा के कोर्णाक के सूर्य मंदिर में भी जिराफ अंकित है। इसे 12वीं-वीं शताब्दी का माना जाता है। ऐसा अनुमान लगाया जा रहा है कि टेराकोटा का जिराफ देश में पहली बार तरीघाट में पाया गया है।
तरीघाट में खोज कर रहे पुरातत्वविद् जेआर भगत ने बताया कि यहां इंडो ग्रीक और इंडो सिथियन सिक्के मिले हैं। इससे यह अनुमान लगाया जा रहा है कि तरीघाट एक अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक सेंटर रहा होगा। व्यापार होने के कारण स्थानीय लोगों ने बाहरी जीव-जंतुओं को भी देखा होगा, जिसके बाद यहां उसे टेराकोटा में उकेरा गया होगा। विशेषज्ञों के अनुसार, तरीघाट में टेराकोटा के जिराफ मिलने से यह भी स्पष्ट हो रहा है कि दूसरी और तीसरी सेंचुरी में छत्तीसगढ़ एक अमीर राज्य की श्रेणी में आता रहा होगा और यहां से बड़े पैमाने पर आयात-निर्यात होता रहा होगा।
पुरातत्वविदों के अनुसार तत्कालीन राजाओं ने दक्षिण अफ्रिका का दौरा किया होगा। इस दौरान इनको जिराफ देखने को मिला होगा। तरीघाट की खुदाई के लिए आर्कियोलाजिकल सर्वे आफ इंडिया से अनुमति ली गई थी। लेकिन इसकी खुदाई की समय सीमा 30 सितंबर को ही समाप्त हो गई है। छत्तीसगढ़ के संस्कृति और पुरातत्व विभाग की ओर से एएसआई को खुदाई की तारीख बढ़ाने के लिए पत्र लिखा गया है।
छत्तीसगढ़ में जोक नदी के किनारे भी ढाई लाख साल पुराने पाषाण के हथियार मिले हैं। महासमुंद के पिथौरा के पास सपोर गांव में प्राग-ऐतिहासिक काल के हैंडएक्स (हस्त कुठार) मिले हैं। प्रदेश में प्राग-ऐतिहासिक काल का पहला हैंडएक्स मिला है। इसके साथ ही जोक नदी के किनारे पहली बार एक ही स्थान पर प्राग-ऐतिहासिक काल से लेकर ऐतिहासिक काल तक के प्रमाण मिले हैं। वहीं कसडोल के अमोदी में तारा के आकार के ईंटों से बने मंदिर के प्रमाण भी मिले हैं। हालांकि अभी इसकी खुदाई शुरू नहीं हुई है।
पुरातत्वविद शिवाकांत वाजपेयी और अतुल प्रधान कहते हैं कि जोक नदी का उद्गम ओडिशा से हुआ है। प्रदेश में यह नदी बागबाहरा के खट्टी गांव से शिवरीनारायण तक है। लगभग 140 किलोमीटर लंबी नदी के किनारे मौजूद गांवों का पुरातात्विक सर्वे करने पर प्राग-ऐतिहासिक काल के प्रमाण मिले हैं। इसमें लघु पाषाण काल के उपकरण भी मिले हैं। हैंडएक्स पाषाण उपकरणों में पहला हथियार माना जाता है।

जोक नदी के किनारे अध्ययन करने पर प्राग-ऐतिहासिक काल के उपकरण और जीवन शैली के बारे में जानकारी मिल रही है। इसके साथ ही उस समय के वातावरण के बारे में भी जानकारी मिल सकती है। प्रदेश में अभी तक लोअर पैलियोलिथिकल काल के अन्य उपकरण मिले थे, लेकिन हैंडएक्स पहली बार मिला है।
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