छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह ने अपनी
तीसरी पारी के शुरुआती कुछ फैसलों से अविभाजित मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री रहे
अर्जुनसिंह की यादें ताजा कर दी हैं। रमन सिंह ने पद संभालते ही ऐलान किया कि पांच
प्रमुख लघु वनोपजों की शासकीय खरीदी की जाएगी। इससे इन लघु वनोपजों के व्यापार से
फल-फूल रहा भाजपा से जुड़ा व्यापारी वर्ग नाराज हो गया है। अब ये लोकसभा चुनाव के
पहले आदिवासी मानस को जीतने का कोई फार्मूला है या फिर अपने ही कुछ लोगों के पर
कतरने की योजना।
कारण चाहे जो भी हो, इस योजना से आम आदिवासी की कुछ तकलीफें तो जरूर
दूर होंगी।
अब छत्तीसगढ़ में पांच लघु वनोपजों की
सरकारी खरीदी की जाएगी। इसमें इमली, चिरौंजी, कोसा-ककून,
महुआ-बीज और लाख शामिल है। इससे जंगलों से इन वस्तुओं को संग्रहित करने वाले
आदिवासियों को सीधा लाभ मिल पाएगा। केंद्र और राज्य सरकार, दोनों ही इस फैसले पर
सहमत हैं। इसलिए केंद्र भी जल्द ही इन वनोपजों का समर्थन मूल्य भी घोषित करने की
तैयारी कर रही है। दूसरी ओर राज्य सरकार लघु वनोपज संघ के मार्फत इस व्यवस्था को
पुख्ता बनाने के शुरुआत कर चुकी है। हालांकि 44 प्रतिशत वनों से आच्छादित
छत्तीसगढ़ में वनोपजों की शासकीय खरीदी का ऐलान तब किया जा रहा है, जब उसके पड़ोसी
राज्य मध्यप्रदेश ने हर्रा, साल बीज समेत कई जंगलों में पैदा होने वाली कई अहम
वस्तुओं को राष्ट्रीयकरण से मुक्त कर दिया है। वहीं दूसरे पड़ोसी राज्य ओडिसा ने
भी हर्रा, चिरौंजी, कोसा, महुआ बीज, साल बीज और गोंद समेत 91 लघु वनोपजों की
शासकीय खरीदी समाप्त कर दी है। लेकिन रमन सिंह ने अपने संकल्प पत्र में किया वादा
निभाते हुए ऐलान किया है कि इमली, चिरौंजी, कोसा-ककून,
महुआ-बीज और लाख की खरीदी लघु वनोपज सहकारी समितियों के माध्यम से तेन्दूपत्ते
की तर्ज पर की जाएगी। राज्य में इन लघु
वनोपजों का लगभग 450 करोड़ रूपए का कारोबार
है।
मुख्यमंत्री रमन सिंह कहते हैं कि, “लघु वनोपज सहकारी समितियों के माध्यम
से इनकी खरीदी होने पर लगभग 14 लाख
वनवासी परिवारों को इनका उचित मूल्य प्राप्त होगा। सरकार पहले इनकी दर निर्धारित
करेगी, फिर इनकी खरीदी की जाएगी। जिन क्षेत्रों में इन लघु वनोपजों का उत्पादन होता है, वहां के साप्ताहिक हाट-बाजारों में
इनकी खरीदी की व्यवस्था की जाएगी। इसके लिए भी मैंने 19
दिसम्बर
को ही मंत्रालय में अधिकारियों की बैठक में उन्हें सभी
तैयारी पूर्ण करने के निर्देश दे दिए हैं”।
जिस तेंदूपत्ता की तर्ज पर पांच अन्य वनोपजों
की खरीदी का फैसला लिया गया है। अविभाजित मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन
सिंह ने 1988 में तेंदूपत्ता नीति में परिवर्तन करते हुए इसकी शासकीय खरीदी की
घोषणा की थी। इसके बाद 1990 में पहली बार तेंदूपत्ता की शासकीय खरीदी की गई।
हालांकि तेंदूपत्ता का राष्ट्रीयकरण तो 1964 में ही कर दिया गया था, लेकिन तब इसका
सीधा लाभ संग्राहकों को नहीं मिल पाया था। लेकिन अर्जुनसिंह ने सीधे संग्राहकों को
लाभ पहुंचाने की नीयत से इसकी नीति में बदलाव किए थे। लेकिन राजनीतिक जानकार बताते
हैं कि इसके पीछे की मंशा राजनीतिक लाभ लेने की तो थी ही, साथ ही भाजपा समर्थित
व्यापारी वर्ग को कमजोर करने की भी थी। अब रमन सिंह तेन्दूपत्ते की तर्ज पर इमली, चिरौंजी, कोसा-ककून,
महुआ-बीज और लाख की खरीदी लघु वनोपज सहकारी समितियों के माध्यम से करने जा रहे
हैं। ऐसे में भाजपा से जुड़े व्यापारी वर्ग ने इसका विरोध शुरु कर दिया है। ऐसा
होना लाजिमी भी है क्योंकि बस्तर के इलाके में व्यापार-व्यवसाय करने वाले व्यापारी
भाजपा के समर्थक माने जाते हैं।
छत्तीसगढ़ लघुवनोपज व्यापार महासंघ के
राष्ट्रीय महासचिव मुकेश धोलकिया इसे अफसरों के तानाशाही फैसले से जोड़कर देख रहे
हैं। धोलकिया का कहना है कि नीति निर्धारक आला अफसर पांचों लघुवनोपजों का
राष्ट्रीयकरण कर मुक्त और स्वस्थ बाजा की प्रतिस्पर्धा को नकराते हुए खरीदी का रूप
बदलना चाह रहे हैं। मुकेश कहते हैं कि इससे वनवासियों का शोषण ही बढ़ेगा। वनोपजों
का संग्राहर अपनी उपज को स्थानीय बाजार में ही बेचने को बाध्य होगा। नई नीति के
तहत लघुवनोपज को दूसरे स्थानों पर ले जाकर बेचना अपराध हो जाएगा। मुकेश ये भी आरोप
लगाते हैं कि प्रदेश में हर्रा का राष्ट्रीयकरण पहले ही कर दिया गया था। राज्य
सरकार हर साल औसतन 45 से पचास हजार क्विंटल ही खरीदी कर पाती है। जबकि राज्य में
हर्रे का कुल उत्पादन करीब दो लाख क्विंटल है। लेकिन हर्रा की शासकीय खरीदी होने
के बाद बचा हुआ हर्रा कोई व्यापारी नहीं खरीद सकता और वह बर्बाद हो जाता है।
बस्तर चेम्बर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्रीज जगदलपुर
के अध्यक्ष भंवर बोथरा कहते हैं कि हम ऐसे निर्णयों का पहले भी विरोध जता चुके हैं
और भविष्य में भी विरोध करते रहेंगे। हम चाहते हैं कि संग्राहकों को उनकी उपज और
संग्रहित वस्तुओं का उचित मूल्य मिले। लेकिन जब एकाधिकार की बात आती है तो चाहे
व्यापारी हो या अन्य, वो उत्पादकों का शोषण ही करता है। बोथरा कहते हैं कि जिन
वनोपजों की शासकीय खरीदी का ऐलान किया गया है। उसमें “इमली” भी शामिल है। जबकि इमली वनोपज की श्रेणी में नहीं आती है। भारतीय वन
अधिनियम 1927 में इमली को वनोपज में उल्लेखित नहीं किया गया है। अलग-अलग राज्यों
ने भी, जहां इमली प्रचुरता में पाई जाती है, इसे कहीं मसाले तो कहीं सब्जी या
किराना की श्रेणी में रखा है।
प्रधान मुख्य वन संरक्षक धीरेंद्र शर्मा कहते
हैं कि अच्छे कामों का भी विरोध तो होता ही है। सरकार संग्राहक को ही वनोपज का
मालिक बनाना चाहती है। उसे उचित मूल्य दिलवाना चाहती है। इसलिए ये फैसला लिया गया
है। 1984 के पहले तक यही होता रहा है। लेकिन 1984 के बाद इसे खुले बाजार में बेचने
की अनुमति दी गई थी ताकि संग्राहक को बाजार की प्रतिस्पर्धा के चलते सही दाम मिल
सके। लेकिन ऐसा हुआ ही नहीं। उल्टे आम आदिवासियों को, जो वनोपज का संग्रह करते
हैं, कोई लाभ ही नहीं मिला। इसलिए राज्य सरकार ने वनोपज व्यापार विनियमन अधिनियम
1969 के तहत अब पांच वनोपज की सरकारी खरीदी करने का फैसला लिया है। इसके तहत
समर्थन मूल्य तय करके हम वनोपज की खरीदी भी करेंगे। यदि संग्राहकों को खुले बाजार
में यदि ज्यादा दाम मिलता तो वे वहां भी अपनी वस्तुएं बेच सकेंगे। लेकिन व्यापारी
कम दामों पर उसे नहीं खरीद पाएंगे क्योंकि कम से कम तय समर्थन मूल्य तो संग्राहकों
को मिलेगा ही। इसकी खरीदी के लिए राज्य सरकार समानांतर व्यवस्था करेगी ताकि
व्यापारियों द्वारा तय मूल्य ना मिलने पर खुद सरकार वनोपज की खरीदी कर सके।
छत्तीसगढ़ का 44 प्रतिशत इलाका वनों से
आच्छादित है। वन क्षेत्रफल और वन राजस्व के हिसाब से छत्तीसगढ़ देश का तीसरा बड़ा
राज्य है। यहां की जलवायु भी जैवविविधता वाली है। यही कारण है कि यहां हर तरह के
वनोत्पाद पैदा होते हैं। लकड़ी के अलावा करीब 200 लघु वन उत्पादों पर स्थानीय
आदिवासियों की आजीविका निर्भर रहती है। लेकिन इनका सही दाम संग्राहक यानि जंगलों
से बीनने वाले आदिवासियों को नहीं मिल पाता। यहां तक कि बस्तर के आदिवासी चिरौंजी
(चारोली) जैसे मेवे को नमक के बदले व्यापारियों को बेच देते हैं। बस्तर के हाट-बाजारों
में आज भी वस्तु विनिमय (वस्तु के बदले वस्तु) की प्रणाली चलती है। यही कारण है कि
बाहरी व्यापारी भोले आदिवासियों को चावल और नमक देकर मंहगे वनोत्पाद खरीद लेते
हैं। जिससे उन्हें उनकी मेहनत का सही प्रतिफल नहीं मिल पाता है।
उच्च पदस्थ एक अधिकारी ने नाम ना छापने की शर्त
पर तहलका को बताया कि हाल ही में संपन्न हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा ने आदिवासी
विधानसभा सीटों पर मुंह की खाई है। बस्तर की 12 सीटों में से 8 सीटें कांग्रेस के
खाते में चली गई हैं। आदिवासी मतदाताओं की नाराजगी दूर करने के लिए राज्य सरकार ने
बिचौलियों को दूर कर सीधे जंगल की उपज बटोरने वाले संग्राहकों को उपकृत करने की
योजना बनाई है। इसे राजनीति से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए। सरकार की मंशा आखिरी
व्यक्ति तक लाभ पहुंचाने की है। यही कारण है कि पांच वनोपजों को सरकारी खरीदी किए
जाने का फैसला लिया गया है।
हालांकी बस्तर से भाजपा के सासंद दिनेश कश्यप भी
सरकार के इस निर्यण से खुश नजर नहीं आ रहे हैं। वे कहते हैं कि भाजपा की आगामी
बैठक में वे इस बात को पार्टी फोरम में रखेंगे। इससे पार्टी के कार्यकर्ताओं में
विद्रोह की स्थिति हो गई है।
बहरहाल छत्तीसगढ़ प्रचूर वनसंपदा का मालिक है,
लेकिन उसमें रहने वाले वनवासियों को हमेशा ही गरीबी और फांके में जीवन काटना पड़ा
है। अगर सरकार की नई योजना से वनवासी ही अपनी उपज का मालिक बन वाजिब हक प्राप्त
करता है तो ये उसके लिए किसी “वनदेवी” से मिले किसी वरदान से कम नहीं होगा।
फिर चाहे इससे मुख्यमंत्री रमन सिंह या फिर उनके दल को आगामी लोकसभा में सियासी
लाभ ही क्यों ना मिले। इससे कम से कम कांग्रेस को तो गुरेज नहीं होना चाहिए।
आखिरकार मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के कांग्रेसियों के पितामाह कहे जाने वाले अर्जुन
सिंह भी तो यही दांव-पेंच खेलते रहे हैं।
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